शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

सुंदर-सौम्य-सुशील महिला


सुंदर-सौम्य-सुशील महिला

मेरे मित्र हैं श्री शर्मा जी जिनकी ससुराल भी हमारी ससुराल की तरह ललितपुर मे हैं। सपत्नीक रायपुर मे मेरे घर मिलने आये। चान्स की बात उस दिन मेरी शादी की सालगिरह थी। उनकी पत्नी और उन्होने ने हम दोनों को शादी की सालगिरह की मुबारकबाद दी। मेरी पत्नी और मैंने उनको धन्यवाद कहा। जैसा की आमतौर पर चलन हैं पत्नी ने कहा "12 साल कैसे निकल गये पता ही नहीं चला"। मैंने भी धीरे से चुटकी ली "हाँ तुम्हें क्यों पता चलेगा, अरे हमसे पूंछों शादी के बाद का एक एक दिन अंगुलियों पर याद हैं"! सुन कर सभी लोग ठहका लगाने लगे। उनकी पत्नी ने ये घटना हू-व-हू लिख कर मासिक पत्रिका सरिता मे लिख भेजी। किस्सा सरिता पत्रिका मे प्रकाशित हुआ और श्रीमती शर्मा पुरुस्कार पा गई।
एक बार शायद 1990 या 1991 मे  शादी की साल गिरह पर हम लोगो ने बाहर होटल मे खाना खाने का प्रोग्राम बनाया। उस समय मैं नया बाजार शाखा ग्वालियर मे कार्यरत था।  फूल बाग के सामने एक होटल मे हम लोग अपने बड़े बेटे के साथ जो उस समय 5 साल का था  खाना खाने पहुँचे। खाने का मैन्यू  फ़ाइनल कर वेटर को ऑर्डर दे दिया। बीच खाने मे मुझे याद  आया ऑफिस से आकार  कपड़े बदलते समय पर्स तो घर पर ही रह गया! अब तो हालत खराब हो गई, खाना अचानक गले मे ही अटक गया। क्रेडिट/डेबिट कार्ड का चलन था नहीं। मोबाइल तो दूर की बात लैंड लाइन फोन भी ज्यादा नहीं हुआ करते थे। क्या करे समझ नहीं आ रहा था। अपने आपको सयंत कर हमने खाना जारी रखा और पत्नी से भी ऐसा करने को कहा। खाने के बाद वेटर मीठे/आइसक्रीम के लिये पूंछने आया श्रीमती जी ने मना करना चाहा पर मैंने आइसक्रीम  का भी ऑर्डर दे दिया। ऑर्डर देने के बाद पत्नी ने कुछ गुस्से मे कहा बैसे ही पैसे नहीं हैं और बिल क्यों बढ़ा रहे हों? मैंने कहा "नाश सो सवा-सत्यानाश", जो समस्या 100 रुपये मे होगी वही सवा सौ मे होगी, क्यों न  आइसक्रीम भी खाई जाए। मैंने हँसते हुए  कहा  वर्तन यदि 100/- रुपये के बिल न देने पर धोने पड़ेंग तो सवा सौ के बिल पेमेंट न देने पर भी धोने पड़ेंगे?? इसी उधेड़-बुन मे वेटर से बिल मंगाया जो 150-200 का रहा होगा।  मैं बिल लेकर काउंटर पर बैठे होटल मैनेजर के पास गया, उसे अपना परिचय दिया और बताया की मैं ओरिएंटल बैंक मे कार्यरत हूँ और अपने पर्स के न होने की समस्या बताई। मुझे अंदर ही अंदर  लगा मैनेजर हमे बुरा-भला, बहाने बाज बताकर झगड़ेगा या बुरा व्यवहार करेगा। लेकिन जब उसने बैंक का नाम सुना तो बोला अरे ओ॰ बी॰ सी॰ मे तो मेरा छोटा भाई  अशोक मेहता काम करता हैं!! सुनकर मैं हतप्रभ रह गया और अंदर ही अंदर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, कि आज तो भगवान ने लाज रख ली नहीं तो पता नहीं कैसी परिस्थिति बनती। मैनेजर श्री मेहता जी से फिर तो काफी बाते  हुई। उन्होने कुछ नगद और भी देने की पेशकश की कि शायद कही बाजार आदि जा रहे हो तो आवश्यकता पड़े? लेकिन हमने उन्हे धन्यवाद कह कर सीधे घर की ओर रुख किया और दूसरे दिन होटल बिल का भुगतान किया।  
कुछ महिलाओं की आदत हैं जब कभी भी बात करों,  भगवान से पति पत्नी के रिश्तों की दुहाई देंगी। ऐसे ही एक बार किसी पारिवारिक समारोह मे सभी लोगो के सामने पत्नी बोली हम तो ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि   हमे तो सात जन्म तक इनकी ही पत्नी बनाना।  मैंने बहुत ही गंभीरता पूर्वक कहा " भाई -भतीजा बाद की हद हैं, हर बार हर जन्म मे तुम ही पत्नि के रूप मे क्यों? कभी दूसरी को भी तो मौका मिलना चाहिये! अरे कटरीना-करीना भी तो इंतजार कर रही होंगी उन्हे भी तो मौका मिलना चाहिये अगले जन्म मे या तुम्ही तुम सात जन्मों तक मेरा पीछा नहीं छोड़ोगी!!
बातें तो कोई हमारी श्रीमती से सीखे। जब कभी हमे धमकाना हो तो बात बात मे बोलती " हमे ऐसा बैसा मत समझना बी॰ के॰ कंचन की बेटी हूँ।" (बी॰के॰ कंचन मेरे फादर इन लॉं का नाम हैं) एक बार गुस्से मे मैंने भी जबाब दे दिया बी॰ के॰ कंचन कोई बहुत बड़ी तोप हैं क्या? क्या कर लेंगे बी॰ के॰ कंचन- बी॰ के॰ कंचन। अब तो ये धमकी बाला अस्त्र श्रीमती जी के  काम नहीं आया। श्रीमती जी ने कुछ दिन बाद एक नया डायलोग की खोज कर ली। कहीं कुछ बात पर धमकी भरे लहजे मे  मेरी माँ का नाम लेते हुए वह बोली "ऐसा बैसा मत समझना", "श्रीमती शीला सहगल"  की बहू हूँ।  अब जब उसने मेरी माँ का नाम देकर मुझे डराया तो  सुनकर मैं भी भौचक्का रह गया और चुप रहा और  धमकी के आगे कुछ नहीं बोल पाया।
कभी-कभी कुछ ऐसे व्यक्तित्व नज़र आते हैं जो अपनी बोलचाल या पहनावे के कारण सहज़ ही आपको प्रभावित कर देते हैं।  एक दिन तो हद हो गई झाँसी मे मैं अपने घर के बाहर हमारे किरायेदार की दुकान पर बैठा था जो बाजार मे हैं। मैंने बड़े आदर-सम्मान भाव से देखा 60-70 मीटर दूर  मंदिर के पास से एक सौम्य, सुंदर  महिला पूर्णतयः भारतीय परिवेश, प्रभावशाली व्यक्तित्व, सिर पर पल्लू डाले चली आ रही हैं। दिल मे लगा किसी सभ्य परिवार की बहू अपने रिशतेदारों के साथ शायद बाजार से  आ रही हैं। दिल के किसी कोने मे उस महिला और उसके परिवार के भाग्य को सराहता हुआ उधेड़-भुन मे सोच रहा था कि कितने सौभाग्यशाली परिवार होगा जिसे इतनी सौम्य सुंदर बहू मिली। एक आदर्श स्त्री की कल्पना उस समय मन मे चल रही थी।  परन्तू ये क्या जैसे जैसे वो नजदीक आई मैं दंग रह गया वो तो मेरी श्रीमती जी हैं!! दिल ही दिल मे अनजाने मे मिली इस खुशी से अपने आप पर आई हंसी को रोक नहीं पाया।     
मेरी शुरू से आदत रही हैं प्रत्येक माह मे एक निशित राशि वेतन से निकाल कर पत्नी को देता रहा हूँ। ये राशि समय,  पद, के हिसाब से उसी तरह बढ़ती रही जैसे  बैंक मे  हमारा वेतन "वेतन-समझौते" के हिसाब से बढ़ता रहा। बीच बीच मे इस निश्चित-वेतन राशि के अतिरिक्त जिस अदा से वह पैसे मांगती है वह देखते ही बनती हैं। जब वह बड़ी स्टाइल मे कहती तुम्हारे बीबी-बच्चे खुश रहे 2000/- रूपाय देदे या  4000/- देदे। इस तरह वेतन के अतिरिक्त राशि की मांग समय समय पर  प्रायः की जाती।  कौन कठोर होगा जो  ऐसी हसीन मांगने बाली को 4-5 हजार रूपय देने से मना कर सकता हैं? बो तो धन्य हो नरेंद्र मोदी की नोट-बंदी नीति का  जब इस "मांगने बाली" की जोड़ी गई रकम का पता चला।  
तमाम मुद्दों पर हमने आपसी सहमति विकसित कर ली थी, जिसमे सबसे बड़ी थी लेट्रीन पॉट की सफाई और हमारे घर की विदेश नीति, क्या होगी, पाकिस्तान के साथ हमारे घर और देश की नीति क्या होगी, रेल-बजट, आम बजट  आदि आदि, जिसकी ज़िम्मेदारी हमने ले ली थी बाकी सभी छोटी-मोटी  जिम्मेदारियाँ हमारी श्रीमती जी ने सम्हाल ली थी, जैसे खाना, राशन, साफ सफाई, रोजाना के खर्च,  रिश्तेदारी मे लेन-देन  आदि सभी कुछ श्रीमती जी की  ज़िम्मेदारी थी। जब कभी भी वह ज्यादा काम की शिकायत करती तो हमारा रटा-रटाया जबाब होता चलो कल से हम अपने काम आपस मे बदल लेते हैं। कल से लेट्रिन की सफाई तुम्हारी!! ये सुनते ही उस की शिकायत बापस हो जाती। 
पत्नि के साथ  छोटी छोटी, मीठी-मीठी  नोक-झोंक मे हमरे सफल वैवाहिक जीवन का सफर यों ही चल रहा हैं  जिसने हमारे वैवाहिक जीवन को  बेइंतह खुशियों से भर दिया। हम उसका आभार व्यक्त करते हैं कि उसने हमसे ज्यादा, जी  हाँ हमसे ज्यादा हमारे माँ-पिता को प्यार और सम्मान देकर   एक आदर्श बहू का परिचय दिया। हमने अपने माता-पिता के चेहरे पर अपनी पत्नी के साथ होने पर जो खुशी देखी हैं वह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरी पत्नी का  प्यार और सम्मान मेरे माता  पिता के प्रति हमसे अधिक रहा हैं, तभी जब कभी भी हमारे माता-पिता सागर, ग्वालियर, भोपाल, रायपुर या दिल्ली मेरे पास आए तो  हमारे पड़ौसी और मिलने बाले ये समझते थे ये मेरी पत्नी के माता पिता हैं।  वास्तव मे वह किचिन किंग हैं, 15-16 साल के अनुभव के साथ शेयर मार्केट की अच्छी जानकार और और व्यवहार कुशल महिला हैं जिसके साथ रहते  ज़िंदगी मे आयी  कठिनाइयो, परेशानियों को हम लोगों ने  सफलतापूर्वक सामना किया हैं। "एसी  सुंदर सौम्य, सुशील  महिला की  33वी  शादी की साल गिरह पर हम उसे  बहुत -बहुत बधाई" और शुभकामनायें देते हैं। रीता- हैप्पी   मैरिज एनिवर्सरी ।  

विजय सहगल




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