"रेवाड़ी
- हैरिटेज स्टीम लोको शेड,
हरियाणा"
गुरुग्राम
के अपने प्रवास पर रविवार दिनांक 07 दिसम्बर 2025 को यूं ही अचानक हरियाणा के
रेवाड़ी स्थित भाप के इंजिन का संग्रहालय देखने का कार्यक्रम बना। इस हैरिटेज लोको
शेड के बारे मे पहले सुन रक्खा था कि रेवाड़ी
के लोको शेड मे पुराने भाप के रेल इंजिन के साथ उस समय के प्रचलित अन्य रेल
उपकरणों का एक म्यूजियम है। गुरुग्राम से लगभग 50 किमी दूर इस मध्यम श्रेणी शहर मे पहुँचने मे लगभग डेढ़ घंटा लगा। रेल्वे
स्टेशन रेवाड़ी के पास स्थित इस भाप के इंजिन की विरासत संग्रहालय को देखने का
अनुभव बहुत अच्छा रहा। काफी बड़े क्षेत्र मे फैले इस लोको शेड का रखरखाब साफ सुथरा और अच्छा था।
सोमवार को अवकाश वाले इस म्यूजियम का प्रवेश
शुल्क अलग अलग प्रदर्शनीयों के लिए अलग अलग था। कुल सौ रुपए के शुल्क के साथ
सभी प्रदर्शनी शामिल थी जिसमे बड़े और बच्चों का आकर्षण टोय ट्रेन की सवारी भी
शामिल थी। मुझे लगता है रेल, रेल गाड़ी को देखना मेरी तरह ही हर भारतीय का
प्रिय शौक रहा होगा। जब बात पुराने भाप इंजिन को देखने को ही तो क्या कहना। लेकिन
बात जब देखने के साथ इंजिन मे चढ़ने, देखने वीडियो और फोटो
खींचने को हो तो बात सोने पे सुहागा की हो जाती है। रेवाड़ी के इस संग्रहालय इन सभी
अभिलाषाओं, इच्छाओं की पूर्ति बड़े ही सहज और सरल ढंग से हो
जाती है। जिन लोगों को सवारी गाड़ी मे बैठने के अलावा कभी इंजिन या माल गाड़ी के गार्ड के डिब्बे को
देखने, बैठने, कभी सवारी करने या चढ़ने
का मौका नहीं मिला उनकी आकांक्षाओ की पूर्ति बड़ी आसानी से यहाँ हो जाती है क्योंकि
इस म्यूजियम मे यहाँ रखे इंजिन मे चढ़ कर आपको अंदर से इंजिन का अवलोकन कर बारीकी से देखने की अनुमति है।
प्रायः
हर भारतीय का रेल मे यात्रा करने, रेल स्टेशन पर जाने और रेल यात्राओं के
खट्टे-मीठे अनुभवों की एक लंबी फेहरिस्त होगी जिनके स्मरण मात्र से आज भी रोमांचित
हुआ जा सकता है। मैंने रेल इंजिन के उस दौर को देखा है जहां भाप के दो तरह के
इंजिन हुआ करते थे। इन दोनों तरह के रेल इंजिन को इस संग्रहालय मे फिर से देखना रेल
विभाग की अपनी धरोहर और उसके इतिहास पर
दृष्टिपात करना जैसा था। गोल और नुकीले इंजिन को बचपन मे रेल यात्रा करते और देखते
बड़ा हुआ। गोल इंजिन को मै दूसरे आयाम की श्रेणी मे रखता था जो मालगाड़ी और साधारण
पैसेंजर गाड़ियों मे उपयोग होते थे और अपनी सुस्त और धीमी गति के लिए जाने जाते थे, जबकि नौक दार इंजिन उन दिनों ताज एक्स्प्रेस मे उपयोग होता था शायद ये ही
पूर्वाग्रह था जो नुकीले इंजिन को गोल मुंह वाले इंजिन से श्रेष्ठता की श्रेणी मे
रखता था। 1893 मे स्थापित रेवाड़ी भाप
इंजिन लोको शेड मे लगभग 100 साल पुराने 13 भाप इंजिनों को रखा गया है जो कभी भारतीय रेल यातायात मे अपनी
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। 2001 मे इस
लोको शेड को विरासत श्रेणी का दर्जा दिया गया। यध्यपि इस लोको शेड के एक बोर्ड पर बॉलीबुड़ और अन्य
भारतीय फिल्मों मे इस शेड मे रखे गए इंजिन और उनके फिल्मांकन की फिल्मों के नाम
दर्शाये गए है। पर भारतीय फिल्मों की
चकाचौंध से अप्रभावित मेरा दृढ़ मत है कि वास्तविक हीरो तो हमारी विरासत के ये भाप
इंजिन ही हैं जिनकी चकाचौंध उन फिल्मी सितारों से कहीं से भी कभी भी कम नहीं हुई।
समय की मार ने बेशक फिल्मी सितारों के ग्लैमर और उनकी शक्लों सूरत को विरूपित कर
दिया हो पर यहाँ रखे भाप के इंजिन की खूबसूरती और आकर्षण आज भी बरकरार है, जिनको रेल विभाग के रेवाड़ी लोको शेड के सक्षम और कार्यकुशल प्रबंधन और इंजीनियरों ने इन इंजिन का भलिभांति
रखरखाव कर इस को दर्शनीय और जीवंत बनाने मे अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है।
रेवाड़ी का लोको शेड प्रबंधन इसके लिए बधाई का पात्र है।
कुछ
अद्भुत और अभूझ सूचनाएँ यहाँ पर लगे सूचना पट मे दर्शाई गई हैं। आम बोलचाल की भाषा
मे रेल पटरियों के बीच की दूरी का वर्गीकरण का वर्णन "गेज़" के आधार पर
करते हैं। सामान्यतः ब्रॉड गेज़, मीटर गेज़, और नैरो गेज़ की
चर्चा होती है। रेवाड़ी के इस लोको शेड मे
यह तकनीकि जानकारी भी प्रदर्शित की गयी है
जो सामान्य ज्ञान की दृष्टि से अद्भुत है। एक बोर्ड पर दो पटरियों के बीच की दूरी के
आधार पर रेल के वर्गीकरण को पाँच वर्गो मे विभक्त कर दर्शाया गया है। एक अन्य बोर्ड पर रेल इंजिन का वर्गीकरण इंजिन
मे आगे, बीच मे और पीछे लगे हर छोटे बड़े पहियों की जोड़ी के
आधार पर किया गया है जो अद्भुत और निराली जानकारी है। लेकिन यहाँ संचालित टोय
ट्रेन की सवारी मे उपयुक्त सवारी डिब्बे और इंजिन का वर्गिकरण और गेज़ अनोखा और
बेमिसाल है। ऐसा प्रतीत होता हैं कि हम जैसे बरिष्ठ वयस्क बच्चों की साइकल पर बैठ
यात्रा कर रहे हों। इस ट्रेन की बेमिशाल सवारी शायद दुनियाँ मे इकलौती हो। छोटे से
क्षेत्र मे प्लेटेफ़ोर्म, ओवर ब्रिज, नदी, क्रोससिंग आदि सब बहुत ही सुंदर तरीके से बनाया गया। छोटे बच्चों, किशोरों को इस संग्रहालय मे और भी
आनंद आयेगा।
चूंकि
उन दिनों उपयुक्त भाप के इंजिन के लिए कोयला और पानी आवश्यक तत्व थे जिनके बिना
इंजिन का गतिमान होना असंभव था। कोयले और पानी के भंडार इंजिन के पिछले भाग मे
भंडारित कर रखे जाते थे। मै बचपन मे देखा करता था कि कैसे एक सहायक ड्राईवर बेलचे
की सहायता से आवश्यक मात्रा मे पत्थर
कोयले को पीछे से इंजिन की भट्टी मे डालते थे। ये एक श्रम साध्य काम था जिसमे
बलिष्ठ और सामर्थ्य की आवश्यकता होती थी। इंजिन मे कोयले के भंडार चढ़ाने का कार्य
लोको क्षेत्र मे होता था जहां मजदूर कोयले को बांस की टोकरियों मे भरकर एक लंबे
पटरे पर चढ़ कर इंजिन के पिछले हिस्से मे डालते थे ताकि रेल की यात्रा मे कोयले की
लगातार पूर्ति होती रहे। एक निश्चित दूरी तय करने के बाद हर भाप इंजिन को लोको शेड
मे लाया जाता था। लेकिन इंजिन मे भाप के निर्माण हेतु पानी का भंडारण मुख्य स्टेशन
के अगले भाग मे बने एक मोटी पानी की पाइप लाईन से होता था। ट्रेन के स्टेशन पर आते
ही एक कर्मचारी पानी की इस पाइप लाइन को 90 डिग्री घुमा कर इंजिन की पानी की टंकी
को पूरा भरता था। रेवाड़ी की इस लोको शेड मे इसका भी प्रदर्शन किया गया जो अद्भुत
है। पुराने सिग्नल का दर्शन भी इस लोको शेड मे किया गया है। सिग्नल यदि 90 डिग्री
की दिशा मे सीधा है तो इसका मतलब होता था कि ट्रेन को स्टॉप करो और यदि 45 डिग्री
की दिशा मे सिग्नल नीचे होता इसका तात्पर्य होता कि ट्रेन को चलाइए! ये ही दिशा
रात्रि मे हरी और लाल लाइट के रूप मे
ड्राईवर का मार्गदर्शन करती थी।
मालगाड़ी
के गार्ड का एक आधुनिक डिब्बे का प्रदर्शन भी इस शेड मे किया गया है जिसको देख कर
मुझे हार्दिक प्रसन्नता और खुशी हुई। चूंकि मै भावनात्मक रूप से मालगाड़ी के गार्ड
के डिब्बे से बहुत ही नजदीक से जुड़ा हुआ हूँ क्योंकि मेरे पिताजी भी रेल विभाग
झाँसी मे गार्ड के रूप मे कार्यरत थे। उन दिनों मालगाड़ी के गार्ड के डिब्बे मे
सुविधाओ का घोर अभाव था। बैठने के लिये लोहे की चादर की शीट और बैसी ही लोहे की
शीट की टेबल। खिड़की तो थी पर काँच की कोई व्यवस्था नहीं होती थी। गार्ड के डिब्बे मे टॉइलेट का कोई प्रावधान नहीं
होता था। जब टॉइलेट नहीं थी तो लाइट और पानी का तो सवाल ही नहीं था। सर्दी की ठंड
हो या गर्मी की तपिश या लू। बचाव का कोई इंतजाम नहीं। लेकिन मालगाड़ी के इस डिब्बे
मे गार्ड के बैठने के लिये घूमने वाली प्लास्टिक/रैगजीन की कुर्सी दोनों दिशाओं मे
देखने हेतु दो कुर्सी देख कर अच्छा लगा कि
तकनीकि ने यात्री की सुवधाओं के साथ रेल्वे ने अपने स्टाफ की सुविधाओं का भी ध्यान
रक्खा। बगल मे टॉइलेट और बाहर और आगे-पीछे
देखने के लिये काँच की खिड़की को देख कर रेल विभाग द्वारा न केवल यात्रियों अपितु अपने स्टाफ के लिये दी जा रही
सुविधाओं को देख कर सकून का अनुभव हुआ।
रेवाड़ी
रेल संग्रहालय मे एक भाप इंजिन चालित रोड रोलर भी रखा है जो नायाब वस्तु की श्रेणी
का है। रेल संग्रहालय मे इंजिन का एक मोडल रक्खा है जो बहुत सुंदर लगता हैं। रेल
विभाग मे उपयोग होने वाली टिकिट मशीन जिसमे दिनांक और समय पंच करते थे। रेल गार्ड
और ड्राईवर द्वारा उपयोग मे लाये जाने वाले लैम्प, वस्तुओं को तौलने वाली मशीन, ऑफिस टाइप राईटर और कुछ चित्र जिनमे घोड़े और बैलों से चलने वाली रेल
दर्शाई गयी हैं। सुंदर हरे भरे पार्क के
बीच इस हैरिटेज लोको शेड को देखना एक सुखद अनुभव था, टॉइलेट
और कैंटीन की व्यवस्था भी है पर चाय कॉफी उस दिन उपलब्ध नहीं थी। यदि संभव हो तो
अपने परिवार के साथ इसे देखने अवश्य जाना चाहिये।
विजय
सहगल



















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