"विनम्र
श्रद्धांजलि प॰ श्री जसराज"
प्रातः काल का भ्रमण हमेशा से बहुत ही थकाऊ
एवं उबाऊ काम होता है। जब आप मौसम के
अनुसार सर्दी मे लिहाफ से मिल रही गर्मी और गर्मियों मे एसी की ठंडी ठंडी हवा को
छोड़ कर उठते है तो ये उठना हमेशा एक कष्ट साध्य काम रहा है। लेकिन सुबह के भ्रमण
से विविध भारती से प्रसारित होने बाले सुबह के भजन "वंदनबार" को सुनने की
चाहत से मिलने बाला आनंद और उल्लास की
कीमत पर भ्रमण का ये थकाऊ एवं उबाऊपन मुझे कभी नहीं खला। ये ही कारण है कि हर रोज
सुबह उठने मे होने बाली कशमकश और अंतर्द्वंद मे हमेशा प॰ भीमसेन जोशी,
कुमार गंधर्व और प॰ जसराज जी के भजनों को सुनने की चाह मुझे हमेशा विजयी मुद्रा दिला प्रातः उठाने मे मदद करती आ रही है।
आज से चार-पाँच दशक पूर्व तक भ्रमण के साथ
साथ रेडियो पर श्री लंका (सीलॉन) या विविध
भारती स्टेशन को सुनना संभव न था। तब भी मै अपने बचपन के मित्र देवेन्द्र दुआ के
साथ झाँसी के नारायण बाग के भ्रमण के दौरान एकाध बार ट्रंजिस्टर को साथ लेकर घूमने
जाता था। उन दिनों बड़ी सी पेटी नुमा
ट्रंजिस्टर को कंधे पर लटका कर साथ लेकर
चलने का देहाती चलन सिर्फ ग्रामीण लोगो मे ही देखने को मिलता था। लेकिन समय के साथ
साथ तकनीकि ने नामचीन गायकों के गायन को भी टेप के माध्यम से आम जनों के बीच लोक
प्रिय बनाया। लेकिन इनकी अपनी सीमाएं थी कि इसको भी आसानी से अपने साथ ले जाना आम सुलभ न था। लेकिन
जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है तब एफ़एम रेडियो,
यू ट्यूब, इंटरनेट के माध्यम से अपने
समय या पुराने जमाने के महान लोक गायक,
शास्त्रीय गायकों को सुनने की ललक साधारण
से साधारण आदमी की पहुँच मे हो गयी है। इस
तकनीकि का लाभ आम जनों के हित के लिए उपलब्ध
होना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
आज इसी तकनीकि तक पहुँच के कारण साधारण से साधारण
किस्म के व्यक्ति भी अपने जीवन के चारों ओर विखरे उल्लास,
प्रसन्नता और खुशी के पलों को हर दिन हर क्षण अनुभव कर जीवन मे खुशियों का अनुभव करते
है। मै भी उन भाग्यशाली लोगो मे शामिल हूँ। तकनीकि
के सकारात्मक उपयोग के कारण प्रातः के
सूर्योदय की लालिमा के पूर्व प॰ भीमसेन जोशी की सुमधुर आवाज मे यदि ये भजन सुनने
को मिला जायें:- "नाम जपन क्यों छोड़ दिया,
क्रोध न छोड़ा झूठ न छोड़ा, सत्य वचन क्यों
छोड़ दिया..........., या "मधुकर श्याम
हमारे चोर.............., संत कबीर की
बाणी "माटी कहे कुम्हार से, तूँ क्या रौंदे
मोय.............. एक दिन ऐसा आयेगा मै रौंदूगी तोय..........................................................."।
तो जीवन मे उल्लास और उमंग के अनमोल मोती यूं ही सहज और सरलता से प्राप्त हुए
प्रतीत होते है। 2008 मे भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी को 1991 मे ग्वालियर मे तानसेन समारोह मे साक्षात देखने और
सुनने का सौभाग्य मिला था तब मै अपने मित्र विनोद अग्रवाल के साथ समारोह मे शामिल हुआ
था जहां पर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उन्हे तानसेन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया
था।
जब सुबह की अमराई मे कोयल और पक्षियों की
चहचहाट के बीच कुमार गंधर्व के काल जयी
भजनों की मधुर वाणी कानों को सुनाई देती
है तो दिन के सार्थक होने का एक अलग आभास होता है। मै हमेशा कुमार गंधर्व के
सुमधुर अवधूत भजन "उड़ जायेगा,
हंस अकेला, जग दर्शन का
मेला...................... का प्रशंसक रहा हूँ। या उनके भजन "सुनता है गुरु
ज्ञानी, ज्ञानी,
गगन मे आवाज हो रही झीनी झीनी.............,
को सुन पूरे शरीर मे रोमांचित करने बाली शक्ति और ऊर्जा का जो संचार होता है उसका
कोई मुक़ाबला नहीं। कुमार गंधर्व जी के स्वर मे श्री देवा नाथ जी रचित निर्गुणी भजन "गुरु
जी, जहां बैठु वहाँ छाया जी,
सो ही तो मालक मेरा नज़रना आया जी........................" मे उनका आलाप आकाश
के शून्य से आता प्रतीत होता है, एक अद्भुद और रोमांच कारी अनुभव उनके भजनों को
सुनने से मिलता है जो एक अलग ही आनंद और उल्लास देने बाला एक अनमोल और बेशकीमती
अनुभव होता है।
भजन गायकी के इन तीन अनमोल मोतियों मे प॰
जसराज जी भी उक्त दोनों महानुभावों के समकक्ष थे।
जिनके कल दिनांक 17 अगस्त 2020 को निधन का समाचार दुःख और वेदना देने बाला
था। दुनियाँ मे ऐसे विरले ही लोग हुये है जिनके कीर्ति और यश पताका प्रांत और देश
के परे दुनियाँ के सातों महादीपों मे समान
रूप से व्याप्त हो प॰ जसराज जी उनमे से एक थे। वे विश्व मे अनेकों सम्मान और विभूषणों से अलंकृत किए गये वे वास्तव मे भारत
रत्न से बढ कर विश्व रत्न थे। उनका भजन "रानी तेरो चिरजीओ
गोपाल.................................... हमे कृष्ण भक्ति की उस अनंत दुनियाँ मे ले जाता है जहां
और कुछ भी पाने की ईक्षा पर पूर्ण विराम स्वतः ही लग जाता है। भजन "भरत भाई
कपि से उऋण हम नाहीं...................................मे भगवान राम और भरत के बीच संवाद मे श्री
राम के वनवास के दौरान श्री हनुमान जी से हर कदम पर मिले सहयोग से उऋण न होने का
जो मार्मिक वर्णन जसराज जी ने अपनी आवाज मे गया है वह उक्त व्रतांत का जीवन्त चित्रण कर देता
है।
वेशक आज संगीत जगत के तीनों दिग्गज महानुभाव सर्व श्री प॰ भीम सेन
जोशी, प॰ कुमार गंधर्व,
प॰ जसराज भौतिक रूप से हम सबके बीच मे
नहीं है लेकिन इन महान आत्माओं के कंठ से निकली सुरीली आवाज ने न केवल ईहलोक के
करोड़ों मनुष्यों को मंत्र मुग्ध किया है और आगे भी करती रहेगी अपितु परलोक मे स्थित देवता गण भी इनकी सुरीली
आवाज का रसास्वादन कर आनंदित हो रहे होंगे।
पूर्व मे परलोकगमन हुए स्व॰ पंडित भीमसेन
जोशी एवं स्व॰ प॰ कुमार गंधर्व और अभी कल दिनांक 17 अगस्त 2020 को दिवंगत प॰ जसराज
जी को हम भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है एवं ईश्वर से विनम्र प्रार्थना करते
है कि वे स्व॰ प॰ जसराज जी को अपने श्री चरणों मे स्थान दें।
अंत मे प॰ जसराज जी के उस भजन "भरत भाई,
कपि से उऋण हम नाहीं ........................,
को पुनः स्मरण करते हुए उनसे कहना चाहते है कि "पंडित
जी,
जैसे भगवान श्री राम, वीर हनुमान के
ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते बैसे ही हम अखिल विश्व के आपके करोड़ों करोड़ प्रसंशक
एवं श्रोतागण आप द्वारा संगीत साधना के
माध्यम से इस भू मण्डल मे प्रवाहित संगीत
सरिता के माधुर्य से कभी भी उऋण नहीं हो सकेंगे।
पंडित जसराज सहित तीनों महान आत्माओं स्व॰
पंडित भीमसेन जोशी एवं स्व॰ प॰ कुमार गंधर्व को हम नमन करते है बारम्बार नमन करते है।
विजय सहगल