गुरुवार, 13 जनवरी 2022

हजारिया महादेव, तालवेहट

 

"हजारिया महादेव, तालवेहट"







दिनांक 16 दिसम्बर 2021 को भोपाल से अपनी बापसी के समय अपने अल्प प्रवास पर राष्ट्रीय राजमार्ग से हट कर जब तालबेहट कस्बे मे जाने के लिये सड़क पर प्रवेश करेंगे तो मार्ग के दोनों ओर कच्चे और उबले सिंघाड़े लिये हुए कई महिलाएं एवं बच्चे टोकरी मे सिंघाड़े बेचते हुए बैठे मिलेंगे। मुझे दाहिनी ओर विशाल तालाब से लाये स्थानीय उत्पाद ताजे सिंघाड़ों का विनमय होता दिखा।  कच्चे सिंघाड़े तीस रुपए एवं उबले-छिले सिंघाड़े का भाव मात्र साठ रुपए प्रति किलो था। पोषक तत्वों से भरपूर 100 ग्राम सिंघाड़े से मात्र 97 कैलोरी ऊर्जा, 0.1 ग्राम फैट, पोटेसियम, मैगनीस और कॉपर जैसे खनिज से भरपूर सिंघाड़ा 2 ग्राम प्रोटीन प्रदान करता है। तालबेहट कस्बा सिंघाड़े और कमल ककड़ी अर्थात मुरार का मुख्य उत्पादन केंद्र रहा है। फिर इतने पौष्टिक गुणो से भरपूर आधा किलो सिंघाड़े का खरीदना तो बनता ही था।      

थोड़ा सा आगे बढ़ने पर सड़क के दाहिने एक अति प्राचीन हजारिया महादेव मंदिर का रास्ता था जो तालबेहट के प्रसिद्ध तालाब के दक्षिणी छोर पर स्थित है। इस मंदिर की स्थानीय स्तर पर बड़ी मान्यता है। सावन और शिवरात्रि के समय इस मंदिर मे विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमे भारी संख्या मे भक्तजन शामिल होते है। मुझे भी इस दिन इस मंदिर मे भगवान महादेव के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कोई विशेष तीज-त्योहार न होने के कारण उस दिन भक्तों की ज्यादा भीड़ नहीं थी। इस मंदिर के बारे मे ऐसी किंवदंती है कि इस शिवलिंग का आकार दिन-व-दिन, तिल-तिल बढ़ रहा है। इस चमत्कारिक और अलौकि शिवलिंग के बारे मे कस्बे के वृद्ध एवं वरिष्ठ जन बताते है कि पहले बचपन मे वे मंदिर की परिक्रमा आसानी से कर लेते थे पर शिवलिंग और जलहरि का आकार बढ़ने के कारण अब मंदिर के परिक्रमा मार्ग  जलहरि के आकार मे वृद्धि के कारण बंद हो गया। इस बात की पुष्टि हमारी श्रीमती जी भी करती है जिनकी जन्म स्थली भी तालबेहट कस्बा है जहां उनका बचपन बीता है।

1936 मे स्थापित इस मंदिर के शिवलिंग की पिंडी पर बहुत ही कलात्मक रूप से गोलाकार रूप मे 108 शिवलिंग को उकेरा गया है। इस तरह छोटे छोटे शिवलिंग के ग्यारह चक्र को पिंडी पर शिल्पियों द्वारा सुंदर तरीके से बनाए गए अर्थात कुल 11088 शिवलिंगों निर्माण का हुनर देखते ही बनता है। इसी तरह की कलात्मक शिल्पकारी शिव के वाहन नंदी पर भी की गयी है। हरे भरे एवं साफ सुथरे मंदिर प्रांगड़ मे स्थित हजारिया महादेव मंदिर का सौंदर्य प्राकृतिक रूप से बने  तालाब ने इस स्थल के  सौंदर्य मे और भी वृद्धि कर दी है। मंदिर के बगल मे बने खुले आँगन मे खड़े होकर तालाब को देखना मन को सकून और शांति प्रदान करने वाला था। मंदिर मे जलाभिषेक और शिवार्चन करने के पश्चात भगवान शिव को शिरोधार्य प्रणाम कर हम प्रसन्नता पूर्वक बाहर निकले।

मंदिर के बाहर फल-फूल की कुछ दुकानों के अलावा एक मनिहारी की दुकान भी वहाँ थी। महिला द्वारा संचालित इस दुकान की स्वामिनी हाल ही खेत से निकले अदरक को मिट्टी से अलग कर रही थी साथ ही मे इनके बीच इक्का-दुक्का अरबी (सब्जी) को भी अलग कर रही थी। मेरी श्रीमती जी को मेरी पसंद के विपरीत अरबी की सब्जी बेहद प्रिय है।  उन्होने अरबी का भाव पूंछा तो हम हैरान रह गये। खेत से निकली ताजा अरबी मात्र 10/- रुपए किलो थी अतः डेढ़ लोगो ( अरबी की पसंदीदा के कारण श्रीमती को "एक" एवं बेमन से खाने के कारण मै आधा) के हिसाब से एक पाव अरबी बहुत थी। उस महिला ने ऐसे ही अंदाजे से एक पन्नी मे अरबी भर कर दे दी जो लगभग तीनचार -सौ ग्राम से कम न थी। पत्नी ने जब दस का नोट दिया तो उसने बड़े ही निर्मल और संकोच के साथ कहा, "बिन्नु अब नैक सी (थोड़ी) से घुइयाँ (अरबी) के का पईसा ले!", "तुम तो ऐसेई (बिना पैसेके) रख लो", "हमने कौन मंडी से मोल (नगद) लई', "जे तो हमए अपने खेत की है"!  इतनी निश्छलता, अपनत्व और स्नेह आपको  सिर्फ आर्थिक रूप से कमजोर पर विचार मे उदार सम्मपन्नता सिर्फ भारत के उदारमना ग्रामीणों मे ही दिखाई देगी। हमारे बार बार आग्रह के बावजूद उस महिला ने अरबी की कोई कीमत नहीं ली। वास्तव मे अरबी की तो नगण्य  कीमत रही होगी, पर उस महिला के अपनत्व और स्नेह मेरे लिए बेशकीमती था।

मंदिर से लगा हुए ही पैडल वोट और बच्चो के लिए फिसल पट्टी, झूले आदि भी लगे थे पर  पर्यटकों की कम आवक से पार्क सूना था। ऐसा प्रतीत होता है कि मेले-ठेले मे ही लोग यहाँ आते होंगे। यदि मेरे पास समयाभाव न होता तो विशाल और सुंदर सरोवर मे नौकायन अवश्य करता।

एक बार पुनः हजरिया महादेव का जयकारा लगा मै अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान कर गया।  

विजय सहगल