बुधवार, 17 अप्रैल 2019

स्कूल


"स्कूल"


उठो-उठो हे शंकर-भोला।
निकला सूरज कनक का गोला॥
भोर हुई हैं, चिड़ियाँ जाती।   
काली कोयल राग सुनाती॥
मोर नाचती, कौआ गाता।
मुर्गा "कूकड़ू" बांग लगाता॥
दौड़ लगाओ, होला होला।
उठो-उठो .....................

जैसे जैसे सूरज उगता।
बच्चे लेकर अपना बस्ता॥
दौड़ लगा  स्कूल को जाते।
हाथ जोड़ कर लाइन लागते॥
देर से हैं, जो बच्चे आते।
पीछे अपनी लाइन लगाते॥
हर बच्चे के हाथ मे एक-एक, मास्टर जी का डंडा बोला।  
उठो उठो .......................

कक्षा मे क-ख-ग पढ़ते।
एक-से-सौ की गिनती चढ़ते॥
जोड़, घटाना,  गुणा, भाग।  
दिनभर करते  इसको याद॥
बारह इंच का एक फुटाना।
एक रुपये मे सोलह आना॥
दो से दस तक पहाड़ा बोला।
उठो उठो .......................

खाने की जब छुट्टी होती।
धक्कम-धुक्का, लत्तम-लोती॥ 
खेल कबड्डी, छुआ-छूअल्ल।
कमल-मुरारी, धूल-धुअल्ल॥
छुट्टी मे  जब घर को जाते,
पीठ पे पड़ता, छड़ी  का शोला।
उठो उठो .........................

विजय सहगल

 

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