"गाँव का मेला"
दौड़
दौड़ बच्चों का रेला।
चला
देखने गाँव का मेला॥
नंदू, मुन्ना,
चुन्नू आगे।
देख
हिंडोला सरपट भागे॥
नीचे-उपर, उपर-नीचे।
हंसी-ठिठोली
पर आंखे मीचे॥
उपर से जब नीचे आते।
गुद-गुदी
तब रोक न पाते॥
हाल
सभी का, यहीं अकेला।
चला
देखने गाँव का मेला॥
भालू
नाचा, बंदर आया।
मदारी
ने जब खेल दिखाया॥
बंदर
की थी चाल अनूठी।
बंदर
की जब बंदरिया रूठी॥
लाठी
टेक जब चरखा चलाया।
भालू
ने भी खूब रिझाया॥
दिया
सभी ने पैसा-धेला।
चला
देखने गाँव का मेला॥
सर्कस
मे भी भीड़ बड़ी थी।
लंबी-लंबी
लाइन खड़ी थी॥
शेर
दहाड़ा, ऊट भी जागा।
कड़दम-कड़दम
घोड़ा भागा॥
जोकर
की जब बारी आई।
हाथ
छोड़ के कार चलाई॥
हाथी
ने फुटबाल से खेला।
चला
देखने गाँव का मेला॥
हाथों
मे थे रंग रँगीले।
लाल
हरे गुब्बारे पीले॥
गर्म
जलेबी, मुँह को आती।
बर्फ
की चुस्की, मुन्नी खाती॥
गुड़िया
के थे मीठे बाल।
बच्चों
ने भी किया धमाल॥
खत्म
हुआ था रेलम-पेला।
चला
देखने गाँव का मेला॥
-विजय सहगल

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