"संदलपुर टू सिथौली"
ज़िंदगी
मे कभी कोई ऐसी बेवकूफी या ऐसी मूर्खता हो जाती है जो उस समय तो कष्टप्रद लगती है
लेकिन बाद मे उसे याद कर अपने आप पर या यूं कहे अपनी मूर्खता पर हँसी आती है। लेकिन कुछ भी कहे उस घटना को याद कर आज भी
रोमांच हो उठता हूँ। बात उन दिनों की है जब हम झाँसी से ग्वालियर अप डाउन करते थे।
हमारे अप डाउनर क्लब मे काफी संख्या मे लोग ग्वालियर के विभिन्न विभागों मे
कार्यरत थे। उन मे से कुछ लोगो को दैनिक आवागमन का अच्छा खासा अनुभव था। अगर 10
मिनिट मे ग्वालियर जाने बाली 3 गाडियाँ झाँसी प्लेटफ़ोर्म पर आने बाली हैं तो ऐसे
अनुभावी "महानुभाव" बता देते थे
कि इन पैसेंजर, एक्सप्रेस
और सुपर फास्ट ट्रेन मे पहले कौनसी ट्रेन उन्हे ऑफिस टाइम के पूर्व ग्वालियर
पहुँचा देगी। उनकी कैलकुलेशन इतनी सटीक
होती थी कि कभी कभी पैसेंजर ट्रेन और सुपरफास्ट ट्रेन के बीच 20-25 मिनिट का यदि फरक है तो वे उसकी स्पीड स्टोपेच और कौशन ऑर्डर
को देखते हुए पैसेंजर ट्रेन से जाने को प्रथमिक्ता देते थे। शायद मार्च-अप्रैल का
महीना रहा था। हम लोग ग्वालियर जाने के लिये झाँसी प्लेटफ़ोर्म पर ट्रेन का इंतजार
कर रहे थे। उत्कल एक्सप्रेस ट्रेन आने वाली थी जो उस दिन कुछ लेट थी। काफी मार्जिन
था, हम लोग उत्कल
एक्सप्रेस ट्रेन मे ग्वालियर के लिये चढ़ गए। दतिया, डबरा स्टोपेच
के पश्चात ट्रेन ने ग्वालियर के लिये प्रस्थान किया सबकुछ ठीक था ट्रेन अपनी गति से जा रही थी।
डबरा ग्वालियर के बीच 4 स्टेशन पड़ते है और दूरी लगभग 45 कि॰ मी॰ है। दो स्टेशन
निकल चुके थे। आंतरी स्टेशन के बाद एक अंधेरी सुरंग से लगा हुआ तीसरा स्टेशन संदलपुर हैं। स्टेशन
तो बस नाम मात्र का है न कोई प्लेटफॉर्म न बैठने, न कोई शेड, न टॉइलेट आदि की व्यवस्था चाय नाश्ते की तो बात छोड़िये पानी भी उपलब्ध
नही हैं। एक मात्र कैबिन बनी है, जिसका स्टाफ आने-जाने बाली रेल गाड़ियों को नियंत्रित करता
हैं। स्टाफ के लिये भी पानी का इंतजाम
पैसेंजर ट्रेन के ड्राईवर डबरा स्टेशन से पानी
संदलपुर भेज कर करते हैं। ड्यूटि के लिये स्टाफ डबरा या ग्वालियर से मालगाड़ी या
पैसेंजर ट्रेन से आकार ड्यूटि जॉइन करते हैं क्योंकि सड़क मार्ग से संदलपुर स्टेशन
का कोई संपर्क नहीं हैं। कहने का तात्पर्य
है ये एक फ्लैग स्टेशन जो रेल्वे के नक्शे पर तो है पर हमे नही लगता संदलपुर स्टेशन
के लिये कभी कोई टिकिट रेल्वे मे कभी बिका
हों या यहाँ से किसी सवारी ने देश
के किसी भी स्टेशन के लिये टिकिट लिया हो! इस स्टेशन पर मात्र पैसेंजर ट्रेन ही
आते-जाते रुकती है। चारों तरफ जंगल, घोर जंगल के अलावा और कुछ नजर नही आता। दोनों तरफ पहाड़ और जब दिन मे सन्नाटा
पसरा रहता हैं तो रात के बारे मे कल्पना ही की जा सकती हैं। उस दिन कुछ दुर्भाग्य
ही था जैसे ही उत्कल एक्सप्रेस अंधेरी सुरंग से बाहर निकल कर संदलपुर स्टेशन पर पहुची, ट्रेन का इंजिन पहाड़ से गिरे किसी पत्थर से या इंजिन के फ्रंट गार्ड से टकरा
गया जिससे गाड़ी अचानक खड़ी हों गई । दुर्घटना मे चिंताजनक जैसी कोई बात नहीं थी, पत्थर
की बजह से इंजिन के आगे के लोहे के गार्ड
और इंजिन को कुछ क्षति हुई थी। दैनिक
यात्रियो की खोज-बीन टीम ने अपने अपने स्तर पर जानकारी जुटाई। ऐसे समय मे ये टीम
अपने स्तर पर सूचनाएँ जुटाने मे निपूण हैं। इस टीम का कहना था तकनीकी मामला है,
चूंकि यहाँ कोई भी सुविधा नही है इंजिन ठीक होना यहाँ संभव नहीं हैं इसलिये ट्रेन
को चलने मे कुछ ज्यादा समय लगेगा। शायद कहीं
से कोई दूसरा इंजिन आएगा तभी गाड़ी चलेगी!!
अब दैनिक यात्रियों मे सुगबुगाहट होना शुरू हुई क्योंकि ग्वालियर के लिये मात्र एक
स्टेशन सिथौली बीच मे था जो संदलपुर से लगभग 10-11 कि॰ मि॰ दूर था। संदलपुर स्टेशन
के चारों ओर घोर जंगल और पहाड़ के अलावा कुछ आबादी भी नहीं हैं। बताते हैं कि इस स्टेशन
मे उत्तर - दक्षिण मे तो रेल की लाइन हैं और पूर्व-पश्चिम मे 9-10 कि॰मी॰ चौड़ी और
कई कि॰मी॰ लंबी जंगल की पट्टी है जो शीतला माता से होती हुए शिवपुरी तक फैली है इस
जंगल पट्टी को प्राय: चंबल के दस्यू
(डाकू) अपनी शरण स्थली के रूप मे इस्तेमाल करते है। उस समय मे डाकू गड़रिया गिरोह
का आतंक इस पट्टी पर था।
दैनिक
यात्रियों मे चिंता इस बात की थी यदि गाड़ी ज्यादा लेट होगी तो ऑफिस का टाइम निकल
जायेगा और खाम-खाँ उस दिन की छुट्टी लग जायेगी, कुछ लोगो की राय थी की ट्रेन मे ही
बैठ कर इंतजार किया जाय जैसा सबका होगा हमारा भी वैसा हो जायेगा परन्तू कुछ "श्रेष्ठ विद्वानों" का
मत था कि हमे कुछ खतरा मोल लेना चाहिये और अगले स्टेशन सिथौली तक पैदल चलकर वहाँ से बस या अन्य कोई
साधन से ग्वालियर पहुचना चाहिये। क्योंकि हमारे पास अभी लगभग डेढ घंटे का समय था, निर्णय तुरंत लेना था देरी का मतलब उस दिन की छुट्टी?? हमने देखा कुछ लोग "श्रेष्ठ मत" के मानने बाले पैदल चल दिये
थे। मैं और मेरे एक मित्र श्री सुरेन्द्र खरे जो ए॰जी॰ ऑफिस मे सेक्शन ऑफिसर के पद
पर थे, आँखों ही आँखों के इशारे मे बात कर "श्रेष्ठ मत"
के साथ शामिल हो कर पैदल ही सिथोली स्टेशन की ओर प्रस्थान कर चल पड़े। हमने आगे नजर
दौड़ाई तो देखा अलग अलग समूह मे करीब 25-30 लोग रेल लाइन के किनारे चले जा रहे थे
उन मे हम दोनों का भी समूह था। हमारे बहुत से दैनिक यात्री अभी भी ट्रेन मे ही थे।
हम लोग ट्रेन के इंजिन से लगभग डेढ -दो कि॰मी॰ आगे निकल गये पीछे मुड़ कर देखा
ट्रेन मे कोई हलचल नही थी। हमे अपने सही
समय पर सही निर्णय लेने पर खुशी हो रही थी। परन्तू मुश्किल से हम लोग आधा कि॰मी॰
और आगे बढ़े तो अचानक देखा की गाड़ी चलने के संकेत दे रही हैं। अब हमारी स्थिति बड़ी
दयानीय उस धोबी के कुत्ते की तरह हो गई
"जो न घर का था न घाट
का" । अब हम चाह कर भी बापस दौड़ कर ट्रेन को पकड़ नहीं पाते। अतः अपने अन्य दैनिक यात्रियो से सहायता की आशा
और आकांक्षा लिये ट्रेन की चैन पुल्लिंग की उम्मीद करते हाथों का इशारा कर रहे थे
पर व्यर्थ। दैनिक यात्रियो का एक अलिखित सिद्धान्त हैं " दैनिक यात्रियो की
दोस्ती ऑफिस टाइम के पहले और ऑफिस टाइम के बाद ही होती है" अर्थात उसे आपकी बजह से ऑफिस टाइम की देरी हो
रही है तो बह आपका साथ छोड़ देगा (कुछ अपवादों को छोड़ कर)!! इस पर एक कहावत प्रचलित
थी -: अप-डाउनर किसी का सगा नहीं।
जो ऑफिस टाइम पर भगा नही ॥
हमारे
तमाम
इशारों के बाबजूद ट्रेन हमारे सामने से निकल गई। बाद मे पता चला कि ट्रेन के पीछे
एक इंजिन लगाया गया था जिसे पिछले स्टेशन आंतरी मे एक मालगाड़ी से निकाल कर उत्कल
एक्स्प्रेस ट्रेन मे लगाया गया था। अब हमे अपने निर्णय पर कुछ पछतावा हो रहा था :-
"पर
अब का होत पछताय जब चिड़िया चुग गई खेत"।
जैसे
जैसे हम लोग आगे बढ़ रहे थे सूर्य भगवान का तेज गर्मी के रूप मे हम लोगो पर कहर बन
कर टूट रहा था। रास्ते मे रेल लाइन के किनारे बनी पगडंडी पर हम लोग बढ़ते जा रहे
थे। प्यास का अहसास होने लगा था। खाना तो
साथ था पर उन दिनों पानी साथ लेकर चलने का चलन नही था। आधे रास्ते पार "अप"
(ग्वालियर से आने बाली लाइन) लाइन से दूर एक ट्यूब-बैल दिखा परन्तू दो कारणो से
आगे बढ़ते रहना ही उचित लगा। एक तो बह रेल लाइन से हट कर लगभग आधा कि॰मी॰ दूर था और
दूसरा संदलपुर से सिथोली आने जाने की लाइनों मे 4-5 कि॰मी॰ का अंतर होना भी था।
ग्वालियर से आने बाली रेल लाइन "S" के आकार मे होने के कारण यह
अंतर था। प्यास के मारे बुरा हाल हो रहा था पहली बार गला सूखने पर ऐसा लग रहा था
कि चक्कर आ रहे हों। एक एक कदम चढ़ते सूरज कि रोशनी मे भारी पड़ रहे थे। पहली बार
अपने निर्णय पर अफसोस हो रहा था। अब छुट्टी होने का अहसास या ऑफिस पहुचने के अहसास
से पहले सिथौली स्टेशन पहुचने की जल्दी थी। उस समय सिर्फ एक ही विचार दिमाक मे था
कि एक कदम भी बेकार गवाये बिना हमे मंजिल
की तरफ बढ़ना हैं और उस समय हमरी मंजिल
सिर्फ और सिर्फ सिथौली स्टेशन ही थी। जैसे जैसे हम सिथौली की तरफ बढ़ रहे थे प्यास
के मारे बुरा हाल था, गर्मी भी कदम कदम पर बढ़ती जा रही थी।
जैसे तैसे हम जब सिथौली पहुचे तो वहाँ पर खाने के रोटी बाले डिब्बे को खाली कर स्टेशन
पर लगे हैंड-पम्प पर हम लोगो ने कई-कई डिब्बे पानी अपने सिर पर डाला और लगभग नहा
ही लिया था हमने। एक मिनिट विश्राम के बाद
16-17 गिलास के बराबर पानी पिया तब कहीं जा कर प्यास बुझी। हम और श्री खरे 8-10
मिनिट स्टेशन की बेंच पर बैठकर विश्राम करते रहे। पैरों का थक कर बुरा हाल था।
जैसे तैसे सिथौली से सड़क मार्ग द्वारा वाहन से ऑफिस पहुचे और सीट से बगैर हिले लंच
तक लगातार बैठ कर काम करते रहे ताकि पैरों को कुछ आराम मिल सके।
यध्यपि
उस दिन का निर्णय जल्दी बाजी मे लिया एक गलत निर्णय था किन्तु हमे हमारी पैदल चलने की क्षमता का भी एहसास उस दिन हमे हुआ था। यदि पानी और कुछ आवश्यक वस्तुओं के साथ बिना
किसी समय पाबंदी के ट्रेकिंग पर निकला जाय तो मैं एक अविस्मरणीय ट्रेकिंग यात्रा
कर सकता हूँ। सेवानिव्रत्त के पश्चात अब सभी परिस्थितियां अनुकूल है खरे साहब का
तो पता नहीं पर क्या ट्रैकिंग के लिये आप तैयार हैं? हम तो तैयार है!!!!
विजय
सहगल

3 टिप्पणियां:
Very well explained Sehgal sab please keep this spirit of writing
बहुत सुंदर संस्मरण । आपकी अभिव्यक्ति शैली लाजवाब है । भूटान में आपके साथ बड़ा मजा आएगा और मौक़ा मिलेगा तो ट्रैकिंग का भी आनंद लिया जाएगा। शायद मैं आपको कम्पनी दे पाऊँ ।
I love your encounters with Indian Railways. I too have experienced many such encounters as a teenager on Kanpur Delhi line when my elder cousin was posted as a Guard at Tundla Jn. Hordes of family members of staff always traveled free, and we were no exception. "Just tell the Guard” we were told, we also take their people. The cardinal rule was not to travel on a ticket. But for me it was a very tense journey as the Guard was no where to be seen after reaching the destination. Exit from the station was an adventure in itself
Ranjeet Singh, Noida
एक टिप्पणी भेजें