सोमवार, 31 अगस्त 2020

स्व॰ श्री प्रणव मुखर्जी


"स्व॰ श्री प्रणव मुखर्जी"


भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी का आज दुःखद निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे। उन्होने 25 जुलाई 2012 से  25 जुलाई 2017 तक देश के 13वे राष्ट्रपति के रूप मे कार्य किया। 26 जनवरी 2019 मे देश के सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न" से सम्मानित किया गया था। उनको  स्वतंत्र भारत के एक मृद व्यवहार कुशल राजनीतिज्ञ, योग्य विद्वान, बुद्धिमान व्यक्तित्व के धनी राष्ट्रपति के रूप मे याद किया जायेगा। पश्चिमी बंगाल के बीरभूमि जिले के एक छोटे से कस्बे "किरनाहर" से दिल्ली तक की यात्रा उनकी मेहनत, संघर्ष का ही परिणाम थी। उन्होने अपने राजनैतिक जीवन मे सरकार के विभिन्न मंत्रालय के मंत्री पदों को सुशोभित किया और अंततः देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति के पद आसीन हुए।    

उनके निधन पर देश के जाने माने राजनैतिक दलों के नेता, गणमान्य नागरिक और अन्य  अनेक प्रसिद्ध व्यक्तित्व अपने आपको उनके साथ जोड़ कर उनके साथ विताए क्षणों, उनके साथ के अपने अनुभवों और सुखद पलों का स्मरण कर उनको याद किया पर दुर्भाग्य से मेरा ऐसा कोई निजी प्रत्यक्ष अनुभव,  संपर्क या यादगार पल उनसे नहीं रहा जिसे आज स्मरण कर  उल्लेख कर सकूँ।  लेकिन एक साधारण नागरिक के नाते मेरा सौभाग्य रहा कि सन् 2016 एवं 2017 मे राष्ट्रपति भवन के प्रांगढ़  मे फूलों की प्रदर्शनी के दर्शन हेतु भ्रमण कर सका। अपने इस  सौभाग्य को ही मै  राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रपति से अपने आपको जुड़े होने पर संतोष व्यक्त करता हूँ।

वर्तमान राष्ट्रपति,  प्रधानमंत्री एवं दूसरी तीसरी लाइन से लेकर अन्य अनेक छोटे मोटे राजनैतिक श्रेष्ठी तक के लोग अपनी उपलब्धियों, सिद्धियों, अनुभूतियों और सफलता से अपने आप को महामहिम "प्रणव दा" से जोड़ कर उनको याद कर उन्हे  अपनी भावांजलि अर्पित कर रहे हों पर एक बात तो निश्चित है कि श्री प्रणव मुखर्जी ने ही अपने कार्यकाल मे  राष्ट्रपति भवन के एक भाग मे म्यूजियम का निर्माण करा आम नागरिकों को राष्ट्रपति भवन मे पूरे साल प्रवेश के लिये उपलब्ध करा एक अति उल्लेखनीय और महत्व पूर्ण कार्य किया अन्यथा राष्ट्रपति भवन के दरबाजे मे प्रवेश साल मे मात्र एक महीने के लिये ही बसंत ऋतु मे फरवरी से मार्च तक ही फूलों की प्रदर्शनी के दर्शन के लिये ही साधारण नागरिकों के लिये उपलब्ध था।  

देश के एक साधारण नागरिक की हैसियत से मै  माननीय श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा देश के लिये किये उनके महान कार्यों एवं अमूल्य योगदान के साथ ही आम नागरिकों के लिये  उक्त म्यूजियम का निर्माण को मै  महान उपलब्धि मानता हूँ। स्व॰ श्री प्रणव मुखर्जी ऐसे बिरले राजनीतिज्ञ थे जो देश के आम नागरिकों के प्रति सोच, सहजता और सरलता रखते हों। मै उनके निधन पर अपनी व्यक्तिगत वेदना, श्रद्धा एवं सम्मान प्रकट कर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित  करता हूँ। मै ईश्वर से उनके परिवार को इस गहन दुःख को वहन करने की शक्ति हेतु भी प्रार्थना करता हूँ। उनका निधन समाज, देश और दुनियाँ के लिये अपूर्णीय क्षति है।

ॐ शांति॰  

विजय सहगल


शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

अ-मित्र


"अ-मित्र"




1988 की बात थी। पहली बार घर से दूर परिवार के साथ सागर, मध्यप्रदेश स्थानांतरण  पर आया था। कुछ दिन एकल प्रवास कर घर आदि देखे क्योंकि परिवार सहित आना था। छोटे छोटे  पहाड़ों के बीच सुंदर शहर। बुंदेलखंडी भाषा, रहन सहन मौसम की द्रष्टि से भी अच्छा था। एक दिन बस से सामान सहित सागर मे पढ़ाव डाल लिया। ट्रक बगैरा का कोई झमेला नहीं था क्योंकि ग्रहस्थी अभी शुरू ही की थी ज्यादा सामान आदि का तामझाम न था।  झाँसी घर से सारा सामान बस मे लोड कर पहुँच गये सागर। बसस्टैंड से भी सामान चार पहिया ठेले पर एक बार मे ही  घर पहुँच गया। सिर्फ आवश्यक जरूरी सामान ही साथ था। उन दिनों बैसे भी टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन का चलन न था और न ही आर्थिक स्थिति इस की अनुमति देती थी। गैस सेवा का चलन शुरू तो हो चुका था पर बेईमानी और भ्रष्टाचार की चरम सीमा के चलते हमारी पहुँच से दूर थी। केरोसिन स्टोव ही सहारा था वह भी बत्ती बाला। शाम को पहुंचे तो उस दिन तो खाने की जुगाड़ घर से ही कर के चले थे जो अगले दिन सुबह तक भी चला। मै तो अगले दिन ड्यूटि करने हेतु बैंक निकल गया।  पूरे दिन श्रीमती जी ने घर को व्यवस्थित कर रहने योग्य बना दिया। शाम के भोजन की व्यवस्था भी करनी थी।

जब दोस्त अच्छे मिल जाये तो बड़ी से बड़ी दुःख तकलीफ दूर हो जाती छोटी मोटी दिक्कते तो चुटकी बजाते ही हल हो जाती है। ऐसा ही हुआ। मैंने ऑफिस पहुँच कर अपने संगी साथियों से खाने बनाने की समस्या पर चर्चा की तो हमारे एक मित्र ने बड़े ही अपने पन से कहा सर मै और तो ज्यादा कुछ नहीं कर सकता पर  उनके घर पर पड़े अतरिक्त गैस सिलेंडर देने की सहमति का प्रस्ताव उन्होने किया। अंधे को क्या चाहिये दो आंखे,  मैंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर उन्हे हृदय से आभार किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि अब गैस से जुड़ी चूल्हे और रेग्युलेटर की समस्या भी हल करा दे। शाखा के कुछ अन्य मित्रों ने बताया कि गैस का चूल्हा और रेग्युलेटर पाइप आदि पास मे ही मस्जिद बाज़ार मे मिल जाएंगे।  रेग्युलेटर उन दिनों बड़ी समस्या थी। हमे अंदेशा था कि ये सिर्फ सरकारी गैस एजेंसी ही रेग्युलेटर उपलब्ध कराती है। पर हमे बताया गया उसी मस्जिद के पास एक दुकान मे ये उपलब्ध हो सकता है। इस तरह गैस चूल्हा सस्ते मंदे मे पाइप के साथ ले लिया।  रेग्युलेटर  मिला तो पर बहुत महंगा था शायद 400/- रुपए मे मिला था रेग्युलेटर उन दिनों। बड़ा महंगा लगा था दुकानदार भी बैंक का ही कस्टमर था पर  अन्य शहरों की तरह यहाँ बैंक का स्टाफ होने का कोई लिहाज आदि न था। मैंने गैस बाले से सारे सामान पर जब कुछ डिस्काउंट दे कीमत कम करने का कहा तो छूटते ही बोला "घोड़ा घास से दोस्ती करे तो खायेगा क्या"। ऐसे मुँहफट्ट जबाब की उम्मीद न थी,  मैंने मांगी गई कीमत अदा कर सारा सामान समेट शाखा मे आ गया।  बाद मे घोड़े और घास की कहावत/कहानी  का हमे पता चला। दरअसल घोड़े का मालिक घास के मालिक को जंगल से घोड़े पर बैठा कर घास मंडी मे छोड़ता था और इस तरह घास का मालिक घोड़े को सौजन्यता के नाते घास खिलाता था उसका मानना था कि इस तरह के पारस्परिक लाभ दोनों के ही हित मे है। इस तरह सम्बन्धों का लिहाज वे एक दूसरे के प्रति करते थे। मैनेजर और दूकानदारों के आपसी सम्बन्धों का कुछ इस तरह का ही लाभ दूसरे शहरों मे बैंक के कर्मचारियों को वस्तुओं की कीमत आदि मे मिल जाता था।  पर हमे पता चला यहाँ शाखा मे घोड़ा मालिक और घास मालिक अपनी अपनी सेवाओं का क्रय-विक्रय नगदी के रूप मे कर लेते-देते है। अतः कहावत के अनुसार सागर शहर शाखा  मे घोड़ा और घास मे  दोस्ती नहीं थी!!  

शाखा  मे  सुपरवाइजर के पद पर था, तंगी तो थी पर सोच कर खुश था चलो  शाम के खाने की जुगाड़ स्टोव पर  सर खपाने  से बेहतर था कि गैस पर खाना बनेगा और एकाध  महीने मे नये गैस सिलेंडर की  जुगाड़ कर लेंगे अन्यथा  रोज रोज मिट्टी के तेल की कौन जुगाड़ करे? राशन कार्ड तो था नहीं जब देखो राशन बाले के मिट्टी के तेल के लिये  निहोरे करों, आधा लीटर भी दे तो दुनियाँ भर के अहसान जतलाएगा?

अब शाम तक ऑफिस मे तीनों सामान चूल्हा, गैस पाइप और रेग्युलेटर की जुगाड़ हो चुकी थी। मै पहली बार परिवार सहित घर से बाहर  निकला था, इतनी आसानी से खाना बनाने के इंतजाम हो जाने की उम्मीद न थी। अपने संगी साथियों और दोस्तों के सहयोग पर नाज़ होना स्वाभाविक था। बिशेष तौर पर हम अपने उन मित्र के द्वारा अतरिक्त सिलेंडर उपलब्ध कराने के बड़े आभारी थे।

शाखा से प्रस्थान के कुछ समय पूर्व जब हमने अपने उन मित्र से अनुरोध कर अतरिक्त सिलेंडर घर से लाने का अनुरोध किया जो वहीं शाखा से कुछ कदम की दूरी पर रहते थे। उनका चेहरा देख हमे कुछ परेशानी दिखाई दी। सौयजन्यता वश हमने उनकी तबीयत आदि के बारे मे पूंछा तो उन्होने बड़े अनमने और बुझे चेहरा लिये कहा तबियत तो बिल्कुल ठीक है पर "सहगल साहब, असल मे मै श्रीमती जी के कामों मे हस्तक्षेप नहीं करता!! मैंने चौंक कर आश्चर्य भाव से पूंछा "मै समझा नहीं आप क्या कह रहे है? तब उन्होने फिर गोल मोल जबाब देते हुए कहा "सर असल मे श्रीमती जी के किचिन, घर ग्रहस्थी  के मामले मे मै दखल नहीं देता"। मैंने कहा पर सिलेंडर तो दे दो ताकि हमारा आज खाने आदि का कार्यक्रम सुचारु रूप से चले। लेकिन तब उन्होने बड़े भारी मन से कहा कि श्रीमती जी ने सिलेंडर देने से मना कर दिया। अब मेरे काटो तो खून नहीं। मै तो सुन कर चौंक गया। मैंने कहा भाई तुमने सुबह तो हमे अतरिक्त सिलेंडर का वादा किया था और इस तंगी की हालात मे तुम्हारे सिलेंडर के आश्वासन पर हमने तो हजार ग्यारह सौ रुपए खर्च कर दिये। पर वे टस से मस न हुए। मैंने कहा भी कि फिलहाल कुछ दिन काम चला दो मै शीघ्र ही तुम्हारा सिलेंडर दो चार दिन मे बापस कर दूँगा? पर उस बंदे पर कुछ असर न हुआ। अब मुझे भी क्रोध आ रहा था पर सब व्यर्थ! आखिरी प्रयास के तहत उनके स्वाभिमान जाग्रत कर अपने दिये वचन का स्मरण करा कहा दोस्त तुम्हारे भरोसे पर मैंने गैस चूल्हा, पाइप, रेग्युलेटर खरीदा कुछ तो लिहाज करो अपने जुबान का, पर उनके विना शर्म चेहरे पर अपनी झूठी बातों का लेश मात्र भी असर न था। मै मन ही मन उस घड़ी को कोसता पर सभी व्यर्थ। उसके चेहरे पर पश्चाताप और खेद का तिल भर भी असर न था। मुझे सपने मे भी उम्मीद न थी कि ऐसी परिस्थितियों से दो चार होना पड़ेगा। पर अब तो परिस्थितियों से जूझने के अलावा कोई चारा न था। शाखा के अन्य स्टाफ भी उस कर्मचारी के इस व्यवहार से हतप्रभ और दुःखी थे। शाम के सात बजने को थे हमारे अधीनस्थ स्टाफ मुकेश और हीरा लाल ने दौड़ भाग कर चाय बाले के स्टोव से मिट्टी का तेल निकलवा एक बोतल मे तेल लाकर दिया तो कुछ चैन की सांस आयी।  दुःख और परेशानी की उस घड़ी मे उन दोनों साथियों का सहयोग मै आज भी नहीं भूला। शाम को उस आधा लीटर तेल से जब खाना बना तो कहते है न कि मेहनत का फल मीठा होता है अतः उस दिन के खाने का स्वाद भी अविस्मरणीय था।

सिलेंडर बाले वे हमारे मित्र आगे भी बैंक सेवा के दौरान एक दो कार्यकाल मे शाखाओं मे  मिले। सेवानिवृत्ति के बाद भी हम दोनों  एक ही शहर मे बसे।  वे आज भी हमारे  मित्र है पर मित्रता के भाव से आज भी  कोसो दूर!!

विजय सहगल

बुधवार, 26 अगस्त 2020

मैनेजर की व्यथा



"मैनेजर की व्यथा"


मैनेजर का बीबी से हो गया झगड़ा।
छोटा नहीं तगड़ा॥
बोली, हम औरतों की भी 'अजब' कहानी है।
शादी के बाद,
एक अपरचित घर मे, सारी उमर बितानी है॥
पूरी ज़िंदगी पापड़ बेलना है।
"सास-ससुर" के नखरे झेलना है॥
"जेठ" जी के ताने।
सौ हुक्म माने॥
एक मे भी चूके।
तो मर गये भूंखे॥
रास्ते है संकरे।
"देवरों" के नखरे॥   
"ननदें" घोड़ी पर सवार।
जैसे,
सिर पर लटकी तलवार॥
इन सबसे बचे हम।
तो "बच्चों" ने लिया दम॥
गुजरी उम्र सारी।
हाय "अबला" वेचारी॥

सुनते सुनते मैनेजर को भी आ गया जोश।  
तानों के उससे, वह भी खो बैठा होश॥
बोला, तेरी और मेरी कहानी नेक है।
सिक्के है दो, पर पहलू एक है॥
मैनेजर है "बहू" की तरह,
शाखा के जैसा है घर।
"आर॰एम॰® है "ससुर" की तरह,
जिससे लगता है डर॥
जो रिश्ता "गरीब" और "सेठ" का है। 
गरीब हूँ मै "ए॰आर॰एम॰© "जेठ" सा है॥
जो शाखा मे मैनेजर के गले के फंदे है।
"कैशियर" और "बाबू" के रूप मे "देवर" और "ननदें" है॥
और जो उम्र मे छोटे,
पर मन के सच्चे है।
"सब-स्टाफ" मेरे बच्चे है॥
"स्पेशल एसिस्टेंट", जो नाविक के तीर है।
देखन मे छोटे लगे पर घाव करें गंभीर है॥
ज़िंदगी के रास्ते,
कहीं टेढ़े कहीं प्लेन है।
मिल गये रिश्तेदार ठीक, तो हीरो,
वरना, ब्लेन है.....वरना ब्लेन है॥

                 (®आर॰एम॰-रीजनल मैनेजर,  © ए॰आर॰एम॰ -एस्सिटेंट रीजनल मैनेजर)  

विजय सहगल     

सोमवार, 24 अगस्त 2020

अमीर बच्चों की पॉकेट मनी


"अमीर बच्चों की पॉकेट मनी" 




श्रीमान संपादक,                                      24.08.2020
नवभारत टाइम्स
नई दिल्ली। 

महोदय,

आपके समाचार पत्र दिनांक 23 अगस्त 2020 मे मनी मंत्र के तहत श्री लोकेश के॰ भारती के टिप्स, ट्रिक्स, आइडियास पढे। बच्चो को मनी मैनेजमेंट समझाने हेतु उन्होने मुकेश-नीता अंबानी द्वारा अपने बच्चों को स्कूल पॉकेट मनी के रूप मे पाँच रूपये प्रति दिन देने के उदाहरण के रूप मे दर्शा समझाने का प्रयास किया।

इस संबंध मे मुझे गीतकार  श्री साहिर लुधियानवी के गीत की ये लाइने याद आ रही है जो उन्होने किसी शायर द्वारा लिखे गीत :-
"इक शहँशाह ने बनवा  के हंसी ताज महल......... की तर्ज़ के विपरीत इन लाइन मे लिखा है:-  

"इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक,"

आपके मनी मंत्र मे उदाहरण देकर श्री अंबानी जी के परिवार के बच्चों को स्कूल पॉकेट मनी के आइडिया से कुछ ऐसी ही अनुभूति हम जैसे निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों द्वारा अपने बच्चों को दी जा रही पॉकेट मनी को देते हुए भावना से ग्रसित करती है।

इस विषय मे काफी चिंतन मनन के बाद मै ये समझने मे असफल रहा कि इस उदाहरण से लेखक महोदय  किसको बरगलाने का प्रयास कर रहे है? इस संबंध मे उन करोड़ो मध्यम वर्गीय माता-पिता को जो इसे पढ़कर  शायद अपने बच्चों को एक रूपये भी पॉकेट मनी के रूप मे न दे सकने के दुःख और पश्चाताप की आग मे अपनी विवशता और लाचारी पर आँसू वहाये? या उन संघर्षशील बच्चों पर जो अपनी दैनिक जरूरतों भर कि  आवश्यकताओं को पूरा करने मे ही अपने जीवन की सार्थकता मान अपनी संघर्ष यात्रा जारी रखे हुए है? या देश के उस सर्वोच्च धनी मानी परिवार एवं उनके  बच्चों को जिनकी प्रशंसा या महिमामंडन  "पाँच रूपये के स्कूल के पॉकेट मनी" रूपी उदाहरण दे एक सामान्य एवं मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार बनने के छद्म प्रयास को?

निम्न और मध्यम वर्गीय परिवार,  बच्चों को कठिन संघर्ष, श्रमसाध्य आचरण एवं निर्धनता से मिली सफलता के श्रेय को ढंका और छुपा कर रखते है।  इस तरह के उदाहरण से अलग उक्त  परिवार की महिमा मंडन की लेखक या पत्र की व्यावसायिक बाध्यता को समझा जा सकता है, पर इसके लिये अन्य अनेकों दूसरे विकल्प मौजूद है जैसे- सम्मान समारोह या पुरुस्कारों रूपी अलकरणों से अलंकृत कर इन आभिजात श्रेष्ठियों के  मन मे सम्मान की ललक और लालसा को पूर्ण किया जा सकता था।  पर यहाँ उदाहरण मे उनके उक्त "पाँच रूपये की स्कूल पॉकेट मनी" के "दर्शनशास्त्र" का यह  तत्वज्ञान हम सामान्य जनों की समझ के परे है।        

लेखक महोदय  शायद अपनी ऊंची एवं प्रगतिशील सोच को आम भारतीय की सोच का उदाहरण मान उनके सपनों को ऊंचा दिखा उन्हे अंबानी जी के बच्चों के  समकक्ष रखने का प्रयास कर रहे हों।  इसके विपरीत हम जैसे गिरे, अधोपतित  और निम्न  सोच के व्यक्ति इन संघर्ष शील युवाओं और बच्चों को ऊंचे सपने की  उड़ान  के विरुद्ध उन्हे अपनी वास्तविक  स्थिति मे रह जमीन से जुड़े रहने के लिए चेता रहा है!! साहब, पॉकेट मनी के रूप मे देश के प्रथम धनी परिवारों मे शुमार अंबानी परिवार के पाँच रूपये का उदाहरण देकर इन मध्यम और निम्न वर्गीय युवाओं ने जो थोड़ी बहुत सफलता अपने संघर्ष से हांसिल की है उनके  जीवन अस्तित्व रूपी संघर्ष को इतने हल्के मे जाया न करे।

वेशक इस परिवार ने अपने औध्योगिक साम्राज्य से देश के आर्थिक विकास मे एक अहम भूमिका अदा की हो? इनके द्वारा परोपकार और दान-पुण्य के कार्यों के तहत बड़े बड़े स्कूल और अस्पताल से हम सभी अच्छी तरह से वाकिफ है। मुंबई स्थित धीरुभाई अंबानी इंटरनेशनल
स्कूल शिक्षा के क्षेत्र मे एवं मुंबई मे  ही स्थित  कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी हॉस्पिटल एवं शोध संस्थान चिकित्सा क्षेत्र मे एक अहम भूमिका निभा रहा है जिसके योगदान को दुनियाँ और देश मे बड़ी सरहना प्राप्त है।  क्या इन मध्यम और निम्न वर्ग के बच्चे जो अपने परिवार से पॉकेट मनी के रूप मे पाँच रूपये या उससे कम पॉकेट मनी पाते है, क्या उन  शिक्षा एवं चिकित्सा संस्थानों मे शिक्षा या चिकित्सा पाने की सोच भी सकते है? पता नहीं लेखक महोदय इन तथ्यों एवं वास्तविकताओं से अवगत है या नहीं?

इन संस्थानों का  देश के आर्थिक विकास मे योगदान को मेरे सहित कोई नहीं नकार सकता पर ये मेरा द्रढ़ मत है देश की 99% आबादी उनके इन शिक्षा और चिकित्सा संस्थाओं द्वारा की जा रही सेवाओं से निचित ही वंचित होंगी। इस पर भी इस परिवार के बच्चों की पॉकेट मनी वेशक  पाँच रूपये से दस रूपये न बढ़ाने की  इन के अभिभावक की मजबूरी लेखक महोदय के  समझ आयी हो या न आयी  हो पर मेरी तो समझ से परे है? कृपया निम्न और मध्यम वर्गीय इन बच्चों को जमीन से जुड़ा रहने दे उनको इतने हंसीन सपने न दिखाये कि सपने से जागने पर ये  सीधे आसमान से नीचे आ  जमीन पर गिरें  और किसी भी काम के न रहे!! 

क्योंकि  आपके मनी मंत्र के इस पाँच रूपये के पॉकेट खर्च बाले सूत्र के निहतार्थ फलीभूत होकर अंबानी परिवार के बच्चों की तरह आम जनों के बच्चों की  सफलता बन चरितार्थ करेंगे, इसमे शंका है?

विजय सहगल





शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

ग्राहक सेवा


"ग्राहक सेवा"




मै उन दिनों कलेक्ट्रेट शाखा रायपुर  मे प्रबन्धक के पद पर था। कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर ही शाखा थी। कलेक्ट्रेट कार्यालय के शत प्रतिशत कर्मचारियों को मै शक्ल और नाम/उपनाम से जनता था तब अधिकारी वर्ग का जानना तो स्वाभाविक ही था जिनसे हमे हमेशा बैंक का व्यवसायिक सहयोग मिलता रहा था।    

एक दिन शाखा मे सुबह सुबह अतरिक्त जिलाधीश महोदय श्री अशोक अग्रवाल जी  का फोन आया और अपने एक सब स्टाफ की सहायता करने का अनुरोध किया। अभिवादन की औपचारिकता के बाद जब एडीएम महोदय ने उनके  एक अधीनस्थ स्टाफ की  बीमारी की हालात के बारे मे बताया जो उनके कार्यालय मे पदस्थ था और सेवानिव्रत्ति के कगार पर था।  काफी अस्वस्थ होने के कारण चलने फिरने की स्थिति मे भी न था। अस्वस्थता के चलते चिकित्सकीय व्यय आदि के कारण बैंक खाते से पैसे निकालने की समस्या थी और इसी संदर्भ मे हमारे सहयोग की अपेक्षा अतिरिक्त जिलाधीश महोदय को हमसे थी। हमने उन्हे इस समस्या मे आवश्यक सहयोग का आश्वासन दे निश्चिंत रहने को कहा। मैंने एडीएम महोदय से उनके सब स्टाफ के किसी भी परिजन को उस अस्वस्थ स्टाफ की खाते की पास बुक के साथ बैंक मे भेजने का अनुरोध किया। कुछ ही मिनटों मे उक्त सब स्टाफ का बेटा अपने पिता की पास बुक लेकर हमारी शाखा मे पहुँच गया। मैंने उसकी पास बुक के  खाता नंबर की आद्धतन जानकारी प्राप्त की आवश्यक धनराशि की निकासी और उनके घर के बारे मे जानकारी मांगी। कर्मचारी के पुत्र ने खाते की न्यूनतम धनराशि छोड़ समस्त राशि निकालने का निवेदन किया जो शायद छः हजार के आस पास थी उसने  ये जानकारी  कि  उनके पिता की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है त्वरित कार्यवाही का अनुरोध किया।  उन्होने बताया कि  कलेक्ट्रेट परिसर के पास  ही उनका आवास है। मैंने तुरंत ही आवश्यक नगदी एवं  निकासी फॉर्म ले वाहक के साथ स्कूटर से उस अस्वस्थ खाताधारक के घर पहुंचा। वहाँ की स्थिति बड़ी ही चिंतनीय थी। कलेक्ट्रेट कर्मचारी बिलकुल ही गंभीर हालत मे विस्तर पर पड़ा था। परिवार के सदस्य एवं अन्य रिश्तेदार आसपास दुःखी हो चिंतित हालत मे खड़े थे। उस खाता धारक को अभिवादन का सम्बोधन किया जिसका प्रत्यातुर उसने कुछ चेतन और  अर्धचेतन अवस्था मे रहते दिया। मैंने परिवार के सदस्यों की उपस्थिती मे ही निकासी धनराशि को खाते से निकालने के बारे मे कान के पास जा कर ऊंची आवाज मे कहा जिसे उसने सर हिला सहमति व्यक्त की। खाताधारक कर्मचारी निकासी फॉर्म पर हस्ताक्षर की स्थिति मे न था जिसकी जानकारी एडीएम महोदय ने हमे पहले ही बता दी थी अतः मै बैंक से ही इंक पैड लेकर चला था। मैंने कर्मचारी के बाएँ हाथ का अंगूठा निशानी निकासी फॉर्म के आगे पीछे प्राप्त की गवाह के रूप मे उनके पुत्र के हस्ताक्षर प्राप्त किये और वांछित धनराशि सभी परिवार के सदस्यों के समक्ष पुत्र को प्रदान कर दी।

एडीएम पद पर रहते एक अधीनस्त सब-स्टाफ के प्रति इतना लगाव निश्चित ही प्रशंसनीय था।  उस कर्मचारी की खाते से सामयिक नगदी निकासी  से उसके परिवार को कितना सहायता मिली होगी नहीं कह सकता पर दुर्भाग्य से उसी दिन शाम के उस खाताधारक का देहांत हो गया।   

एक अन्य घटना ग्वालियर प्रवास के दौरान की है। सन् 2000 मे  रायपुर से स्थानांतरित हो ग्वालियर आने के कारण मै जिला अदालत ग्वालियर मे भी  रायपुर की तरह  एम॰ए॰सी॰टी (मोटरयान दुर्घटना दावा अभिकरण) खातों का व्यवसाय पाने हेतु प्रयासरत था।  इसी बीच एक घटना जिसमे जिला न्यायालय के एक अर्दली को कुछ आसमाजिक तत्वों और एक हिस्ट्रीशीटर बदमाश द्वारा लूटपाट की मंशा से घायल कर दिया था। उक्त अदालत का स्टाफ घायल अवस्था मे जयारोग्य हॉस्पिटल ग्वालियर मे स्वास्थ लाभ के लिये भर्ती था पर चिंताजनक जैसे  हालत की स्थिति न थी। उक्त चतुर्थ श्रेणी के स्टाफ की आर्थिक हालात भी बहुत अच्छे न थे और उपर से अनचाहे आकस्मिक चिकित्सकीय खर्चों  ने उसकी हालत को और भी खराब कर दिया था। तभी जिला न्यायालय के एक माननीय अतरिक्त जिला न्यायाधीश ने उक्त कर्मचारी के प्रति सहानुभूति रखने के आशय से कैसे उसकी सहायता करने के बारे मे जानना चाहा? यध्यपि न्यायालय परिसर मे पूर्व से ही यूनियन बैंक की शाखा थी। उन  दिनों हमारे बैंक ने  सरकारी कर्मचारियों के वेतन के दस गुना तक  साथी कर्मचारी की व्यक्तिगत गारंटी के अंतर्गत व्यक्तिगत ऋण योजना चला रखी थी। जब मैंने उन माननीय को उस योजना की विस्तृत जानकारी दी तो वे उस चतुर्थ  श्रेणी कर्मचारी की गारंटी देने हेतु सहर्ष तैयार हो गये।

फिर क्या था मैंने कर्मचारी ऋण योजना के अंतेर्गत ऋण प्रस्ताव बनाया। पर एक समस्या और थी उक्त कर्मचारी हॉस्पिटल मे भर्ती था! मैंने ऋण दस्तावेजों पर कर्मचारी के हस्ताक्षर स्वयं अस्पताल मे जा कर कराये और हॉस्पिटल के मेडिकल ऑफिसर से काउंटर साइन करा कर्मचारी के हस्ताक्षर का सत्यापन कराया। इस तरह अतरिक्त जिला न्यायाधीश महोदय की व्यक्तिगत गारंटी के पेपर एवं कर्मचारी के भी आवश्यक पेपर, आवेदन आदि लिये जिसे माननीय न्यायाधीश ने सहजता से उपलब्ध करवा दिये।  मैंने भी उक्त ऋण स्वीकृत कर कर्मचारी के खाते मे वितरित कर दिया। उक्त एक ऋण के कारण हमे एक नया ग्राहक समूह जिला न्यायालय के रूप मे प्राप्त हुआ। 

दोनों ही घटनाये छोटी थी लेकिन ऐसी अन्य छोटी छोटी सेवाओं ने कलेक्ट्रेट परिसर, रायपुर स्थित बैंक की शाखा को एक मजबूत नीव प्रदान की और जो आज छत्तीसगढ़ की बड़ी शाखाओं मे से एक गिनी जाती है और ग्वालियर शाखा मे भी जिला न्यायालय का  भी बड़ा  बैंकिंग व्यवसाय हासिल करने मे हम सक्षम रहे। इन दोनों ही घटनाओं मे शाखा के स्टाफ का उसी तत्परता से अमूल्य सकारात्मक सहयोग भी एक अहम लेकिन मुख्य कारक था जिनके बिना उक्त अविस्मरणीय ग्राहक सेवा देना संभव न थी।  

विजय सहगल                


मंगलवार, 18 अगस्त 2020

विनम्र श्रद्धांजलि प॰ श्री जसराज

"विनम्र श्रद्धांजलि प॰ श्री जसराज"




प्रातः काल का भ्रमण हमेशा से बहुत ही थकाऊ एवं उबाऊ काम होता है।  जब आप मौसम के अनुसार सर्दी मे लिहाफ से मिल रही गर्मी और गर्मियों मे एसी की ठंडी ठंडी हवा को छोड़ कर उठते है तो ये उठना हमेशा एक कष्ट साध्य काम रहा है। लेकिन सुबह के भ्रमण से विविध भारती से प्रसारित होने बाले सुबह के भजन "वंदनबार" को सुनने की चाहत से  मिलने बाला आनंद और उल्लास की कीमत पर भ्रमण का ये थकाऊ एवं उबाऊपन मुझे कभी नहीं खला। ये ही कारण है कि हर रोज सुबह उठने मे होने बाली कशमकश और अंतर्द्वंद मे हमेशा प॰ भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व और प॰ जसराज जी के भजनों को सुनने की चाह मुझे  हमेशा विजयी मुद्रा दिला    प्रातः उठाने मे मदद करती आ रही है।

आज से चार-पाँच दशक पूर्व तक भ्रमण के साथ साथ रेडियो पर  श्री लंका (सीलॉन) या विविध भारती  स्टेशन को सुनना संभव न था।  तब भी मै अपने बचपन के मित्र देवेन्द्र दुआ के साथ झाँसी के नारायण बाग के भ्रमण के दौरान एकाध बार ट्रंजिस्टर को साथ लेकर घूमने जाता था। उन दिनों बड़ी सी  पेटी नुमा ट्रंजिस्टर को कंधे पर लटका कर  साथ लेकर चलने का देहाती चलन सिर्फ ग्रामीण लोगो मे ही देखने को मिलता था। लेकिन समय के साथ साथ तकनीकि ने नामचीन गायकों के गायन को भी टेप के माध्यम से आम जनों के बीच लोक प्रिय बनाया। लेकिन इनकी अपनी सीमाएं थी कि इसको भी  आसानी से अपने साथ ले जाना आम सुलभ न था। लेकिन जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है तब एफ़एम रेडियो, यू ट्यूब, इंटरनेट के माध्यम से अपने समय या पुराने जमाने के महान लोक गायक, शास्त्रीय गायकों को सुनने की ललक  साधारण से साधारण आदमी की पहुँच मे हो गयी  है। इस तकनीकि का लाभ आम जनों के हित  के लिए उपलब्ध होना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

आज इसी तकनीकि तक पहुँच के कारण साधारण से साधारण किस्म के व्यक्ति भी अपने जीवन के चारों ओर विखरे उल्लास, प्रसन्नता और खुशी के पलों को हर दिन हर क्षण अनुभव कर जीवन मे खुशियों का अनुभव करते है। मै भी उन भाग्यशाली लोगो मे शामिल हूँ।   तकनीकि के सकारात्मक उपयोग के कारण  प्रातः के सूर्योदय की लालिमा के पूर्व प॰ भीमसेन जोशी की सुमधुर आवाज मे यदि ये भजन सुनने को मिला जायें:- "नाम जपन क्यों छोड़ दिया, क्रोध न छोड़ा झूठ न छोड़ा, सत्य वचन क्यों छोड़ दिया..........., या "मधुकर श्याम हमारे चोर.............., संत कबीर की बाणी "माटी कहे कुम्हार से, तूँ क्या रौंदे मोय.............. एक दिन ऐसा आयेगा मै रौंदूगी तोय..........................................................."। तो जीवन मे उल्लास और उमंग के अनमोल मोती यूं ही सहज और सरलता से प्राप्त हुए प्रतीत होते है। 2008 मे भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी को 1991  मे ग्वालियर मे तानसेन समारोह मे साक्षात देखने और सुनने का सौभाग्य मिला था तब मै अपने मित्र विनोद अग्रवाल के साथ समारोह मे शामिल हुआ था जहां पर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उन्हे तानसेन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था।

जब सुबह की अमराई मे कोयल और पक्षियों की चहचहाट  के बीच कुमार गंधर्व के काल जयी भजनों की  मधुर वाणी कानों को सुनाई देती है तो दिन के सार्थक होने का एक अलग आभास होता है। मै हमेशा कुमार गंधर्व के सुमधुर अवधूत भजन "उड़ जायेगा, हंस अकेला, जग दर्शन का मेला...................... का प्रशंसक रहा हूँ। या उनके भजन "सुनता है गुरु ज्ञानी, ज्ञानी, गगन मे आवाज हो रही झीनी झीनी............., को सुन पूरे शरीर मे रोमांचित करने बाली शक्ति और ऊर्जा का जो संचार होता है उसका कोई मुक़ाबला नहीं। कुमार गंधर्व जी के स्वर मे  श्री देवा नाथ जी रचित निर्गुणी भजन "गुरु जी, जहां बैठु वहाँ छाया जी, सो ही तो मालक मेरा नज़रना आया जी........................" मे उनका आलाप आकाश के शून्य से आता प्रतीत होता है, एक  अद्भुद और रोमांच कारी अनुभव उनके भजनों को सुनने से मिलता है जो एक अलग ही आनंद और उल्लास देने बाला एक अनमोल और बेशकीमती अनुभव होता है।

भजन गायकी के इन तीन अनमोल मोतियों मे प॰ जसराज जी भी उक्त दोनों महानुभावों के समकक्ष थे।  जिनके कल दिनांक 17 अगस्त 2020 को निधन का समाचार दुःख और वेदना देने बाला था। दुनियाँ मे ऐसे विरले ही लोग हुये है जिनके कीर्ति और यश पताका प्रांत और देश के परे दुनियाँ के सातों  महादीपों मे समान रूप से व्याप्त हो प॰ जसराज जी उनमे से एक थे। वे विश्व मे अनेकों सम्मान और  विभूषणों से अलंकृत किए गये वे वास्तव मे भारत रत्न से बढ कर विश्व रत्न थे। उनका भजन "रानी तेरो चिरजीओ गोपाल.................................... हमे कृष्ण भक्ति की उस अनंत दुनियाँ मे ले जाता है जहां और कुछ भी पाने की ईक्षा पर पूर्ण विराम स्वतः ही लग जाता है। भजन "भरत भाई कपि से उऋण हम नाहीं...................................मे भगवान राम और भरत के बीच संवाद मे श्री राम के वनवास के दौरान श्री हनुमान जी से हर कदम पर मिले सहयोग से उऋण न होने का जो मार्मिक वर्णन जसराज जी ने अपनी आवाज मे गया  है वह उक्त व्रतांत का जीवन्त चित्रण कर देता है।

वेशक आज संगीत जगत के  तीनों दिग्गज महानुभाव सर्व श्री प॰ भीम सेन जोशी, प॰ कुमार गंधर्व, प॰ जसराज  भौतिक रूप से हम सबके बीच मे नहीं है लेकिन इन महान आत्माओं के कंठ से निकली सुरीली आवाज ने न केवल ईहलोक के करोड़ों मनुष्यों को  मंत्र मुग्ध किया है  और आगे भी करती रहेगी  अपितु परलोक मे स्थित देवता गण भी इनकी सुरीली आवाज का रसास्वादन कर आनंदित हो रहे होंगे।

पूर्व मे परलोकगमन हुए स्व॰ पंडित भीमसेन जोशी एवं स्व॰ प॰ कुमार गंधर्व और अभी कल दिनांक 17 अगस्त 2020 को दिवंगत प॰ जसराज जी को हम भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है एवं ईश्वर से विनम्र प्रार्थना करते है कि वे स्व॰ प॰ जसराज जी को अपने श्री चरणों मे स्थान दें।

अंत मे प॰ जसराज जी के उस भजन "भरत भाई, कपि से उऋण हम नाहीं ........................, को पुनः स्मरण करते हुए उनसे कहना चाहते है कि "पंडित जी,  जैसे भगवान श्री राम, वीर हनुमान के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते बैसे ही हम अखिल विश्व के आपके करोड़ों करोड़ प्रसंशक एवं श्रोतागण आप द्वारा संगीत  साधना के माध्यम से इस  भू मण्डल मे प्रवाहित संगीत सरिता के माधुर्य से कभी भी उऋण नहीं हो सकेंगे।

पंडित जसराज सहित तीनों महान आत्माओं स्व॰ पंडित भीमसेन जोशी एवं स्व॰ प॰ कुमार गंधर्व को हम नमन करते है  बारम्बार नमन करते है।

विजय सहगल