मनुजता का ऋण भरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥
शैशव रैन चैन मे सोया।
किशोर,ज्ञान ध्यान मे खोया॥
युवा हो,इतिहास मे अटका।
अंकगणित के जाल मे भटका॥
विद्या अध्यन,जीवन वृत्ति।
गृहस्थ आश्रम,वानप्रस्थि॥
से आगे अब पग धरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥
उऋण उस माँ का होना है,
जिसने "मल" सिर मेरा ढोया।
उऋण उस "तात" का होना,
जिसने द्वार नित पोंछा धोया॥
सारा जीवन स्वयं,स्वार्थ मे,
उस कृतघ्नता से डरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥
देर रात सपनों मे आकर,
उन बच्चों ने फिर झकझोरा।
खुले गगन के नीचे रहते,
अक्षर ज्ञान का,कागज कोरा॥
उस कोरे कागज मे बच्चों के,
सतरंगी सपने भरना है।
यम के दूत खड़े दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥
शतकों से जो दबे,सताये,
उनका भी कुछ मुझ पे हक था।
जैसे पा पाये हम सब कुछ,
नींव मे ये थे,कोई न शक था॥
वक्त आज आहुति देने का,
हवन-मंत्र पूरे पढ़ना है।
मृत्यु बाट जोहे दरबाजे,
काम अभी ढेरों करना है॥
विजय सहगल



5 टिप्पणियां:
निशब्द!!!!!!!!!!!🙏🙏
बहुत खूब अति सुंदर
अत्यंत ख़ूबसूरत रचना।
साधुवाद।
काम अभी ढेरों करना......
काम तो कभी पूरा ही नहीं होता!!
लेख का भावना अति सुंदर।
- शंकर भट्टाचार्य।
अति सुंदर भाव की अभिव्यक्ति । -- खत्री योगेन्द्र आजाद, पटना ।
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