"टेम्पो रूट नंबर-8"
उन
दिनों
(1984) हम लखनऊ से स्थान्तरित होकर
ग्वालियर शाखा मे आये थे। इससे पूर्व ग्वालियर पहले कभी आना नहीं हुआ था।
हम झाँसी से ग्वालियर ट्रेन से डेली अप डाउन करते थे। डेली अप डाउन बालों का जीवन
बड़ा ही मशीनीकरण की तरह होता था। सुबह झाँसी से लगभग 7 बजे निकलना होता था। आज की
तरह इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाये नहीं थी
जिससे गाड़ियों की स्थिति पता कर पाते, पर उन दिनों आकाशवाणी
ग्वालियर पर प्रातः 6 बजे के समाचारों के
पश्चात ग्वालियर स्टेशन पर रेल गाड़ियों के
आवागमन की स्थिति का प्रसारण किया जाता था। हम सभी डेली अप डाउनर ठीक 6 बजे के
समाचार के बाद झाँसी मे आकाशवाणी ग्वालियर
स्टेशन सुनते थे और ग्वालियर स्टेशन पर गाड़ियों के स्थिति के अनुसार झाँसी मे उनके
आने का अनुमान लगा कर सबसे अनुकूल ट्रेन जो ऑफिस समय से पहले हमे ग्वालियर पहुंचा दे उस
गाड़ी से ग्वालियर आते थे। प्रायः ग्वालियर की
दूरी (98किमी) के कारण ट्रंजिस्टर पर आवाज साफ नहीं आती थी और कई बार
आकाशवाणी ग्वालियर गाड़ियों की स्थिति बताने मे ये कह कर असमर्थता व्यक्त करती कि
"रेल विभाग से सूचना न मिलने के कारण गाड़ियों की स्थिति बताने मे असमर्थ है" तो बड़ी निराशा होती थी तब स्टेशन मास्टर ग्वालियर
से हम लोग इस बात की शिकायत करते थे ताकि हर रोज आकाशवाणी ग्वालियर से गाड़ियों की
स्थिति प्राप्त होती रहे।
ग्वालियर
स्टेशन पर पहुँचने पर सभी डेलि पैसेंजर का लक्ष्य जल्दी से जल्दी ऑफिस पहुँचने की
रहता था। प्रायः सभी के ऑफिस नयाबाजार, जयेन्द्रगंज, बाड़े के आसपास थे। एजी ऑफिस के लोग तो वहाँ तक जाने के साधन न होने के कारण
प्रायः पैदल ही अपने ऑफिस पहुँच जाते थे। ऑफिस के लिए स्टेशन के बाहर से टेम्पो को
पकड़ कर हम सभी ऑफिस के लिये जाते। एक साथ यात्रियों के आने से टेम्पो बाले कुछ मन
मानी कर निर्धारित किराया से 25-30 पैसे ज्यादा लेते थे। उन दिनों दैनिक आवागमन के
खर्चों के बाद टेम्पो बालों का निर्धारित दर से ज्यादा किराया लेना बहुत खलता था, पर मजबूरी थी। टेम्पो बालों की
मनमानी चल रही थी, झगड़ा फसाद हम लोग कर नहीं सकते थे क्योंकि
हम सभी नौकरी पेशावर लोग थे।
एक
बार रोज-रोज की इस लूट और मनमानी से परेशान होकर पाटनकर बाज़ार स्थित यातायात पुलिस
की चौकी पर हम अपने मित्र मुकेश रिहानी, विजय गुप्ता, राजकुमार खरे, राजीव कपूर आदि मित्र पहुँचे और
टेम्पो बालों के मनमानी की शिकायत की। इस शिकायत पर यातायात पुलिस की प्रीतिक्रिया
बड़ी सकारात्मक थी। उन्होने इस मनमानी का समाधान हम सभी को छपे हुए यातायात कार्ड
देकर किया। उस पोस्ट कार्ड पर टेम्पो बालों की मनमानी की शिकायत के तीन चार कारण
छपे थे जिसमे से एक निर्धारित दर से ज्यादा किराया लेने पर शिकायत का भी था। उस पर
सिर्फ टेम्पो का नंबर, और शिकायत का क्र्मांक लिख कर अपने
नाम पते के साथ डाक से पोस्ट करना था, सबसे बड़ी बात उक्त
पोस्ट कार्ड पर कोई पोस्टल स्टैम्प का शुल्क भी नहीं अदा करना था। उन यातायात
पुलिस के स्टाफ ने हम लोगो को 2-2, 3-3 छपे कार्ड दे दिये और
कहा कि जो भी टेम्पो बाला आप से निर्धारित दर से ज्यादा पैसे ले आप उसका नंबर लिख
कर डाक से हमारे पास भेज दो हम उस ड्राईवर के विरुद्ध कार्यवाही करेंगे। अब तो हम
लोगो के पास कार्ड के रूप मे एक ऐसा
हथियार आ गया था जिससे हम टेम्पो बालो से उनकी मनमानी के विरुद्ध अहिंसात्मक लड़ाई
लड़ सकते थे, पर इसमे एक समस्या थी और अनेक आशंकाओं रूपी सवाल
भी थे कि यदि टेम्पो बाला अभी पैसे ज्यादा
ले गया तो शिकायत के बाद क्या कार्यवाही होगी? होगी कि नहीं
होगी? और अगर होगी भी तो कब होगी? और
हुई भी तो हमे कैसे पता चलेगा? और यदि सबकुछ हमारे पक्ष मे हो
भी गया ततो हमारे पैसे तो बापस मिलने से
रहे? क्योंकि हम सभी भारतीय बचपन से पुलिस की इस व्यवहार से भलीभाँति परिचित थे फिर पुलिस
चाहे मध्यप्रदेश की हो उत्तर प्रदेश की या किसी अन्य राज्य की। हमे मालूम था
यातायात कार्ड से प्राप्त हुई शिकायत पर कार्यवाही तो निश्चित होगी। यातायात पुलिस
का सिपाही कार्ड के आधार पर टेम्पो ड्राईवर के विरुद्ध कार्यवाही निश्चित ही
प्रारम्भ करेंगा, उस टेम्पो जिसकी शिकायत की गई है उसे
रोकेगा पर अपना सुविधा शुल्क लेकर उसे छोड़ देगा क्योंकि इस तरह के शिकायती पत्र या
कार्ड का कोई लिखित रेकॉर्ड या लेखा जोखा तो होता नहीं।
पर
हम लोगो ने भी "सर्वे भवन्तु सुखिना:....... अर्थात सभी सुखी हों के तर्ज़ पर
एक बीच का रास्ता निकाल लिया। पहले तो हम लोग बैग मे खुले पैसे रखते और निर्धारित राशि
ही उसे देते फिर भी यदि टेम्पो ड्राईवर हम
लोगो से ज्यादा पैसे मांगता तो उसे प्यार
से ट्रैफिक शिकायती कार्ड दिखा कर यही बात
कहते देख भाई हमे निर्धारित किराये से
20-25 पैसे ज्यादा देने मे कोई
हर्ज़ नहीं पर यदि हम इस यातायात पुलिस के कार्ड से तुम्हारी शिकायत करेंगे तो हमे मालूम
है तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा पर इस कार्ड को पुलिस द्वारा फाड़ने (शिकायत को
नज़रअंदाज़ करने) के लिये चाय पानी के नाम पर तुम्हें 5-10 रूपये तो खर्च करना ही
पड़ेगा। क्योंकि शिकायत का लेखा जोखा रखना या न रखना उस पुलिस बाले की मर्जी पर
होगा। हम इसी बात मे तसल्ली कर लेंगे
हमारे 20-25 पैसे बसूल हो गये? यह प्रयोग 99% सफल रहा। कार्ड
दिखने पर अब प्रायः टेम्पो बाले पुलिस के
झंझट से बचने के लिये हम लोगो से ज्यादा पैसे लेने का जोखिम नहीं लेते। प्रायः ऐसा ही होता था शिकायती कार्ड
पाकर पुलिस का सिपाही बैसे ही खुश होता था जैसे रोटी के लिये आपस मे झगड़ती
दो बिल्लियाँ का न्याय पाने के लिये बंदर के पास जाना!! यदि एकाध टेम्पो ड्राईवर फिर भी हमारी बात न मान कर
ज्यादा पैसे लेने का दुस्साहस करता तो हम लोग अनिर्लिप्त भाव से टेम्पो बाले की
शिकायत पुलिस रूपी बंदर की अदालत मे
प्रेषित कर देते।
देश
की आम जनता सरकार से मात्र कुछ उम्मीदे ही करती है कि उसका जीवन की छोटी-मोटी
आवश्यकताओं की पूर्ति बगैर किसी बाधा या
कष्ट के पूरी होती रहे। उक्त यातायात
शिकायत कार्ड से एक बात तो स्पष्ट है कि
प्रशासन चाहे तो किसी भी समस्या, समाज विरोधी तत्व, या निर्धारित दर से ज्यादा राशि बसूलने बाले टेम्पो ड्राईवर, दुकानदार, या रिश्वत लेने बाले शासकीय अधिकारी या
कर्मचारी को रोकने मे सक्षम है पर इसके लिये दृढ़ ईक्षा शक्ति की जरूरत है जिसके
लिये देश की आम जनता लगातार पिछले 72 साल से इंतज़ार कर रही है।
विजय
सहगल


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