रविवार, 3 सितंबर 2023

वार्ड संख्या 83

 वार्ड संख्या 83 भोपाल 





आज लेपटोप मे 22 मई 2022 को भोपाल के मुख्यमंत्री को नगर निगम के वार्ड  83 मे पदस्थ एक कर्मचारी के  व्यवहार के संबंध मे लिखी शिकायत हाथ लग गयी तो सोचा आज का ब्लॉग उस घटना की याद क्यों न आप सभी के साथ सांझा करूँ। दुःख इस बात का हैं कि मध्य प्रदेश मे सरकारी कार्यालयों के कर्मचारी लाल फीताशाही से ग्रस्त हो कैसे आम जनों के साथ व्यवहार करते हैं उससे बड़ा दुःख और शोक इस बात का हैं कि प्रदेश के मुखिया को शिकायत के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं होती।      

 

श्रीमान  शिवराज सिंह जी,                       22.05.2022

मुख्यमंत्री,

मध्य प्रदेश सरकार,

भोपाल।

 

विषय- नगर निगम भोपाल के वार्ड कार्यालय 83, दानिशकुंज मे पदस्थ श्री आशुतोष राणा की       शिकायत।  

 

दानिशकुंज स्थित नगर निगम, भोपाल  के वार्ड 83 कार्यालय मे  16 फरवरी 2021 को कार्यालय मे पहली बार जाना हुआ था तब वहाँ के सब-स्टाफ श्री शंकर पाटिल से जुड़ी कुछ मीठी यादें आज भी मेरे स्मृति पटल पर ताज़ा है। श्री शंकर द्वारा  कार्यालय मे आये अगुंतकों से प्यार से बोलना, पानी के लिये पूंछना और  सबसे बढ के कार्यालय की सफाई व्यवस्था ने मुझे श्री शंकर के कर्तव्य निष्ठा ने प्रभावित किया था।  

वित्त वर्ष 2022-23 मे  अपने भोपाल स्थित फ्लैट का प्रॉपर्टि टैक्स ऑन लाइन जमा करने के प्रयास मे असफल होने के कारण मजबूरी वश दिनांक 17 मई 2022 को मेरा भोपाल नगर निगम स्थित वार्ड कार्यालय 83 मे पुनः जाना हुआ ताकि संपत्ति कर को नगद जमा कराया जा सके। दुर्भाग्यवश उस दिन सर्वर की कुछ समस्या के कारण कनैक्टिविटी समस्या के कारण संपत्ति कर की राशि तो सिस्टम मे जमा हो गयी लेकिन नगदी जमा की रसीद जारी न हो सकी। लेकिन  कनैक्टिविटी समस्या काउंटर पर बैठे स्टाफ के  नियंत्रण से परे थी जिसकी हमे भी कोई शिकायत नहीं थी।       

मेरे सहित कुछ लोग कार्यालय मे ही कनैक्टिविटी दुरुस्त होने का इंतजार करने लगे। तभी उसी हाल मे दूसरे सिरे पर बैठे एक अधिकारी श्री आशुतोष राणा ने टैक्स जमा कराने आये एक व्यक्ति को कूलर के सामने से हटने को कहा जो  उस अधिकारी के सामने दूसरे सिरे पर रक्खा था। उस अधिकारी के बोलने का लहज़ा कुछ अजीब जो  साधारण शिष्टाचार के विपरीत था।  यह सोचकर कि मुझे कौन सा कार्यालय मे देर तक रुकना है, मैंने उनके व्यवहार पर बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये उनके व्यवहार को नज़रअंदाज़ कर दिया। बदकिस्मती से  मेरे लगातार दो घंटे तक इंतज़ार के बाद भी कनैक्टिविटी की समस्या ठीक नहीं हुई।  कम्प्युटर के  न चलने की बजह से लोगो की भीड़ कार्यालय मे बढ़ती चली जा रही थी, इस दौरान श्री राणा लगातार अपने मोबाइल के व्हाट्सप्प पर व्यस्त रहे। उनसे गर्मी के इस मौसम मे आम लोगो हेतु  पेयजल  की अपेक्षा तो क्या ही की जा सकती थी?      

 

कुछ लोग जाने अनजाने पुनः कूलर के सामने लाइन मे खड़े हो अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे तब उस निष्ठुर और धूर्त अधिकारी श्री आशुतोष राणा ने एक बार फिर उन लोगो को कूलर के सामने से हट जाने को कहा, जो 42-43 डिग्री की गर्मी से आकार कार्यालय मे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। तब मेरे सहित कुछ अन्य लोगो ने उसके इस व्यवहार पर एतराज़ किया। मैंने कहा कि कूलर की सुविधायें आम जनों के सुख सुविधाओं के लिये की गयी है!!    एक जन सेवक के नाते साधारण लोगो से इस तरह बोलना अनैतिक है? उस निर्लज्ज और ढीठ अधिकारी ने बड़े ही क्रूर और निर्दयी तरीके से कहा,  "ये कूलर मैंने अपने पैसे से लगवाया है!" इसलिये मेरा अधिकार है कि लोगो से इस के सामने खड़े होने से माना करूँ!! ये बेशर्मी की पराकाष्ठा थी!! कैसे कोई अधिकारी अपनी सुख, सुविधा के लिये व्यक्तिगत उपकरण कार्यालय मे लगवा सकता है? क्या कार्यालय से इस हेतु आवश्यक स्वीकृति ली गयी? इस बिजली के उपकरण पर होने वाला बिजली व्यय ऑफिस के व्यय मे कैसे डाला जा सकता है? क्या खर्च  हुआ बिजली व्यय इनके वेतन से बसूल किया गाया?

जब मैंने प्रीतिवाद कर उनसे दो-ढाई घंटे से व्हाट्सप्प छोड़ कनैक्टिविटी को दुरुस्त कराने के प्रयास करने के लिये कहा तो दीर्घ सूत्री अधिकारी श्री राणा अपना आपा खो बैठे और उन्होने बड़े ही निर्मम तरीके से कहा कि मोबाइल कोई आपके पिताजी के पैसे से नहीं खरीदा ये मेरा मोबाइल है इसे जैसे चाहे मै इस्तेमाल करूँ? आप कौन होते है मोबाइल पर सवाल पूंछने वाले? सार्वजनिक कार्यालय मे पदस्थ ऐसे  क्रूर,  निष्ठुर अधिकारी से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती।  फिर भी  मेरा कहना था कि आप एक सार्वजनिक कार्यालय के प्रमुख है ये आपकी नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि आम जनों के सुख सुविधाओं का ख्याल रखे न कि अपने व्यक्तिगत सौभाग्य और सहूलियत का? यहाँ 30-35 लोग खड़े है इनके लिये पीने के पानी और  बैठने की सुविधा प्रदान करना आपका नैतिक दायित्व है? श्री राणा की बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिये कि उसने सामने कमरे मे रक्खी कुर्सियों की ओर इशारा कर कहा, कमरे से उठा लीजिये कुर्सियाँ और बैठ जाइये। इतनी निर्लज्जता और निष्ठुरता पर खीज़ होना स्वाभाविक था। जब मैंने कहा हम लोग कुर्सियाँ क्यों उठाएंगे? श्री राणा ने बगैर सुने ही अपना फरमान जारी कर दिया कि "मै आप लोगो का नौकर नहीं हूँ", जो कुर्सी उठा कर रक्खूँ!! जब मैंने अपना प्रतिरोध कर कहा कि, आपसे कौन कुर्सियाँ उठाने या लाने को कह रहा है? आप अपने कार्यालय के अधीनस्थ कर्मचारी को आदेशित कर कुर्सी या पानी की व्यवस्था करा सकते है? लेकिन ये वो अनाराध्य निष्ठुर पुरुष थे जिनसे सद्व्यवहार की अपेक्षा बेमानी थी।

अंततः लगभग चार घंटे बाद टैक्स की रसीद प्राप्त हुई लेकिन काउंटर पर बैठे अन्य कर्मचारी का व्यवहार और आचरण प्रशंसनीय था जो समस्या के निराकरण हेतु लगातार प्रयसरत थे।  

ऐसा प्रतीत होता है कि श्री आशुतोष राणा जैसे राज्य शासन के ये अदने  सेवक अपने आपको जनता पर शासन करने वाले शहंशाह समझते है। ये आम जनों को अपना गुलाम समझ नौकरों की तरह व्यवहार करते है। ये भूल जाते है कि आम जनों द्वारा किये टैक्स भुगतान से ही इनको वेतन भत्ते मिलते है जिससे इनका और इनके परिवार का गुजर-बसर होता है? लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे असामाजिक और असंस्कारित अधिकारी जो शासन और सत्ता छवि मे पलीता लगाने को आतुर है उन्हे कैसे रोका जा सकता है?

अतः आपसे अनुरोध है कि श्री आशुतोष राणा जैसे  निष्ठुर और क्रूर अधिकारी के विरुद्ध जांच कर सख्त, कठोर और कड़ी कार्यवाही कर सेवा से वर्खास्त करें।

 

विजय सहगल

प्रतिलिपि:- कमिश्नर नगर निगम भोपाल आवश्यक कार्यवाही हेतु अनुरोध।