"स्केल-फाइव एवं कुतुब मीनार"
(व्यंग)
यहाँ पर कुतुब
मीनार के निर्माण, इतिहास, वास्तु या पुरातत्व की चर्चा करने का मेरा कोई इरादा
नहीं है। न ही इसके इतिहास की, कि
किसकी थी किसने बनाई इससे भी हमे कोई सरोकार न था,
लेकिन उपयोगिता और अनुभव के बाद एक बात
पक्की है ये मीनार फिलहाल बैंक बालो के कब्जे मे है!! एक बारगी लगा कहीं ऐसा तो
नहीं कुतुब मीनार बनाने के लिये कुत्बुद्दीन एबक ने लिये ऋण की अदायगी मे चूक के
कारण बैंक ने इसे "गैर निष्पादन अस्ति" अर्थात "एनपीए" के तहत मीनार को अपने उपयोग के लिये अपने
आधिपत्य मे ले लिया हो? कुतुब मीनार
इतिहास की एक अकेली ऐसी मीनार है जो तमाम लोगो के सफलताओं और असफलताओं की एक मूक
गवाह रही है। अनेकों ने इस मीनार से प्रेरणा ग्रहण कर इसकी ऊंचाई को अपने आदर्श का पैमाने मान सफलताओं को हांसिल किया है
इसके विपरीत कई लोगो ने अपनी असफलताओं पर दुःख और खेद जताने के लिये इसका सहारा ले
जीवन की "ईह लीला" को समाप्त कर लिया?
ऐसी ही कुछ मामलों मे कुतुब मीनार की यहाँ चर्चा
करूंगा।
वर्षों पहले से ही बैंक की नौकरी मे प्रबन्धक नाम का प्राणी हमेशा
"टार्गेट" नमक शब्द से सबसे ज्यादा दुःखी पीढ़ित और परेशान रहा है। न
जाने कितने निरीह मैनेजर इस टार्गेट रूपी दैत्य के कारण अपने उच्च प्रबंधन के क्रूर
दुर्व्यवहार के शिकार हो गये। वर्षों पूर्व एक सीधा साधा ग्रामीण परवेश से निकला
मैनेजर प्रोन्नति के चक्कर मे मैनेजर पद को तो प्राप्त हो गया। घर परिवार,
नाते रिश्तेदारों का खुश होना स्वाभाविक
था पर हाय रे मैनेजर इस मैनेजरी के पीछे का दुःख तो तेरे सिवा और कौन जानता जिसके साथ
वो अपने दुखडों को सांझा करता?
उच्च अधिकारियों का दबाब कि बढ़ाओ डिपॉज़िट-एडवांस
तो बढ़ जाता एनपीए और जब रीज़नल मैनेजर कहता कम करो एनपीए तो कम हो जाता डिपॉज़िट-एडवांस।
जीवन की इस आपाधापी और रोज रोज की चिक चिक से उस गाँव के मैनेजर ने अपनी ईह जीवन
लीला समाप्त करने का निर्णय ले लिया। दूसरों के सामने दुःखड़ा रोने का कोई मतलब न
था क्योंकि वो कहावत है न "जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई"। डिपॉज़िट लाने मे, खाते खोलने मे, गैर निष्पादन कारी
आस्तियों को कम करने मे लाचार मैनेजर ने इस अंतिम घड़ी मे घर परिवार एवं बैंक को
अपना संदेश भी लिख, शर्ट
की उपरी जेब मे रख लिया ताकि अंत समय किसी भी संकट मे किसी को कोई तकलीफ न
हो और चल दिया मेहरोली की विश्व धरोहर "कुतुबमीनार" की ओर। विचार यही था "न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी"।
अपनी धुन मे खोये मैनेजर को कुतुबमिनार के गेट के
अंदर प्रवेश करते ही पुरातत्व के कर्मचारी ने उसे रोक टिकिट मांगा? मैनेजर ने मन ही मन कहा, "हा
शोक!", अंतर देशी यात्रा के लिये तो टिकिट लेने की
अनिवार्यता को तो सुना और समझा था, पर दुनियाँ से विदा हो अंतिम यात्रा अर्थात देवलोक गमन करने के लिये भी
टिकिट लेना पड़ेगा इसका आभास न था? पर मरता क्या न करता दो
रुपए का टिकिट ले कुतुब मीनार के परिसर मे प्रवेश किया। इरादा अटल था, निश्चय द्रढ़ था भरी दोपहरी कुतुब मीनार की पहली सीढ़ी पर चढ़ने के लिये उसने कदम बढ़ा ही लिया था। उन
दिनों आज की तरह मीनार के अंदर चढ़ने की मनाही न थी लेकिन शायद इन्ही सब बैंक अफसरों के परलोक वासी हादसों ने प्रशासन को इसकी ऊपरी मंजिलों पर चढ़ने
की पाबंदी लगानी पड़ी। पक्के इरादे के साथ
मैनेजर ने दीन दुनियाँ को पीछे मुड़ एक बार
देखा, मन ही मन सभी को प्रणाम कर अपने किये के लिये माफी
मांगी और बढ़ लिया आगे सीढ़ियों की ओर। एक, दो, तीन, चार लेकिन कहाँ तक सीढ़ियों को गिनता और इस तरह
बचपन के गिनती पहाड़े के बोझ को इस अंत समय
मे सिर से हल्का कर लिया। चढ़ते चढ़ते मैनेजर
कुतुब मीनार की पहली मंजिल और जीवन की
आखिरी मंजिल पर कब पहुँच गया पता ही न चला।
मीनार के पहले और
ज़िंदगी के आखिरी पढ़ाव पर दो पल के लिये सुस्ताया और एक बार घर मे छोटी
नन्ही से प्यारी बेटी की यादों मे खो गया। बैंक के पूर्व कितनी सुखी और हँसती
खेलती ज़िंदगी थी उसकी। गाँव के पोस्ट ऑफिस मे बाबू था। चैन की नौकरी थी। न टार्गेट
का चक्कर न एनपीए या बसूली की खट खट। गाँव मे ही बूढ़े माँ-बाप और पत्नी परिवार के
साथ खुश था। लेकिन सरपंच जी की सिफ़ारिश पर बैंक का अफसर हो उन दिनों गाये जाने बाले
फिल्मी गीत को यथार्थ मे परिवर्तित कर दिया कि "साला मै तो साहब बन गया ..............."।
अफसर बन वह देश की राजधानी दिल्ली मे पदस्थ
हुआ और कुछ समय बाद मैनेजर भी बना था। अचानक बीते हुए दिनों की कल्पना से बाहर आ उसने पहली मंजिल से नीचे झाँका, शंका हुई वांछित फल की प्राप्ति हो न हो, परमगति मिली तो ठीक और यदि इसमे चूके तो टूटी हड्डी पसलियाँ लिये समाज के लोग बड़ी छीछालेदर करेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं, "आसमान से गिरे, खजूर मे अटके", तो बड़ी दुर्गति होगी। इन्हे शंकाओं-कुशंकाओं
के बीच दृढ़ निश्चय और अटल इरादे लिये, चढ़ लिया उपर और उपर की
ओर। अब इरादा था पाँचवी मंजिल। शंका लेश मात्र भी नहीं। आत्मघात का निश्चित लक्ष्य
आँखों मे लिए पाँचवी मंजिल की बालकनी से झाँका, कहीं कोई
शंका नहीं इकदम स्पष्ट लक्ष्य। दुनियाँ के सारे कष्टों से मुक्ति और ईश्वर से एकाकार
होना सामने ही दिखाई पड़ रहा था। दो घड़ी रुका था वह ताकि इस अंतिम समय उपर वाले को
स्मरण कर अपने किए धरे के लिये माफी मांगले। जैसे ही अत्महत्या के लिये कदम आगे
बढ़ाया ही था कि अचानक किसी ने कॉलर पकड़ ज़ोर से पीछे खींचा! दरम्यानि उम्र के एक भद्र पुरुष ने ज़ोर से पूंछा? किस स्केल मे है तू? सुनकर आश्चर्य तो हुआ जैसे
अंतर्यामी श्रेष्ठी बैंक के प्रमोशन का इंटरव्यू लेने साक्षात धरती पर पधारे हों? मेरे मुंह से वरवश ही निकाल पड़ा स्केल-I॰ फिर क्या
था चटा-चट दो थप्पड़ उन महाश्य ने जड़ दिये मुंह के दोनों गालों पर और चीख कर बोले-
"औकात भिखारियों की और शौक नवाबों के"। एक बार फिर चिहुँक कर बोला -: मूर्ख!!, ये पाँचवी मंजिल स्केल फाइव के लिये निर्धारित है,
जा भाग यहाँ से सीधे पहली मंजिल की ओर। जैसे ही नीचे सीढ़ियों की तरफ देख अपनी औकात
की मंजिल की ओर कदम बढ़ाते कि अचानक पीछे से एक जोरदार शक्ति का आभास हुआ मानों कार
का एक्सिलेटर किसी ने पैर की पूरी ताकत से
दबाया हो? पिछवाड़े उस शक्ति के अहसास के अनुभव ने मैनेजर साहब
के सारे के सारे कदम, एकसाथ बगैर कदमों के ही तेज रफ्तार से सीढ़ियों
के नीचे की ओर गिरते-पढ़ते, लुढ़कते-पुढ़कते बढा लिये मानों सीढ़ियों से नीचे कोई खाली ड्रम लुढ़कना
शुरू करता हो। इस तरह कब पहली मंजिल निकली पता ही नहीं चला और अपनी औकात की पहली मंजिल
से भी नीचे जमीन पर पड़ा था। सूरज की रोशनी का चका-चौंध वाला दिन था, पर न जाने क्यों दिन मे तारे साफ साफ दिखाई दे रहे थे!! अब तक हिम्मत भी जबाब दे चुकी थी। अत्महत्या का
भूत चारों खाने चित्त दिन मे तारों को गिन रहा था। रह रह कर उस थप्पड़ और स्वर्ग
सिधारने के निर्धारित स्केल रूपी मार्ग की
कल्पना ने हाथ पैर फिर से ठंडे कर दिये थे। अगली सुबह मैनेजर साहब शाखा मे फिर से
डांट खाने को हाज़िर थे। ये ही सोच कर हालात से सम्झौता कर लिया शायद बैंक के
मैनेजर की ये ही नियति हो। संकट की इस घड़ी मे एक बार प्रभु स्मरण हो आना स्वाभाविक
था मन ही मन उन्हे याद किया-:
"सीता-राम, सीता-राम,
सीता-राम कहिए।
जाहे विधि राखे "आर॰ एम॰" ताहि विधि रहिए॥
विजय सहगल


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