मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

गढ कुण्डार का किला










                                                        "गढ कुण्डार का किला"
9 दिसम्बर 2018  को जब मैंने  गढ कुण्डार का किला देखा जो झाँसी के पास हैं, इस शानदार इमारत को देखने मे हमे 60 साल लगे जिसका हमे बेहद अफसोस है!! चलिये आप को हम गढ कुण्डार का किला लिये चलते हैं। "गढ कुण्डार का किला" पर  एक इतिहासिक उपन्यास भी हिन्दी साहित्यिक जगत के मूर्धन्य उपन्यासकर स्व॰ व्रंदावन लाल वर्मा दुवारा लिखा गया हैं जो उपन्यास जगत मे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं।  गढ कुण्डार का किला झाँसी से लगभग 45-50 कि॰मी॰ दूर खजुराहो रोड पर निवाड़ी जिला टीकमगढ़ मे हैं। कहते हैं 1182 ई॰ मे इस किले का निर्माण महाराज खेत सिंह खंगार ने कराया था जिसे पर  बाद मे बुंदेले राजाओं ने विजयी  प्राप्त की। गढ कुण्डार का किला  एक ऐसी इतिहासिक इमारत हैं जो आज से लगभग 1000 साल पूर्व अपने वैभवशाली गौरव की गाथा कह रहा है। एक   अनखोजी ऐसी पुरातत्व धरोहर जिसे दिल्ली या आसपास के लोगो दुवारा  बहुत कम खर्च पर एक दिन मे देखा जा सकता हैं। इस स्थान पर न के बराबर पर्यटक आते हैं। इस का मुख्य कारण म॰प्र॰ सरकार दुवारा इस पर्यटन स्थल का प्रचार-प्रसार न करना और सड़क के छोटे टुकड़े (लगभग आधा कि॰मी॰) का निर्माण नहीं करना और चाय पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव हैं।  मैं अपनी मोटरसाइकल से  झाँसी से प्रातः 10 बजे के आसपास गढ कुण्डार के किले को देखने रवाना हुआ।  प्रातः की हल्की सर्दी मे मोटरसाइकल की यात्रा सुनहरी धूप मे बड़ी बड़ी सुखद थी। झाँसी से 15 की॰मी॰ तक यात्रा आराम से मध्यम गति से तय की। उ॰प्र॰ की सीमा समाप्त होने पर म॰प्र॰ की सीमा शुरू होती ही, धूल धूसरित  वातावरण इस बात का एहसास आप को सहज ही करा देता हैं। 5-6 कि॰मी॰ लंबी सड़क के दोनों ओर काफी संख्या मे क्रेसर मशीने  पत्थरों को तोड़ कर गिट्टी का निर्माण कर वातावरण को दूषित-प्रदूषित कर नियम कानून की धज्जियां उड़ा रहे थे। बड़े-बड़े ड्ंपर वेलगमा यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे। कहीं भी नहीं लगा की म॰प्र॰ सरकार का कहीं शासन-प्रशासन यहाँ हैं। इस छोटे से टुकड़े को  छोड़ दे  तो सड़क के  दोनों ओर हरे भरे  जंगल यात्रा को सुखद बना रहे थे।  सैकड़ों की संख्या मे पौधशालये, बरुआसागर (उ॰प्र॰) कस्बे की मौजूदगी सुंदर सुंदर पेड़-पौधों की नर्सरी के रूप मे करा रही थी। बड़ी संख्या मे लोग सुंदर सजावटी पौधो की खरीद कर रहे थे। बरुआ सागर शहर अदरक उत्पादन का भी एक बड़ा केंद्र हैं जिसका उत्पात देश मे दूर-दूर स्थानो तक प्रेषित किया जाता हैं। यहाँ से म॰प्र॰ के निवाड़ी शहर 5-7 की॰ मी॰ दूर हैं जहाँ से हमे मुख्य मार्ग को छोड़ कर बायीं ओर 18 की॰मी॰ और आगे जाना था जिसकी सूचना  दिशा सूचक बोर्ड के माध्यम से पर्यटकों को दी जा रही थी। उक्त 18 की॰मी॰ सड़क पर  दिल्ली-नोएडा के मुक़ाबले लगभग न के बराबर ट्रैफिक मे 25-30 कि॰मी॰ की गति से मोटरसाइकल के चलाना एक आजाद पंछी की तरह उड़ने का सुखद अहसास खुशी देने बाला था।   उप सड़क मुख्य सड़क से भी अच्छी नज़र आ रही थी जो सीमेंट से बनी हुई थी हमे लगा म॰प्र॰ सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये गढ कुण्डार किले को  पर्यटन के नक्शे पर लाना चाह रही होगी। इस किले की एक बहुत विशेषता है कि गढ कुण्डार से 5-6 की॰मी॰ दूर से ही किले की सुंदर इमारत ऊंची पहाड़ी पर साफ नज़र आने लगती हैं (चित्र1)पर जैसे ही आप  कुण्डार गाँव मे पहुचते हैं किला नीचे से नज़र नहीं आता। म॰ प्र॰ सरकार की नियत भी यहीं से नज़र आने लगती हैं।  जब  कुण्डार गाँव से कुछ पहले एक बोर्ड मुख्य सड़क से बायी ओर मुड़ने का इशारा करता हैं। लेकिन कोई पक्की या अध-पक्की सड़क न दिखने के कारण हम ये सोच कर उसी सड़क पर आगे बढ़ गये लेकिन बायी तरफ कोई सड़क नहीं दिखाई दी!! तब हमने एक ग्रामीण से किले का रास्ता पूंछा तो उसने बताया की आप रास्ता पीछे छोड़ आये हैं। हम बापस आये और उस पूर्ण तया: कच्चे  रास्ते पर जब बढ़े तो लगा कहाँ एक सड़क आगे दूर दूर सीमेंट से बनी दीख रही थी बही दूसरी ओर गढ कुण्डार किले को जाने बाली सड़क सीमेंट या डामर की न होकर महज़ पगडंडी बाली कच्ची सड़क हैं, जो शायद पर्यटकों को  इस बात का अहसास कराती है कि सड़क मतदाताओं के लिये है जो वोट देते हैं पर्यटक वोट नहीं देते?  आगे पहाड़ी पर जाने के लिये तो रास्ता  और भी गया वीता था। जहाँ तहाँ पड़े फिसलन भरे छोटे-बड़े कंकर पत्थरों की पगडंडी 150-200 मीटर रही होगी, यहाँ तो पैदल चलना भी कठिन था । प्रदेश सरकार और  पर्यटन विभाग की घोर लापरवाही पर धिक्कार करने के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा था। जैसे तैसे इन कठिनाइयों को पार करने पर पक्की सीढ़ियो देख कर सारा क्रोध काफ़ूर हो गया। सीढ़ियो के पार करने पार एक विशाल दरवाजे की बहुत विशाल एवं सुंदर निर्माण देखते ही बनता था जो गढ कुण्डार किले का मुख्य दरवाजा था (चित्र2)। मुख्य दरवाजे मे प्रवेश करने पर बड़ी दालानों से होकर मुख्य प्रांगढ़ मे पहुँचा जा सकता हैं। उक्त किला 8 मंज़िला इमारत हैं। नीचे की तीन मंजिलों को सुरक्षा की द्रष्टि से बंद कर दिया गया हैं। कहते हैं की एक बार इस किले मे एक बारात नीचे के तहख़ानो मे घूमने गई थी फिर कहाँ खो गई आज तक पता नहीं चला!! यहाँ आने के पूर्व हमारे एक मित्र श्री के॰ सी॰ रामपुरिया से यहाँ आने के बारे मे जानकारी की लिये मोबाइल पार बात की, जो  झाँसी शाखा मे कार्यरत हैं और गढ कुण्डार के पास निवाड़ी के रहने वाले हैं। उन्होने भी हमे आगाह कर भुतहा  किले के   नीचे न जाने के लिये कहा था? इन दालानों पार कुछ सीढ़िया ऊपर चढ़ने पार एक विशाल आँगन मे पहुँचा जाता है जिसके चारों ओर बड़े बड़े महल और कमरे बने हुए थे जो राजाओं के दीवान और मंत्रियों के रहे होंगे (चित्र 4 एवं 6)।  कर्मचारी  प्रमोद रजक दुवारा किले का विवरण अच्छे ढंग से दिया गया। एक मंदिर का विशाल प्रांगण जो मंदिर सा प्रतीत होता हैं(चित्र 5)। एक विशेष निर्माण जो आज कल के इमोजी जैसा था आश्चर्य करने बाला था(चित्र3)।  जिसमे दो आंखो के नीचे खुला मुह जैसा प्रतीत होता हैं। विशाल आँगन मे एक कोने मे अन्न पीसने की चक्की बनी है जिसे चार-पाँच व्यक्ति एक साथ चलाते थे। वही दूसरी ओर विशाल हवन कुंड वना हैं इसके ऊपर मुख्य जजमान के बैठने का चबूतरा हैं जिसपर बैठ कर हवन की आहुतियाँ कुंड मे दी जाती थी। आँगन के चारों तरफ बने कमरों, दालानों के ऊपर चारों कोनों मे बने महल नुमा आकृतियाँ राजाओं और राजकुमारों की रही होंगी। इन चार निर्माणों मे एक महल के ऊपर दो मंज़िला निर्माण और था जो शायद राजा का निवास रहा होगा (चित्र 10)। किले मे पीने के पानी की व्यवस्था गुप्त तहख़ानो से बाबड़ी से लाने ले जाने की थी। बाबड़ी मे पानी नीचे तालाब और वर्षाती पानी से एकत्रित कर की जाती थी। गढ कुण्डार का  किला एक समृद्धशाली इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। एक सुंदर और शानदार किला जो दर्शनीय स्थल जो बुंदेलखंड के इतिहास मे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता  हैं।
बापसी मे एक उम्रदराज महिला को उसके वजन से ज्यादा वजन की लकड़ी को सिर पर ढोकर ले कर जाना हृदय को द्रवित कर गया। जब मैंने उससे पूंछा सरकार की व्रद्धावस्था पेंशन मिलती हैं या ऐसा कोई  बैंक खाता भी हैं। तो उसने बताया की न तो उसको कोई पेंशन मिलती हैं या खाता हैं और बगैर मेहनत के कैसे उस का गुजारा होगा? उसका उत्तर हमारी व्यवस्था और जनधन खाते रूपी विकास पर एक तमाचा हैं! (चित्र 11)
विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

Madhav Kumar ने कहा…

आदरणीय सहगल जी। आपने बिल्कुल सही तरीके से फ़ोटो और वर्णन किया है।
आपका ब्लॉग आज पहली बार पढ़ा और आपकी लेखनिबक मुरीद हो गया।
सच में बेहतरीन लेखन और फोटोग्राफी है आपकी।

Chander Kumar Santani ने कहा…

बढ़िया जानकारी chander Santani.blogspot.com