गुरुवार, 30 जुलाई 2020

मित्र विजय गुप्ता की सेवानिव्रत्ति


"मित्र विजय गुप्ता की सेवानिव्रत्ति"




गुप्ता जी आज 38-39 साल की सफल और बेदाग सेवा के बाद आज 31 जुलाई 2020 को  आपकी बैंक से सेवानिव्रत्ति का दिन है एवं जीवन का एक महत्वपूर्ण पढ़ाव भी। गुप्ता जी तुम्हें याद तो होगा ही आज जब आपका  बैंक की सेवा से रिटायरमेंट है और इन्ही दिनों के अरीब-करीब 1985-86 मे अपनी पहली मुलाक़ात ग्वालियर शाखा मे हुई थी जब आप सीतापुर (उत्तर प्रदेश) से स्थानांतरित होकर ग्वालियर आये थे। उन दिनों ग्वालियर शाखा मे पहले से ही हम तीन स्टाफ सदस्य जो  झाँसी के मूल निवासी हो ग्वालियर शाखा मे पदस्थ थे। यध्यपि वे सब भी अपने स्वजन सहचर ही थे लेकिन उनकी निकटता मात्र बैंक और ग्वालियर-झाँसी के बीच दैनिक यात्रा तक ही सीमित थी। इन मित्रो के संबंध को हम कमतर नहीं आँकते लेकिन फिर भी उन रिश्तों  को प्रगाढ़ या मजबूत मित्रता के रिश्तों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। वे मित्र तो थे पर मित्रता की वो भावना हम लोगो के बीच उतनी प्रगाढ़ नहीं थी।   कुछ ऐसी ही शंका उन दिनों  आपके बारे मे हमारे ज़ेहन चलती रहती थी कि कदाचित ऐसी ही मित्रता के भाव का आभाव आपके साथ भी न हो? लेकिन समय की लंबी कसौटी पर आज हमे कहते हुए फ़ख्र है कि तुम मित्रता की इस पैमाने मे अद्व्तिय रूप से अव्वल रहे। तुम्हारी मित्रता पर हमे अभिमान है गुप्ता जी।

जो अपने मित्र के दुःख मे दुःखी और सुख मे प्रसन्नता का अनुभव करे मानों कुछ मंगल उसके ही साथ हुआ है तथा जो अपने मित्र के साथ दुःख और संकट की घड़ी मे मजबूती से खड़ा रहे वास्तव मे बो ही सच्चा मित्र होता है। गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस मे उल्लेख भी किया है:-
धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद काल परखिये चारी॥

हमे कहते हुए कोई भी झिझक नहीं की तुम जैसे मित्रों ने संकट और विपत्ति मे हमारे साथ बखूबी दिया है जिसे जीवनपर्यंत हम नहीं भुला सकते। नब्बे के दशक मे हमारी व्यवसायिक  संपत्ति के विवाद मे एक तीसरे व्यक्ति द्वारा उसे अपने अधीन लेने के बल पूर्वक प्रयास के प्रतिवाद  से  उपजी हिसात्मक घटना  के पश्चात अपरोक्ष रूप से हमारे मित्र स्व॰ अनिल समधिया और तुमने जो साथ दिया था उसे एक पक्ष के नाते मै ही महसूस कर सकता हूँ। संकट की उस घड़ी मे हम तीन नहीं थे अपितु एक पे एक पे एक अर्थात 111 थे। विपत्ति की बो घड़ी आई और चली गई लेकिन इस दौरान हमारी मित्रता और मजबूत और निखरी लेकिंन  अनिल समधिया का इस असमय बिछुड़ जाना प्रायः दिल को बहुत कचोटता है।

गुप्ता जी दैनिक यात्रा मे बिताए वे अविस्मरणीय क्षण रह रह कर याद आते है। कैसे हर रोज बुंदेलखंड एक्सप्रेस मे हम 8-10 लोग सुबह का खाना एक साथ कभी ट्रेन की खाली पड़ी बोगी मे, कभी बीच रास्ते जंगल मे घंटों खड़ी ट्रेन मे छोले के पेड़ से तोड़े पत्तों पर हांस-परिहास  के बीच मुकेश रिहानी, राजकुमार खरे और दारोगा जी के साथ उड़ाई लंच पार्टियां किसी फाइव स्टार होटल की पार्टियों से कम    थी। आज आप के रिटायरमेंट के रहते आपकी माताजी का भी स्मरण हो आया। गुप्ता जी यूं तो मुनगा और सेम की सूखी सब्जी अनेकों बार हमने खाई होगी  पर आपकी माताजी द्वारा बनाई सेम और मुनगा की सब्जी की बात ही कुछ और थी। इन सब्जियों का वो स्वाद हम आज तक नहीं भूले। अदरणीय माता जी को भी हमारा स्नेह चरण वंदन कहना और आगे कोई ऐसा आयोजन अवश्य करने का प्रयास करना जिसमे उक्त दोनों सब्जियों का रसास्वादन पुनः ले सकूँ।  

तुम्हारी शादी मे वो भांग के नशे का स्वांग भरा वाक्या गाहे बगाहे याद कर हंसी छूट जाती है। कैसे पान के साथ तंबाकू के सेवन से उपजी असहज स्थिति से तुम्हें गुजरना पड़ा था। तुम्हारी ससुराल अर्थात आदरणीय भाभी जी का मायका स्थानीय होने के कारण आपके ससुर स्व. गेड़ा जी का स्मरण होना भी स्वाभाविक है। कैसे आपके सास ससुर हम पति पत्नी को भी आपके समकक्ष आदर सम्मान देकर साल मे एक दो बार परिवार सहित भोजन पर आमंत्रण देकर बुलाते रहे। आज के समय दामाद का रिश्ता निभाना ही कठिन होता है तो दामाद  के मित्र का रिश्ता निभाना तो कल्पना से परे है।

गुप्ता जी एमआईटीएस कॉलेज के बच्चों के बीच हुए झगड़ो मे एक पक्ष के रूप मे शामिल अपने बच्चों का पक्ष लिये मध्यस्था हेतु बच्चों के कॉलेज  हॉस्टल मे हम दोनों के जाने की वो भयावह रात तो याद होगी। कैसे 100-125 से ज्यादा बच्चों के बीच जब हम उस पीढ़ित छात्र से उसके तीन मंजिला हॉस्टल मे मिले थे। पीढ़ित बच्चों सहित सारे बच्चे हम सबको घेर आवेशित मुद्रा मे खड़े थे। कितने क्रोधित थे वो सारे छात्र, "बाप रे" सोच कर भी सिहरन होती है!! यदि कोई एक भी छात्र उस दिन हम लोगो की बुजुर्गीयत के लिहाज़ को अनदेखा कर अपनी सीमा लांघ न्यूनतम शिष्टाचार को तिलांजलि दे  हल्की सी भी हिंसा कर देता तो निश्चित ही हम दोनों बहुत ही गंभीर भीड़ का शिकार हो गये होते, जिसकी कल्पना से ही डर लगने लगा था। बात चीत के बाद कैसे हम दोनों दबे पाँव हॉस्टल से बगैर पीछे मुड़े तेजी से निकल गये थे। हमे लगता है वो हम लोगो का साहस नहीं दुस्साहस था। आज लगता है उस घटना मे इस तरह जाने का हमारा  निर्णय सही नहीं था।
गुप्ता जी ग्वालियर मेले मे 2 रुपए के गाने तो याद होंगे। हम चार पाँच लोग थे रिहानी, शायद खिच्ची साहब भी थे और कौन कौन था याद नहीं। बात रुपए की नहीं थी देखने बालों की भीड़ से दूर खड़े होकर एक पुलिस कांस्टेबल को पुलिस स्टाफ के रूप मे परिचय दे एक नहीं दो-दो बार वीआईपी दर्शकों की तरह एक्ज़िट गेट से कितने सम्मान के साथ शो मे ले जा कर आगे सोफ़े पर बैठाया  गया था। वे शरारते जब कभी याद आती है तो हंसी छूट ही जाती है। 

आपके हमारे और मिश्रा जी के परिवार सहित अंडमान निकोबार की यात्रा भी कम यादगार नहीं
थी। फिर चाहे कोलकाता मे ट्रैवल एजेंट द्वारा बुक  घटिया होटल को छोड़ अपनी पसंद के होटल मे ठहर ट्रैवल एजेंट से बाद मे पैसे की बसूली  जो लगभग असंभव लग रही थी फिर भी हम लोगो ने होटल के भुगतान को ट्रैवल एजेंट से बसूल किया था, लड़ाई भिड़ाई का कोई मौका नहीं छोड़ा था।  चाहे रॉस आइलेंड या हेवलॉक आइलेंड की यात्रा हो  चाहे समुद्र स्नान वो एक अविस्मरणीय यात्रा थी।   हेवलॉक से शिप से बापसी मे घनघोर वर्षा के बीच  हम सभी परिवारों का शाकाहारी होने के बीच मछलियों की तीक्ष्ण गंध के कारण भाभी जी से उल्टी की शुरुआत का जो सिलसिला चला उसके देखा देखी एक के बाद एक बाद 3-4  लोगो का उल्टी कर देना उस समय तो तनाव का कारण था लेकिन फिर उस घटना की चर्चा बच्चों सहित हम सब के बीच हास्य-परिहास का एक अनूठा किस्सा बना रहा था। आधुनिक तकनीकी से मेरे द्वारा बनाये विडियो और फोटो न जाने वीडियो कैमरा से कहाँ गायब हो गये इससे तो पुराने जमाने के निगेटिव ठीक लगते थे जब जी चाहा पीपी साइज़ फोटो एल्बम बना लेते थे और उनको देख सुनहरी यादों मे खो जाते थे। अब तो फोटो या अल्बम देखने की बाते गुजरे जमाने की बाते हो गई।

गुप्ता जी पिछले एक-सवा साल से नोएडा मे मुझे झोपड़ पट्टी के बच्चों के साथ जुडने का जो  मौका मिला उसने हमारी सोच को उद्वेलित कर एक नया आयाम दिखाया (https://www.facebook.com/pratibodhaksiksha.sansthan)। यध्यपि कोविड महामारी की बाध्यता के चलते हमे भी उक्त कार्य को अभी विराम देना पड़ा ।  जमीन से जुड़े एवं अभावों के बीच पल रहे उन बच्चों को देख लगा कि कि घर परिवार माता-पिता और बच्चों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों के पूर्ण करने के बाद हमे आज उस वंचित समाज के लोगो और उनके बच्चों के लिये आगे आना चाहिए जो परिस्थिति वश शिक्षा से दूर अपना जीवन यूं ही व्यर्थ गंवा समाज और देश मे मिले शिक्षा के अधिकार से वंचित है। ये काम स्वार्थ परक राजनीति और भ्रष्ट व्यवस्था तंत्र के रहते सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता? समाज के लोगो को आगे आकर ही इस व्यवस्था मे बदलाव की शुरुआत करनी होगी। सेवानिव्रत्ति के बाद आज समाज के उन दबे-कुचले और वंचित वर्ग के लोगो  को कुछ बापस देने का समय है जिससे अब तक हम हर पल हर घड़ी कुछ न कुछ लेते आये है। जन्म से लेकर आज तक माता-पिता, भाई बहिनों चाचा ताऊ या अन्य अनेक नजदीकी रिश्तेदारों का उऋण तो लगातार हम अब तक  होते आये है पर उम्र के इस दो राहे पर आज  हमे समाज के इन वंचित लोगो के लिये कुछ करना चाहिये जो सब  वे न पा सके जो ईश्वर और अपने पूर्वजों के अनुग्रह से हमे प्राप्त हुआ है। ग्वालियर प्रवास पर अब समान विचारों के लोगो के साथ मिलकर हम सब इस राह मे कुछ करने का प्रयास करेंगे।

आज आपकी सेवानिव्रत्ति पर हम आपके सुखी और दीर्घ स्वस्थ जीवन की कामना करते है। आप जीवन की एक नई पारी की शुरुआत अपनी पूज्य माताजी, पितातुल्य बड़े भाई राधे श्याम भाई साहब-भाभी एवं परिवार के समस्त सदस्यों के साथ आनंद पूर्वक व्यतीत करें ऐसी कामनाओं के साथ।

तुम्हारा मित्र,

विजय सहगल
              
     


रविवार, 26 जुलाई 2020

(कारगिल के वीरों को समर्पित) "कैसे तुम्हें भुलाये हम?"


(कारगिल के वीरों को समर्पित)
कैसे तुम्हें भुलाये हम?






वादा हमसे आने का था,
कैसे तुम्हें भुलाये हम?
बाट जोहती माँ द्वारे पर,
उसको क्या बतलाये हम?

जिस माता की रक्षा करने,
माँ ने तिलक लगाया था।
शिखर कारगिल विजयी पताका,
फहरा, कदम बढ़ाया था॥
छल से अरि ने घात पीठ पर,
वार अस्त्र का गोला था।
घोर नीचता, कायरता थी,
अखिल विश्व ये बोला था॥
नयन नीर जिन आँखों सूखे,
दिवास्वपन झुठलाये भ्रम?
वादा हमसे आने का था,
कैसे तुम्हें भुलाये हम?
   
हिम शिखरों की चोटी से,
जब दुश्मन ने हमला बोला।
अटल इरादों, ऊंचे हौसलों,
रौंदे शत्रु औ झांकड़ झोला॥
याद दिलाया दूध छटी का,
कुटिल चाल गीदड़ की तोड़ी।
पाक फौज को बना अपाहिज,
लूला, लंगड़ा, अंधा कोढ़ी॥
नस्ले उनकी याद करेंगी,
साहस, शौर्य, भारत हरदम।   
वादा हमसे आने का था,
कैसे तुम्हें भुलाये हम?

सच का घात सह लिया हमने,   
पर, शिशु-कुमार को क्या बतलायेँ।
वादा जाकर आने का था,
कल पर कितने कल टलवायेँ?
मिथ्या दरों-दीवार समझते,
सच मासूम बतायें कौन?
समझदार हम, भी न समझे,
बयां कर रहा उसका मौन॥
दूर सितारों पर होकर भी,
रौशन राह दिखा, बच "तम"।
वादा हमसे आने का था,
कैसे तुम्हें भुलाये हम?

युद्ध कारगिल "घोष" सही था।
"गीता" कृष्ण, संदेश यही था॥
या तो युद्ध मे हो बलिदान,
स्वर्गारोहण गमन करेंगे।
अथवा विजयी श्री वरण कर,
धरा लोक सुख भोग करेंगे॥

विजय सहगल  

शनिवार, 25 जुलाई 2020

नाग पंचमी


"नाग पंचमी पर विशेष"





आज पुनः एक बार फिर नाग पंचमी है, हमारे पर्व और त्योहार प्रायः प्रकृति से जुड़े हुए है और हमको मानव और प्रकृति के बीच के संतुलन और सामंजस्य का  हर पल स्मरण कराते है जिसमे दोनों का सद्भाव पूर्वक सहअसतित्व बना रहे। त्योहार हमे समय समय पर आगाह भी करते है कि दोनों मे से कोई भी अपनी सीमा का उल्लंघन न करे फिर चाहे त्योहार होली, दीवाली, राखी गोवेर्धन पूजा, वट सावित्री अमावस्या या नाग पंचमी का क्यों न हो। नाग पंचमी वास्तव मे मानवता के मित्र, नागों, साँपों के प्रति हमारा आदर और सम्मान ही है जो प्रकृति और मानव के सहअसतित्व का अनूठा उदाहरण है और जिसका उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रन्थों मे अनेकों जगह भी मिलता है। जिसका स्पष्ट संदेश है एक दूसरे की रक्षा करना। यदि हम साँपों की रक्षा करेंगे तो वे भी हमे फसलों को नुकसान पहुंचाने बाले जीव जंतुओं, कीट-पतंगो को आहार बना कर अन्न के रूप मे धन्य-धान प्रदान करेंगे। हम मानव समुदायों ने अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित साँपों के बारे मे दिग्भ्रमित हो तमाम भ्रांतियाँ अपने मन मे पाल उन को मारकर उनके विनाश को अग्रसर हो परोक्ष रूप से अपना  ही विनाश किया है। टिड्डी रूपी समस्या इसका ज्वलंत उदाहरण है।  

हमे याद है बचपन मे झाँसी शहर मे नाग पंचमी का एक बहुत बड़ा मेला भूतनाथ दरवाजे बाहर बगिया (बगिया का नाम मै भूल रहा हूँ) मे लगता था। भूत नाथ गेट की किले की चारदीवारी के से लगी बगिया मे सुंदर सुंदर झकियां सजाई जाती थीं। एक दो दिन पूर्व से से ग्रामीणों के समुदाय सावन के गीत और आल्हा गाते हुए बगिया मे इक्कठे हो सारी रात लोक गीतों का गायन एवं श्रवण करते थे। प्रायः सावन की ऋतु होने के कारण वर्षात भी हो जाती थी।  नाग पंचमी बाले दिन सारा नगर मेला देखने उमड़ पड़ता था। हम लोगो के घर पानी की टंकी से एक-सवा किलोमीटर दूर बगिया तक क्या बूढ़े क्या बच्चे, महिला पुरुष  मेला देखने उमड़ पड़ते थे। तेलियों के मंदिर से तो भीड़ इतनी हो जाती कि सम्हालना मुश्किल। झूले खिलौने मिठाई की अंगिनित अस्थाई दुकाने सज जाती। पीने के पानी की व्यवस्था स्वस्फूर्त हो सभी बच्चे बाल्टी मे पानी ले अपने अपने घरों के चबूतरे पर बैठ लोगो को पानी पिलाने की सेवा करते। यद्यपि नलों से पानी की इतनी आपूर्ति न होती लेकिन हमारे घर के पिछवाड़े स्थित कुएं से कुछ लोग पानी खींचते और कुछ लोग बाल्टियों से दो ढाई सौ फुट दूर घर के चबूतरों तक पानी पहुँचते ताकि मेले देखने जाने बालों को पीने के पानी की कमी न हों।  इन सभी कार्यों की  देखरेख और अगुआई का कार्य मुहल्ले के संरक्षक के रूप जो व्यक्ति करते हम सभी उन्हे  "चुखू भाई साहब" कहते थे। उनकी  सक्रिय देखरेख मे पानी की व्यवस्था सुचारु रूप से दिन भर जारी रहती।

सड़क के दोनों ओर पूरे रास्ते मे जगह जगह कुछ बच्चे युवा बाल्टी मे पानी भर उसमे एक बहुत छोटी कटोरी या डिब्बी बाल्टी के पैन्दे मे रख लोगो को आमंत्रित करते कि जो एक, दो, पाँच दस पैसे के सिक्के बाल्टी मे भरे पानी के उपर से निशाना साध नीचे रखे कटोरी या डिब्बी मे डालेगा उसे उतनी ही मुद्रा पुरुस्कार स्वरूप मिलेगी। यानि, एक के दो, दो के चार, पाँच के दस और दस के बीस पैसे मिलेंगे। हर बाल्टी के चारों ओर बाल्टी मे पैसे डालने के खेल खेलने बालों की भीड़ लगी रहती। कोई ठीक बीच मे से सिक्का डालने का प्रयास करता कोई  विशेष कोण और स्थिति से पैसे डालने का प्रयास करता। अधिकतर लोग कभी सफल और कभी असफल होते। लेकिन कुछ लोग कैरम बोर्ड के महारथियों की तरह अचूक निशाना बना खिलाने बाले की जेब खाली कर जाते। ऐसे निशान बाज की खबर तुरंत ही लग जाने पर लोग उस निशाने बाज को खिलाने से बचते नज़र आते। पूरे शहर मे मेले का नशा दिन भर छाया रहता। शहर मे जहां तहां सपेरों को घेरे हुए बच्चे बूढ़े उत्सुकता पूर्ण नज़रों से काले नागों को देखते। बीन की आहट पर सपेरों का यहाँ वहाँ डोलना ऐसे लगता कि बीन की धुन पर मस्त हो कर नागिन डांस कर रही हो। भय मिश्रित डर से लोग साँपों के नजदीक भी आने से डरते। हर घर के लोग महिलाएं पुरुष साँपों को दूध पिलाना, तिलक, चावल पुष्प चढ़ाया जाता। मै भी अपनी माँ को साँपों की पूजा करते देख सँपेरों की बहादुरी पर अचंभित होता और उनकी ही तरह साँपों को अपने हाथ मे लेने के बारे मे  सोचता। सपेरों की भी ऐसे अवसरों पर अच्छी कमाई हो जाती। लोग पैसे के साथ पुराने वस्त्र और अन्न, मिष्ठान आदि मे उन्हे देता। एक ऐसी सामाजिक अर्थ व्यवस्था के दर्शन होते जिसमे समाज के हर वर्ग के लिये मुद्रा स्फीति अर्थात मुद्रा के विस्तार का स्थान होता। लेकिन दिसम्बर 2019 मे मेले के उन्ही मेले के  स्थलों और लक्ष्मी तालाब की दयनीय हालत देख बड़ी निरशा हुई।

छात्र जीवन मे आगे  जीव विज्ञान विषय होने के नाते इन जीव जंतुओं के बारे मे तमाम अज्ञानता और भ्रतियों का निवारण साँपों के बारे मे भी हुआ। तभी से साँपों के बारे मे पोषित डर, भय और कुधारणाओं को दूर करने के लिये बचपन मे साँप पकड़ने की चाह ने मुझे जब जब मौका मिला मैंने  हमेशा सँपेरों का उनके साँपों के बारे मे गूढ ज्ञान के कारण उनके गुरु रूपी सानिध्य मे रह साँपों को अपने हाथ मे लेना, गले मे डालना जैसे कार्य उनसे सीख अपने भय को दूर किया। लेकिन आज भी स्वतंत्र रूप से साँप पकड़ने का कार्य उस कहावत को चरतार्थ करने की मूर्खता नहीं करूंगा  कि "बिच्छू का मंत्र न जाने साँप के बिल मे हाथ डालें"। 
    
हर विषय मे सरकार से अपेक्षा करना, उनके सीमित संसाधन और स्वार्थपरक नीतियों के कारण  दीर्घ काल तक उनके भरोसे बैठे रहना न्यायोचित एवं विवेक सम्मत न होगा। आज के वैज्ञानिक युग मे जहां एक ओर  पशु क्रूरता, निवारण अधिनियम, ("पीटा एक्ट") के नियमों के चलते बकरे पर क्रूरता को दरकिनार  नाग पंचमी पर सपेरा जाति के समुदाय को साँपों के पकड़ने के नाम पर जब तब उत्पीढन किया जा रहा हो तो धार्मिक संस्थाओं को आगे आकर इन सँपेरा जाति के समुदाय के साँपों के बारे मे सोच, समझ, ज्ञान  और अनुभव का लाभ साधारण जन सामुदाय के साँपों के बारे मे पूर्वाग्रह और भ्रांतियों का निवारण कर शिक्षित करने मे तथा गाँव शहर, कस्बों, महानगरों मे आबादी के बीच निकले साँपों को पकड़ने मे  करना चाहिये जिससे उक्त समुदाय आर्थिक विकास भी होगा और जन साधारण का साँपों के बारे मे ज्ञानवर्धन भी। 
   
विजय सहगल
          

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

नीलगिरी पर्वतीय रेल-ऊटी


"नीलगिरी पर्वतीय रेल-ऊटी"











नीलगिरी पर्वतीय रेल जिसको संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया है से यात्रा करना एक अलग ही रोमांचकारी अनुभव था। ये पर्वतीय रेल बैसे तो "मेत्तुपलायम" से दक्षिण के पर्वतीय शहर "ऊटी" को जोड़ती है जिसकी दूरी लगभग 50 किमी है। पर चूंकि उक्त साढ़े चार घंटे की यात्रा के लिये समय और परिस्थिति दोनों ही अनुकूल न थी क्योंकि हमारी इस यात्रा मे रिहाइश इन दोनों शहरों के मध्य मे  "वेलिंग्टन" (कुन्नूर) शहर मे थी जो दूरी के मामले मे भी लगभग मध्य मे था अर्थात वेलिंग्टन से ऊटी लगभग 25 किमी था। अतः इस 25 किमी रेल यात्रा का आनंद हमने वेलिंग्टन से ऊटी जाने आने मे करने का निश्चय किया। किसी भी पर्वतीय रेल से ये मेरी पहली रेल यात्रा थी। ऊटी भ्रमण के बारे मे अपने अनुभव फिर किसी ब्लॉग मे लिखूंगा फिलहाल तो सिर्फ नीलगिरी पर्वतीय रेल यात्रा के अनुभव सांझा करूंगा।

22 फरवरी 2019 को वेलिंग्टन से उद्गम मंडलम जाने के निश्चय के साथ मै अपनी पत्नी और बड़े भाई-भाभी के साथ घर  से कार द्वारा वेलिंग्टन स्टेशन के लिये निकले। गूगल मैप के अनुसार स्टेशन नजदीक ही 2-2.5 किमी दिखला रहा था। पहाड़ी क्षेत्रों मे गूगल महश्य कभी कभी धोखा दे जाते है चलते चलते जब सड़क अचानक दो भागों मे बंट जाये एक रास्ता सीधा और दूसरा कुछ दूर समानान्तर हो ढलान लिये हुए नीचे अंतर्ध्यान हो जाये तो भ्रांति उत्पन्न होना स्वाभाविक था, ऐसा ही हम लोगो के साथ हुआ। मैप पर स्टेशन बमुश्किल आधे से भी कम किमी की दूरी पर दिखा रहा था पर गलत रास्ते की बजह से हमे स्टेशन ढूँढे से भी नहीं मिल रहा था। इन्ही गफलतों मे 10-15 मिनिट लग गये तब कहीं एक सड़क से घाटी मे उतर कर जैसे तैसे वेलिंग्टन स्टेशन पहुंचे। लंबे लंबे चीड़ के सघन पेड़ो को तले सुंदर मनोरम दिखने बाला रेल्वे स्टेशन वेलिंग्टन अपनी पुरातन वैभवता को समेटे शांत सुरम्य वातावरण मे स्थित दिखाई दिया। बहुत छोटा साफ सुथरा समान्यतः रेल स्टेशन की छवि के एकदम विपरीत वेलिंग्टन स्टेशन बगैर किसी कोलाहल के, प्लेटफ़ोर्म भी बिना किसी एक यात्री  के देखना अपने आप मे एक सुखद एवं आश्चर्य अनूभूति देने बाला था। स्टेशन पर नज़र आती थी सिर्फ और सिर्फ पक्षियों के कलरव की ध्वनि और ठंडी हवाओं के झोंकों से पेड़ों के पत्तों की आपस मे टकराने से उत्पन्न फुसफुसाहट सुनसान के सहचर की सी निशब्द आहट।

लगभग एक शताब्दी पूर्व निर्मित अंग्रेजों के जमाने का शांत लेकिन सुंदर वास्तु समेटे हम लोगो ने वेलिंग्टन स्टेशन मे प्रवेश किया तो मुख्य कार्यालय मे स्टेशन मास्टर जी से गाड़ी की पोजिशन और यात्रा करने के टिकिट आदि के बारे मे पूंछतांछ की। कार पार्किंग के लिये भी हमने उनसे जानकारी चाही? सौभाग्य से स्टेशन मास्टर जी भी बड़े  सहृदय मिलनसार राजस्थान के उत्तर भारतीय थे। मीना जी (नाम भूल रहा) उपनाम के सज्जन ने बताया की रेल आगमन के पश्चात उपलब्ध सीटों के आधार पर ही सामान्य श्रेणी के टिकिट का वितरण किया जायेगा क्योंकि पर्वतीय रेल होने के कारण असीमित संख्या मे टिकिट का वितरण ट्रेन पर बढ़ने बाले यात्रियों के बजन के कारण  नहीं होता ताकि रेल विना किसी रुकावट के अपने गंतव्य तक पहुँच सके। कार पार्किंग आदि कोई सुविधा स्टेशन पर उपलब्ध न थी। स्टेशन के बाहर भी मैदानी स्टेशन की तरह  कोई बहुत बड़ा स्थान उपलब्ध न था। स्टेशन मास्टर से सलाह मशविरे के बाद वंही एक जगह हम लोगो ने कार पार्क कर दी।  कुछ समय बाद सामने से छोटी सी खिलौने की तरह दीख रही पाँच डिब्बों की ट्रेन स्टेशन की ओर बढ़ती दिखाई दी। और चंद मिनटों पर पर्वतीय रेल स्टेशन वेलिंग्टन पर आकार रुकी।  स्टेशन मास्टर ने ट्रेन मे उपस्थित टिकिट चैकर स्टाफ से पूंछ कर बताया कि सेकंड क्लास की टिकिट उपलब्ध न हो सकेंगी! लेकिन प्रथम श्रेणी का डिब्बा पूर्णतय: खाली था। जब प्रथम श्रेणी और द्व्तिय श्रेणी के टिकिट के रेट के बारे मे पूंछा तो उन्होने प्रथम श्रेणी रु॰180/- एवं द्व्तिय श्रेणी का किराया शायद रु.13/- बताया। अब तो हम लोगो को लगा कि यात्रा संभव न हो पाएगी? दोनों श्रेणी के डिब्बों की बनावट आदि मे लेश मात्र का भी कोई अंतर न था सिवाय डिब्बे के बाहर लिखे प्रथम श्रेणी अर्थात फ़र्स्ट क्लास। निर्णय तुरंत ही लेना था। एक बारगी सोचा दोपहर बाली गाड़ी से चलेंगे।  अन्य मैदानी स्टेशन होता तो इतना समय भी सोचने विचारने का न मिलता पर छोटा स्टेशन होने एवं स्टेशन मास्टर, बुकिंग क्लर्क, लाइन मैन, टिकिट चैकिंग और बाबू  आदि रेल्वे के समस्त उत्तरदायित्व एक ही व्यक्ति के पास होने के कारण कुछ सेकंड इस हेतु मिल गये। मैंने भी उस कहावत "नाश सो सवा सत्यानाश" का स्मरण कर निर्णय लिया कि कौन सा रोज रोज ऊटी आना है? स्टेशन मास्टर को 720/- रूपये देकर  चार प्रथम श्रेणी के टिकिट लिये और ट्रेन की ओर भागे। छः सीट बाला डिब्बा पूरा खाली था हम लोग ट्रेन की ओर बढ़े और लपक कर डिब्बे मे चढ़ गये।

कुछ ही सेकंड मे ट्रेन ने अपनी सीटी बजा चलने का संकेत दिया और गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। मैदानी क्षेत्रों के रेल की तरह आपाधापी न थी पाँच डिब्बे की ट्रेन मे सभी यात्री अनुशासित होकर बैठे थे। जंगलों पहाड़ों को पीछे छोड़ती ट्रेन बढ़ी तो कुछ देर बाद दूर दिखाई देते हरे भरे पेड़ सुंदर नज़ारा लिये दिखाई दिये। कहीं चाय बगानों से और कहीं सड़क किनारों से रेल अपनी मध्यम गति से एक सुंदर और सुमधुर संगीत उत्पन्न कर आगे बढ़ रही थी। कभी सड़क और बहते पहाड़ी झरने के उपर से बने पुल से रेल निकलती तो कहीं रेल खुद ही किसी सड़क के पुल के नीचे से आगे बढ़ जाती। रास्ते मे ऊटी के पहले तीन स्टेशन और पड़े जिनमे अरुवंकाडु स्टेशन भी देखने मे सुंदर और मन भावन था। सड़क किनारे इस रेल यात्रा से वंचित कुछ बस और कार से ऊटी जा रहे पर्यटक निकट से गुजर रही ट्रेन के फोटो और विडियो सेल्फ़ी के साथ  बना रहे थे। दूर पहाड़ो पर बने सुंदर मकान अपने स्वर्गिक वातावरण मे होने पर इठलाते प्रतीत हो रहे थे। ट्रेन मे अधिकतर पर्यटक यात्री  पर्वतीय रेल यात्रा से जुड़े रोमांच का अनुभव लेने ही यात्रा कर रहे थे। स्थानीय सामान्य जनों, विध्यार्थियों, व्यवसाइयों  का इस ट्रेन से  यात्रा न करने का मुख्य कारण ट्रेन का छोटी दूरी मे अधिक समय लेना था  इसके विपरीत  आर्थिक द्रष्टि से कमजोर कुछ स्थानीय निवासियों का  बहुत कम किराया होने के कारण  इस ट्रेन मे यात्रा करना समान्यतः देखा। बमुश्किल 30-35 मिनिट मे ट्रेन केत्ति, लवडेल स्टेशन पर विराम लेते हुए उद्गम मंडलम पहुँच गई। ऊटी स्टेशन के आसपास हरे भरे पेड़ो के बीच पहाड़ियों पर जहां तहां होटल और गेस्ट हाउस नज़र आ रहे थे। स्टेशन पर एक सुंदर मनमोहक कोयले से चालित भाप  का रेल इंजिन स्टेशन की शोभा मे चार चाँद लगा रहा था। लुप्तप्राय भाप इंजिन मे पानी भरने बाला पम्प देख कर बचपन मे इस तरह के पम्प देखने की यादें ताज़ा हो गयी।   उद्गम मंडलम स्टेशन पर ही एक बहुत छोटे से रेल म्यूजियम मे रेल विभाग द्वारा उन्नीसवी शदी मे प्रयुक्त की जा रही वस्तुओं और उपकरणों का प्रदर्शन सुखद लगा। बापसी मे द्व्तिय श्रेणी के टिकिट ट्रेन से उतर कर तुरंत ही बुक करा लिये थे जिसका प्रस्थान समय लगभग एक घंटे बाद ही था अतः कुछ समय ऊटी रेल स्टेशन के बाहर यूँ  ही व्यतीत किया।  रेल कैंटीन मे उत्तर भारतीय  भोजन की उपलब्धता को देखते हुए पेट पूजन किया जो गर्म होने के साथ स्वादिष्ट भी था। एक शताब्दी पूर्व बनी कैंटीन अपने वास्तु की कहानी स्वयं बखान कर रही थी। 

बापसी के लिये प्लेटफार्म पर लगी बेंचों मे क्रम से यात्री अपनी बारी की प्रतीक्षा करते नज़र आये हम लोग भी उनमे शामिल हो ट्रेन के डिब्बों मे बैठ रेल के चलने का  इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद ही ट्रेन अपनी बापसी यात्रा पर थी।  डिब्बे मे यात्रा के दौरान कुछ  यात्रियों द्वारा ट्रेन का फिल्मांकन और किसी अभिनेता का उस फिल्म के गाने मे शायद "छइयाँ- छइयाँ.... (ठीक से याद नहीं) के अभिनय की चर्चा होने लगी पर मेरा इस पर्वतीय ट्रेन के महत्व को कम कर उस अभिनेता और उसकी  फिल्म के महत्व को बढ़ाने का कोई  इरादा न था अतः मेरा कुछ देर  निंद्रा की शरण मे चले जाने के कारण उक्त  चर्चा पर वहीं विराम लग गया। एक बार फिर वेलिंग्टन के आने के पूर्व ऊटी के प्रकृतिक नज़ारों, पहाड़ों, चाय बगानों, पर्वतीय झीलों का आनंद उठाते हुए हम कब बापस  अपने स्टेशन पहुँच गये पता भी न चला। कार बगैर पार्किंग के अपनी जगह पार्क देख प्रसन्नता हुई। इस तरह इस  नीलगिरी पर्वत रेल यात्रा के हम भी एक सहयात्री बने।      

दक्षिण भारत के मैदानी इलाकों के विपरीत 9-10 दिन के प्रवास पर ऊटी और उसके आसपास  
के वातावरण की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों मे ए॰सी॰ की तो क्या बात करे पंखों का भी न होना  घोर सुखद आश्चर्य करने बाला था। रात के मौसम मे आवश्यक रूप से हल्की पतली रज़ाई के बिना सुखद नींद लेना संभव न था। इस तरह का मौसम उत्तर भारत मे मसूरी, नैनीताल मे भी अनुभव किया जा सकता है। कुन्नूर, वेलिंग्टन ऊटी की रेल यात्रा एक अनुशासित, सुखद और शांत शहर की एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

विजय सहगल

            

सोमवार, 20 जुलाई 2020

संपादक नवभारत टाइम्स न्यू दिल्ली को पत्र




टिप्पड़ी :-

दिनांक 16.07.2020 को नवभारत टाइम्स नई दिल्ली मे सम्पादकीय पृष्ठ  पर सुश्री नईशा हसन का लेख "खतरे की आहात है म्यूजियम को मस्जिद मे बदलना"। उक्त लेख मे लेखिका से असहमति रखते हुए उनकी भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की टिप्पड़ी पर  मैंने संपादक महोदय "नव भारत टाइम्स, नई दिल्ली" को रीडर मेल के तहत अपने विचार प्रकाशनार्थ प्रेषित किए थे जिसे उन्होने आज दिनांक 21.07.2020 को नई दिल्ली के नवभारत टाइम्स मे पेज 08 पर रीडर्स-मेल के अंतर्गत मेरा मत भिन्नतात्मक संशोधित पत्र प्रकाशित किया गया है। मूल आलोचनात्मक पत्र नीचे अवलोकनार्थ प्रस्तुत है।-विजय सहगल,     





श्रीमान संपादक                                                16.07.2020
नव भारत टाइम्स,
न्यू दिल्ली

महोदय,

16 जुलाई 2020 के अंक मे "हागिया सोफिया म्यूजियम" को मस्जिद मे बदलने का सुश्री नाइश हसन जी का लेख पढ़ा। "हागिया सोफिया" जो पहले एक चर्च था जिसे बाद मे मस्जिद मे परिवर्तित किया गया, तदुपरान्त इसे म्यूजियम मे परिवर्तित कर दिया गया। उन्होने बड़ी बेवाकी से  तुर्की सरकार के संकुंचित संप्रदायवादी सोच की आलोचना करते हुए धर्मनिरपेक्ष तुर्की के विचार का समर्थन किया।  पर खेद है लेख के अंत मे आते आते स्वयं भी उसी सांप्रदायिक सोच का शिकार हो गई, जिसमे उन्होने भारत के लोकतान्त्रिक स्वरूप पर सवाल कर उसको "राजसत्ता और धर्मसत्ता का गठजोड़ करार दिया"। सुप्रीम कोर्ट के बाबरी मस्जिद पर निर्णय को गठजोड़ का नमूना बताना आपकी इसी सोच को परलक्षित करता है।  ये जानते हुए भी कि लगभग एक शतक से चले आ रहे इस न्यायिक प्रकरण मे सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्याधीशों की पीठ ने सर्वानुमती से इस फैसले को मंदिर के पक्ष मे सुनाया था जिसमे एक न्यायधीश माननीय श्री जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर भी थे। फैसले का मुख्य आधार आर्कियोलोजीकल सर्वे ऑफ इंडिया के प्रमुख श्री के॰के॰ मोहम्मद की वह रिपोर्ट थी जिसमे मस्जिद के नीचे के ढांचे को इस्लामिक नहीं माना गया था। भारतीय संसद द्वारा पारित एनआरसी कानून तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के अल्पसंख्यक नागरिकों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव और उत्पीढन पर आधारित है।  देश के किसी भी धर्म संप्रदाय से इसका दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं है। काश तुर्की के धर्म आधारित चरित्र को उजागर करने के साथ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश की इस्लामिक कट्टरवादी सोच के लोगो के विरुद्ध भी कुछ प्रकाश डालती तो सुश्री नाइश हसन जी की  विशाल एवं  प्रगतशील सोच मे चार   चाँद लगते।

विजय सहगल
नोएडा॰


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

इन्सपैक्शनी-किस्से


"इन्सपैक्शनी-किस्से"




बैंक से दीगर लोगो के सूचनार्थ लिख दे कि बैंक का एक निरीक्षण विभाग होता है जिसके निरीक्षक बैंक की हर शाखा का निरीक्षण साल मे एक बार बिना किसी पूर्व सूचना के छापेमारी स्टाइल मे करते है, जो औसतन 4-5 दिन चलता है। बैंक के ये इंस्पेक्टर बिना वर्दी के होते है पर बाकी आचार विचार कमोवेश पुलिस की ही तरह होता है (हल्के फुल्के मज़ाक मे लिख रहा हूँ)। इस लिखे को बहुत गंभीरता से न लिया जाये क्योंकि ये एक सामान्य प्रिक्रिया है। 

किसी भी बैंक का निरीक्षण विभाग बैंक की शाखाओं और उसके स्टाफ के बीच उसी तरह अलोकप्रिय है जैसे फिल्मों मे खलनायक या टीवी पर रवीश कुमार की तरह सरकार के किसी भी काम मे मीन मेख निकालना या फिल्मों मे दिखाई जाने बाली बम्बईया पुलिस जो ऐन आठवे फेरे के पूर्व खलनायक को साथ ले, हीरो-हीरोइन की शादी के कार्यक्रम मे  हवाई फायर धाँय- धाँय- धाँय कर  कुछ इस अंदाज मे रोकती हैं,  ठहरो!!......... "ये शादी नहीं हो सकती"। ठीक इसी तरह शाखा का प्रत्येक मैनेजर निरीक्षण विभाग से आये  निरीक्षक को बिन बुलाये मेहमान की तरह व्यवहार कर अपने मन मे यही विचार रखते हुए कहता है, ठहरो!!.........."ये लोन नहीं हो सकता........" धाँय- धाँय- धाँय।
     
निरीक्षण विभाग मे रहने के दौरान  कई बार बड़े ही रोचक और दिलचस्व किस्से सुनने को मिल जाते थे जो बड़े मजेदार और हास्यास्पद रहते। ऐसे किस्से प्रायः कार्यालयों मे सुने और सुनाये जाते रहे है।  कुछ किस्से आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ।
एक बार एक शाखा की  निरीक्षण रिपोर्ट आई जिसमे एक व्यक्तिगत ऋण खाते की त्रुटियों का उल्लेख निरीक्षक कार्यालय के निरीक्षक ने किया था। व्यक्तिगत ऋण खाते की एक शर्त ये भी थी कि ऋणी द्वारा साथी कर्मचारी की व्यक्तिगत गारंटी दिलवाई जाएगी। उक्त ऋण खाते मे चूंकि पति पत्नी दोनों राज्य सरकार की सेवा मे ही कार्यरत थे लेकिन विभाग भिन्न होने के कारण निरीक्षक ने त्रुटि निकलते हुए  लिखा "जिस साथी कर्मचारी की गारंटी ली गई है वो ऋणी की पत्नी है?"  ब्रांच मैनेजर ने त्रुटि का निराकरण करते हुए बहुत ही सुंदर जबाब लिखा "साथी कर्मचारी की गारंटी ले ली गई है जो ऋणी की जीवन साथी नहीं है।"

एक और प्रसंग मेरे संज्ञान मे आया। प्रादेशिक कार्यालय इन्सपैक्शन की फ़ाइल बंद करने मे प्रायः शाखाओं के ढुलमुल रवैये से बड़ा परेशान रहता है। अनेकों शाखाओं मे 8-10 अनुस्मारकों के बाद भी निरीक्षण की फाइले 5-6 महीने तक पेंडिंग पड़ी रहती। पर इस मिजाज के विपरीत  एक शाखा के प्रबन्धक इस मामले मे बड़े ही अनुशासित और बैंकिंग कार्यों को करने मे समय के पाबंद थे।  इन्सपैक्शन के समाप्त होते ही  तुरंत फ़ाइल मे उल्लेखित त्रुटियों को दूर करने मे जुट गये। शाखा की निरीक्षण की फ़ाइल को बंद करने के  अनुमत समय 90 दिन होता था जिसमे अभी  कुछ समय शेष था। पर प्रादेशिक कार्यालय के निरीक्षण विभाग ने अन्य शाखाओं के रुख की तरह ही अति उताबलेपन दिखाते हुए इन शाखा प्रबन्धक महोदय को भी तीसरे अनुस्मारक पत्र के माध्यम से फ़ाइल को शीघ्र बंद कराने के निर्देश दिये  ताकि एकाध शाखा की निरीक्षण फ़ाइल तो अनुमत समय 90 दिन के अंदर बंद हो जाये अन्यथा 99% शाखाये अपनी वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट अनुमत समय 90 दिन के बाद ही फ़ाइल बंद करा पाती थी। शाखा प्रबन्धक जिनकी कार्य प्रणाली अनुशासनात्मक थी, को जब तीसरा अनुस्मारक मिला तो उन्होने कार्य मे और  तेजी लाते हुए शेष त्रुटियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर कर वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट  की फ़ाइल बंद करने की अनुसंशा करने का फ़ाइनल पत्र भी प्रादेशिक कार्यालय को भेज दिया और अंततः निरीक्षण की फ़ाइल बंद भी हो गई। लेकिन कहानी मे असली मोड़ तब आया जब उन अनुशासित शाखा के शाखा  प्रबन्धक ने प्रादेशिक कार्यालय के निरीक्षण विभाग के उस अधिकारी से यूं ही निरीक्षण फ़ाइल पर  चर्चा के बहाने  पूंछा कि आपने  तीसरा अनुस्मारक फ़ाइल के बंद करने हेतु भेजा था पर पूर्व के दो रिमाइंडर तो हमे मिले ही नहीं? तब निरीक्षण विभाग के उन अधिकारी ने बड़े राज की बात बताई। बड़े भोले पन से वे बोले मै शाखाओं के प्रबन्धकों द्वारा निरीक्षण के कार्य को गंभीरता से न लेने के कारण मै काफी खिन्न और परेशान रहता हूँ इसलिये मै दो अनुस्मारक न भेज सीधा तीसरा अनुस्मारक ही भेजता हूँ ताकि शाखाएँ तीसरा रिमाइंडर देख कुछ तो महत्व  निरीक्षण के कार्य को दे!!

एक और किस्सा मै आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ। प्रादेशिक निरीक्षण कार्यालय के एक चतुर किस्म के काइयाँ निरीक्षक ने एक शाखा के निरीक्षण के समय एक ऋण खाते मे कुछ त्रुटियाँ निकाली। दरअसल एक ऋण खाते के मुख्य ऋणी का देहांत हो गया था। ऋणी की मृत्यु होना कोई ऐसी बात नहीं थी जो निरक्षक या शाखा प्रबन्धक या किसी के भी वश मे हों? बैंक के नियमानुसार मुख्य ऋणी की मृत्यु की दशा मे एक डॉकयुमेंट मृतक के कानूनी बारिसों से लेना होता है ताकि ऋण की अदायगी की ज़िम्मेदारी मृतक के कानूनी बारिसों से की जाये। निरीक्षक ने न जाने क्यों और कैसे मृत्यु को त्रुटि मान लिया और  निरीक्षक ने अपनी रिपोर्ट मे उक्त ऋण खाते की त्रुटियों की रिपोर्ट मे त्रुटि नंबर एक मे लिखा "ऋणी की मृत्यु हो चुकी है। दूसरी त्रुटि संख्या के समक्ष रिपोर्ट  मे लिखा कि "मृतक ऋणी के बारिसों से ऋण अदायगी के वचन का डॉकयुमेंट नहीं लिया गया है"। अन्य खातों की त्रुटियों की  रिपोर्ट  के साथ पूरी रिपोर्ट शाखा प्रबन्धक को ऋण खातों की त्रुटियों को दूर करने हेतु सुपुर्द कर दी गई। शाखा प्रबन्धक ने जब उक्त ऋणी के मृत्यु की त्रुटि को देखा तो उन्हेने भी कुछ मज़ाक के लहजे मे शरारत पूर्ण जबाब लिखा।  उक्त मृतक  ऋण खाते की त्रुटि को दूर करते हुए जबाबी पत्र प्रादेशिक  कार्यालय मे भेजा जो बड़ा ही रोचक और मजेदार था। पत्र मे त्रुटि नंबर एक जिसमे लिखा था "ऋणी की मृत्यु हो चुकी है" के जबाब मे लिखा "ऋणी की मृत्यु के संबंध मे भगवान से पत्राचार किया गया है। ऋणी के  पुनर्जन्म होने पर आपके कार्यालय को सूचित किया जायेगा!! त्रुटि संख्या दो " मृतक ऋणी के बारिसों से ऋण अदा करने के दस्तावेज़ ले लिये है"।

एक अन्य किस्सा जो प्रायः मै निरीक्षण कार्यालय पे सुनाया करता था। हुआ यूं एक इंस्पेक्टर को दोनों  हाथ मे न जाने  क्या समस्या हो गई कि शर्ट बनियान या कोट पहनते वक्त जैसे ही हाथ को हल्के से पीछे करते तो हाथों मे भयंकर दर्द होता। चिकित्सको से सलाह ली लेकिन कोई फायदा न हुआ। बड़े विशेषज्ञ डॉक्टर को भी दिखाया, एक्स-रे, एमआरआई, ब्लड आदि जो भी टेस्ट थे कराये पर कोई लाभ न हुआ। थक हार कर हड्डियों के विशेषज्ञ को भी दिखाया कोई लाभ न मिला। एक दिन ऑफिस के बाहर सड़क के किनारे एक नीम हाकिम को टेंट लगाकर जड़ी बूटी से रोगो का इलाज करने बाले को देखा। लाउडस्पीकर से शर्तियाँ, गारंटेड इलाज का संदेश टेप रिकॉर्डर पर बज रहा था। कपड़े के बोर्ड पर भी शर्तियाँ इलाज को मोटे मोटे अक्षरों मे   लिखा गया था। फायदा न होने पर पैसे बापस की भी शर्त थी। इंस्पेक्टर ने सोचा "मरता क्या न करता" क्यों ने इसी से भी "हाथ" के इलाज की बात की जाए। वे उस नीम हकीम के पास पहुँच गए। पच्चीस तरह की जड़ी बूटियाँ, लाल हरे पीले सहित अनेक रंगों की फर्श पर पड़ी थी। सादे लिवास मे सिर पर पगड़ी बांधे एक नीम हकीम आदिवासी टेंट के अंदर फर्श पर चादर बिछाये बैठा था। फीस भी ज्यादा न थी, सौ रुपए मे गारंटी के साथ इलाज की बात तय हो गई। इंस्पेक्टर महोदय ने अपनी पीढ़ा बताई कि कपड़े पहनते समय हाथों को थोड़ा भी पीछे मोड़ने पर तीखा दर्द होता है। उस नीम हकीम ने बिषय को आगे बढ़ाते हुए पूंछा हाथ को पीछे मोड़के पॉकेट से कंघा निकालने मे दिक्कत होती होगी। मैंने तुरंत कहा "हाँ भाई हाँ"। उसने फिर पूंछा पेंट की पिछली पॉकेट से पर्स आदि निकालने पर अत्यधिक वेदना होती होगी। मैंने खुशी, उत्सुकता और कौतूहल पूर्वक कहा "हाँ भाई हाँ"। मै मन ही मन खुश था कि बीमारी का मर्ज पकड़ मे आ गया। मै सोचने लगा पिछले दो-तीन साल के मर्ज का इलाज अब तो निश्चित ही ठीक हो जायेगा। मैंने जिज्ञासा वश उस नीम हकीम से तुरंत पूंछा हकीम साहब बीमारी का मर्ज तो मिल गया न। उसने ठंडी आह भरते हुए पूंछा- क्या आप "आर॰ आई॰" (रीजनल इंसपेकटोरेट) मे है? अब चौकने की बारी इंस्पेक्टर साहब की थी। बोले तुझे कैसे पता? हकीम बोला "आर॰ आई॰" बाले शाखाओं मे जब निरीक्षण करने जाते है तो उनका हाथ कभी पीछे पॉकेट मे जाता ही नहीं। पूरे निरक्षण कार्य मे जेब से एक धेला भी खर्च नहीं  होता होगा? जब हाथ पीछे पॉकेट मे जायेगा ही नहीं तो पर्स भी नहीं निकलता। अर्थात इंस्पेक्टर महोदय की पांचों अंगुलियाँ घी मे और सिर कढ़ाई मे रहता है यानि की चका-चक। हकीम बोला इस का एक ही शर्तियाँ इलाज़ है "जिस दिन तुम्हारा ट्रान्सफर "आर॰ आई॰" से दूसरे किसी विभाग या शाखा  मे हो जायेगा तो  ये बीमारी उसी दिन तुरंत खत्म हो जाएगी। "आर॰ आई॰" मे रहते ये बीमारी खत्म न होने बाली। हकीम ने मक्कारी भरी हंसी छोड़ते हुए फीस के सौ रुपए अपने पर्स मे रख लिए।  
             
कभी कभी इस तरह के रोचक किस्से निरीक्षण कार्यालय के उबाऊ, थकाऊ और नीरस कार्य के दैनंदिनी कार्य मे कुछ हास्य रस घोल कर कुछ आनंदित क्षणों का निर्माण कर जाते है।

विजय सहगल