मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

#भारतीय किसान

 

#भारतीय किसान#




आज का तो नहीं मालूम पर 1970 के दशक मे हमारे समय स्कूल की  कक्षा आठवीं से लेकर कक्षा बारहवीं तक की हिन्दी और अँग्रेजी के परीक्षा प्रश्न पत्र मे तीन चार टॉपिक मे से किसी एक विषय पर चार-पाँच सौ शब्दों मे निबंध लिखने का प्रश्न होता था। हमारी मित्र मंडली ने इस प्रश्न के सफल समाधान हेतु  हेतु कुछ अचूक नुस्खे ढूंढ लिये थे। हम लोगो ने सौ-डेढ़ सौ शब्दों का एक अनुच्छेद तैयार कर लिया था। जैसे "भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसकी अस्सी प्रतिशत आबादी गाँव मे निवास करती है जो कृषि पर निर्भर है।" निबंध की समाप्ती पर उपसंहार के रूप मे  प्रायः "साहूकारों के उधार के चक्रव्यूह के कारण किसान गरीबी के बीच  जन्म लेता है, गरीबी मे ही पलता-बढ़ता है और गरीबी मे ही मर जाता है" इस तरह उसका पूरा जीवन गरीबी मे ही व्यतीत हो जाता है"।

उक्त पैरा को हम सभी घोंट घोंट कर हिन्दी और अँग्रेजी मे रट लेते थे। प्रश्न पत्र मे निबंध खेल, विज्ञान, त्यौहार के साथ साथ कृषि के विषय पर भी होता था। हम सभी निबंध का शीर्षक प्रश्न पत्र के अनुसार लिख देते और उक्त रटा हुआ पैराग्राफ निबंध के शुरू और आखिर मे जरूर पेल देते। बीच मे जो कुछ आड़ा-तिरक्षा लिख लिखा कर  परीक्षा उत्तीर्ण हो जाती थी। इस तरह हम छात्रों सफलता के लिये किसान-कृषि-खेती-किसानी का इस्तेमाल कर उनको  माध्यम बना या कहें किसान की  पीठ पर बैठ सफलता प्राप्त कर परीक्षा उत्तीर्ण हो  जाते थे या यूं  कहे अपना उल्लू सीधा कर लेते थे।  

आज चालीस पचास साल बाद भी परिस्थितियाँ बहुत ज्यादा बदली नहीं है। हालात ज्यों के त्यों है। किसान उसी गरीबी के चक्रव्यूह मे उलझा है। बचपन मे हम जैसे  स्वार्थी छात्र शब्दों के माध्यम किसान का इस्तेमाल कर सफलता प्राप्त करते थे आज बड़े बड़े राजनैतिक क्षत्रप, तथाकथित किसान नेता, अन्य उधयोग धंधों और मजदूर नेता भोले भले किसानों का इस्तेमाल उसी तरह अपना उल्लू सीधा कर रहे है। स्थिति और परिस्थितियाँ आज भी वैसी ही है। छोटा और गरीब किसान अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये संघर्षरत है वो फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्यों के लिये कैसे संघर्ष करे? उसकी न्यूनतम चिकित्सा आवश्यकतायेँ छाड़-फूंख और टोटके-तमनों से होती है वो कैसे मंडियों के नियम कायदे और टैक्स से बचे? जिस किसान की न्यनतम शिक्षा काला अक्षर भैंस बराबर रही वो कैसे किसी कानूनी पेचीदगियों से पार पा सके? स्वतन्त्रता के 73 साल बाद भी ये सवाल अनुत्तरित है। किसान  तो पहले भी इन राजनैतिज्ञों का शिकार रहा है और आज भी एक मोहरे की तरह स्तेमाल किया जा रहा है, किसान हमेशा  छला गया, लूटा गया, कभी सरकारी ओहदे दारों द्वारा, कभी मंडी के दलालों और आढ़तियों द्वारा और कभी विचौलियों द्वारा। जिन्होने उसे आज भी साहूकारों के चक्रव्यूह दलालों के चंगुल से बाहर नहीं आने दिया।

जो दोगले नेता पिछले 73 साल से न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून न बना सके वे आज दहाड़ दहाड़ कर इसकी मांग कर रहे है। वे भूल जाते है कि यदि कानून बनाने से ही समस्या हल हो जाती तो उन जैसे छद्म किसानों द्वारा आए दिन  रेल, सड़क को रोकने/बंद कराने के विरुद्ध भी कानून है, उनका वे क्या हश्र कर रहे है?  

जहां एक शिक्षित घर के चार सदस्य भी किसी मसले पर एक राय नहीं होते? एक गृह  सोसाइटी मे सभी रहवासी किसी मुद्दे पर एकमत नहीं होते? किसी धर्म/संप्रदाय/समाज के सभी लोग एक मत नहीं हो पाते तो  देश के समस्त राजनैतिक दलों का किसानों के मामले मे एक राय होना शंका पैदा करता है!! भोले भले किसानों को बरगला कर उनकी आड़ मे ये   राजनैतिज्ञ अपने बजूद की हारी हुई लड़ाई को जीतने की कोशिश कर रहे है। इनकी कहीं  कोई प्रतिवद्धतायेँ देश की जनता, देश के किसानों या देश के लिये भी नहीं है। ये सभी स्वार्थी नेतागण कहीं न कहीं, कभी न कभी सत्ता मे रहे  है, तब इन्होने कभी देश के लोगो, किसानों, गरीबों, दबे, वंचित लोगो के लिये न्यूनतम मूल्य का कानूनी जामा, मंडी मे फसल के बेचने की बाध्यता आदि के लिये कभी  कुछ नियम/कानून  नहीं बनाया। आज जब भ्रष्टाचार, परिवारवाद, भाई भतीजा वाद के कारण इनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा तो चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज़ पर देश के सामने किसानों के पक्ष मे स्यापा कर रहे है, झूठे  घड़ियाली आँसू बहा कर ये सारे दलों के क्षत्रप एक स्वर मे बंद के समर्थन एकजुट हो गए।

हमने अपने बैंक सेवा के दौरान किसानों की फसल को विचौलियों के माध्यम से बोली लगाकर दलालों के गिरोह द्वारा लुटते-पिटते देखा है। मंडी के इंसपैक्टर राज जो खरीदने और बेचदार किसान से मंडी टैक्स के रूप करोड़ो रुपए एकत्र करते है और इस पैसे से मंडी कमेटी के सदस्य एवं पदाधिकारी सुविधाओं का उपभोग कर विलसतापूर्ण जीवन व्यतीत करते है। कदाचित ही किसानों को कोई लाभ इन मंडियों से प्राप्त होता हो।

वास्तव मे यदि किसानों से संबन्धित कानून मे कोई खामी लगती है तो शब्द दर शब्द, पॉइंट वाइज़ चर्चा हो सकती है लेकिन सीधे ही संसद द्वारा पारित कानून को वापस लेने की तुक तार्किक नहीं लगती। देश के काननों के निर्माण करने के लिए ही विधायिका अस्तित्व मे है।  अन्यथा गली-मुहल्ले, गाँव नगर के लोगो की मांग पर कानून बनाए या बापस लिए जाने लगे तो कैसी अव्यवस्था होने लगे? ये विचारणीय प्रश्न है।

सरकार और वास्तविक किसानों को मिल बैठ कर वृहद चर्चा कर कुछ निर्णय या सर्वसम्मत निर्णय निकालने की आवश्यकता है।

विजय सहगल     

 

1 टिप्पणी:

P.c.saxena ने कहा…

आपने व्यंग्य के माध्यम से से कड़ी बात कह दी है हकीकत सभी जानते हैं किसान बहाना है राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटियां सेक रही है लेकिन इससे इन पार्टियों को कुछ हासिल होने वाला नहीं है