शनिवार, 11 अप्रैल 2020

घूमती कुर्सी




"घूमती कुर्सी"


बड़ी विपरीत हालातों मे साढ़े चार साल की कार्यावधि  पश्चात  बड़े अहसानों के बाद हमारे उच्चाधिकारियों ने  मेरा स्थानांतरण प्रबन्धक के रूप मे मेरे घर से लगभग 1500 किमी दूर तब के छत्तीसगढ़ स्थित रायपुर मे एक नई शाखा को शुरू करने के लिये किया गया था। इतनी दूर बैंक मे स्थानांतरण कुछेक अपवादों को छोड़ कर प्रायः प्रोन्नति, आपके निवेदन या फिर सजा के तौर पर ही किये जाते रहे है। हमारे विषय मे पहले दो तर्क लागू नहीं थे अतः मै मान कर चला था घर से इतनी दूर पदस्थापना मुझे तीसरे कारण से ही किया गया होगा। लेकिन अपने ईष्ट के इस कथन पर हमारा दृढ़ विश्वास था "कि प्रसन्न रहने के दो ही उपाय  हैं, आवश्यकताएँ कम करें और परिस्थितियों से तालमेल बिठाएँ"।  मात्र इस एक सूत्र के कारण ही बेमन से स्वीकार्य ये पदस्थपना मेरे  बैंकिंग सेवा काल की सर्वश्रेष्ठ पदस्थपना साबित  हुई। पहली बार रायपुर पहुँचने पर हमारे बैंक के मात्र एक-दो अंतरंग  मित्रों के सिबाय, अंजान और अपरचित इस शहर मे कोई भी जानकार न था। पर बैंक के  लगभग चार वर्ष बाद हमारे बैंक के  सहचर, सहयोगी, साथी, बैंक के माननीय संरक्षक एवं  ग्राहक गण, मेरे आवास के मेरे पड़ौसी, मित्रगण एवं शुभचिंतक रूपी एक बहुत बड़ा कोषालय छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी मे हमने इस दौरन एकत्रित कर लिया था। बीस साल बाद रायपुर के  मित्रों, शुभचिंतकों, पडौसी और बैंक के माननीय ग्राहकों से मिले सम्मान, स्नेह, प्यार और अपनेपन रूपी धरोहर हमारे अमूल्य खजाने की शोभा आज भी बढ़ा रही है।

शाखा के उद्घाटन के अवसर के उस एक पीढ़ादायक  क्षण को मै आज भी नहीं भूल पाया जब हमारे नियंत्रण कार्यालय के एक  उच्च अधिकारी ने उद्घाटन के मुख्य कार्यक्रम के पश्चात फुर्सत के समय बातों ही बातों मे ये कह कर मेरा ध्यानाकर्षण गोदरेज कंपनी की उस तांत से बुनी हत्थे बाली मैनेजर की कुर्सी की तरफ इशारा  कराया जिस पर मै बैठा था  कि "you  know घूमने बाली कुर्सी तुम्हें allow नहीं है"। मै ये सुनकर घोर आश्चर्य चकित और हैरान था कि मैंने तो कुर्सी के संदर्भ मे कभी कोई भी सवाल किया ही नहीं था तो क्योंकर माननीय महोदय ने इस घूमती कुर्सी न देने की बात का स्मरण मुझे कराया? मै बैसे ही उस समय वक्त और हालात का सताया हुआ था कुछ भी उत्तर/प्रत्युत्तर देने की स्थिति मे न था। मन मार कर चुप रह गया!!  पर न जाने क्यों रह रह कर मेरे दिमाक मे उन माननीय के "घूमने बाली कुर्सी" के बारे मे  कहे गये बो शब्द  "you know.........कानों मे डाले गये गर्म तेल की तरह    बड़े दिनों तक गूँजते रहे। जब जब वे शब्द मुझे याद आते मै हीन भावना से ग्रसित हो अपराध बोध  से भर जाता। बगैर किसी अपराध या त्रुटि के उन माननीय द्वारा हमारे प्रति इस व्यवहार को आज तक मै  समझ न सका  कि आखिर क्यों कर उन्होने मुझे  घूमने बाली कुर्सी न देने की बात का स्मरण कराया जबकि मैंने उन्हे शाखा के उद्घाटन बाले दिन या शाखा के उद्घाटन के पूर्व तैयारी के समय घूमने बाली कुर्सी तो क्या किसी भी तरह की सुविधा, वस्तु या स्थान की  ईक्षा या आकांक्षा प्रकट की थी? तो फिर घूमने बाली  कुर्सी की क्या विसात!! मेरा इस सद्वाक्य मे द्रढ़ मत था कि "दूसरों के साथ वैसी ही उदारता बरतो, जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है" माननीय महोदय शायद इस सद्वाक्य को स्मरण न रख सके। धीरे धीरे कुछ दिनों और महीनों मे घूमने बाली कुर्सी की बात हमारे मानस पटल से विस्मृत हो गई और सहज़ ढंग से बैंक का कार्य अपनी सामान्य गति से चलता रहा।

कुछ महीनों बाद शाखा मे एक दिन सहायक प्रादेशिक प्रबन्धक का दौरा हुआ। एआरएम महोदय ने अस्थाई छोटे परिसर मे उपलब्ध साधनों के रहते  बैंक के निरीक्षण के दौरान ही कुछ आवश्यक निर्देश दिये इसी दौरान उन्होने मेरी हत्थे बाली तांत से बनी कुर्सी के बारे मे पूंछा और बैंक की नीति के तहत घूमने बाली कुर्सी के न होने पर  सवाल किया? मैंने जब उन्हे शाखा के उद्घाटन पर उन  उच्च अधिकारी के "घूमने बाली कुर्सी" न देने के निर्णय से अवगत कराया। तब  उन्होने नई शाखाओं के खोलने पर बैंक द्वारा  उपलब्ध कराये जाने बाले फ़र्निचर के प्रधान कार्यालय की नीतियों और  निर्देश का उल्लेख करते हुए गोदरेज के स्थानीय डीलर को फोन कर "घूमने बाली कुर्सी" का कोटेशन प्रादेशिक कार्यालय भेजने और कुर्सी क्रय करने की अग्रिम  अनुमति दी तो मै एक बार फिर गुजरे जमाने की घूमने बाली कुर्सी की कहानी मे कहीं खो गया। हमे ये सुन और जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ बैंक की नीति होने के बाबजूद उन माननीय द्वारा घूमने बाली कुर्सी न देकर वे हमे क्या संदेश देना चाहते थे? क्या उनका इरादा हमे हेय द्रष्टि से दिखाने का था? हमारे ऊपर उनकी पूर्वाग्रह ग्रसित सोच का तो कोई  विशेष असर नहीं हुआ  पर उनके बारे मे मेरे दिल को सोचने के लिये मजबूर जरूर कर दिया कि क्यों कुछ आदमी अपनी पद प्रतिष्ठा से मिली शक्ति के मद मे अहंकार से ग्रसित हो अपने अधीनस्थों के प्रति इतना दुराग्रह रखते है?? अपनी हठधर्मिता से वशीभूत ऐसे लोग अपने मातहतों  के विरुद्ध ऐसा पूर्वाग्रह क्यों रखते है? वे भूल जाते है कि पद प्रतिष्ठा से प्राप्त शक्ति, यौवन की तरह  चिरस्थाई नहीं है? प्रबंधन मे बैठे कुछ लोगो की इस नकारात्मक सोच ने हमारी संस्थान एवं मानव संसाधन का बड़ा अहित किया है। मेरा मानना है कि पद प्रतिष्ठा से प्राप्त शक्ति का उपयोग गुरवाणी के उस शबद कीर्तन के सार की तरह होना चाहिये जिसमे "शूरा सो पहचानिये जो लरे दीन के हेत, शूरा सोई" । असली  मान सम्मान बही है जब पद प्रतिष्ठा रूपी शक्ति के न रहने के बाद भी आपके मित्र, शुभचिंतक एवं  अधीनस्थ  आपके कार्य व्यवहार के प्रति वही मान सम्मान और श्रेष्ठता का भाव रखे जो आपके पद पर रहते हुए रखते थे।

कुछ दिन बाद जब घूमने बाली कुर्सी आई। मेरे मन मे संत कबीर दास जी कि इन पंक्तियाँ का स्मरण हो आया कि "दास कबीर जतन करि ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया"। तब भी उस कुर्सी पर मै अनासक्त भाव से इस तरह  बैठा कि एक दिन इसे छोड़ कर हमे पुनः जाना है। कुर्सी पर बैठे बैठे मन ही मन अपने और अपने हालात पर काफी हँसता और मुस्कराता रहा  कि उन माननीय ने शायद मुझे घूमने बाली कुर्सी न दे कर मुझे मेरी हैसियत दिखाई थी या कदाचित अपनी .......  बताई थी!!!!

विजय सहगल