सोमवार, 14 सितंबर 2020

मान न हम रखने पाये


"मान न हम रखने पाये"


 



लड़े जो देश की खातिर उनका,
मान न हम रखने पाये?
लज्जित है हम, "देश के वीरों",
कैसे "कृतघ्न" उस माँ के जाये॥


लड़े जो सीमा, देश की खातिर।
जान हथेली पर थी तब आखिर॥
सीमा पर तब जान लड़ाई।
बड़ी कठिनता "मुक्ति" पाई॥
कैसे "शिव" की हम संताने?
राष्ट्र भक्ति भी न जाने?
शीश झुका दुश्मन का तुमने
वीरों, देश का मान बढ़ाया।
हा शोक! दुर्भाग्य हमारे,
रूप "दोगला" तुम्हें दिखाया॥


राह मे "युद्धवीर" जो आया।
उसका वो सम्मान न भाया?
तुम निर्लज्ज कुमारग मति के।
अधम, नीच, पाथ पतित हे॥
हिंसा, विरुद्ध, वीर तुमने की।

दोष "नयन लहू" भरने की॥
जिसने देश का मान बढ़ाया।
अपमानित कर उसे गिराया॥
"शूर वीर" से कर अधिमाई।
हे नर, लाज तनिक न आई॥


थी कायरता, न थी शान।
ये नपुंसकता की पहचान॥
शर्मसार हैं, हर जन, मन मे।
कैसे कपूत हे "शिव", माँ जन्मे॥
कैसे कपूत हे "शिव", माँ जन्मे॥

विजय सहगल































 कैसे कपूत हे "शिव", माँ जन्मे॥ 

विजय सहगल 


4 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

गज़ब ही लिखते हैं सर।

शंकर भट्टाचार्य ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लेख है!
सबसे अच्छा लगा लेख का भाषा।
सहगल साहब आप ऐसे ही लिखते रहिए।
साधुवाद के साथ - शंकर भट्टाचार्य।

Ganguli ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा है सर

विजय सहगल ने कहा…

vijay jha from raipur on whatsapp
सहगल साहब बहुत बेहतरीन लाजवाब और उन हरामखोर खुद गर्ज लोगों के मुँह पर तमाचा दुख होता है सम्मानीय शूरवीर के साथ अमानवीय व्यवहार होता रहा लोग मूकदर्शक देखते रहे बहुत बहुत साधुवाद ईश्वर करें आपकी लेखनी को बल मिले आपका उतशाह कायम रहे धन्यवाद