आन
पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं ॥
कल
कल, झर-झर नदियाँ बहती।
ईश्वर
का संदेश ये कहती॥
जीवन
जल हैं, जल ही जीवन।
अमृत
पीकर महके उपवन॥
संरक्षित
कर बूंद-बूंद को, इस धरती की प्यास बुझाओं।
हम
बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।
आन
पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं॥
धरती
माँ के आंचल से हम, अन्न-धन्न फल फूल हैं पाते।
मानव, जलचर
पशु-पक्षी सब, अपनी-अपनी भूख मिटाते॥
श्वास-श्वास
में इन सब की तुम, प्राण वायु बन करके आये।
जीवन
चक्र की इस रचना को, हर क्षण हर पल गति मे लाये॥
मंद-मंद
ठंडी बयार से निर्जन-बन, जीवन
बिखराओं।
हम
बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।
आन
पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं॥
खुला
गगन संदेश ये देता, बनो विशाल जीवन प्रणेता।
"रवि" ऊर्जा से भरपूर, सदा निरंतर ऊष्मा देता॥
नभ
मे तारे, परमेश्वर का घर।
देते
शक्ति
अनंत, भास्कर॥
कर्मों
के कुरुक्षेत्र मे पावन, पावक अजर अनल दहकाओं।
हम
बच्चे बगिया के तेरी, फूलों सा हमको महकाओं।
आन
पड़े विपदा जब भारी, आंचल को अपने लहराओं॥
विजय
सहगल

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