"शताब्दी एक्सप्रेस"
बात उन दिनों की है जब शताब्दी एक्सप्रेस झाँसी नई
दिल्ली के बीच चलती थी जिसे बाद मे भोपाल
तक बढ़ा दिया गया था। नई चली शताब्दी मे यात्रा का अपना ही कुछ जलबा और रुतबा था।
स्टेशन से गाड़ी चलने से लेकर प्लेटफोरम गुजर जाने तक लोग ऐसे शान के साथ ऐन रेल डिब्बे के दरबाजे पर
खड़े रहते कि कोई उनका जानने बाला उन्हे शताब्दी से यात्रा करते देख ले और यात्रा का फलार्थ उन्हे कृतार्थ कर दे।
शायद 2001 का साल था। मेरी पदस्थपना ग्वालियर शाखा
मे थी। बैंक से मिलने बाली होम टाउन एलएफ़सी की सुविधा के तहत मैंने शताब्दी
एक्स्प्रेस से अपने गृह नगर झाँसी आने-जाने की योजना बनाई। अपने तय कार्यक्रम
अनुसार ग्वालियर से झाँसी जाने के लिये निकले। ट्रेन का झाँसी की तरफ जाने का समय लगभग 9.30 बजे सुबह
था। हम अपने परिवार के साथ ट्रेन पर सवार हुए। ट्रेन के चलने पर तुरंत पानी की एक
एक बोतल अन्य यात्रियों के साथ हमारे परिवार के चारों सदस्यों को दी गई। दोनों
बेटे छोटे थे पहली बार एसी कुर्सियान ट्रेन मे इस तरह की मिल रही सुविधा से वे बड़े उत्सुक थे। उन्होने खिड़की बाली सीट पर बैठ कर खूब आनंद
लिया। कुछ समय बाद ही हम सभी को रेल के नियमानुसार चाय और बिस्कुट वितरण किया गया
जो ट्रेन के किराए मे शामिल था। झाँसी से ग्वालियर की दूरी 98 किमी ही थी जो लगभग
एक घंटे मे तय हो गई। ऐसा कुछ लगा ही नहीं की हमने ट्रेन मे यात्रा की। शताब्दी
एक्सप्रेस के वातानुकूलित कुर्सियान मे ये हमारे परिवार की पहली यात्रा थी। यात्रा
बड़ी सुखद रही।
कुछ दिन के
अवकाश अपने गृह नगर झाँसी मे व्यतीत कर हम लोग पुनः झाँसी से ग्वालियर के लिये रवाना हुए। झाँसी से ये ट्रेन
शाम लगभग 6.00- 06.15 बजे चलती थी। सही समय पर ट्रेन आने पर हम सभी अपनी नियत सीट पर
बैठ गये। पानी की बोतल वितरण के पश्चात हम सभी चाय, बिस्कुट का इंतजार करने लगे। ट्रेन अपने निश्चित समय से चलकर ग्वालियर की ओर बढ़ रही थी। दतिया से
ट्रेन आगे सोनागिर स्टेशन पार कर रही थी पर चाय के लिये किसी भी स्टाफ ने संपर्क
नहीं किया हम समझे शायद भूल गये होगे तभी वहाँ उपस्थित कैटरीन स्टाफ से हमने पूंछा, हम लोग झाँसी से ट्रेन मे चढ़े है ग्वालियर तक ही
जाना है, चाय बिस्कुट आदि प्रदान नहीं करोगे? पर हमारे अनुरोध को
अनदेखा कर ट्रेन आधे से ज्यादा दूरी तय कर डबरा क्रॉस कर रही थी। हमने एक बार सोचा
छोड़ो क्यों छोटी सी बात मे विवाद किया जाये। पर दोनों बच्चो को यात्रा की उत्सुकता
और सीट के सामने लगी ट्रे पर चाय पीने की बाल हट थी। उन्होने जब हमसे चाय के लिये
कहा मैंने दोनों बच्चो को ही कहा तुम कैटरीन बाले से बात कर बोलो कि वे चाय भेजे
लेकिन हद तो तब हो गई दोनों बच्चों के अनुरोध को भी उन कैटरीन स्टाफ ने अनदेखा कर
दिया। तब मुझे उन कैटरीन स्टाफ के व्यवहार पर कुछ गुस्सा आया और मैं अपनी सीट से
उठ कर उन्हे पुनः रेल के तय नियमानुसार चाय के लिये बोल अपनी सीट पर बैठ गया पर उन
दुष्ट कैटरीन स्टाफ के कानों पर जूं भी न रैँगी। अब तक ट्रेन भी डबरा से 12-15
किमी॰ आगे अनंतपेठ स्टेशन से भी निकल चुकी थी। बमुश्किल 25 मिनिट मे ग्वालियर आने बाला था। अब मैंने भी तय
किया इन धूर्त स्टाफ को कुछ सबक सिखना ही होगा। उन दिनों शताब्दी एक्सप्रेस मे एसी
चेयर कार के पुराने रैक ही लगा करते थे। हर
सीट की एक-दो लाइन के बीच चैन की व्यवस्था होती थी। अधिकतर यात्री जिन्हे दिल्ली तक जाना था अपनी
सीट पर उनींदे बैठे थे। मैंने अपनी सीट के निकट लगी लाल चैन को खींचा। चैन खींचते
ही गाड़ी कुछ ही मिनटों मे खड़ी हो गई। चारों तरफ रेल स्टाफ मे अफरा तफरी मच गई।
टीसी व अन्य स्टाफ हमारे डिब्बे मे आये और ट्रेन रोकने का कारण जानना चाहा। हमने
जब उन्हे पूरा घटनाक्रम बताया तो टीसी स्टाफ ने कैटरीन मैनेजर सहित कैटरीन बॉय की बड़ी लानत
मलानत कर बुरा भला कहा। तुरत फुरत चाय बिस्कुट पेश किया गया और कैटरीन स्टाफ की गुस्ताखी के लिये अनेकों बार
माफी मांगी गई। मै जानता था कि चाय पीने का जो
आनंद हमे यात्रा मे मिलना चाहिए था इन कैटरीन स्टाफ के बेहूदा व्यवहार के कारण उस आनंद से हम वंचित हो
चुके थे और इसी लिए चाय को जल्दी जल्दी पीना पड़ा। हमने कैटरीन मैनेजर से शिकायत
पुस्तिका लाने को कहा। रेल्वे मे जब कभी भी कोई यात्री शिकायत की किताब मांगता है तो
प्रायः संबन्धित स्टाफ शिकायत की किताब देने मे आना कानी करता है। यहाँ भी कैटरीन स्टाफ तमाम माफी मांगते हुए
शिकायत न लिखने का अनुरोध करता रहा। पर रेल प्रशासन की जानकारी मे लाये बिना चैन
पुलिंग की घटना व्यर्थ हो जाती और रेल प्रशासन की नज़र मे उक्त घटना न आ पाती। अतः मैंने सख्त लहजे मे कैटरीन मैनेजर से शिकायत की किताब लाने को कहा और ये भी
कहा यदि आप किताब नहीं देंगे तो मुझे पुनः गाड़ी की चैन खींचना पड़ेगी। किताब पर
मैंने संक्षेप मे शिकायत दर्ज़ की। इन 15-20 मिनिट मे रेल कैटरीन प्रबन्धक एवं तमाम
स्टाफ बचाव की मुद्रा मे खड़ा रहा। कुछ मिनिटों मे ग्वालियर स्टेशन आने बाला था।
इसी बीच ट्रेन के मुख्य टिकिट निरीक्षक भी हमारे डिब्बे मे आ गये और मामले को जान
कर उन्होने भी कैटरीन मैनेजर और स्टाफ को
डांटा। अब तो कैटरीन मैनेजर ने पुनः गलती के लिये माफी मांगी और कहा मै उस कैटरीन
स्टाफ को आज ही सेवा से निकाल दूँगा जिसने हमारे बार बार अनुरोध को नज़रअंदाज़ किया
था।
ग्वालियर स्टेशन आया तो कैटरीन स्टाफ सहित मैनेजर
ने मेरे बार बार आग्रह के बाबजूद मेरे
समान को ट्रेन से उठा कर बाहर तक छोड़ा। सारा स्टाफ हाथ जोड़ अपने क्रत के लिए अफसोस
व्यक्त कर रहा था। ट्रेन से उतरते समय कैटरीन स्टाफ ने जो वीआईपी व्यवहार किया
मानों कोई बहुत विशेष महत्वपूर्ण व्यक्ति ट्रेन से उतरने बाला हो जो मेरे स्वभाव
के विपरीत मुझे असहज स्थिति मे डालने बाला लगा। इस सबका मुख्य कारण मात्र ट्रेन की
चैन खींच कर रोकने के बजह से ही था।
रेल विभाग का तमाम सेवाओं मे निजीकरण की नीति के कारण निजी ठेकेदार और रेल अधिकारियों की मिलीभगत से उपजे भ्रष्टाचार एवं अधिकारियों द्वारा इन ठेकेदारों द्वारा सेवाओं
मे कमी की अनदेखी के कारण आम यात्रियों को इस तरह की सेवाओं से वंचित कर किया जाता
है। इस तरह बदनामी का धब्बा रेल विभाग के मुँह
पर चस्पा कर दिया जाता है। ऐसे ही एक अप्रिय घटना से मुझे बिलासपुर (छत्तीसगढ़) मे रूबरू होना पड़ा था जिसका
उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग "हीराकुंड एक्सप्रेस" (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/11/blog-post_15.html) मे किया था।
हमारी उक्त यात्रा यदि बिना किसी विघ्न-बाधा के
सम्पन्न होती तो शायद याद न रहती पर एक उपभोक्ता के अधिकार के नाते ये यात्रा मेरे
लिये यादगार हो गई।
विजय सहगल














