"मांगन मरण समान
है!!"
बचपन
मे मुझे अपनी बुआ, ताऊ-ताई के साथ वर्ष 1972 मे एक बार वाराणसी जाने का सौभाग्य मिला था।
शायद 5-6 दिन का प्रवास था। धर्मशाला का नाम श्री सत्यानारायण था शायद, ठीक से याद नहीं वहाँ से पैदल ही दशाश्वमेध घाट और वहाँ से गलियों मे घूमते बाबा विश्वनाथ मंदिर
के दर्शन!! दशाश्वमेध घाट की स्वर्णिम यादें, घाट पर सुबह शांत चित्त बहती गंगा मे थोड़ा तैर कर स्नान-ध्यान।
शाम के घाट पर बैठ कर गंगा आरती और घाटों पर बैठ गंगा दर्शन, आज भी चेतनापटल पर स्पष्ट अंकित है। उन दिनों मोबाइल तो था
नहीं, कैमरा भी आसान सुलभ न था पर नाव के द्वारा घाटों
के दर्शन और सुंदर वास्तु शिल्प से बने घाटों को निहार अपनी स्मृतियों मे तथा
घाटों के नाम अपनी कॉपी मे नोट किये थे। कॉपी कहाँ गुम हो गयी पता नहीं।
वाराणसी को
अपनी स्मृतियों मे पुनर्स्थापित करने की आशा से पिछले वर्ष अप्रैल मई 2020
मे वाराणसी जाने का कार्यक्रम बना था पर
कोरोना के कारण कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा था। इस बार भी एक पंथ दो काज की कहावत को
चरितार्थ करने के इरादे से 18 जून 2021 मे एक शादी समारोह मे शामिल होने के सुखद संयोग
की आशा से लगभग
3-4 महीने पहले पुनः वाराणसी जाने की योजना बनी पर अभी कुछ दिन पूर्व फिर से रद्द करनी पड़ी, पर इस बार "कोरोना" कारण
नहीं था। इस बार शादी के कार्यक्रम का लड़के वालों द्वारा हर कदम पर पैसे की मांग
के कारण तय रिश्ते का समाप्त होना था। आज
के इस आधुनिक प्रगतशील युग मे नव युवाओं द्वारा महज पैसे के लिये इस पवित्र रिश्ते
के शुरु होने के पूर्व ही दमन ने दिल को अंदर तक झकझोर कर बेहद दुःख और वेदना के एहसास से भर दिया।
सौभाग्य
से मै दोनों ही पक्षों के परिवारों से
परिचित होने और नव युगल मे से लड़की जो विज्ञान मे परास्नातक है और लड़का भी अच्छा
पढ़ा लिखा होने के बावजूद महज पैसे के
लेन-देन पर तय रिश्ते का टूट जाना विचलित
करने वाला था। आज की नौजवान पीढ़ी से अपेक्षा की जाती है और ऐसा देखा भी जा रहा है
कि जातिबंधन एवं दहेज रहित रिश्ते बनाने मे नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की पुरातनपंथी सोच
से कहीं बहुत आगे है, जिसकी जितनी
भी प्रशंसा की जाय कम है पर दुर्भाग्य से
कम्प्युटर सेवी,
ज्ञान कौशल मे महारथ हांसिल इस पीढ़ी मे
अभी भी ऐसे नौजवान होंगे जो कोरोना काल मे भी बधू पक्ष से सौ मेहमानों का
खर्च एक हजार रूपये प्रति खाने की प्लेट
की मांग करे तब उनकी बुद्धि और सोच पर तरस आता है। क्या महामारी के इस कठिन दौर मे
कम मेहमानों और सरल तरीके से शादी सम्पन्न
करने के प्रयास नहीं किये जाना चाहिये थे? यूं भी वर्तमान समय
मे इस कोरोना महामारी के समय बहुत नजदीक के
रिश्तेदार भी आयोजनों मे शामिल होने से बचते है तो दूर दराज के रिश्तेदार, मित्र और शुभचिंतकों का समारोहों मे आना शायद ही संभव हो! क्या नौजवान नव
युगल को वैवाहिक जीवन की शुरुआत, आपसी समझ बूझ और एक दूसरे
के विचारों और आवश्यकताओं का सम्मान करने मे नहीं करना चाहिये थी? यूं भी हर माँ-बाप बेटी की शादी मे अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करते और
उपहार देते है तब पैसे की इस मांग का क्या औचित्य? मांगने के सवाल पर संत कबीर की वे लाइन स्वतः
स्मृति पटल पर आ जाती है जो बड़ी ही
समसामयिक है और दहेज के रूप मे पैसे मांगने वालों के मुंह पर एक करारा तमाचा भी!!:-
मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख।
विजय सहगल



