शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

गंदा काम


"गंदा काम"


हमारे एक मित्र जो बैंक मे आजकल उच्चतम पद पर कानूनविद विशेषज्ञ अधिकारी के रूप  मे पदस्थ है। उन दिनों भोपाल मे लॉं अधिकारी के पद पर पदस्थ थे। चूंकि विधि विशेषज्ञ थे तो शाखाओं से कानूनी परामर्श हेतु उनके पास प्रायः फोन आते रहते थे। उनके सहज और सरल स्वभाव के कारण भी लोग गाहे बगाहे उन्हे अपना समझ कभी भी किसी वक्त फोन कर कानूनी सलाह, सुझाव आदि  लेते रहते  थे। इस  मीटिंग के दौरान भी  उनके पास मोबाइल पर एक फोन कानूनी परामर्श हेतु आया।  कुछ देर बाद जब उन्होने मीटिंग मे उपस्थित लोगो को ये अनहोनी  खबर दी कि एक शाखा के  दो स्टाफ सदस्यों को पुलिस ने हिरासत मे ले लिया है और बैंक ने उन दोनों को सेवा से निलंबित कर दिया। तो अचानक ही मैंने शाखा का नाम लेते  हुए उन दोनों का नाम बता उनसे उन दोनों के नाम  सुनिश्चित करना चाहा तो उनके सहित मीटिंग मे उपस्थित सारे लोग चौंक गये! उन्होने पूंछा तुम कैसे जानते हो उन्हे? तब मैंने उनकी कारगुजारियों को इस कहावत के साथ ऊद्धृत किया की "लल्ला के पाँव पल्ला मे दिखते है"। मैंने उन्हे पाँच वर्ष पूर्व अपने प्रबन्धकीय कार्यकाल मे उन महानुभावों के साथ बिताये चार साल का उल्लेख कर किया।

एक शाखा मे मेरी पदस्थपना के दौरान एक सरकारी विभाग से हमे ये शिकायत मिली की बैंक के कैशियर ने धनराशि जमा करने के दौरान 300/- रूपये कम कर दिये है। इस तरह की घटना पहले भी हो चुकी थी पर सुनिश्चित न हो पाने के कारण शिकायत नहीं की। पर इस बार प्रमाण भी थे।  घटना गंभीर थी फिर भी मेरा प्रयास था कि संबन्धित स्टाफ को सख्त हिदायत के साथ इस तरह की घटना दुबारा न घटित होने की चेतावनी के साथ मामले को  शिथिल कर पटाक्षेप कर दिया जाये। लेकिन उक्त स्टाफ ने इस घटना को स्थानीय बैंक कर्मचारी संगठन से घटना को बता हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। फिर क्या था अन्य शाखाओं के 8-10 स्थानीय स्टाफ मामले पर वार्ता हेतु हमारी शाखा मे उपस्थित हो लिये। उन सब को अचानक शाखा मे देख मै भी चौंका। उनमे एक स्टाफ जिसे मै परिपक्व और सामाजिक समझता था को शाखा के अंदर बने कक्ष मे ले जाकर कहा कि कोई बातचीत अगर करनी थी तो हमसे अकेले मे कर लेते इतने जमघट को लाने कि क्या आवश्यकता थी? लेकिन लगता था वे नेत्रत्व कारी साथियों के प्रतिनिधित्व के नाते सभी के सामने तर्क-वितर्क करने के पक्ष मे थे। मैंने उन्हे कहा भी कि मै भी संगठन मे हूँ और इस विषय को आगे बढ़ाने के पक्ष मे नहीं हूँ लेकिन कोई भी गोपनीय बात दो व्यक्तियों के बीच तो रह सकती है लेकिन इतने जमघट के बीच बातचीत गोपनीय न रह पाएगी और यदि इस घटना की सूचना उच्च प्रबंधन तक मेरे माध्यम से न पहुँच किसी और माध्यम से पहुंचेगी तो मुझे भी परेशानी और दिक्कतों का सामना कर पड़ सकता है। लेकिन उन नव नेत्रत्व कारी साथी के बचकाना और अपरिपक्व व्यवहार ने इस विषय पर कुछ भी वार्तालाप सभी के समक्ष करने से कम पर राजी न थे। मेरे लिये गंभीर समस्या थी कि मैंने आजतक कभी भी अपने अधीनस्थ स्टाफ के विरुद्ध भरसक कोशिश कर कभी कोई कार्यवाही नहीं की। आज पहली बार इस असहज स्थिति से मुझे रूबरू होना पड़ रहा था। न चाहते हुए भी मजबूरी मे मुझे कैश की कमी से संबन्धित शिकायत को उच्च अधिकारियों के संज्ञान मे लाना पड़ा जो मेरे स्वभाव के एकदम विपरीत था।

विभागीय जांच तक मामला आरोप प्रत्यारोप की शक्ल ले चुका था जिसमे मेरे उपर भी कैश सुरक्षा मे लापरवाही के मिथ्या आरोप आदि लगे  क्योंकि हमारे विपरीत साथी पक्ष ने इसे युद्ध का रूप दे दिया था और मै जानता था कि हालात जब उस दशा तक पहुँच जायें जहां "प्यार और युद्ध मे सबकुछ जायज़ है" तब आपसी भाई चारे और मान सम्मान की अपेक्षा रखना बेमानी है। मुझे शुरू से ही इस विवाद का एक पक्ष होने के नाते पीढ़ा थी यदि ये सार्वजनिक विवाद का विषय न बनता तो निश्चित ही मै अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उक्त विभाग से शिकायत को बापस लिवपा लेता लेकिन कहते है न "बंदूक से निकली बोली और मुंह से निकली बोली कभी बापस नहीं आती"।

जांच चलती रही और चलते चलते अपने अंतिम चरण मे पहुँच गई जो मेरे जीवन मे ऐसा दंश और चुभन दे गई जिसकी कल्पना मैंने अपने जीवन मे कभी न की थी। आज की तरह दूर संचार के उतने आधुनिक तकनीकि साधन उपलब्ध न थे कि पत्राचार को तुरत फुरत भेजा जा सके फिर भी "फ़ैक्स" तकनीकि से पत्र या दस्तावेज़ को कुछ मिनटों मे एक साथन से दूसरे स्थान  प्रेषित किये जा सकते था। चूंकि शाखा मे ये सुविधा न थी अतः उन दिनों शाखा से बाहर लगभग आधा किलो मीटर दूर एसटीडी, पीसीओ पर उपलब्ध सुविधाओं के माध्यम से पत्रों को प्रेषित करना होता था। प्रादेशिक कार्यालय से इस जांच के अंतिम पत्राचार का रूप सुनिश्चित किया जाना था। मेरे द्वारा प्रेषित पत्र के तीन चार प्रारूप अस्वीकार किये जा चुके थे। पत्र को  अंतिम रूप के पूर्व चार-पाँच बदलाब हो चुके थे। चूंकि उन दिनों कम्प्यूटर की सुविधा न होने से संशोधित पत्र को पुनः नये सिरे से हाथ से लिखना  पड़ रहा था।  उच्च प्रबंधन से बार बार पत्र के  बदलाब हेतु फोन आता तो मै तुरंत हाथ से लिखे पत्र मे वांछित संशोधन कर नया पत्र पुनः लिखता और शाखा के बाहर से फ़ैक्स करने भागता। पत्र को फ़ैक्स कर बमुश्किल शाखा मे बैठ पाता कि पुनः प्रादेशिक कार्यालय से फोन आ जाता कि पत्र का फलां फलां पैरा बदल के फिर से फ़ैक्स करो।  उस दिन  पाँच छः बार की इस दौड़ भाग के बाद जब पत्र का  फ़ाइनल प्रारूप   फ़ैक्स करके बापस शाखा मे बैठा ही था कि चैन की कुछ सांस ले। लेकिन उस दिन शायद सुख चैन मेरे भाग्य मे था ही नहीं। कुछ ही मिनटों मे फोन की घंटी बजी। मै बार बार की दौड़ धूप और  तनाव मे तो  था  ही, डरते डरते फोन उठाया दूसरी  तरफ प्रादेशिक प्रबन्धक महोदय थे। अभिवादन की औपचारिकता के बाद उन्होने बताया कि मेरे द्वारा फ़ैक्स के माध्यम से फ़ाइनल  पत्र मिल गया।  मैंने चैन की सांस ले जी सर कह कृतज्ञता व्यक्त की पर तभी हमारे प्रादेशिक प्रबन्धक ने जब ये कहा कि "बताओ पहले सस्पैंड तुम्हें किया जाये या उस कैशियर को", सुनकर मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। गला सूख गया मानों किसी ने कानों मे पिघला शीशा डाल दिया हो! मेरा रक्तचाप अचानक बैसे ही गिरा जैसे कोई न्यायाधीश एक निरापराधी को फांसी की सजा सुना रहा हो!! कुछ समय के लिये मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया!!! इस समयान्तराल मे  इन शब्दों को सुन मुझे अपने और अपने परिवार की इस असामयिक आकस्मिक विपत्ति को देख भविष्य की चिंता होने लगी।  मै शपथ पूर्वक सत्य वचन लिख रहा हूँ उस दिन मेरे बात करते हाथ काँप रहे थे!!!!  मै  रह रह कर उस घड़ी को कोस  रहा था कि किस अशुभ घड़ी मे इस "कम नगदी" होने के  प्रकरण को होना था? करे कोई भरे कोई के विचार मेरे मन मे उठ रहे थे? मैंने पूरी हिम्मत और ताकत के साथ उनको फोन पर डरते हुए कहा सर, मेहरबानी करे, क्या गुस्ताखी हुई सर,!!! तब उन्होने कहा आपने जो ये फ़ाइनल प्रारूप पत्र हमारे कार्यालय को फ़ैक्स  किया है उस पर आपने  हस्ताक्षर नहीं किये?

मुझे काटो तो खून नहीं, महज एक हस्ताक्षर ने करने की छोटी सी भूल के लिये अपने अधीनस्थ अधिकारी को अपनी क्रूरतम  वाणी से आतंकित करने जैसा इतनी  बड़ी सजा? कि आपको सस्पैंड करूँ? ये सरा सर अपराध था और ये अपराध कोई मामूली व्यक्ति द्वारा नहीं अपितु उस व्यक्ति द्वारा किया गया  जो रीजन के मुखिया के नाते उनके अधीन स्टाफ का पितातुल्य संरक्षक भी होता है?? अपनी विषैली वाणी से एक ऐसा वज्राघात जो किसी की जान भी ले सकता हो?? एक परिवार के प्रधान होने के नाते ऐसा क्रूर व्यवहार उत्तरदायी पदों पर पदस्थ व्यक्तियों का मैंने पहली बार देखा था जो उच्च पदस्थ अधिकारी को कतई शोभा नहीं देता और जो सदा, सर्वथा निंदनीय ही कहा जायेगा। उस दिन पाँच छः प्रारूप के संशोधन भेजने मे एक पत्र पर साइन न होने पर "मैनेजर को सस्पैंड करने जैसे शब्दों" की अतिवादी  वाणी? उस व्यक्ति के मानसिक दिवालियपन पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है???  एक विना कसूरबार व्यक्ति को सेवा से निलंबित करने जैसा मानसिक आघात देना कहाँ तक न्यायोचित था?

मुझे नहीं मालूम उच्च प्रबंधन ने उक्त कैशियर को संबन्धित मामले मे उसके क्रत के लिये क्या सजा दी? लेकिन मुझे ये  अच्छी तरह मालूम है कि बैंक के तत्कालीन उच्च प्रबंधन ने बैंक के एक निरपराध मैनेजर को अपनी सनक और पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता एवं अतिवादी व्यवहार  के कारण भरपूर क्रूरतम सजा दे दी थी और उनके  इस मुंह जवानी क्रूरता और आतंक का कहीं कोई  रेकॉर्ड भी  नहीं  था। उच्च प्रबंधन मे पदस्थ   कुछ अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थ अधिकारियों के विरुद्ध इस तरह की सजा लगातार  आज भी जारी है। इन कुछ अधिकारियों ने हमारे संस्थान का और हमारे संस्थान के मानव संसाधन का बहुत ही अहित किया है। मै निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता लेकिन लगता है कि  क्या  हमारे संस्थान का अन्य कमजोर संस्थान मे समामेलन का ये भी एक बहुत बड़ा कारण नहीं है? 

चलिये इस यात्रा को कुछ और आगे बढ़ाते है। उसी शाखा मे एक दिन सुबह सुबह  एक महिला आकर बैंक के दो स्टाफ के बारे मे पूंछती है। हमारे बैंक के सब स्टाफ शैलेंद्र (शैलेंद्र पर ब्लॉग - https://sahgalvk.blogspot.com/2019/01/blog-post_8.html ) उसे उनके बैंक मे न होने को कह कर बैंक से बापस कर देता है। वह महिला दूसरी-तीसरी बार भी शाखा मे आकार उन दोनों को न देख बापस चली गई। उक्त फूहड़ सी, गंदे लिवास की महिला विशाल सरकारी कार्यालय के परिसर मे और उसके आसपास घूमती नज़र आ जाती थी जहां पर हमारी शाखा थी। उसका इस तरह शाखा मे आकार स्टाफ को पूंछना पहली बार था। चौथी बार आने पर जब मैंने उससे पूंछा कि तुम सुबह  से बार बार शाखा मे आकर हमारे स्टाफ को क्यों पूंछ रही हो? क्या बात है? तब उसने मुझे उन दोनों से पैसे लेने की बात बताई। मै सुनकर हैरान था मन मे शंका उठी भला इसे किस बात के, कैसे पैसे लेने हो सकते है? मैंने जिज्ञासा वश पूंछा काहे के पैसे लेने है? तो उसने उतनी ही सहजता और बेबाकी से कहा कि "कल इन दोनों ने हमारे साथ गंदा काम किया था"।  मै हतप्रभ था, इस तरह के जबाब की मुझे कतई उम्मीद न थी। मै सुन कर हैरानी से चौंक गया, शाखा मे उस समय उपस्थित पुरुष और महिला ग्राहकों के समक्ष उसका इस तरह बोला  जाना मुझे असहज स्थिति मे डालने वाला था। मैंने यहाँ वहाँ बगले झांक  अपने आपको सयंत हो कर उसे  शाखा से जाने को कहा और दुबारा शाखा मे न आने कि हिदायत दी।

आज जब मीटिंग की समाप्ती पर हमारे विधि विशेषज्ञ, विधिवेता मित्र श्री मिश्रा जी मीटिंग मे उपस्थित सदस्यों को पुलिस द्वारा  बैंक के दो स्टाफ सदस्यों की गिरिफ़्तारी की सूचना और बैंक द्वारा उन दोनों को बैंक की सेवा से निलंबित  किये जाने की जानकारी दे घटना का अन्य विवरण दे रहे थे।  मीटिंग मे उपास्थि समस्त स्टाफ उनके पुलिस की हिरासत मे होने आदि  के कारण जानने को उत्सुक था लेकिन उन दोनों स्टाफ की हिरासत की उस घटना ने हमे भाव शून्य   कर दिया था क्योंकि मुझे उन दोनों स्टाफ की  इन घिनौनी हरकतों के संकेत चार वर्ष पूर्व ही उस महिला ने "गंदा काम" कह दे दिये थे और  "सस्पैंड (निलंबन) शब्द" की गहनता, तीव्रता, वेदना, कष्ट, चुभन, दुःख, दर्द, पीड़ा, व्यथा संताप, टीश, क्लेश, यंत्रणा, आपदा, संकट, दंश, घाव, का अहसास हमे उन तत्कालीन प्रादेशिक प्रमुख द्वारा लगभग पाँच वर्ष पूर्व करा दिया था जिसके दंश और टीश को  हम आज तक नहीं भूले और इसी असहजता के  कारण मै उस दिन  भाव शून्य हो मीटिंग मे बैठा था। 


विजय सहगल             
           


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