शुक्रवार, 22 मई 2020

सूरदास


"सूरदास"




"मांगन मरन समान है, मत कोई माँगे भीख"।
"मांगन ते मरना भला, ये सतगुरु की सीख"॥

संत कबीर दास जी के इस दोहे सहित अनेकों दोहों को  बचपन मे खूब पढ़ा था यूं भी संत कबीर के दोहे अपनी सरलता और पैने संदेश के लिये जाने जाते है। संत कबीर जैसे कवि विरले ही हुए है जिन्होने  समाज मे फैली कुरीतियों और ऊंच  नीच के भेद पर करारा कटाक्ष किया।  भिखारियों की परिभाषा  आज के जमाने मे लोग  अलग अलग तरह से देते और किसी व्यक्ति के  भिखारीपने को अपने अपने अंदाज मे ब्याँ करते है। वास्तविक भिखारियों को तो प्रत्यक्ष रूप से देख उनके साथ समय और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार सभी लोगो द्वारा अपने अपने अंदाज से किया जाता है, पर उन छद्म भिखारियों से कैसे निपटा जाये ये कठिन सवाल हमेशा हर व्यक्ति के जीवन मे अवश्य ही आता रहा होगा? छात्र जीवन या आगे भी कई मर्तबा जब ऐसे व्यापारी, सरकारी नौकर या दुकानदार जो अपने पद और प्रतिष्ठा से मिली शक्ति  का दुर्पयोग कर किसी वस्तु या सेवा के बदले ज्यादा मूल्य मांगता तो मेरा उस व्यापारी या सरकारी मुलाज़िम से  हमेशा एक ही जबाब होता "इस धंधे को छोड़ तुम एक कटोरा रख  भीख मांगना शुरू कर दो तो नौकरी या व्यापार से ज्यादा कमाई कर लोगे!! जिसे सुन प्रायः, पर क्रोध भरे भाव से वे सही मूल्य लेते पर कभी कभी बेशर्म चिकने घड़ों की तरह उन पर  कोई फर्क नहीं पड़ता और निर्लज्जता से ज्यादा पैसे  या हूँ कहे घूस/रिश्वत रख लेते थे जैसे  ग्वालियर मे टेम्पो बालों से जूझते समय इस समस्या का चित्रण हमने अपने ब्लॉग "रूट नंबर-8" (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/03/8.html) मे किया था। हमे क्या पता था भीख और  भिखारी से हमे भी कई बार ऐसी घटनाओं से रूबरू होना पड़ेगा जो बड़ी मजेदार, रोचक और यादगार होंगी।

बात उन दिनों की थी जब मै झाँसी से  ग्वालियर दैनिक आवागमन करता था। शुरू शुरू मे तो  लगता था कि हम नौकरी पेशा लोग ही इस दैनिक आवागमन का हिस्सा है जो एक शहर से दूसरे शहर अपनी व्रत्ति की खातिर जाते है। पर जब हम इस दैनिक आवागमन का अटूट  हिस्सा बने तो पता चला कि  चलने बाली रेल मे हमारे  वर्ग के ही  नहीं बल्कि अन्य  कई श्रेणी के लोग जैसे  पान तंबाकू बेचने बाला, जूता पोलिस करने बाला, बैग आदि की चैन ठीक करने बाला, 3-4 चना ज़ोर बाले खाने के आइटम बेचने बाले और कई" डिब्बों मे सफाई के बदले  पैसे लेने बालों" के साथ भिक्षा व्रत्ति मे रत एक "सूरदास" (जिनकी की आंखे नहीं थी) भी जो यात्रियों से  पैसा मांग कर अपना जीवन यापन करने बाला था, ऐसे अन्य अनेक लोगो के साथ अप-डाउन करते थे। उनका क्या नाम था किसी को नहीं मालूम पर आँखेँ न होने के कारण सभी उन्हे सूरदास ही कहा करते थे।  सभी का आने जाने का अपना अलग अलग टाइम टेबल था पर कभी न कभी आवागमन के दौरान आपस मे एक दूसरे से प्रायः टकरा जाते और इस तरह अप-डाउनर के नाते पहचान हो ही जाती थी। ये सभी दैनिक यात्री आपस मे  एक दूसरे का सम्मान तो करते पर  अपनी वस्तु या सेवाओं का आदान प्रदान अर्थात क्रय-विक्रय सौजन्यता वश आपस मे  नहीं करते थे।

बैसे तो अलग व्यवसाय के ये सारे डेलि पैसेंजर एक दूसरे को देख रेल की उन सीटों या कैबिन को छोड़ आगे बढ़ जाते जहां पर अन्य यात्रियों के साथ  दैनिक यात्रियों का समूह बैठा होता।  चूंकि सूरदास को आँखों से दिखाई न देने की क्षमता के कारण कई बार बगैर ये जाने कि दैनिक यात्री भी किसी सीट या कैबिन मे बैठे है, सूरदास जी अपनी धुन मे मगन  सीट दर सीट, कैबिन दर कैबिन भजन सुना भिक्षा मांगते रेल के डिब्बे मे बढ़े चले जाते थे । हम लोग दैनिक यात्री छोटे छोटे 5-6 सदस्यों के ग्रुप मे स्थान और परिस्थिति अनुसार एक साथ थोड़ा कभी दबके या आगे पीछे खिसक या कभी डिब्बे मे उपर नीचे बैठ या कोच मे ही उन सीटों पर बैठ जाते जिनका कोटा आगे के स्टेशन से होता। एक साथ बैठने का एक मुख्य कारण ताश खेलना भी होता ताकि एक घंटे की यात्रा का समय आसानी से व्यतीत हो सके। यध्यपि हम लोगो की पूरी कोशिश होती कि साथी यात्रियों को कोई ज्यादा दुःख, तकलीफ  न हो।  भिक्षा व्रत्ति मे रत सूरदास जी भजन गाते हुए जैसे ही  हमलोगो की सीट के नजदीक आते तो हमलोग उनका नाम को कुछ विशेष अंदाज़ मे लंबा उच्चारण कर "सू...sssssssर दास" कहते तो वो समझ जाता कि ये डेलि पैसेंजर अर्थात स्टाफ के लोग है अर्थात इनसे आपसी "व्यावसायिक प्रतिवद्धतावध रिश्तों" (प्रॉफेश्नल रिलेशन)  के चलते "भिक्षा व्रत्ति" की कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिये, अतः रेल डिब्बे की उन सीटों और  कैबिन को छोड़ सूरदास जी  आगे बढ़ जाते थे। ये नित्य प्रति की दिनचर्या थी जिसे धीरे-धीरे  सूरदास जी और दैनिक यात्रियों के बीच के इस रिश्ते को एक तरह की व्यवहारिक मान्यता मिल चुकी थी।  सूरदास जी की एक और विशेषता थी कि जब कोई उन्हे कुछ पैसे दे देता तो उसे "भगवान आपका भला करे" कह उसको धन्यवाद ज्ञपित करना उनका स्वभाव था जिसे वे कभी न भूलते।  

एक दिन ग्वालियर से बापसी मे एक अलग  अद्भुद घटना घटित हुई। सूरदास जी भजन गाते हुए "इस गरीब अंधे को रुपया दो रुपया या खाने का कुछ समान दे दे"। "भगवान आप और आपके बच्चों को खुश रखे"!! "जो दे भला और जो न दे उसका भी भला" आदि गाते हुए उन सीटों और कैबिन की ओर बढ़े जहां हम दैनिक यात्री बैठ  ताश के पत्ते खेलने मे मस्त थे।  पर तभी  एक दैनिक यात्री ने सूरदास के हम लोगो की सीट के निकट आते देख उस ही  लहजे मे  लंबा उच्चारण कर "सू...sssssssर दास"  कहा तो वे हम सभी डेली पैसेंजर को "बाबूजी राम राम" कह  आगे बढ़ गये।  पर अचानक हमारे एक मित्र ने दया, दान, धर्म के वशीभूत  आवाज लगा कर सूरदास को वापस बुलाया  और एक रुपए का सिक्का उनके हाथ मे देते हुए रख लेने को बोला।    आशा  के विपरीत  सूरदास ने पैसे मिलने के बाद अपने रटे रटाय जबाब "भगवान आपका भला करे" के बदले  मित्र को संबोधित कर पूंछा "बाबूजी! आज क्या "तनखा" मिली है"।

इतना सुनते ही कुछ क्षणों के लिये वातावरण मे मानों जैसे सन्नाटा छा गया पर तुरंत ही सूरदास के इस जबाब पर सहयात्रियों सहित हम सभी साथियों के चेहरों पर एक अलग तरह की  हंसी  विखर गई, पर  हमारे उन मित्र के  चेहरे पर क्रोध मिश्रित शर्मिंदगी और असहजता  के भाव देखने लायक थे। इस घटना पर मेरे मित्र की दशा "भई गति साँप छछूंदर केरि" की तरह हो गई थी    जिनके "होम करते, हाथ जले" थे।

इस घटना के बाद मैंने अपने उन मित्र को कभी किसी भिखारी या उन सूरदास को दैनिक आवागमन मे  भिक्षा देते हुए नहीं देखा!!!

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

वास्तविकता का सजीव चित्रण।

Unknown ने कहा…

वास्तविकता का सजीव चित्रण।

शिशोदिया