मानसिक
आरोग्यशाला
कभी
कभी छोटी सी चूक से बड़ी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं और उसकी बजह से व्यक्ति
उपहास का पात्र बन जाता हैं। अगर थोड़ी से सावधानी वर्ती जाय तो उस स्थिति से बचा
या उसे टाला जा सकता हैं। ऐसी ही स्थिति मे घटित एक घटना का मैं गवाह बना। बात उन दिनों की है जब मैं थाटीपुर शाखा
ग्वालियर मे प्रबंधक था शायद 2004-05 की बात रही होगी। श्री ए॰ के॰ मुंजाल साहब उस
समय भोपाल प्रादेशिक कार्यालय के प्रादेशिक
प्रबन्धक थे। श्री मुंजाल जी का
ग्वालियर की नया बाज़ार और हमारी शाखा, थाटीपुर का निरीक्षण का कार्यक्रम था। ग्वालियर ही नहीं
पूरे मध्यप्रदेश मे एक चलन था कि जब प्रादेशिक प्रबन्धक किसी शाखा के दौरे पर होते
तो आसपास की शाखाओं के सारे प्रबन्धक भी
प्रादेशिक प्रबन्धक से मिलने चले आते थे। कुछ प्रबन्धकगण व्यव्हारिक्ता के नाते उनको अपनी शाखा मे आने का
अनौपचारिक आमंत्रण देते थे। समय की उपल्ब्ध्ता के आधार पर प्रादेशिक प्रबन्धक कभी
कभी उस अनुरोध को स्वीकार भी कर लिया करते थे। उस दिन भी यही हुआ। हमारी मानसिक
आरोग्यशाला के प्रबन्धक जी के अनुरोध पर उन्होने
पूर्वनिर्धारित शाखाओं के निरीक्षण के पश्चात उनकी मानसिक आरोग्यशाला शाखा
मे आने का अनुरोध स्वीकार कर लिया। चूंकि मानसिक आरोग्यशाला,
शाखा का निकट भविष्य मे नये परिसर मे स्थांतरित होने का कार्यक्रम था, शाखा मानसिक आरोग्यशाला के नये परिसर की फर्निशिंग का कार्य भी चल रहा था।
श्री मुंजाल साहब का उद्देश्य एक पंत दो
काज़ करने का था कि इस बहाने शाखा के कार्य की प्रगति की भी समीक्षा हो जायगी, उन्होने शाम के समय मानसिक आरोग्यशाला शाखा मे आने का कार्यक्रम निश्चित कर दिया। सर्दियों
का समय था दोनों शाखाओं के निरीक्षण के पश्चात दिन ढलने के पूर्व उन्होने हमारे
एवं नया बाजार शाखा के प्रबन्धक और कुछ अन्य स्टाफ के साथ शाखा मानसिक आरोग्यशाला
के लिये प्रस्थान किया। शाखा मे पहुँचने पर स्टाफ से मिलने की औपचारिकता के बाद
शाखा परिसर का भ्रमण किया जो मेंटल हॉस्पिटल परिसर के एक बहुत छोटी
बिल्डिंग मे चल रही थी जिसका स्पेस बहुत नाकाफी था। चाय-पानी की औपचारिकता
के पश्चात उन्होने शीघ्र ही नये भवन को देखने की इक्छा जाहिर की। मानसिक
आरोग्यशाला के प्रबन्धक के साथ श्री
मुंजाल साहब और हम सभी 5-6 स्टाफ नये
परिसर को देखने के लिये चल दिये। नया शाखा परिसर मानसिक आरोग्यशाला से लगभग
100-150 मीटर दूर रहा होगा। हम लोग पैदल ही चल कर 5-7 मिनिट मे बैंक के नये
निर्माणाधीन परिसर मे पहुँच गये जो एक छोटी लेकिन काफी खुले परिसर की मार्केट मे
था। उक्त मार्केट मे एक समान निर्मित चालीस, शटर से सुसज्जित
दुकाने थी। मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक ने बताया कि बैंक ने इन चालीस दुकानों
मे से तीन दुकाने मेंटल हॉस्पिटल कमेटी से किराये पर ली हैं जो मार्केट के मध्य मे
स्थित थी। सारी दुकानों के आगे 6-7 फुट का
कवर्ड वरांडा नुमा कॉरीडोर बना हुआ था। कॉरीडोर के आगे काफी खुला एरिया पार्किंग
के लिये भी था। उक्त पूरा मार्केट बाउंड्री बाल से कवर्ड किया हुआ था। मानसिक
आरोग्यशाला के प्रबन्धक सिलसिले बार परिसर की खूबियों को बताना शुरू किया। जैसा की स्वाभिक था प्रादेशिक प्रबन्धक श्री
मुंजाल जे ने उन तीन दुकानों को देखने की इक्छा प्रबन्धक महोदय से जताई और किराये
के संबंध मे पूंछा। प्रबन्धक महोदय ने किसी स्टाफ से नवीन परिसर के बंद तीनों शटर के
तालों को खोलने के निर्देश देते हुए श्री मुंजाल जी को बताया चूंकि सरकारी
बिल्डिंग है तो किराया कलेक्टर महोदय दुवारा निर्धारित रेट से होगा। प्रादेशिक
प्रबन्धक ने पुनः पूंछा किराया कितना बनता हैं। मानसिक आरोग्यशाला प्रबन्धक ने कहा
भू अभिलेख के इंस्पेक्टर ने निरीक्षण कर लिया है । जब प्रादेशिक प्रबन्धक ने पुनः किराये
के बारे मे पूंछा कुल कितना किराया अंदाज से देना होगा? शायद
प्रबन्धक महोदय को इस मामले मे जानकारी नहीं थी। मैंने कुछ बात सम्हाल्ते हुए कहा
यहाँ शायद 4-5 रूपये वर्ग फूट होगा। श्री मुंजाल जी के चेहरे से उनकी खीज़ और
अप्रसन्नता के भाव आसानी से पढे जा सकते थे। उन्होने बैंक परिसर के लिये आवंटित
दुकानों के शटर के तालों को खुलने का
इंतजार मार्केट के कॉरीडोर के पास खड़े होकर किया,
जिसे एक सब-स्टाफ ताले खोलने का प्रयास कर
रहा था। यहाँ जो मैंने देखा उस का उल्लेख मैंने उपर शुरुआत मे किया अर्थात
प्रबंधिकीय कौशल मे थोड़ी कमी। मैंने देखा उस सब-स्टाफ के हाथ मे चाबियों का एक बड़ा सा गुच्छा
था हमे ये अनुमान लगाने मे देरी नहीं हुई कि चाबियों के इस गुच्छे मे पूरे मार्केट
की 40 दुकानों की 80 चाबियाँ है जो कि प्रत्येक
शटर मे लगे दो-दो ताले की थी। अब तो हमे कुछ अप्रिय घटने की आशंका होने लगी जो
हास्यासपाद रूप मे लेने जा रही थी। इसी बीच मानसिक आरोग्यशाला के प्रबन्धक लगातार
बैंक परिसर की गुणों को बताये जा रहे थे। उन्होने प्रादेशिक प्रबन्धक महोदय को सम्बभोधित
करते हुए कहा, तीसरे
शटर मे स्ट्रॉंग रूम और कैश कैबिन होंगे, पहले शटर मे
मैनेजर कैबिन होगा। श्री मुंजाल जी ने कहा ठीक हैं, ताला खोलो-ताला खोलो,
मैनेजर साहब ने देखा ताला अब भी नहीं खुला तो पुनः बोले, "सर दूसरे कैबिन मे ग्राहकों के लिये काउंटर होगा। मुंजाल जी ने फिर कहा भाई पहले
ताला खोल-ताला खोल। दुर्भाग्य से उस गुच्छे मे सभी चाबियाँ एक ही कंपनी के ताले की
थी जो कमोबेस एक जैसी प्रतीत हो रही थी।सब स्टाफ लगातार एक के बाद एक चाबी लगा कर शटर
के तले खोलने का प्रयास कर रहा था। दिन ढल
चुका था, लाइट की व्यवस्था भी नहीं थी। दुर्भाग्य से स्टाफ
दुवारा ताला खोलने के सारे प्रयास निरर्थक हो रहे थे। जब मानसिक आरोग्यशाला, प्रबन्धक ने बतलाना शुरू किया कि "सर, यहाँ
ए॰टी॰एम॰ लगाया जायेगा", तो श्री मुंजाल साहब के सब्र का पैमाना टूट चुका
था। अपने क्रोध को काबू करने का असफल प्रयास करते हुए झल्ला कर बोले,"ताला खोल-ताला खोल। दुर्भाग्य से
अंत तक शाखा परिसर के शटर का ताला नहीं खुला तो नहीं खुला और वह बगैर परिसर को देखे बापस हो गये।
कितनी
चिंताजनक और दु:ख की स्थिति थी कि प्रादेशिक
प्रबन्धक जिस कार्य के लिये आये थे, एक न समझी और मिस मैनेजमेंट की बजह
से उस को ना कर सके। मेरा मानना हैं यदि थोड़ी
सी सावधानी उस दिन रखी जाती और मानसिक
आरोग्यशाला के प्रबन्धक यदि बैंक के परिसर के शटर के ताले की दो या तीन चाबियों
बाला ताला लगा उन तालों की एक चाबी अपने पास रखते तो उस दिन जैसी हास्यास्पद एवं
अजीब स्थिति से बचा जा सकता था।
विजय
सहगल
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