बुधवार, 27 मई 2020

खबास


"खबास"




हमारे स्कूल या उससे भी पहले  के जमाने मे एक विशेष उपाधि "खबास" उन लोगो को दी जाती थी जो बेतार की गति से यहाँ की खबर वहाँ करने मे माहिर माने जाते थे। झूठी मनगढ़ंत खबरों मे नमक मिर्च लगा कर समाज मे फैलाना इनका शगल होता था फिर चाहे  उनके आचरण से किसी का अहित नुकसान या परेशानी हो।  उन दिनों  आज की तरह  फोन, मोबाइल, इंटरनेट सोश्ल मीडिया व्हाट्सप्प आदि नहीं था, लेकिन लोग ठीक ऐसे ही थे आज की तरह के व्हाट्सपिये अर्थात बिना जाँचे परखे, बिना सोचे विचारे, आयात निर्यात करने बाले अर्थात व्हाट्सप्प के एक ग्रुप का माल दूसरे ग्रुप मे पटका और दूसरे के माल तीसरे मे और बन गये शूरमा व्हाट्सपिये अर्थात बीते दिनों के "खबास"। अभी कुछ दिन पूर्व  उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता श्री का देहांत हुआ, घटना दुःखद थी पर इससे भी दुःखद था उनके निधन की घटना का व्हाट्सप्प पर संप्रेषण मे प्रतिस्पर्धा और इससे उपजी  सूचना क्रांति की इस प्रतियोगता मे प्रथम आने की चाह!! हमारे इस पारवारिक व्हाट्सप्प ग्रुप की हमारी निकटस्थ रिश्तेदारिन ने उनके निधन की सूचना 20 अप्रैल 2020 को सुबह लगभग 7.25  के बीच ग्रुप मे डाल दी।  लेकिन जब  मै नहा धोकर नाश्ता के पश्चात  टीवी खोल देखने बैठा तो स्वाभाविक था देश के एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री के पिता के देहावसान का समाचार प्रमुखता से आ रहा था।   मै ये सुन हैरान था कि टीवी समाचारों के अनुसार उनका दुःखद निधन तो 20 अप्रैल 2020 को ही हुआ था लेकिन निधन का समय प्रातः  11.45 बजे के आसपास का था!! लगभग चार घंटे पहले उन्हे कहाँ से खबर मिली क्या मालूम?

दरअसल सूचना देने की ये बेतावी या उतावलापन या नंबर पाने की चाह उन पुराने  दिनों भी थी जब न मोबाइल, इंटरनेट, फ़ेस बुक या व्हाट्सप, ट्वेट्टर न थे। सूचनाओं का आदान प्रदान चिट्ठी पत्री, तार या टेलीफ़ोन से ही संभव था।  ले-दे कर टेलीफ़ोन तो था लेकिन इतना आम सुलभ न था कि सामान्य आदमी की पहुँच मे हो।  टेलीफ़ोन शहर के कुछ धनीमानी  सम्पन्न परिवारों मे ही हुआ करते थे।

1984  के आसपास की घटना थी। हमे सूचना मिली  कि हमारी एक नजदीकी रिश्तेदार का  लगभग 80 साल की उम्र मे तालबेहट मे निधन हो गया है। वे मेरी माँ की मौसी थी उम्रदराज तो थी ही, हम बच्चे उन्हे "माईं बऊ" (मामी दादी) कहा करते थे और बचपन मे प्रायः हर गर्मियों की छुट्टी मे उनके पास जाना होता था। उनको कोई ऐसी बिमारी हारी न थी की निधन की नौबत हो पर ज़िंदगी का क्या भरोसा, ऐन होली के पूर्व घटित इस  दुःखद घटना को सुन शोक होना लाज़मी था। यध्यपि इस दुःखद घटना की खबर "खबास की उपाधि" से विभूषित  जिन सज्जन के माध्यम से मिली थी उनका उताबलापन और विश्वसनीयता उसी तरह संदिग्ध थी जैसे  आज के उक्त  गैर जिम्मेदार व्हाट्सपिए की, जो बिना सुनिश्चित किये खबरों की प्रतिस्पर्धा मे प्रथम आने की चाह मे व्हाट्स्प्प पर खबरों को वाइरल कर फैलाते है भले ही खबर छद्म  और झूठी ही क्यों न हो। लेकिन आज की तरह किसी घटना का प्रति-परीक्षण (क्रॉस चेक)  करने के अन्य कोई साधन जैसे टीवी, इंटरनेट, गूगल आदि उन दिनों  न थे। एक बारगी मन मे आया कि निधन की घटना की सत्यता परखने तक इंतज़ार करे पर अगले ही पल लगा यदि घटना सत्य हुई तो नजदीकी रिश्तेदार होने के नाते समय पर न पहुँचने का पहलू जुड़ा था?  अतः रिश्तेदार के निधन कि पुष्टि हम लोग न कर सके। दुख की इस घड़ी मे शामिल होने के लिए हम और हमारी माँ तथा मौसी ने  तुरंत ही तालबेहट जाने का कार्यक्रम बनाया। रात के नौ बजने को थे मेरी माँ और मौसी का इस दुःखद घड़ी मे जाना आवश्यक था अतः मै भी साथ होकर हम तीनों लोग सीधे बस स्टैंड पहुंचे। वहाँ पर ज्ञात हुआ कि एक फास्ट नॉन-स्टॉप बस आने बाली है। बस सीधे ललितपुर जायेगी, झाँसी से ललितपुर लगभग 90 किलोमीटर है और इन दोनों शहरों के मध्य लगभग 45 किलोमीटर पर तालबेहट है।  चूंकि बस का स्टॉप तालबेहट न था अतः बस तालबेहट उतार तो सकती थी  लेकिन किराया ललितपुर तक का देना पड़ा। यहाँ से जाने बाली ये आखिरी बस थी।  होली के त्योहार की पूर्व रात्री होने के कारण  जैसे ही बस आई तो बस मे अच्छी खासी भीड़ थी। अकेले होते तो गिरते पड़ते, लटकते  जैसे भी हो चले जाते पर माँ और मौसी जो कि बीपी रोग  से पीढ़ित थी, के साथ उनकी सहूलियत का ध्यान रखना भी जरूरी था। सह यात्रियों से अनुनय विनय के बाद जैसे तैसे दोनों को बैठाने का इंतजाम किया और मैंने खड़े होकर  यात्रा की। इस तरह हम लोग बस से तालबेहट के लिए रवाना हुए।

रात के साढ़े दस -ग्यारह बजे का समय रहा होगा हम लोग बड़ी कठिनाइयों को झेलते नींद के प्रकोप को झटकते जैसे तैसे   तालबेहट बस स्टैन्ड उतरे। उन दिनों तालबेहट एक छोटा सा कस्बा था स्टैंड बिलकुल सुनसान कोई भी दुकान आदि खुली न थी दूर दूर कोई भी इंसान आता जाता न दिखा। ऐसे कस्बों मे प्रायः दिन ढलते ही अंधेरा होने पर बाज़ार हाट बंद होने लगते है, 8-9 बजे तक निपट अंधेरा छा जाता है। कस्बा जाना परखा था, रास्ता देखा था अतः हम तीनों स्टैंड से "माईं बऊ" के घर की ओर बढ़े जो बस स्टैंड के नजदीक ही था। माईं बऊ के घर के बाहर सन्नाटा पसरा था। हम लोग चौंके कि ऐसा कैसे हो सकता है? जिस घर मे कुछ घंटे पहले किसी का देहांत हो जो परिवार अपनों के बिछुड़ने पर गमगीन हो उसके घर के बाहर सुनसान निपट अंधेरा और घर के बाहर विना कोई शोकाकुल  माहौल के कोलाहल रहित वातावरण कैसे संभव है? मामला कुछ गड़बड़ है? हम तीनों ने आपस मे बात की लगता है सूचना गलत थी? इन तमाम अनिष्ट और अभीष्ट की आशंका के बीच हम लोगो की हिम्मत माईं बऊ के घर का दरबाजा खटखटाने की भी न हुई। हम अपनी माँ और मौसी के साथ पुनः बस स्टैंड पर आ गाये कि शायद कोई साधन मिले तो झाँसी बापस हो ले। लेकिन कुछ समय इंतजार के बाद भी कोई बस आदि न मिली। फिर एक आशंका और हुई कि जब खबर मिली है तो इतनी दूर आकर  एक बार पुष्टि तो कर ही लेनी चाहिए यदि सूचना सही हुई और यहाँ आकर भी बगैर शोक व्यक्त किये जाना तो और भी गलत  होगा  ये सोच हम तीनों एक बार फिर निश्चय के साथ माईं बऊ के घर पहुंचे। लेकिन कोई भी संकेत ऐसे न मिले कि परिवार मे कोई गमी हुई हो हम लोग दरवाजे पर पुनः ठिठके। दरअसल हम लोगो को ये संकोच और दुविधा हो रही थी कि निधन की सूचना यदि गलत हुई तो माईं बऊ और उनके परिवार के लोग क्या सोचेंगे कि कमाल है इन रिशतेदारों ने तो जीते जी हमे मार डाला! बगैर सूचना को सुनिश्चित किये मुँह उठा  हमारे मरग मे शामिल होने चले आये। अरे कुछ तो सोचा होता!! एक बारगी लगा कि उनके पड़ौस के एक दो परिवारों को हम जानते थे उन के द्वार खटखटा खबर की पुष्टि कर ले, लेकिन अगले ही पल लगा अगर खबर गलत हुई तो सारे कस्बे  मे रात को ही  ढिंढोरा पिट  जायेगा तब और भी जग हँसाई होगी। अंत मे कोई और ठौर न पाकर  ये ही  निश्चय किया कि इतनी रात गये माईं बऊ के घर का दरबाजा ही खटखटाया जाये जो भी होगा सच सच बयान कर देंगे और अब "चाहे मारो या डांटो" की नीति पर  अपने किये की माफी मांग लेंगे!!

इन सब उधेड़-बुन मे रात 12 बजने को थे हम लोगो ने माईं बऊ के घर का दरबाजा खटखटाया! इतनी देर रात गये जब उनके परिवार ने दरवाजा खोला तो हमे जो आशंका थी वही हुआ सामने माईं बऊ को देख हमे हैरानी मिश्रित खुशी थी कि वे जीवित है!!

अब  हम लोगो को देख हैरान होने की बारी माईं बऊ और उनके परिवार की थी। इतनी देर रात गये अचानक बगैर किसी सूचना के हम लोगो को घर पर देख उनका परिवार भी चौंक गया। परिवार के सारे छोटे बड़े सदस्य नींद से जाग कौतूहल पूर्ण निगाह से इतनी देर रात आने के मन्तव्य पर हैरान थे। कुछ देर आराम से बैठ पानी आदि पीने के बाद जब हम लोगो ने उन्हे सारी घटना कह सुनाई और अपने किये की माफी मांगी तो सभी का हंस हंस कर बुरा हाल था। हम सभी भी माईं बऊ की लंबी उम्र की कामना ईश्वर से करने लगे। और देर रात तक इसी घटना की बात होती रही और बात होती रही उस खबरी लाल "खबास" की जिसने ये छद्म सूचना फैलाई थी।

कोई और दिन होता तो हम लोग अगले ही दिन किसी बस से बापस झाँसी आ जाते लेकिन होली के अगले दो दिन बुंदेलखंड क्षेत्र मे होली के  इस त्यौहार के अवसर पर  यातायात पूर्ण तय: बंद होने के  रिवाज़  के कारण आगे दो दिन भी हम लोग अपने घर झाँसी बापस न जा सके। छद्म खबरी लाल "खबास" की  एक गलत और अपुष्ट, फूहड़ और भद्दी  घटना को फैलाने के कारण तीन परिवारों के अनेक सदस्य को  तीन दिन तक कितनी चिंता, परेशानी, कठिनाई और एक शर्मनाक घटना के दौर से गुजरने पड़ा।

पुराने दौर के उन "खबास"  और आज के इन व्हाट्सपियों मे कोई विशेष फरक नज़र नहीं आता,  न पहले इन "खबासों" रूपी "चिकने घड़ों" पर किसी  बात का असर होता था और न ही अब इन "व्हाट्सपियों" पर अब किसी बात का असर होता है।   

विजय सहगल


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