"अंडमान
निकोबार"
आठ नवम्बर 2002 को मेरा परिवार सहित अंडमान
जाना तय हुआ। जब मन की अभिलाषा पूरी हो तो मिलने बाली खुशी की कल्पना नहीं की जा
सकती। कोलकता से पोर्टब्लेयर की सुबह छह बजे के फ्लाइट थी। तभी एक अपसगुन के बारे
मे सूचना प्राप्त हुई की वामपंथी
पार्टियों ने बंगाल बंद का आवाहन प्रातः 6 बजे से 24 घंटे के लिये किया है। सारी
सेवाएँ बंद रहेंगी जैसे, रेल,
हवाई, सड़क,
टेम्पो, ऑटो,
टैक्सी। चिंता होना स्वाभाविक थी। जिस यात्रा की महीनों से तैयारी हो उसमे विघ्न
पड़ता दिखाई देने लगा। बैसे होटल से प्रातः चार बजे निकलने का प्रोग्राम था। इसी
चिंता मे रात भर नींद नहीं आई और हम लोग रात एक बजे ही टैक्सी से एयरपोर्ट के लिये
निकाल लिये। लेकिन वामपंथियों को भी लगता था सारी रात नींद नहीं आई वे भी झुंड के
झुंड प्रातः छह बजे के पूर्व ही रात एक बजे जगह जगह सड़क रोक कर बंद का आवाहन समय
के पूर्व ही कर चुके थे। रात मे एक दो जगह रोका पर जैसे तैसे आगे बढ़ते रहे पर
अंततः एयरपोर्ट से लगभग एक किमी॰ पूर्व उनके आंदोलन का शिकार हो ही गये। टैक्सी से
सामान उतार एयरपोर्ट तक खींचते खींचते जैसे तैसे पहुंचे। तब कुछ चैन की सांस आयी। एयरपोर्ट
पर पता चला कि पोर्टब्लेयर की फ्लाइट जाएगी,
तो सारे कष्ट भूल यात्रा के समय का इंतज़ार करने लगे। लेकिन बिलकुल ऐन वक्त पर
बताया कि देश के किसी भी हिस्से से न फ्लाइट आयेगी और न ही जायेगी। सभी के साथ
समाजवादी समान व्यवहार। अंततः अंडमान की फ्लाइट भी निरस्त हो गई।
अब तक सब कुछ अनिश्चित था। इस महा बंद मे
कहाँ रुकेंगे खाने पीने की क्या व्यवस्था होगी और सबसे बड़ी बात क्या और कब पोर्ट
ब्लेयर के लिए जाएंगे, जाएंगे भी या
नहीं? इन्ही उहाँ पोह की स्थिति मे एयर पोर्ट पर
हजारों यात्री धीरे धीरे एकत्रित हो गये। एयर पोर्ट की स्थिति रेल्वे प्लेट फोर्म
की तरह हो चुकी थी। हर कोने जहां मे लोग चादर बिच्छा आराम की मुद्रा मे आ चुके थे।
कहते है कि बंगाल मे बरसात और बंद का आवाहन कब हो जाये पता नहीं चलता। इससे पहले
21 मई 1991 मे जगन्नाथ पुरी की यात्रा के समय
खड़गपुर मे स्व॰ श्री राजीव गांधी की हत्या के अगले दिन सुबह से 24 घंटे
के बंद को झेल चुका था। चूंकि बंगाल मे थल
(रेल यात्रा), नभ (हवाई) यात्रा के पूर्व 24-24 घंटे के बंगाल बंद को झेल चुका
था अतः मैंने अब निश्चय कर लिया कि भविष्य मे समुद्र यात्रा की शुरुआत कम से कम बंगाल
से हरगिज न करूंगा कहीं ऐसा न हो कि तब भी मुझे फिर 24 घंटे के बंद का सामना करना
पड़े।
लेकिन ईश्वर का कृपा रही की अगले दिन हमे
पोर्ट ब्लेयर की फ्लाइट सही समय मिल गई और इस तरह हम नौ बजे के करीब अंडमान की
पावन धरती पर कदम रखने मे कामयाब रहे। हवाई अड्डे पर उतरते ही एक उत्साह पूर्ण
रोमांच का अनुभव था। हवाई अड्डे से बाहर निकल टैक्सी ली ताकि होटल की तलाश की जा
सके। बहुत ही सुंदर, सुखद एकदम शांत साफ
सुथरा शहर का आभास हुआ था। ऊंची नीची पहाड़ियों के बीच बसा सुंदर शहर,
एक तरफ छोटे एवं मध्यम ऊंचाई के पहाड़ और
उसके चारों ओर समुद्र की अनंत मे व्याप्त जलराशि। एक दो जगह होटल देखने के बाद सेल्यूलर जेल से 50 कदम दूरी पर आखिरकार
ठ्हरने के व्यवस्था हो गई। छोटा लेकिन शांत शहर पोर्ट ब्लेयर,
अंडमान की राजधानी। बैसे छह दिन का प्रवास था लेकिन वामपंथियों के बंद के निमित्त
एक दिन यूं ही खर्च हो गया बगैर किसी व्यापार विनिमय के।
कुछ आराम आदि के बाद दिन के शेष समय गांधी
पार्क, सामुद्रिका म्यूजियम,
मछ्ली म्यूजियम तथा सेल्यूलर जेल के पास नीचे "सी बीच" मे व्यतीत किया।
अंडमान के समुद्र तट निहायत ही साफ सुथरे और शांत है। भीड़ भाड़ आपको कहीं नहीं
दिखेगी। शाम स्थानीय बाजार मे व्यतीत की। मिश्रित आबादी से परिपूर्ण अंडमान
निकोबार मे देश की हर प्रांत और संस्कृति के लोग मिलेंगे। एक ओर जहाँ दक्षिण भारतीय अपने बोलचाल एवं पहनावे मे नज़र
आयेंगे वही सिक्ख एवं पंजाबियों के व्यापारिक प्रतिष्ठान भी आपको नज़र आयेंगे।
बंगाल और बिहार के रहवासी भी आपको प्रतिष्ठानों मे कार्यरत मिलेंगे। इसकी मुख्य वजह
भारत के प्रथम स्वतन्त्रता आंदोलन से आज़ादी मिलने तक अंग्रेजों से संघर्षरत
योद्धाओं की ये संताने है जिन्हे अग्रेजों
से लड़ी लड़ाई मे अग्रेज़ शासकों ने अंडमान की जेलों मे सजा के तौर पर कैद कर रखा था
और जो सजा के बाद अंडमान की ही धरती पर ही अपने सुनहरे भविष्य की चाह मे वही वस गये।
पूरे अंडमान मे अधिकतर आबादी इन्ही देश के स्वतन्त्रता सेनानियों के वंशज है जिन
पर देश को नाज़ है।
अगले दिन सुबह 6 बजे भ्रमण के दौरान ही सेल्यूलर जेल के दर्शन हुए और
नीचे ही बने बीच पर नारियल पानी ग्रहण कर दिन की शुरुआत की। यदि अंडमान को एक
दिव्य आलौकिक शांति द्वीप कहें तो अतिसयोंक्ति न होगी। वास्तव मे अंडमान द्वीप
समूह भारत का स्वर्ग है। प्रदूषण से एकदम मुक्त एक स्वस्थ वातावरण से परिपूर्ण
द्वीप समूह। जिसमे छोटे बड़े लगभग 300
द्वीप है और बमुश्किल 38-39 द्वीप मे ही आबादी है।
हर घटना मे देश काल और पात्र का एक अपना ही
महत्व है। एक समय था जब देश को आज़ाद कराने बाले वीर योद्धा जब स्वतन्त्रता के
युद्ध के लिये लड़ते थे तो सजा के बतौर
अंग्रेज़ शासक उन्हे कालापानी भेज दुर्दांत विद्रोही करार कैदी के रूप मे सजा देते थे। समय चक्र
परिवर्तित हुआ अंग्रेजों के सिरदर्द बने वे कुपात्र आज सुपात्र बन उसी कालापानी
सहित पूरे देश मे स्वतंत्र वीर योद्धा के रूप मे बलिदानी और स्वतन्त्रता सेनानी के रूप मे जाने जाते है।
कभी अत्याचार, अनाचार,
उत्पीढन, शोषण और निरंकुशता का
प्रतीक रही अंडमान स्थित काला पानी के रूप मे कुख्यात सेल्यूलर जेल आज काल चक्र के
परिवर्तन स्वरूप 130 करोड़ भारतीयों के लिये राष्ट्रीय धरोहर का प्रतीक आस्था और
विश्वास के तीर्थ के रूप मे जाना और पूजा जाता है। कल्पना कीजिये 15X8
फुट की कोठरी मे किसी व्यक्ति को सालों और किन्ही
किन्ही व्यक्तियों द्वारा दशकों तक अपना जीवन बिताया हों?
सिर्फ 3x6 फुट का एक दरबाजे एवं कोठरी
मे ऊंचे बने मात्र एक छोटे रोशन दान से उस दढ्वे नुमा कोठरी मे हवा और रोशनी के
आने का इंतजाम हो, तत्कालीन वीर सेनानियों
ने कैसे स्वतन्त्रता के संघर्ष के एवज़ मे मिली सजा को भोगा होगा?
अंग्रेजों द्वारा बड़ी बर्बरता और क्रूरता से बंदियों पर अत्याचार किये जाते थे।
तेल पिराई का काम कैदियों से लिया जाता था। जिसके अवशेष अवलोकनार्थ जेल मे आज भी
मौजूद है। केंद्रीय निरीक्षण टावर के चारो
ओर सात लाइनों मे तिमंजिला भवन मे 694 काल कोठरियां बना बड़ी निरंकुशता से कैदियों
को यहाँ रखा जाता था। आज केवल सात मे से तीन हिस्से ही है जीवंत देखे जा सकते है।
वीर सावरकर को नासिक कलेक्टर की हत्या के जुर्म मे कालापानी के सजा हुई। अंग्रेज़
शासकों ने उन्हे दो बार आजन्म कैद की सजा दी। उनको सजा के तौर पर 50 वर्ष कालापानी
मे वितना था। ऐसी सजायाफ्ता वे एकलौते
कैदी थे। जुलाई 1911 से मई 1921 तक वे सेल्यूलर जेल मे कैदी के रूप मे रहे। उनके
बड़े भाई भी अंग्रेजों के विरुद्ध जुर्म मे कालापानी मे ही थे पर लगभग तीन साल तक
दोनों को एक दूसरे के बारे मे जानकारी न थी। ऐसी थी अंग्रेजों के अत्याचार और
अनाचार की कहानी। फांसी घर भी एक भयावह दृश्य उत्पन्न करता दिखता। पूरी सेल्यूलर
जेल की बनावट कुछ इस तरह से 1906 मे की गई थी कि पूरे लगभग 687 कोठरियों को मात्र
एक केंद्रीय टावर से नियंत्रित किया जा सके। एक विशेषता और थी सेल्यूलर जेल की,
कि जेल के बाहर मैदान से कोई भी जेल कर्मी तीनों मंजिल के कैदियों को देख सकता था
लेकिन कोई भी कैदी आपस मे एक दूसरे को नहीं देख सकता था। यहाँ तक कि बगल बाला कैदी
भी अपने साथ बाले को नहीं देख सकता था ये बात और थी कि ऊंची आबाज मे शायद सुरक्षा
कर्मियों से बच बात कर सके।
रात मे प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम देखना
रोमांच पैदा करने वाला था। ओम पुरी की आवाज मे जब सेल्यूलर जेल की कहानी सुनाई
जाती है तो रोंगटे खड़े हो जाते है। बड़ा ही जीवंत प्रस्तुतीकरण दिखलाया गया। ऐसे
लगता है सारे पात्र मौन होकर अपना चरित्र अभनीत कर रहे है और सूत्राधार हर पात्र
की कहानी का चित्रण पूर्ण निस्तब्धता और सन्नाटे की बीच अपनी आवाज मे कर रहा हो।
सेल्यूलर जेल का देशभक्ति की भावना से
ओतप्रोत ये एक पहलू था। जेल की कालकोठरियों मे भारत के महान सपूतों ने देश की
स्वतन्त्रता की खातिर जो कष्ट, वेदना और जुल्म
सहे उनके इस त्याग और बलिदान के कारण अंतर्मन
से ही इस स्थान के प्रति श्रद्धा और सम्मान उमड़ता है। समय के चक्र ने इस स्थान को
उन बलिदानियों के त्याग रूपी तप ने आज इतना सुंदर बना दिया कि जिसकी कल्पना नहीं
की जा सकती। जेल के कण कण मे महान आत्माओं की दिव्यता का आभास होता है। लकड़ी से
बने सेंट्रल टावर की सर्वोच्च भवन से चारों ओर का नज़ारा इतना सुंदर और जीवंत था कि
कह नहीं सकते। हम उस छोटे से "काष्ठ भवन" मे लगभग 2-3 घंटे बैठे रहे। एक ओर "रौस द्वीप"
नज़र आ रहा था। दूसरी ओर गहरा काला रंग लिये समुद्र का पानी दूर दूर तक दिखाई
देता। द्वीप पर हरे भरे सघन नारियल के पेड़ सहित अन्य लाखों पेड़ पौधे द्वीप की
सुंदरता को और भी शोभयमान कर रहे थे। न चाहते हुए भी बेमन से वॉच टावर से उतरा और
फिर सेलुलर जेल की काल कोठरियों की छत पर से नीचे बने निर्माण को निहार अपने आपको
उन सेनानियों की मृत आत्माओं से साक्षात्कार करने की कोशिश कर उनको स्मरण करता रहा। अप्रीतम द्रश्य था।
पोर्ट ब्लेयर की मुख्य धरती से वोट की
यात्रा से 5-6 किमी दूरी पर एक छोटा सा द्वीप रौस आईलैंड स्थित है जहां पर उस समय
के अंग्रेज़ अफसर और उनके लोगो की रिहाइश थी। उस समय के विलसतापूर्ण जीवन की झांकी
के भग्नावशेष के दर्शन इस द्वीप मे किये जा सकते थे। जैसे द्वीप पर रोशनी आदि के लिये पावर हाउस,
स्विमिंग पूल, क्लब,
बेकरी, चर्च एवं पुराने अवसीय खंडहर जिनसे स्पष्ट
अनुमान लगाया जा सकता था कि "खंडहर बता रहे है,
इमारत बुलंद थी"। पूरे द्वीप का चक्कर डेढ़-दो घंटे मे लगाया जा सकता है। कुछ
चाय आदि की भी सुविधा यहाँ उपलब्ध थी। काश देश के इस स्वर्ग अंडमान मे कुछ दिन,
सप्ताह, महीने रहने की ख्वाइश
पूरी हो तो आज भी मै वहाँ रहने के लोभ संभरण से न चूंकूँ?
केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण सम्पूर्ण
व्यवस्थाएं उत्तम कोटि की थी। मसलन उन दिनों भी पेट्रोल 5-6 रुपए से ज्यादा उत्तर
प्रदेश और मध्य प्रदेश के मुक़ाबले सस्ता था। अंतर द्वीप यात्रा के लिये उपलब्ध
फेरि सुविधाओं का किराया स्थानीय निवासियों को नाम मात्र के किराये पर उपलब्ध थी।
साक्षारता का प्रतिशत भी देश के अन्य राज्यों की तुलना मे सर्वोपरि था। बिजली की भरपूर उपलब्धता बहुत ही कम दामों
पर थी। हर जगह सड़के शानदार बनी हुई थी। जब सड़क का जाल सम्पूर्ण द्वीप पर बिखरा हो और प्रकृति भी जंगल और समुद्र
के रूप मे मुक्त हस्त से स्नेह वर्षा रही
हो, प्रदूषण का नामोनिशान न हो,
प्रशासन द्वारा साफ सफाई की चाक चौबन्द व्यवस्था हो,
स्थानीय निवासियों का व्यवहार सहयोगात्मक हो,
अपराध का प्रतिशत "जीरो" हो,
जगह जगह प्रकृतिक सौन्दर्य के नज़ारे कदम कदम पर दृष्टिगोचर हों तो दिल्ली एनसीआर तो एक जलती और धुआँ उगलती
भट्टी के सदृश्य नज़र आयेगा ही!!
उन दिनों हमारे बैंक की अंडमान निकोबार
द्वीप समूह पर कोई शाखा न थी। यहाँ के शांत एवं सुखद जीवन शैली से प्रभावित हो
मैंने एक बार यूं ही अपने प्रबंधन और संगठन के नेतृत्व से आग्रह किया था कि यदि एक
शाखा यहाँ अंडमान मे खुलती है तो मै यहाँ की प्रथम पदस्थपना के पाँच वर्ष के
कार्यकाल व्यतीत करने को तैयार हूँ।
महा अंडमानी,
जरबा, ओंग और सेंटीनली जनजाति यहाँ की संरक्षित
जाति मे आती है जो एक-दो द्वीप समूह तक ही सीमित है और उनका मुख्य भूमि के लोगो से
किसी भी तरह का संपर्क नहीं है। इन जतियों के संरक्षण हेतु सरकार की अनेक कल्याण पूरक योजनाओं को सीमित
स्टाफ के माध्यम से इन तक पहुंचाया जाता है जिनके लिये विशेष प्रशिक्षित स्टाफ ही
उनके साथ जुड़ा है क्योंकि ये खूंखार स्वभाव के लोग है जो अपने वर्ग के बाहर के
लोगो से एकदम दूर है। यदि कभी किसी बाहरी व्यक्ति ने इनके नजदीक आने की कोशिश भी
की तो ये तीर कमानों और भालों आदि से जान लेने मे भी नहीं हिचकते। विशेष संरक्षण
के कारण इनके विरुद्ध किसी भी तरह की कोई कार्यवाही वर्जित है। इनके रिहाइश के आस
पास इस तरह के चेतावनी वाले बोर्ड सामान्य जनो के लिये लगाये गये है। हमे सौभाग्य
मिला कि बाराटांग भ्रमण के दौरान जरबा जाति के इन नागरिकों को जो सड़क किनारे पुलिस
के संरक्षण मे खड़े थे। बस ड्राईवर ने बिलकुल शांत रहने की चेतावनी पहले ही दे दी
थी। पुलिस ने भी उनके खड़े स्थान के पूर्व ही गाड़ियों को न रोकने,
हॉर्न और शोर ने मचाने की हिदायत पहले ही ड्राईवर को दे दी थी। इस द्वीप पर जाने
के लिये वाहनों को झुंड मे पुलिस अभिरक्षा मे ही भेजा जाता है।
नॉर्थ वे द्वीप,
हैवलॉक द्वीप,कार्बाइन कोव,
जॉली बॉय, चिड़िया टापू जैसे अन्य अनेक सी बीच है जिनपर
जाकर नहाना यादगार क्षण होते है। बस अंतर इतना ही है कि यहाँ के बीच एकदम साफ
सुथरे है। गंदगी,
प्लास्टिक आदि फैलाने के विरुद्ध नियम सख्त है।
मैनग्रूव खारे पानी के समुद्री दलदली जंगल बाराटांग मे प्रकृतिक रूप से पानी के रिसाव
से बनी चूने की गुफाएँ भी दर्शनीय थी। जमीन से कुछ मीटर नीचे 2-3 किमी लंबी स्याह
अंधेरे मे चूने की गुफाओं को देखना अपने आप मे एक रोमांचक अनुभव था। समुद्र की तलहटी मे मूँगे की चट्टानों की रंग
बिरंगी दुनियाँ वोट की तली मे लगे काँच से देखी जा सकती थी। एक अलग ही सपनों के
दुनियाँ जिनमे हर रंग की छोटी बड़ी मछ्लियाँ जीव जन्तु अपने मूँगे की चट्टानों के
महलों मे विचरती नज़र आयेंगी। समुद्री किनारे अन्य समुद्रीय तट के शहरों की तरह ही होते
है पर अंडमान के समुद्र तट पर्यावरण के प्रदूषण से मुक्त साफ सुथरे और मन भावन है।
एक बार अंडमान जाने के बाबजूद आज भी पुनः एक बार फिर से वहाँ जाने की आकांक्षा और
उत्कंठा लंबा प्रवास व्यतीत करने के लिये आज भी ज़ेहन मे जीवित है देखो ईश्वर कब
पुनः इस अतृप्त ईक्षा की पूर्ति करता है।
हमे इंतज़ार है।
विजय सहगल



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