"सेल्फ़िटिस"
शायद सन् 2000 की बात थी,
साल के बारे मे निश्चित नहीं हूँ पर बैंक की वो ट्रेनिंग अपने आप मे अलग ही तरह की
थी। उक्त प्रशिक्षण छः बैंक के साउथ एक्सटैन्शन,
नई दिल्ली स्थित प्रशिक्षण महाविध्यालय मे
किया गया था। उस प्रशिक्षण मे कोई भी बात बैंक या उसकी कार्य
प्रणाली से जुड़ी न थी सारा ज़ोर नेतृत्व विकास पर था। प्रशिक्षण कार्यक्रम की विषय
वस्तु मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि मे समूहिक सफलता,
छुपी प्रतिभा को परिष्कृत करना, आपसी सहयोग
आदि पर आधारित था। उस ट्रेनिंग मे एक "जोहरी विंडो" (Joseph
and Heri
नाम के दो मनोवैज्ञानिक के नाम पर Johary window)
के नाम से विषय था जिसमे मानव स्वभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण खुद और दूसरों के
साथ सम्बन्धों की कल्पना की गयी थी। उस
विधि को जोहरी विंडो नाम दिया था। उंक्त
विषय के अंतर्गत किसी व्यक्ति के बारे मे
समाज के अन्य लोग क्या और कैसे सोचते है से
संबन्धित था, लेकिन इसमे एक पॉइंट जो
विशेष था और जो हमे अब तक याद है वह था कि "कई बार हमे हमारी कमजोरियों,
कमियाँ या आदते स्वयं दिखाई नहीं देती
जबकि दूसरे आपके साथी या सामने उपस्थित
अन्य लोग उसे साफ महसूस कर सकते है देख और सुन सकते है"। ये आदते जैसे बोलते
समय आपका कोई "तकिया कलाम" अर्थात किसी शब्द का बोलते समय बार बार उपयोग
या असामान्य हावभाव भी हो सकते है। उदाहरण के तौर पर भारत सरकार के केंद्रीय उपभोक्ता
मंत्री श्री राम बिलास पासवान प्रायः अपने बोलचाल या भाषण मे दो वाक्यों का
इस्तेमाल बार बार करते है पहला "क्या
कहते है कि" एवं दूसरा "जो है" या "ये जो है"। शायद वे
इस कमी से वाकिफ हों या न हों पर जन सामान्य उनकी इस कमी या आदत से अच्छी तरह बाकिफ
है।
एक अन्य केंद्रीय प्रभावशाली मंत्री श्री
अमित शाह की भी एक आदत मेरे सहित अनेक लोगो ने भी शायद महसूस की होगी
कि कभी कभी जब वे संसद मे या बाहर भी भाषण देते समय हाथ मे लिये पेजों या
दस्तावेजों के पन्ने को अंगूठे या अंगुलियों को जीभ मे लगे थूंक की सहायता से पलटते है। अनेकों लोग इस आदत
से पीढ़ित हो मजबूर होंगे। इस तरह की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कमियों या आदतों को आप
का कोई हितैषी या शुभचिंतक अंतश्चेतन मन को मजबूर करने वाली इन कमजोरी या आदत को आपको ऐसा करने से रोकने के
लिये जरूर आगाह करा सकता है लेकिन यह तभी संभव होगा जब वह आपका अति निकटस्थ आपका
मित्र या हितचिंतक हो।
कुछ
समय पूर्व मै एक फ़ेस बुक पेज "विश्व हिन्दी संस्थान,
कनाडा" से जुड़ा था। अपने थोड़े लिखने-पढ़ने
आदि के शौक को उस ग्रुप मे प्रकाशित कर
पूरा करता था। इस फ़ेस बुक पेज जिसके लगभग
सत्तर हजार के करीब सदस्य थे से जुड़ साहित्यिक ज्ञानार्जन आदि करता रहा। कुछ समय
उस फ़ेस बुक पेज का अध्यन और अध्यापन कर मै शीघ्र ही एक अदृश्य हीन
भावना से ग्रसित हो गया और अपनी
छोटी मोटी रचनाएँ उसमे पोस्ट करना बंद कर दिया क्योंकि उस ग्रुप मे लेखक और
लेखिकायेँ अपनी रचना के साथ-साथ अपनी
सुंदर आभूषण और वस्त्रों से सुसज्जित
"स्वदेह रचना" (सेल्फी) की फोटो भी पोस्ट करते। इस आयोजन मे
पुरुष और महिला लेखक समान रूप से सहभागी थे।
यध्यपि उनके द्वारा लिखित रचनाए अपने आप मे परिपूर्ण और उत्क्रष्ट थी, उन रचनाओं और आलेखों को आकर्षित और पठनीय बनाने हेतु किसी बाहरी छद्म आडंबर रूपी क्षणभंगुर नश्वर
देह की सुंदरता को शामिल करने की आवश्यकता नहीं थी। पर चूंकि वो एक रस्म और परंपरा
बन गई थी इसलिये लेखक और कवि अपनी स्वरचित रचना के साथ अपनी स्व-चित्र (सेल्फी) भी चिपकाने
लगे। जिसमे मुझ जैसे खुर-बुर्रे पके केश विन्यास, असुंदर चेहरे वाले व्यक्ति की "रचना/लेख" उक्त व्यवस्था के अनुकूल न होने के कारण उससे
दूरी बना लेने का मन करने लगा। पर दूसरे पल ही अर्जुन की "न दैन्यम न पलायनम्"
अर्थात "चुनौतियों से भागना नहीं अपितु जूझना" वाली नीति का अनुसरण कर
अपने रूखे, बहुतायत पके सफ़ेद-काले खिजड़ी बालों मे कालिख पोत सुंदर चेहरा बना सुंदर
सेल्फी लेने की विधि सीखने हेतु गूगल पर
छान बीन शुरू की। इस प्रिक्रिया के दौरान
सेल्फी की आधुनिक विधियों के बीच ही सेल्फी से जुड़ी एक मनोवैज्ञानिक बीमारी भी
दिखाई दी जिसे "सेल्फ़िटिस" के नाम से बताया गया था। अब तो सेल्फी खींचना
कहीं पृष्ठभूमि मे समा गई और "सेल्फ़िटिस" की खोज मुख्य विषय हो
गया।
इसी तारतम्य मे अभी कुछ दिन पूर्व देश के एक
अग्रणी समाचार पत्र नवभारत टाइम्स मे सेल्फी से संबन्धित एक बीमारी
"सेलफाइटिस" के बारे मे विस्तृत रिपोर्ट पढ़ी। (https://navbharattimes.indiatimes.com/lifestyle/health/more-than-three-selfies-a-day-may-cause-selfitis-disease/articleshow/62112204.cms)
इस नई मनोवैज्ञानिक रुग्णताके बारे मे कुछ
विदेशी विश्व विध्यालय के अलावा तमिलनाडु के त्यागराजार स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के
छात्रों द्वारा सन् 2014-15 मे शोध पर आधारित थी। इस नशेबाजी रूपी मानसिक अस्वस्था के शोध का प्रकाशन रिसर्च
इंटरनैशनल जर्नल ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड अडिक्शन मे हुआ। (https://link.springer.com/article/10.1007/s11469-017-9844-x)।
जान कर आश्चर्य हुआ कि इस बीमारी की पहली अवस्था मे तीन तक सेल्फी लेना पर सोश्ल
मीडिया मे पोस्ट न करना। दूसरी अवस्था जिसे क्रोनिक बीमारी कहा गया जिसमे फोटो सेल्फी को
सोश्ल मीडिया मे पोस्ट करना है। तीसरी तो स्वाभाविक तौर पर हर समय सेल्फी ले
मीडिया मे डालना की आदत को पागलपन की श्रेणी ने हमे हैरान और परेशान कर दिया।
अनुसंधानकर्ताओं
ने इनके कारणों मे मुख्य रूप से आत्मविश्वास के क्षरण, अपनी
स्वीकार्यता बढ़ाने एवं लोगो से आगे रहने की चाहत को माना।
सेल्फ़िटिस
रूपी इस बीमारी ने हमे हमारे रचना के साथ सेल्फी चिपकाने की आदत पर पुनर्विचार
करने को मजबूर कर दिया। सेल्फ़िटिस की इस मनोदशा को सोचने और चिंतन मनन ने हमारी मन
मे भयावह विचार मंथन का समुद्र उमड़ने घुमड़ने लगा, तब हमने अपने और अपने चारों
ओर इस विषय मे शोध शुरू किया तो घोर आश्चर्य हुआ कि इस बीमारी की व्यापकता भाषा, प्रांत, क्षेत्रीयता,
संप्रदाय, लिंग, शिक्षा, योग्यता, पद प्रतिष्ठा और उम्र से परे है। बच्चे की सेल्फी की लालसा तो बचपना
मान नजरंदाज की जा सकती थी पर परिपक्व वानप्रस्थ उम्र के लोगो की सेल्फी की बेकरारी
पर सवाल लाज़मी था? अनपढ़ व्यक्तियों के सेल्फी की दीवानगी तो
अशिक्षा के कारणों से समझी जा सकती थी लेकिन शिक्षित और विभिन विषयों के प्रकांड विद्वान
इस स्व-देह दर्शन के रोग से मन्त्र मुग्ध
हों तो चिंता स्वाभाविक है। चतुर्थ श्रेणी या निम्न श्रेणी पद पर आसीन कर्मचारी
यदि सेल्फ़िटिस से प्रभावित है तो एक बारगी उनके पदानुरूप व्यवहार की स्वीकार्यता
है पर बैंक सहित अन्य संस्थानों के उच्चतम पद पर आसीन व्यक्ति "सेलफ़ी" रूपी
इस रुग्णता से आत्ममुग्ध हों तो किस पद के मनोविश्लेषण को उचित ठहराया जा
सकता है यह एक विचारणीय प्रश्न था?
एक
मुद्दा और किसी व्यक्ति को यदि रोटी, पूरी, पराँठे, ढोसा के साथ रोज रोज सिर्फ और सिर्फ सड़े आलू रूपी सब्जी परोसी जाय तो भोजन से वितृष्णा होना एवं बदहज़मी होना
स्वाभाविक है। तो क्यों न इस हमे इस बीमार रूपी सेल्फी को रोका जाना चाहिये?? इसी विचार के वशीभूत हो मैंने इस शोध पूर्ण विषय मे "सेल्फी" ही नहीं बल्कि "सेल्फ़िटिस" से भी आज़ादि
पा ली और अब सिर्फ अपने शौक और ईक्षा पर
ध्यान केन्द्रित करने लगा हूँ।
विजय
सहगल



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