दुर्बल को न सताइये
भारत
की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी जिन्होने देश पर लगभग सन् 1966 से 1977 तक एवं 1980 से मृत्युपर्यन्त
1984 तक 15 साल शासन किया। अपने तेज
तर्रार व्यक्तित्व एवं तीव्र बौद्धिक क्षमता के लिये लोग उन्हे अब तक याद करते हैं।
1971 मे पाकिस्तान के दो टुकड़े कर अपनी नीति एवं निर्णायक क्षमता का लोहा उस समय
के देश एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर मनवाया। 18 मई 1974 को भारत का प्रथम परमाणु
बम विस्फोट परीक्षण कर भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बनने पर सारे विश्व मे भारत
की कीर्ति पताका विश्व मे लहराई। 1999 मे
बीबीसी द्वारा उन्हे सहस्त्राव्दी की महिला घोषित किया गया। अपने राजनैतिक कौशल की
वजह से विपक्ष के नेता भी उन की तारीफ करते थे। उन्हे सन् 2011 भारत देश के सबसे
बड़े सम्मान "भारत रत्न" एवं 2012 मे बांग्लादेश के सबसे बड़े सम्मान "बांग्लादेश स्वाधीन सम्मान" से
अलंकृत किया गया। उनकी देश भक्ति एवं देश के लिये की गई सेवाओं को सभी लोग आदर और
सम्मान की द्रष्टि से देखते हैं। तत्कालीन
राजाओं का "प्रविपर्स" समाप्त करना और बैकों का राष्ट्रीयकरण भी उनकी
बहुत बढ़ी उपलब्धि रही थी।
पर
25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक अपने स्वार्थ और राजनैतिक अस्तित्व के खातिर न
केवल देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ताक पर रख चुनावों को स्थगित कर दिया बल्कि
विपक्ष के सभी मुख्य-मुख्य नेताओं के साथ साथ उनके लाखों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार
कराया। इस दौरान 21 माह तक आम जनता के सभी
लोकतान्त्रिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया।
श्रीमती
इन्दिरा गांधी के इस कृत की क्या इस कारण
आलोचना नहीं होना चाहिये कि उन्हे "भारत रत्न" सम्मान मिला हैं? आपातकाल के लिये श्रीमती गांधी
की निंदा क्या इसलिये नहीं होनी चाहिये थी कि उनकी देश भक्ति पर किसी को कोई शक था, उन्होने भारत के जन्मजात शत्रु पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये?? आपातकाल के लिये श्रीमती गांधी की भर्त्स्ना क्या इसलिये नहीं होनी चाहिये थी कि उन्होने
भारत को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र के रूप मे स्थापित किया?? लंबे समय ताक देश भक्ति पूर्ण सेवायें देश को
देने के बाबजूद भी श्रीमती इन्दिरा गांधी की आपातकाल लागू करने के कारण 1975 से आज
तक प्रत्येक बर्ष 25 जून को देश मे लोकतन्त्र को नष्ट करने के कारण, आम जनता के संवैधानिक अधिकारों
समाप्त करने के कारण प्रायः
लोकतन्त्र मे विश्वास करने बाले हर व्यक्ति, संस्थान और
राजनैतिक दलों द्वारा उनकी आलोचना होती हैं, निंदा होती हैं, भर्त्स्ना
होती हैं। श्रीमती इन्दिरा गांधी की 16 साल तक प्रधान मंत्री
पद पर दी गई अपनी देशभक्ति, गौरवपूर्ण सेवाओं के बावजूद भी आपातकाल के निर्णय को
न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता था। इसलिये एक ओर जहां उनके देशभक्ति पूर्ण, गौरवशाली और विकासशील कार्यों की प्रसंशा भी होती हैं तो बही दूसरी ओर
उनके अलोकतांत्रिक "आपातकाल" और "गरीबी हटाओं" कार्यक्रम की
असफलता पर उनकी आलोचना एवं निंदा भी होती हैं।
एक
अन्य उदाहरण मेजर लीतुल गोगई द्वारा 10 जुलाई 2017 को सेना द्वारा आतंकवादियों के विरुद्ध की जा रही कार्यवाही मे
बाधा पहुचाने के उद्देश्य से कश्मीरी युवकों द्वारा सेना के जवानों पर पत्थर फेंके
जा रहे थे। चूंकि भटके हुए अपने ही देश के नौजवानों पर गोली चलाने के आदेश भारतीय
सेना को न होने के कारण एक पत्थरबाज
नौजवान को सेना की जीप के सामने बांध कर एक मानव कवच बनाया इससे उस दिन एक अप्रिय
घटना होने से बच गई और पत्थरबाजों की भीड़ ने फिर कोई पत्थरबाजी सेना के जवानों पर
नहीं की। मेजर लीतुल गोगई द्वारा मानव कवच बना कर की गई कार्यवाही को अधिकतर देशवासियों का समर्थन मिला। कुछ
मानवाधिकार संगठनों और कुछ राजनैतिक दलों
द्वारा इस कार्यवाही की निंदा की लेकिन आवाम की आवाज़ के कारण मेजर लीतुल गोगई की
कार्यवाही की सभी लोगो ने प्रशंसा की अन्यथा इस अप्रिय पत्थरबाजी की घटना मे भटके
हुए पत्थरबाज़ कश्मीरी युवकों की गोलीबारी से मृत्यु हो सकती थी। सेना द्वारा भी
अपने मेजर को तत्कालीन परिस्थिति से मानव कवच की रचना मे प्रशंसा मिली। लेकिन
अगस्त 2018 मे सेना के निर्देशों की अवहेलना और अनुशासनहीनता के कारण उनका कोर्ट मार्शल हुआ और यथोचित
कार्यवाही हुई। तो क्या मेजर लीतुल गोगई पर
सेना के आदेश की अवहेलना पर सजा क्या
इसलिये रोकी जानी चाहिये थी या कोई कार्यवाही इसलिये नहीं की जानी चाहिये थी कि
उन्होने मानव कवच के रूप मे एक कश्मीरी पत्थरवाज़ के उपयोग कर अप्रिय घटना को रोका
था। मेजर लीतुल गोगई की प्रशंसा अपने साथी नौजवानों को सूरक्षित करने मे की गई, पर अनुशासन हीनता पर उनके विरुद्ध कार्यवाही भी उचित थी।
26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का एक सुनियोजित कायरता पूर्ण हमला
हुआ था। इस नृशंस हमले मे 26 विदेशी
नागरिकों सहित 166 लोग मारे गए। मुंबई के 5-6 स्थानों मे हुए इस हमले को नियंत्रित
करने मे सुरक्षा बलों को लगभग 60 घंटे का समय लगा। इस आतंकवादी हमले मे विभिन्न
सुरक्षा बलों के 11 अधिकारी भी शहीद हुए। जिनमे से मुख्यतः आतंकविरोधी दस्ते के
प्रमुख श्री हेमंत करकरे भी थे। श्री हेमंत करकरे ने देशभक्ति पूर्ण इस शहादत मे उन्होने अपने प्राणों कि आहुति देकर
सर्वोच्च बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया हैं। 2009 मे श्री हेमंत करकरे को सेना का सर्वोच्च सम्मान
अशोक चक्र, मरणोपरांत
प्रदान किया गया। श्री करकरे का बलिदान एवं देशभक्ति किसी भी शंका से परे
हैं। उनकी देश भक्ति एवं बहदुरी पर हर भारत वासी को गौरव हैं। आतंकवादियों से
संघर्ष करते हुए श्री करकरे ने अपने कर्तव्यों को सेर्वोपरि रखते हुए देश और मुंबई
की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। श्री हेमेंत करकरे के बलिदान एवं देश
भक्ति पर किसी भी भारतवासी को लेशमात्र भी
शक नहीं हैं। अभी हल ही मे 29 सितम्बर 2008 को मालेगांव ब्लास्ट केस मे जमानत पर
रिहा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का बयान/साक्षत्कार प्रसार माध्यमों मे आया, जिसमे साध्वी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा आतंकविरोधी दस्ते के प्रमुख रहे स्व॰
श्री हेमंत करकरे पर संगीन आरोप लगाये गये। उन आरोपों मे साध्वी प्रज्ञा द्वारा
कहा गया कि आतंकविरोधी दस्ते के प्रमुख स्व॰ श्री हेमंत करकरे ने मालेगांव ब्लास्ट
केस मे आधारहीन आरोपों के आधार पर न केवल
झूठा केस दायर किया बल्कि गैर कानूनी तौर पर हिरासत मे रखा एवं पूंछताछ
करते समय हिरासत मे हिंसक तरीके से मारपीट एवं अत्याचार किये गये। आतंकविरोधी
दस्ते के प्रमुख स्व॰ श्री हेमंत करकरे एवं उनकी टीम ने लगातर 23-24 दिन तक दिन
रात मारपीट की एवं एक औरत की अस्मिता के विरूद्ध गाली गलौज भाषा का इस्तेमाल किया।
तत्कालीन राजनैतिक प्रभाव बाले श्री चिदंबरम एवं श्री दिग्विजय सिंह द्वारा अपने
प्रभाव का दुर्पयोग कर हिन्दू आतंकवाद शब्द को गढ़ा गया। इतिहास इस बात का गवाह हैं
जब जब राजनैतिक नेताओं और ब्यूरोक्रेसी के बीच ठकुर सुहाती हो जाय तो दोनों की सांठगांठ
से देश के कानून का दुर्पयोग कर किसी
व्यक्ति या संस्थाओं के विरूद्ध बदले की भावनाओं से कार्य करने की आज़ादी राजनैतिक
नेताओं और ब्यूरोक्रेसी को मिल जाती हैं। साध्वी के केस के संबंध मे भी ऐसा कुछ
हुआ हैं? जिसके संबंध मे विस्तार पूर्वक जांच होनी चाहिये। ये
एक मानवीय कमजोरी हैं जब किसी अवला नारी के विरूद्ध लगातार 24-25 दिन
तक गैर कानूनी मारपीट, हिंसात्मक शारीरिक उत्पीढन किया जाये
तो औरत तो क्या कोई भी मजबूत से मजबूत कद
काठी के पुरुष के विरूद्ध भी ऐसी हिंसा हो
तो पीढ़ा देने बालों के विरूद्ध पीढ़ित की यही बददुआ निकलती जिसे कबीर दस जी ने अपने
इस दोहे मे उद्धरत किया हैं:-
दुर्बल को न सताइये, जा की मोटी हाय ।
बिना जीव की श्वास सौं, लोह भसम हो जाय ॥
बिना जीव की श्वास सौं, लोह भसम हो जाय ॥
अर्थात:- संत कबीर दास जी कहते हैं कि
शक्तिशाली व्यक्ति को कभी अपने बल के मद में चूर हो कर किसी दुर्बल पर अत्याचार
नहीं करना चाहिए क्योंकि दुखी ह्रदय कि हाय बहुत ही हानिकारक होती है। जिस प्रकार
लोहार कि चिमनी निर्जीव खाल होते
हुए भी लोहे को भस्म करने कि शक्ति रखती है ठीक उसी प्रकार दुःखी व्यक्ति कि
बद्दुआओं से अत्याचारी का
नाश हो जाताहै ।
कहने का तात्पर्य यह है कि भारत जैसे
लोकतान्त्रिक देश मे स्व॰ श्री हेमेंत करकरे कि शहादत और उनके वीरता पूर्ण कार्य
को जिसमे उन्होने देश कि रक्षा हेतु अपने प्राणों कि आहुति दी उनकी इस शहादत को हर
भारतीय सिर झुका कर नमन करता हैं, किन्तु क्या उनके द्वारा यदि एक महिला साध्वी के
विरूद्ध गैर कानूनी शारीरिक हिंसा एवं मानसिक यंत्रणा दी गयी हो तो इस कृत के लिये
क्या उनकी "आलोचना" या
"निंदा" नहीं की जानी चाहिये?? यह एक विचारणीय
प्रश्न हैं????
विजय
सहगल
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