रविवार, 7 अप्रैल 2019

"स्ट्रॉंग रूम "


"स्ट्रॉंग रूम "

हम कॉलेज टाइम से सुनते आये हैं कि परमाणु बम्ब सम्पन्न देशों  के राष्ट्रप्रमुख  और उपराष्ट्रप्रमुख  कभी भी एक साथ देश के बाहर  यात्रा पर नहीं जाते क्योंकि परमाणु बम का बटन या रिमोट कंट्रोल उन दोनों के पास रहता हैं। ताकि देश को आपात काल या आकस्मिक आवश्यकता के समय परमाणु हथियार का स्तेमाल की आवश्यकता पड़ने पर उसके स्तेमाल के लिये दोनों मे से कोई एक उपस्थित रह सके।  यह कहाँ तक सच हैं नहीं मालूम पर ये बिलकुल सच हैं कि बैंक के सेफ और स्ट्रॉंग रूम के गेट की डुप्लिकेट चाबियों के सेट को कभी भी उसी शाखा मे किसी भी कीमत पर एक साथ नहीं रखते हैं। प्रत्येक  बैंक की सुरक्षा नीति को मद्देनज़र यह स्पष्ट आदेश हैं। हम लोग शाखा निरीक्षण शुरू करते समय सबसे पहले डुप्लिकेट चाबियों के सेट को मंगा कर चाबियों की अदला-बदली कर शीघ्र से शीघ्र सील पैक कर बापस अन्य शाखा मे सुरक्षित सुपुर्दगी हेतु उसी दिन हर हालत मे भेज देते हैं। इस  बारे मे लगभग सभी अधिकारी-कर्मचारी जो थोड़ा बहुत भी सेवा का अनुभव रखते हैं इस प्रिक्रिया  से भलीभाँति परिचित हैं। पर कभी कभी हमारे साथी इस की गंभीरता को नजरंदाज कर न केवल बैंक द्वारा निर्धारित नीतिगत आदेश की अवहेलना करते हैं बल्कि बैंक की सुरक्षा को संकट मे डाल देते हैं। बैंक की चाबियों के खोने की तरह-तरह की घटनायें यदा कदा सुनने मे आती रहती हैं।  एक शाखा के निरीक्षण मे पाया गया कि उनके पास डुप्लिकेट चाबियाँ कहाँ किस शाखा मे रक्खी हैं कोई रिकॉर्ड ही नहीं हैं। मैनेजर,कैशियर या अन्य संबन्धित स्टाफ  को भी नहीं मालूम कि चाबियों का दूसरा सेट किस शाखा मे रखा हैं। तमाम खोजबीन के बाद भी कोई सुराग न मिल पाने के कारण चाबियों की अदला-बदली ही नही की जा सकी!!  

एक बार तो एक शाखा मे  लापरवाही की पराकाष्ठा सामने आयी। हमारी एक शाखा  नये भवन मे स्थानांतरित होकर आई थी। कुछ  ही दिन हुए थे। सेफ को तो नये परिसर मे ले जया गया इसलिये उस सेफ की डुप्लिकेट चाबियाँ तो अन्य शाखा मे रखी थी। पर  चूंकि नये शाखा परिसर मे नया स्ट्रॉंग रूम लगा था उसकी डुप्लिकेट चाबियों के सेट को दूसरी शाखा मे नही  रखा गया। स्ट्रॉंग रूम की चाबियों को दूसरी शाखा मे न रखा जाना संबन्धित स्टाफ की  घोर लापरवाही थी और इस संबंध मे  बैंक के निर्देशों की अवहेलना कर स्ट्रॉंग रूम की डुप्लिकेट चाबियाँ को शाखा के कैश सेफ मे ही  रख दिया गया। ये एक गंभीर चूक थी। स्ट्रॉंग रूम की आरिजिनल चाबियों से शाखा के कार्य समय पश्चात बंद कर दिया गया। कहते हैं कि मुसीबत समय देख कर नहीं आती,  उस दिन भी ऐसा ही हुआ। कुछ ऐसा दुर्भाग्य रहा, मुख्य खजांची महोदय से बैंक की समस्त  चाबियों का सेट घर जाते समय रास्ते मे कहीं गुम हो गया। स्थिति गंभीर थी। स्ट्रॉंग रूम की डुप्लिकेट चाबियाँ कैश सेफ मे पहले से ही बंद थी। प्रादेशिक कार्यालय को सूचित किया गया। चाबियाँ गुम होने की रिपोर्ट दर्ज़ कराई गई। अब सवाल था इस स्थिति से कैसे निपटा जाए। गोदरेज कंपनी से संपर्क करने पर निष्कर्ष निकला कि स्ट्रॉंग रूम की दीवार को सेंध लगा कर तोड़ा जायेगा  तब उस दीवार मे इतना बड़ा छेद किया जा सके ताकि आदमी उस छेद मे से स्ट्रॉंग रूम मे प्रवेश कर सके और सेफ को डुप्लिकेट चाबियों के माध्यम से खोला जा सके और स्ट्रॉंग रूम की डुप्लिकेट चाबियों से स्ट्रॉंग रूम खोला जा सके। ये एक पेचीदा काम था  पूरी तरह सामान्य स्थिति मे आने मे  जिसमे 3-4  दिन का समय  लग सकता था। तत्काल दो गार्ड की 24 घंटे रात-दिन की  ड्यूटि लगाई गई। एक-दो गार्ड को प्रादेशिक कार्यालय  से बुलवाया गया। छुट्टी बाले दिन चार पाँच मजदूरों ने ड्रिल मशीन जो कि पहाड़ मे होल करने के कार्य मे स्तेमाल होती थी की  सहायता से स्ट्रॉंग रूम  दीवार मे सेंध लगा कर  दीवार को तोड़ कर एक बड़ा सा छेद बनाया, गैस काटने बाली मशीन से दीवार के बीच मे स्थित लोहे की बीम को काटा गया ताकि एक आदमी उस छेद के माध्यम से स्ट्रॉंग रूम के अंदर जा सके। इस कार्य मे दिन भर लग गया तब कहीं जा कर दो आदमियों  स्ट्रॉंग रूम मे प्रवेश कराया गया। उन लोगो ने कैश सेफ  की डुप्लिकेट चाबियों से  सेफ को खोला उसमे से स्ट्रॉंग रूम गेट की डुप्लिकेट चाबियों को निकाल कर स्ट्रॉंग रूम को खोला। पर अभी तो आधा ही कार्य हुआ था। अभी स्ट्रॉंग रूम की टूटी हुई दीवार को ठीक कर बापस पूर्व की स्थिति मे लाना था ताकि सुरक्षा की द्रष्टि से दीवार पहले की ही तरह मजबूत हो। इंजीनियर की देख रेख मे उक्त कार्य सम्पन्न कराया गया। जिसका प्रमाणीकरण दूसरे इंजीनियर ने किया इस तरह  स्ट्रॉंग रूम की दीवार की मरम्मत का कार्य सम्पन्न हुआ। सेफ और स्ट्रॉंग रूम गेट की सारी चाबियों के सारे लॉक बदले गये तब शाखा का कार्य पुनः सामान्य तरीके चालू हो सका।

एक छोटी सी चूक या लापरवाही की बजह से न केवल बैंक को आर्थिक हानि उठानी पड़ी बल्कि बैंक को  पुनः सामान्य स्थिति तक लाने मे  लगभग एक  हफ्ते का समय भी व्यय हुआ। यध्यपि बैंक ने इस संबंध मे नियमानुसार कार्यवाही कर संबन्धित लोगो के विरुद्ध कार्यवाही की पर बैंक द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों को न मानने की एक कड़ी सीख सभी स्टाफ को सीखने को मिली।
कहने का तात्पर्य यह है कि बैंक कि चाबियाँ परमाणु बम्ब बेशक न सही पर बैंक की कार्यप्रणाली के मद्देनजर परमाणु बम्ब से कम भी नहीं हैं। बस फर्क इतना है कि परमाणु बम्ब के संदर्भ के लिये "दोनों राष्ट्र प्रमुख एक साथ  देश के बाहर नहीं जा सकते" और बैंक के संदर्भ के लिये "दोनों चाबियों एक-साथ बैंक के अंदर नहीं आ सकती"।  

विजय सहगल

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