शनिवार, 30 मई 2020

शताब्दी एक्सप्रेस


"शताब्दी एक्सप्रेस"




बात उन दिनों की है जब शताब्दी एक्सप्रेस झाँसी नई दिल्ली के बीच चलती  थी जिसे बाद मे भोपाल तक बढ़ा दिया गया था। नई चली शताब्दी मे यात्रा का अपना ही कुछ जलबा और रुतबा था। स्टेशन से गाड़ी चलने से लेकर प्लेटफोरम गुजर जाने तक  लोग ऐसे शान के साथ ऐन रेल डिब्बे के दरबाजे पर खड़े रहते कि कोई उनका जानने बाला उन्हे शताब्दी से यात्रा करते  देख ले और यात्रा का फलार्थ  उन्हे कृतार्थ कर दे।  

शायद 2001 का साल था। मेरी पदस्थपना ग्वालियर शाखा मे थी। बैंक से मिलने बाली होम टाउन एलएफ़सी की सुविधा के तहत मैंने शताब्दी एक्स्प्रेस से अपने गृह नगर झाँसी आने-जाने की योजना बनाई। अपने तय कार्यक्रम अनुसार ग्वालियर से झाँसी जाने के लिये निकले। ट्रेन का  झाँसी की तरफ जाने का समय लगभग 9.30 बजे सुबह था। हम अपने परिवार के साथ ट्रेन पर सवार हुए। ट्रेन के चलने पर तुरंत पानी की एक एक बोतल अन्य यात्रियों के साथ हमारे परिवार के चारों सदस्यों को दी गई। दोनों बेटे  छोटे थे पहली बार एसी कुर्सियान  ट्रेन मे इस तरह की मिल रही  सुविधा से वे बड़े उत्सुक थे।  उन्होने खिड़की बाली सीट पर बैठ कर खूब आनंद लिया। कुछ समय बाद ही हम सभी को रेल के नियमानुसार चाय और बिस्कुट वितरण किया गया जो ट्रेन के किराए मे शामिल था। झाँसी से ग्वालियर की दूरी 98 किमी ही थी जो लगभग एक घंटे मे तय हो गई। ऐसा कुछ लगा ही नहीं की हमने ट्रेन मे यात्रा की। शताब्दी एक्सप्रेस के वातानुकूलित कुर्सियान मे ये हमारे परिवार की पहली यात्रा थी। यात्रा बड़ी सुखद रही।

कुछ  दिन के अवकाश अपने गृह नगर झाँसी मे व्यतीत कर हम लोग पुनः झाँसी से  ग्वालियर के लिये रवाना हुए। झाँसी से ये ट्रेन शाम लगभग 6.00- 06.15 बजे चलती थी। सही  समय पर ट्रेन आने पर हम सभी अपनी नियत सीट पर बैठ गये। पानी की बोतल वितरण के पश्चात हम सभी चाय, बिस्कुट का इंतजार करने लगे। ट्रेन अपने निश्चित  समय से चलकर ग्वालियर की ओर बढ़ रही थी। दतिया से ट्रेन आगे सोनागिर स्टेशन पार कर रही थी पर चाय के लिये किसी भी स्टाफ ने संपर्क नहीं किया हम समझे शायद भूल गये होगे तभी वहाँ उपस्थित कैटरीन स्टाफ से हमने पूंछा,  हम लोग झाँसी से ट्रेन मे चढ़े है ग्वालियर तक ही जाना है,  चाय बिस्कुट आदि  प्रदान नहीं करोगे? पर हमारे अनुरोध को अनदेखा कर ट्रेन आधे से ज्यादा दूरी तय कर डबरा क्रॉस कर रही थी। हमने एक बार सोचा छोड़ो क्यों छोटी सी बात मे विवाद किया जाये। पर दोनों बच्चो को यात्रा की उत्सुकता और सीट के सामने लगी ट्रे पर चाय पीने की बाल हट थी। उन्होने जब हमसे चाय के लिये कहा मैंने दोनों बच्चो को ही कहा तुम कैटरीन बाले से बात कर बोलो कि वे चाय भेजे लेकिन हद तो तब हो गई दोनों बच्चों के अनुरोध को भी उन कैटरीन स्टाफ ने अनदेखा कर दिया। तब मुझे उन कैटरीन स्टाफ के व्यवहार पर कुछ गुस्सा आया और मैं अपनी सीट से उठ कर उन्हे पुनः रेल के तय नियमानुसार चाय के लिये बोल अपनी सीट पर बैठ गया पर उन दुष्ट कैटरीन स्टाफ के कानों पर जूं भी न रैँगी। अब तक ट्रेन भी डबरा से 12-15 किमी॰ आगे  अनंतपेठ  स्टेशन से भी निकल चुकी थी।  बमुश्किल 25  मिनिट मे ग्वालियर आने बाला था। अब मैंने भी तय किया इन धूर्त स्टाफ को कुछ सबक सिखना ही होगा। उन दिनों शताब्दी एक्सप्रेस मे एसी चेयर कार के पुराने रैक ही  लगा करते थे। हर सीट की एक-दो लाइन के बीच चैन की व्यवस्था होती थी।  अधिकतर यात्री जिन्हे दिल्ली तक जाना था अपनी सीट पर उनींदे बैठे थे। मैंने अपनी सीट के निकट लगी लाल चैन को खींचा। चैन खींचते ही गाड़ी कुछ ही मिनटों मे खड़ी हो गई। चारों तरफ रेल स्टाफ मे अफरा तफरी मच गई। टीसी व अन्य स्टाफ हमारे डिब्बे मे आये और ट्रेन रोकने का कारण जानना चाहा। हमने जब उन्हे पूरा घटनाक्रम बताया तो टीसी स्टाफ ने  कैटरीन मैनेजर सहित कैटरीन बॉय की बड़ी लानत मलानत कर बुरा भला कहा। तुरत फुरत चाय बिस्कुट पेश किया गया  और कैटरीन स्टाफ की गुस्ताखी के लिये अनेकों बार माफी मांगी गई। मै जानता था कि चाय पीने का जो  आनंद हमे यात्रा मे मिलना चाहिए था इन कैटरीन स्टाफ के  बेहूदा व्यवहार के कारण उस आनंद से हम वंचित हो चुके थे और इसी लिए चाय को जल्दी जल्दी पीना पड़ा। हमने कैटरीन मैनेजर से शिकायत पुस्तिका लाने को कहा। रेल्वे मे जब कभी भी कोई यात्री शिकायत की किताब मांगता है तो प्रायः संबन्धित स्टाफ शिकायत की किताब देने मे आना कानी करता है।  यहाँ भी कैटरीन स्टाफ तमाम माफी मांगते हुए शिकायत न लिखने का अनुरोध करता रहा। पर रेल प्रशासन की जानकारी मे लाये बिना चैन पुलिंग की घटना  व्यर्थ हो जाती  और रेल प्रशासन की नज़र मे उक्त घटना न आ पाती।  अतः मैंने सख्त लहजे मे कैटरीन  मैनेजर से शिकायत की किताब लाने को कहा और ये भी कहा यदि आप किताब नहीं देंगे तो मुझे पुनः गाड़ी की चैन खींचना पड़ेगी। किताब पर मैंने संक्षेप मे शिकायत दर्ज़ की। इन 15-20 मिनिट मे रेल कैटरीन प्रबन्धक एवं तमाम स्टाफ बचाव की मुद्रा मे खड़ा रहा। कुछ मिनिटों मे ग्वालियर स्टेशन आने बाला था। इसी बीच ट्रेन के मुख्य टिकिट निरीक्षक भी हमारे डिब्बे मे आ गये और मामले को जान कर उन्होने भी कैटरीन मैनेजर और स्टाफ को डांटा। अब तो कैटरीन मैनेजर ने पुनः गलती के लिये माफी मांगी और कहा मै उस कैटरीन स्टाफ को आज ही सेवा से निकाल दूँगा जिसने हमारे बार बार अनुरोध को नज़रअंदाज़ किया था।

ग्वालियर स्टेशन आया तो कैटरीन स्टाफ सहित मैनेजर ने मेरे बार बार  आग्रह के बाबजूद मेरे समान को ट्रेन से उठा कर बाहर तक छोड़ा। सारा स्टाफ हाथ जोड़ अपने क्रत के लिए अफसोस व्यक्त कर रहा था। ट्रेन से उतरते समय कैटरीन स्टाफ ने जो वीआईपी व्यवहार किया मानों कोई बहुत विशेष महत्वपूर्ण व्यक्ति ट्रेन से उतरने बाला हो जो मेरे स्वभाव के विपरीत मुझे असहज स्थिति मे डालने बाला लगा। इस सबका मुख्य कारण मात्र ट्रेन की चैन खींच कर रोकने के बजह से ही था।

रेल विभाग का तमाम सेवाओं मे  निजीकरण की नीति के कारण निजी ठेकेदार और  रेल अधिकारियों की मिलीभगत से उपजे भ्रष्टाचार  एवं अधिकारियों द्वारा इन ठेकेदारों द्वारा सेवाओं मे कमी की अनदेखी के कारण आम यात्रियों को इस तरह की सेवाओं से वंचित कर किया जाता है।  इस तरह बदनामी का धब्बा रेल विभाग के मुँह पर चस्पा कर दिया जाता है। ऐसे ही एक अप्रिय घटना से मुझे  बिलासपुर (छत्तीसगढ़) मे रूबरू होना पड़ा था जिसका उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग "हीराकुंड एक्सप्रेस" (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/11/blog-post_15.html) मे किया था।         
हमारी उक्त यात्रा यदि बिना किसी विघ्न-बाधा के सम्पन्न होती तो शायद याद न रहती पर एक उपभोक्ता के अधिकार के नाते ये यात्रा मेरे लिये यादगार हो गई।

विजय सहगल

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बुधवार, 27 मई 2020

खबास


"खबास"




हमारे स्कूल या उससे भी पहले  के जमाने मे एक विशेष उपाधि "खबास" उन लोगो को दी जाती थी जो बेतार की गति से यहाँ की खबर वहाँ करने मे माहिर माने जाते थे। झूठी मनगढ़ंत खबरों मे नमक मिर्च लगा कर समाज मे फैलाना इनका शगल होता था फिर चाहे  उनके आचरण से किसी का अहित नुकसान या परेशानी हो।  उन दिनों  आज की तरह  फोन, मोबाइल, इंटरनेट सोश्ल मीडिया व्हाट्सप्प आदि नहीं था, लेकिन लोग ठीक ऐसे ही थे आज की तरह के व्हाट्सपिये अर्थात बिना जाँचे परखे, बिना सोचे विचारे, आयात निर्यात करने बाले अर्थात व्हाट्सप्प के एक ग्रुप का माल दूसरे ग्रुप मे पटका और दूसरे के माल तीसरे मे और बन गये शूरमा व्हाट्सपिये अर्थात बीते दिनों के "खबास"। अभी कुछ दिन पूर्व  उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता श्री का देहांत हुआ, घटना दुःखद थी पर इससे भी दुःखद था उनके निधन की घटना का व्हाट्सप्प पर संप्रेषण मे प्रतिस्पर्धा और इससे उपजी  सूचना क्रांति की इस प्रतियोगता मे प्रथम आने की चाह!! हमारे इस पारवारिक व्हाट्सप्प ग्रुप की हमारी निकटस्थ रिश्तेदारिन ने उनके निधन की सूचना 20 अप्रैल 2020 को सुबह लगभग 7.25  के बीच ग्रुप मे डाल दी।  लेकिन जब  मै नहा धोकर नाश्ता के पश्चात  टीवी खोल देखने बैठा तो स्वाभाविक था देश के एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री के पिता के देहावसान का समाचार प्रमुखता से आ रहा था।   मै ये सुन हैरान था कि टीवी समाचारों के अनुसार उनका दुःखद निधन तो 20 अप्रैल 2020 को ही हुआ था लेकिन निधन का समय प्रातः  11.45 बजे के आसपास का था!! लगभग चार घंटे पहले उन्हे कहाँ से खबर मिली क्या मालूम?

दरअसल सूचना देने की ये बेतावी या उतावलापन या नंबर पाने की चाह उन पुराने  दिनों भी थी जब न मोबाइल, इंटरनेट, फ़ेस बुक या व्हाट्सप, ट्वेट्टर न थे। सूचनाओं का आदान प्रदान चिट्ठी पत्री, तार या टेलीफ़ोन से ही संभव था।  ले-दे कर टेलीफ़ोन तो था लेकिन इतना आम सुलभ न था कि सामान्य आदमी की पहुँच मे हो।  टेलीफ़ोन शहर के कुछ धनीमानी  सम्पन्न परिवारों मे ही हुआ करते थे।

1984  के आसपास की घटना थी। हमे सूचना मिली  कि हमारी एक नजदीकी रिश्तेदार का  लगभग 80 साल की उम्र मे तालबेहट मे निधन हो गया है। वे मेरी माँ की मौसी थी उम्रदराज तो थी ही, हम बच्चे उन्हे "माईं बऊ" (मामी दादी) कहा करते थे और बचपन मे प्रायः हर गर्मियों की छुट्टी मे उनके पास जाना होता था। उनको कोई ऐसी बिमारी हारी न थी की निधन की नौबत हो पर ज़िंदगी का क्या भरोसा, ऐन होली के पूर्व घटित इस  दुःखद घटना को सुन शोक होना लाज़मी था। यध्यपि इस दुःखद घटना की खबर "खबास की उपाधि" से विभूषित  जिन सज्जन के माध्यम से मिली थी उनका उताबलापन और विश्वसनीयता उसी तरह संदिग्ध थी जैसे  आज के उक्त  गैर जिम्मेदार व्हाट्सपिए की, जो बिना सुनिश्चित किये खबरों की प्रतिस्पर्धा मे प्रथम आने की चाह मे व्हाट्स्प्प पर खबरों को वाइरल कर फैलाते है भले ही खबर छद्म  और झूठी ही क्यों न हो। लेकिन आज की तरह किसी घटना का प्रति-परीक्षण (क्रॉस चेक)  करने के अन्य कोई साधन जैसे टीवी, इंटरनेट, गूगल आदि उन दिनों  न थे। एक बारगी मन मे आया कि निधन की घटना की सत्यता परखने तक इंतज़ार करे पर अगले ही पल लगा यदि घटना सत्य हुई तो नजदीकी रिश्तेदार होने के नाते समय पर न पहुँचने का पहलू जुड़ा था?  अतः रिश्तेदार के निधन कि पुष्टि हम लोग न कर सके। दुख की इस घड़ी मे शामिल होने के लिए हम और हमारी माँ तथा मौसी ने  तुरंत ही तालबेहट जाने का कार्यक्रम बनाया। रात के नौ बजने को थे मेरी माँ और मौसी का इस दुःखद घड़ी मे जाना आवश्यक था अतः मै भी साथ होकर हम तीनों लोग सीधे बस स्टैंड पहुंचे। वहाँ पर ज्ञात हुआ कि एक फास्ट नॉन-स्टॉप बस आने बाली है। बस सीधे ललितपुर जायेगी, झाँसी से ललितपुर लगभग 90 किलोमीटर है और इन दोनों शहरों के मध्य लगभग 45 किलोमीटर पर तालबेहट है।  चूंकि बस का स्टॉप तालबेहट न था अतः बस तालबेहट उतार तो सकती थी  लेकिन किराया ललितपुर तक का देना पड़ा। यहाँ से जाने बाली ये आखिरी बस थी।  होली के त्योहार की पूर्व रात्री होने के कारण  जैसे ही बस आई तो बस मे अच्छी खासी भीड़ थी। अकेले होते तो गिरते पड़ते, लटकते  जैसे भी हो चले जाते पर माँ और मौसी जो कि बीपी रोग  से पीढ़ित थी, के साथ उनकी सहूलियत का ध्यान रखना भी जरूरी था। सह यात्रियों से अनुनय विनय के बाद जैसे तैसे दोनों को बैठाने का इंतजाम किया और मैंने खड़े होकर  यात्रा की। इस तरह हम लोग बस से तालबेहट के लिए रवाना हुए।

रात के साढ़े दस -ग्यारह बजे का समय रहा होगा हम लोग बड़ी कठिनाइयों को झेलते नींद के प्रकोप को झटकते जैसे तैसे   तालबेहट बस स्टैन्ड उतरे। उन दिनों तालबेहट एक छोटा सा कस्बा था स्टैंड बिलकुल सुनसान कोई भी दुकान आदि खुली न थी दूर दूर कोई भी इंसान आता जाता न दिखा। ऐसे कस्बों मे प्रायः दिन ढलते ही अंधेरा होने पर बाज़ार हाट बंद होने लगते है, 8-9 बजे तक निपट अंधेरा छा जाता है। कस्बा जाना परखा था, रास्ता देखा था अतः हम तीनों स्टैंड से "माईं बऊ" के घर की ओर बढ़े जो बस स्टैंड के नजदीक ही था। माईं बऊ के घर के बाहर सन्नाटा पसरा था। हम लोग चौंके कि ऐसा कैसे हो सकता है? जिस घर मे कुछ घंटे पहले किसी का देहांत हो जो परिवार अपनों के बिछुड़ने पर गमगीन हो उसके घर के बाहर सुनसान निपट अंधेरा और घर के बाहर विना कोई शोकाकुल  माहौल के कोलाहल रहित वातावरण कैसे संभव है? मामला कुछ गड़बड़ है? हम तीनों ने आपस मे बात की लगता है सूचना गलत थी? इन तमाम अनिष्ट और अभीष्ट की आशंका के बीच हम लोगो की हिम्मत माईं बऊ के घर का दरबाजा खटखटाने की भी न हुई। हम अपनी माँ और मौसी के साथ पुनः बस स्टैंड पर आ गाये कि शायद कोई साधन मिले तो झाँसी बापस हो ले। लेकिन कुछ समय इंतजार के बाद भी कोई बस आदि न मिली। फिर एक आशंका और हुई कि जब खबर मिली है तो इतनी दूर आकर  एक बार पुष्टि तो कर ही लेनी चाहिए यदि सूचना सही हुई और यहाँ आकर भी बगैर शोक व्यक्त किये जाना तो और भी गलत  होगा  ये सोच हम तीनों एक बार फिर निश्चय के साथ माईं बऊ के घर पहुंचे। लेकिन कोई भी संकेत ऐसे न मिले कि परिवार मे कोई गमी हुई हो हम लोग दरवाजे पर पुनः ठिठके। दरअसल हम लोगो को ये संकोच और दुविधा हो रही थी कि निधन की सूचना यदि गलत हुई तो माईं बऊ और उनके परिवार के लोग क्या सोचेंगे कि कमाल है इन रिशतेदारों ने तो जीते जी हमे मार डाला! बगैर सूचना को सुनिश्चित किये मुँह उठा  हमारे मरग मे शामिल होने चले आये। अरे कुछ तो सोचा होता!! एक बारगी लगा कि उनके पड़ौस के एक दो परिवारों को हम जानते थे उन के द्वार खटखटा खबर की पुष्टि कर ले, लेकिन अगले ही पल लगा अगर खबर गलत हुई तो सारे कस्बे  मे रात को ही  ढिंढोरा पिट  जायेगा तब और भी जग हँसाई होगी। अंत मे कोई और ठौर न पाकर  ये ही  निश्चय किया कि इतनी रात गये माईं बऊ के घर का दरबाजा ही खटखटाया जाये जो भी होगा सच सच बयान कर देंगे और अब "चाहे मारो या डांटो" की नीति पर  अपने किये की माफी मांग लेंगे!!

इन सब उधेड़-बुन मे रात 12 बजने को थे हम लोगो ने माईं बऊ के घर का दरबाजा खटखटाया! इतनी देर रात गये जब उनके परिवार ने दरवाजा खोला तो हमे जो आशंका थी वही हुआ सामने माईं बऊ को देख हमे हैरानी मिश्रित खुशी थी कि वे जीवित है!!

अब  हम लोगो को देख हैरान होने की बारी माईं बऊ और उनके परिवार की थी। इतनी देर रात गये अचानक बगैर किसी सूचना के हम लोगो को घर पर देख उनका परिवार भी चौंक गया। परिवार के सारे छोटे बड़े सदस्य नींद से जाग कौतूहल पूर्ण निगाह से इतनी देर रात आने के मन्तव्य पर हैरान थे। कुछ देर आराम से बैठ पानी आदि पीने के बाद जब हम लोगो ने उन्हे सारी घटना कह सुनाई और अपने किये की माफी मांगी तो सभी का हंस हंस कर बुरा हाल था। हम सभी भी माईं बऊ की लंबी उम्र की कामना ईश्वर से करने लगे। और देर रात तक इसी घटना की बात होती रही और बात होती रही उस खबरी लाल "खबास" की जिसने ये छद्म सूचना फैलाई थी।

कोई और दिन होता तो हम लोग अगले ही दिन किसी बस से बापस झाँसी आ जाते लेकिन होली के अगले दो दिन बुंदेलखंड क्षेत्र मे होली के  इस त्यौहार के अवसर पर  यातायात पूर्ण तय: बंद होने के  रिवाज़  के कारण आगे दो दिन भी हम लोग अपने घर झाँसी बापस न जा सके। छद्म खबरी लाल "खबास" की  एक गलत और अपुष्ट, फूहड़ और भद्दी  घटना को फैलाने के कारण तीन परिवारों के अनेक सदस्य को  तीन दिन तक कितनी चिंता, परेशानी, कठिनाई और एक शर्मनाक घटना के दौर से गुजरने पड़ा।

पुराने दौर के उन "खबास"  और आज के इन व्हाट्सपियों मे कोई विशेष फरक नज़र नहीं आता,  न पहले इन "खबासों" रूपी "चिकने घड़ों" पर किसी  बात का असर होता था और न ही अब इन "व्हाट्सपियों" पर अब किसी बात का असर होता है।   

विजय सहगल


शुक्रवार, 22 मई 2020

सूरदास


"सूरदास"




"मांगन मरन समान है, मत कोई माँगे भीख"।
"मांगन ते मरना भला, ये सतगुरु की सीख"॥

संत कबीर दास जी के इस दोहे सहित अनेकों दोहों को  बचपन मे खूब पढ़ा था यूं भी संत कबीर के दोहे अपनी सरलता और पैने संदेश के लिये जाने जाते है। संत कबीर जैसे कवि विरले ही हुए है जिन्होने  समाज मे फैली कुरीतियों और ऊंच  नीच के भेद पर करारा कटाक्ष किया।  भिखारियों की परिभाषा  आज के जमाने मे लोग  अलग अलग तरह से देते और किसी व्यक्ति के  भिखारीपने को अपने अपने अंदाज मे ब्याँ करते है। वास्तविक भिखारियों को तो प्रत्यक्ष रूप से देख उनके साथ समय और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार सभी लोगो द्वारा अपने अपने अंदाज से किया जाता है, पर उन छद्म भिखारियों से कैसे निपटा जाये ये कठिन सवाल हमेशा हर व्यक्ति के जीवन मे अवश्य ही आता रहा होगा? छात्र जीवन या आगे भी कई मर्तबा जब ऐसे व्यापारी, सरकारी नौकर या दुकानदार जो अपने पद और प्रतिष्ठा से मिली शक्ति  का दुर्पयोग कर किसी वस्तु या सेवा के बदले ज्यादा मूल्य मांगता तो मेरा उस व्यापारी या सरकारी मुलाज़िम से  हमेशा एक ही जबाब होता "इस धंधे को छोड़ तुम एक कटोरा रख  भीख मांगना शुरू कर दो तो नौकरी या व्यापार से ज्यादा कमाई कर लोगे!! जिसे सुन प्रायः, पर क्रोध भरे भाव से वे सही मूल्य लेते पर कभी कभी बेशर्म चिकने घड़ों की तरह उन पर  कोई फर्क नहीं पड़ता और निर्लज्जता से ज्यादा पैसे  या हूँ कहे घूस/रिश्वत रख लेते थे जैसे  ग्वालियर मे टेम्पो बालों से जूझते समय इस समस्या का चित्रण हमने अपने ब्लॉग "रूट नंबर-8" (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/03/8.html) मे किया था। हमे क्या पता था भीख और  भिखारी से हमे भी कई बार ऐसी घटनाओं से रूबरू होना पड़ेगा जो बड़ी मजेदार, रोचक और यादगार होंगी।

बात उन दिनों की थी जब मै झाँसी से  ग्वालियर दैनिक आवागमन करता था। शुरू शुरू मे तो  लगता था कि हम नौकरी पेशा लोग ही इस दैनिक आवागमन का हिस्सा है जो एक शहर से दूसरे शहर अपनी व्रत्ति की खातिर जाते है। पर जब हम इस दैनिक आवागमन का अटूट  हिस्सा बने तो पता चला कि  चलने बाली रेल मे हमारे  वर्ग के ही  नहीं बल्कि अन्य  कई श्रेणी के लोग जैसे  पान तंबाकू बेचने बाला, जूता पोलिस करने बाला, बैग आदि की चैन ठीक करने बाला, 3-4 चना ज़ोर बाले खाने के आइटम बेचने बाले और कई" डिब्बों मे सफाई के बदले  पैसे लेने बालों" के साथ भिक्षा व्रत्ति मे रत एक "सूरदास" (जिनकी की आंखे नहीं थी) भी जो यात्रियों से  पैसा मांग कर अपना जीवन यापन करने बाला था, ऐसे अन्य अनेक लोगो के साथ अप-डाउन करते थे। उनका क्या नाम था किसी को नहीं मालूम पर आँखेँ न होने के कारण सभी उन्हे सूरदास ही कहा करते थे।  सभी का आने जाने का अपना अलग अलग टाइम टेबल था पर कभी न कभी आवागमन के दौरान आपस मे एक दूसरे से प्रायः टकरा जाते और इस तरह अप-डाउनर के नाते पहचान हो ही जाती थी। ये सभी दैनिक यात्री आपस मे  एक दूसरे का सम्मान तो करते पर  अपनी वस्तु या सेवाओं का आदान प्रदान अर्थात क्रय-विक्रय सौजन्यता वश आपस मे  नहीं करते थे।

बैसे तो अलग व्यवसाय के ये सारे डेलि पैसेंजर एक दूसरे को देख रेल की उन सीटों या कैबिन को छोड़ आगे बढ़ जाते जहां पर अन्य यात्रियों के साथ  दैनिक यात्रियों का समूह बैठा होता।  चूंकि सूरदास को आँखों से दिखाई न देने की क्षमता के कारण कई बार बगैर ये जाने कि दैनिक यात्री भी किसी सीट या कैबिन मे बैठे है, सूरदास जी अपनी धुन मे मगन  सीट दर सीट, कैबिन दर कैबिन भजन सुना भिक्षा मांगते रेल के डिब्बे मे बढ़े चले जाते थे । हम लोग दैनिक यात्री छोटे छोटे 5-6 सदस्यों के ग्रुप मे स्थान और परिस्थिति अनुसार एक साथ थोड़ा कभी दबके या आगे पीछे खिसक या कभी डिब्बे मे उपर नीचे बैठ या कोच मे ही उन सीटों पर बैठ जाते जिनका कोटा आगे के स्टेशन से होता। एक साथ बैठने का एक मुख्य कारण ताश खेलना भी होता ताकि एक घंटे की यात्रा का समय आसानी से व्यतीत हो सके। यध्यपि हम लोगो की पूरी कोशिश होती कि साथी यात्रियों को कोई ज्यादा दुःख, तकलीफ  न हो।  भिक्षा व्रत्ति मे रत सूरदास जी भजन गाते हुए जैसे ही  हमलोगो की सीट के नजदीक आते तो हमलोग उनका नाम को कुछ विशेष अंदाज़ मे लंबा उच्चारण कर "सू...sssssssर दास" कहते तो वो समझ जाता कि ये डेलि पैसेंजर अर्थात स्टाफ के लोग है अर्थात इनसे आपसी "व्यावसायिक प्रतिवद्धतावध रिश्तों" (प्रॉफेश्नल रिलेशन)  के चलते "भिक्षा व्रत्ति" की कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिये, अतः रेल डिब्बे की उन सीटों और  कैबिन को छोड़ सूरदास जी  आगे बढ़ जाते थे। ये नित्य प्रति की दिनचर्या थी जिसे धीरे-धीरे  सूरदास जी और दैनिक यात्रियों के बीच के इस रिश्ते को एक तरह की व्यवहारिक मान्यता मिल चुकी थी।  सूरदास जी की एक और विशेषता थी कि जब कोई उन्हे कुछ पैसे दे देता तो उसे "भगवान आपका भला करे" कह उसको धन्यवाद ज्ञपित करना उनका स्वभाव था जिसे वे कभी न भूलते।  

एक दिन ग्वालियर से बापसी मे एक अलग  अद्भुद घटना घटित हुई। सूरदास जी भजन गाते हुए "इस गरीब अंधे को रुपया दो रुपया या खाने का कुछ समान दे दे"। "भगवान आप और आपके बच्चों को खुश रखे"!! "जो दे भला और जो न दे उसका भी भला" आदि गाते हुए उन सीटों और कैबिन की ओर बढ़े जहां हम दैनिक यात्री बैठ  ताश के पत्ते खेलने मे मस्त थे।  पर तभी  एक दैनिक यात्री ने सूरदास के हम लोगो की सीट के निकट आते देख उस ही  लहजे मे  लंबा उच्चारण कर "सू...sssssssर दास"  कहा तो वे हम सभी डेली पैसेंजर को "बाबूजी राम राम" कह  आगे बढ़ गये।  पर अचानक हमारे एक मित्र ने दया, दान, धर्म के वशीभूत  आवाज लगा कर सूरदास को वापस बुलाया  और एक रुपए का सिक्का उनके हाथ मे देते हुए रख लेने को बोला।    आशा  के विपरीत  सूरदास ने पैसे मिलने के बाद अपने रटे रटाय जबाब "भगवान आपका भला करे" के बदले  मित्र को संबोधित कर पूंछा "बाबूजी! आज क्या "तनखा" मिली है"।

इतना सुनते ही कुछ क्षणों के लिये वातावरण मे मानों जैसे सन्नाटा छा गया पर तुरंत ही सूरदास के इस जबाब पर सहयात्रियों सहित हम सभी साथियों के चेहरों पर एक अलग तरह की  हंसी  विखर गई, पर  हमारे उन मित्र के  चेहरे पर क्रोध मिश्रित शर्मिंदगी और असहजता  के भाव देखने लायक थे। इस घटना पर मेरे मित्र की दशा "भई गति साँप छछूंदर केरि" की तरह हो गई थी    जिनके "होम करते, हाथ जले" थे।

इस घटना के बाद मैंने अपने उन मित्र को कभी किसी भिखारी या उन सूरदास को दैनिक आवागमन मे  भिक्षा देते हुए नहीं देखा!!!

विजय सहगल

शनिवार, 16 मई 2020

"श्रमिक कानून संशोधन विरोध"


"श्रमिक कानून संशोधन विरोध"
"अर्थात सरकारों  की-नकटा थुकैल बज्जताड़ी"



औरंगाबाद रेल हादसे मे 16 मजदूरों की रेल दुर्घटना मे मृत्यू की खबर ने अंदर तक दिल को झकझोर दिया। इन मजदूरों की जिस चाहत ने रेल की पटरियों पर चल इनके कार्य स्थल से घर बापस पहुँचने की यात्रा ने इन्हे  मजबूर किया वही इनकी अकाल मौत का कारण बनी। "एक रात्रि" के सुख और शांति की चाह ने इनकी इस "गृह यात्रा" को "अंतिम यात्रा" मे तब्दील कर दिया। उनकी  "चैन की एक निद्रा" की चाह ने इन मजदूरों को "चिर निद्रा" मे विलीन कर दिया। जिस मालगाड़ी ने पटरियों पर सोते उन मजदूरों के शरीर को चिथड़े-चिथड़े कर टुकड़ो मे उसी तरह बाँट दिया, कि बो अगर जिंदा भी होते तो पलायन से उपजी त्रासदी, जीते जी उन के सपने को ये निर्दयी और नाकाम व्यवस्था भूख और प्यास से इनके बीबी और बच्चों को तिल तिल कर मरने को मजबूर कर देती। मजदूरों के घर बापसी मे पलायन के दौरान उनकी मौत का ये सिलसिला आज भी जारी है। 

"कौन दोषी है इन मजदूरों की अकाल मृत्यू के लिये"?? शायद ये सवाल इस बेरहम, बेदिल धन पिपासुओं, पद लोलुप्तों  और नरपिशाच  नेताओं और नौकर शाहों की साँठ गाँठ से उपजी व्यवस्था मे उतना ही वेमानी है जितना एक कसाई के लिये बकरे की जान? हर बार की तरह इस घटना की जाँच और कारणों पर कमेटियाँ का गठन और  न्यायिक अधिकरण के गठन की खाना पूर्ति की औपचारिकता निभा दी जायेगी। शायद पैसठ दिनों के इस "लॉक डाउन" मे अन्य अनेक या प्रत्येक मुद्दे पर सहमति बनी या न बनी हो,  पर "मजदूरों के लॉक डाउन मे घर बापस जाने की चाह" पर कतई सहमति इस दौरान न बन सकी। सरकारों और राजनैतिक नेताओं का दोगलापन कदम कदम पर इन प्रवासी मजदूरों का पलायन का कारण बना। इन नेताओं के दोहरे नकाब रूपी नीतियों  की बहुत बड़ी कीमत इन मजदूरों को चुकानी पड़ी। कहीं कहीं हजारों किलोमीटर की अनवरत पैदल यात्रा और  कहीं कहीं तो "कीमत" के रूप मे इन निरीह, गरीब और लाचार मजदूरों को अपनी जान भी "अकाल मृत्यु" के रूप मे चुकानी पड़ी!!
नियति का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि जिन बेबस, असहाय, असमर्थ और विवश मजदूरों ने दो जून की रोटी के लिये अपना घर छोड़ा, अपने परिवार और बच्चों के सुखमय और सुखद भविष्य की कल्पना सँजोये अपनी मातृभूमि से सैकड़ों और कही कही हजारों किलोमीटर दूर पलायन किया। उनके पलायन जिक्र हमने अपने ब्लॉग "सपनों की उड़ान" (https://sahgalvk.blogspot.com/2019/03/blog-post_8.html) मे एक बार किया था।  काश! समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्तियों की छद्म चिंता करने बाली ये "श्रमिक कल्याणकारी सरकारें",  यदि उनके ही जन्मभूमि मे रोज़गार उपलब्ध करा देती तो इन लाचारों को अपनी जान गँवाने के ये दुर्दिन न देखने पड़ते। वहीं दूसरी ओर यदि इन वेवश लाचारों ने अपनी मातृभूमि  से विलग अपने श्रम से देश के सुदूर राज्यों मे जाकर अपने श्रम रूपी रुधिर से आर्थिक विकास का जो तंत्र उन शहरों मे स्थापित  कर उन पूँजीपतियों की वैभव शाली अट्टालिकाओं को गगनचुम्बी ऊंचाइयों तक उठाया।  क्या उन भामाशाहों, मठाधीशों, धनवानों का नैतिक और मानवीय कर्तव्य नहीं था, कि जिन मजदूरों और कर्मकारों के बल पर वे धनाढ्य बने (उनमे से कुछ तो विश्व की  नवधनाढ्यों की सूची मे प्रथम स्थान रखने बाले भी है), उन  विपत्ति के मारे श्रमिकों  को अपने धन से ऐसे आपदा के समय दो वक्त का भोजन करा पाते? ये कैसा दुर्भाग्य कि कोविड रूपी महामारी के फलस्वरूप उत्पन्न हालातों के मद्देनज़र देश के प्रधानमंत्री के आवाहन के बावजूद इन दौलतमंद पूँजीपतियों, ठेकेदारों  ने इन श्रमिकों, मेहनतकशों को  लॉक डाउन के कारण बंद कलकारखानों का पारिश्रमिक प्रदान नहीं किया जिसकी बजह से एक बार फिर इन अभागों को "दो जून की रोटी" के लिये अपने गृह वतन पैदल पलायन कर बापस जाने को विवश किया। इन करखानेदारों और ठेकेदारों के मजदूरों को लॉक डाउन से उत्पन्न बंदी मे वेतन से वंचित करने की नीति के कारण ही कुछ श्रमिक लॉक डाउन के प्रारम्भ मे, कुछ तालाबंदी के मध्य मे और कुछ तालाबंदी के अंतिम पढ़ाव मे अपने गृह नगर बापसी को विवश होते रहे और इस तरह ये पलायन का दौर पूरे देश मे तालाबंदी की शुरुआत से लेकर  अंत तक और आज भी सतत जारी है। सड़क पर पुलिस की बाधा या भय के कारण इन लोगो ने रेल की पटरियों के  रास्ते   पलायन का रास्ता पकड़ा। रेल की पटरियों पर चलने की  व्यथा को मैंने एक बार खुद भुक्तभोगी की हैसियत से अपने ब्लॉग "संदलपुर टू सिथौली" (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/11/blog-post.html) मे व्यक्त किया था। कितनी कठिन थी वो यात्रा जो इन मजदूरों के पलायन की  यात्रा के सामने  उसका एकांश भी न होगी। सोच कर सिहरन होती है कि कैसे ये मजदूर रेल की पटरियों पर यात्रा करने को मजबूर हुए। 

अहो दुर्भाग्य इन निर्धन असहाय मजदूरों को जिस "दो वक्त की रोटी" ने अपने जन्मभूमि से दूर श्रम की तलाश मे पलायन के लिये महानगरों की कर्मभूमि की  ओर मजबूर किया और इस अभागी "कोविड महामारी" के कारण इन्ही महानगरों की दैत्य रूपी सरकारों लोभी अधिष्ठानों और लालची नियोक्ताओं के दोहरे नकाबों, छद्म और झूठे वचनों/आश्वासनों से विमुख कर "दो वक्त की रोटी" की उसी चाहत और सुरक्षा के भाव  ने पुनः उन्हे बापस अपने गाँव और कस्बों की ओर पलायन के लिये विवश किया ठीक उसी तरह जैसा "सूरदस जी" ने अपने इस पद मे लिखा है :-

"मेरो मन अनत कहां सुख पावै"।
"जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै"॥

इन मजदूरों का दुर्भाग्य देखिये जो फिक्रमंद सरकार इन भाग्यहीन श्रमिकों की जन्मभूमि मे शासित है और वे भी सरकारे जो इन मेहनतकशों की कर्मभूमि पर शासित थी इन दोनों ही जन विरोधी और श्रम विरोधी सरकारों ने औरंगाबाद रेल दुर्घटना मे मारे गये श्रमिकों को,  जो  जीते जी  "दो वक्त की रोटी" न दे सकी हों उन पत्थर दिल, कठोर, अमानवीय शासकों द्वारा शासित दोनों ही सरकारों ने उन मृत श्रमिकों की मौत  की कीमत पाँच-पाँच लाख रूपये देने का निश्चय किया और जो "रेल्वे",  मजदूरों पर आई इस आपदा के समय वापस उनके गृह नगर भेजने मे इन वेसहारा श्रमिकों को "सामान्य श्रेणी" के डिब्बे मे "एक अदद सीट" उपलब्ध न करा सकी हो  उसने इन मजदूरों की लाशों को उनके गृह नगर भेजने का बंदोबस्त किया।  कदाचित ये निरंकुश नौकर शाह और राजनैतिक नेतागण उन श्रमसाध्य कार्य के पश्चात आराम की श्रमिक नीति के अधिकारों मे विश्वास के प्रणेता इन कामगारों को "श्रम" से उपजे परिश्रम और परिश्रम के फल रूपी पारिश्रमिक की व्यवस्था मे कोताही न वरतते तो उन्हे रेल की पटरियों पर श्रमसाध्य कार्य के पश्चात आराम के लिये  इस तरह मजबूर न होना पड़ता।

पहले से ही मौजूद मूलभूत  श्रमिक क़ानून अर्थात  "आठ घंटे काम, आठ घंटे घर परिवार के साथ आमोद-प्रमोद और शेष आठ घंटे आराम" के बाबजूद जो नीति नियंता श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा "कोविड महामारी आपदा" के इस आढ़े  समय मे न कर सके, उन मजदूरों के पैरोंकारी विधि संस्थाये भी जिन मेहनतकशों की "जीवन यापन" के मूलभूत अधिकारों की रक्षा न कर सकी वे सरकारें श्रमिकों के अधिकारों मे कटौती कर श्रमिक क़ानूनों मे संशोधन हेतु तत्पर है । श्रमिक पलायन मे जिन सैकड़ों श्रमिकों ने अपने प्राणों की आहुति "जीने के इस मूलभूत" अधिकार के लिये होम कर दी ऐसी कुछ  श्रम विरोधी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और गोवा की सरकारों ने  विदेशी उध्योग को आकर्षित करने हेतु श्रमिक क़ानूनों मे बदलाव किया है कुछ और प्रदेश भी उनके इस नक्शे कदम पर चलने के तत्पर है। इन क़ानूनों के बदलाब से श्रमिक अपने उन अनेकों श्रमिक अधिकारों से वंचित कर दिये जाएंगे जो श्रमिकों को भारतीय संविधान मे उपलब्ध है। जिसमे मुख्यतः है "निश्चित नियामक कार्यकारी "आठ घंटे" पर लगी रोक को बढ़ा बारह घंटे करना"। बारह कार्यकारी घंटों के बाद मजदूर कितने घंटे घर परिवार को देगा और कितने घंटे वो आराम करेगा इस सवाल पर एक विचारणीय  प्रश्न चिन्ह है?? काम  के इन आठ घंटे के वैधानिक अधिकार के  इन निश्चित नियामक कार्यकारी  घंटों के कानून का  सरासर दुर्पयोग बैंक सहित सरकारी और गैर सरकारी विभागों के संगठित क्षेत्रों मे आज भी जब बखूबी देखा जा सकता है तब फिर नये श्रमिक कानून संशोधन को असंगठित क्षेत्र मे देखने और सुनने और रोकने बाला कौन होगा?? फिर तो  "जब सैयां भये कोतवाल तो फिर डर काहे का"।   ऐसे  श्रमिक विरोधी कानून मे संशोधन कराने मे लिप्त है ये सरकारे और तुर्रा ये कि हम श्रमिकों के कल्याण कारी योजना मे विश्वास करते है अर्थात "मुँह मे राम बगल मे छुरी" !!     
           
"केशर बऊ" (ब्लॉग:- https://sahgalvk.blogspot.com/2019/06/70-75-30-2-4-4-4.html) आज सालों बाद एक बार पुनः स्मरण हो आई है जो बुंदेलखंडी भाषा मे अपना आक्रोश और विरोध जिन शब्दों मे करती थी उन्ही शब्दों का हू-ब-हू प्रयोग कर हम भी इन छः सरकारों द्वारा "श्रमिक कानून मे संशोधन" का विरोध इन सरकारों को "नकटा, थुकैल, बज़्जताड़ी"  कह कर, करते है।

विजय सहगल




बुधवार, 13 मई 2020

संवाद



"संवाद"







संवाद एक मासिक मैगजीन सैक्टर 50 से प्रति माह प्रकाशित हो रही है। उक्त मैगजीन की सूचना अनुसार "संवाद"  जिसकी लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा प्रतियाँ प्रतिमाह प्रकाशित होती है और जिनका वितरण  सैक्टर 11 से सैक्टर 104  के नोएडा स्थित  34 सैक्टरों मे स्थित सोसाइटियों मे निशुल्क किया जाता है। इसके अतरिक्त दक्षिण दिल्ली की 26 कॉलोनियों एवं गुड़गाँव के 7 क्षेत्रों मे भी इनका वितरण किया जाता है। हमे प्रसन्नता है कि संवाद की संवाददाता श्रीमती शिखा सिन्हा द्वारा हमारे द्वारा संचालित झुग्गी वस्ती के स्कूल के बारे मे एक रिपोर्ट अपनी मासिक पत्रिका "संवाद" के मार्च 2020 के अंक मे चित्र सहित  प्रकाशित की है। हम "संवाद" पत्रिक के प्रबंधन, संपादक एवं संवाददाता श्रीमती शिखा सिन्हा के प्रति अपना आभार व्यक्त कर धन्यवाद ज्ञापित करते है। उनकी ये रिपोर्ट हमारे उद्देश्य के मार्ग  मे  आगे बढ़ने और समाज के इन विपन्न और वंचित वर्ग की सेवा हेतु उत्साह वर्धन मे उत्प्रेरक का कार्य करेगी।

विजय सहगल