"जगन्नाथ
मंदिर ग्राम बेहटा-कानपुर"
बैसे तो मुझे जगन्नाथ भगवान का मंदिर ओड़ीशा राज्य के पुरी
नगर मे होने की जानकारी थी और मुझे वहाँ चार-पाँच
बार जाने का सौभाग्य मिला, पुरी शहर और
भगवान जगन्नाथ मंदिर के साथ पुरी के समुद्र तट मेरे प्रिय स्थानों मे से एक रहे
हैं जहां पर मै हमेशा जाना पसंद करता हूँ।
लेकिन 4 नवंबर 2025 को घाटमपुर के भीतरगाँव मे गुप्तकालीन मंदिर के दर्शन के दौरान
वहाँ के पुरातत्व विभाग के कर्मचारी शाही जी ने मुझे वहाँ से 3-4 किमी दूर स्थित
ग्राम बेहटा, कानपुर मे भगवान जगन्नाथ के मंदिर जाने का आग्रह किया
जो भगवान विष्णु के अवतार जगन्नाथ के साथ ब्रह्मा और भगवान शिव को भी समर्पित है।
इस मंदिर के बारे मे शाही जी ने बताया उक्त
प्राचीन मंदिर की एक चमत्कारिक विशेषता भी है कि इस मंदिर से मानसून के पूर्व आने
वाले मानसूनी वर्षात की भविष्यवाणी होती हैं
इसलिए इसे मानसून मंदिर भी कहते हैं। मंदिर मे भेंट
हुई इस मंदिर के पुजारी पीताम्बर वस्त्र धारी पंडित श्री दिनेश शुक्ला जी से जिन्होने बतलाया मानसून आने के पूर्व कानपुर शहर के लोगों के साथ समाचार पत्र और टीवी
मीडिया के लोग भी मंदिर के अंदर की छत्त
पर लगे पत्थर पर भरी जून की गर्मी मे भी उभरी पानी की बूंदों के देख कर मानसून के पहले की जाने वाली भविष्यवाणी देखने और सुनने के
लिए भरी संख्या मे इस प्राचीन मंदिर मे एकत्रित होते हैं। मंदिर की छत्त पर जितनी
अधिक पानी की बूंदे उभरती हैं मानसून भी उतना अच्छा आता हैं। इस वर्ष पानी की
बूंदों से टपकते पानी के संदेश इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि मानसून मे बाढ़ के से हालात आ सकते हैं,
और ऐसा हुआ भी। ये तो रही इस मंदिर से
जुड़े मौसम और मानसून से जुड़ी चमत्कार की बात। प्रशासन के लोगो को कहना हैं कि
मंदिर से जुड़े इस चमत्कारिक रहस्य जानने के लिये अनेकों बार प्रयास किए गए लेकिन
इस रहस्य को नहीं जान सके। लेकिन मौसम की इस भविष्यवाणी को क्षेत्रीय किसान अवश्य
लाभान्वित होते हैं।
11वीं सदी मे निर्मित मंदिर के वास्तु निर्माण भी अद्व्तिय
आश्चर्य जनक है,
मंदिर के बाहर और मंदिर के अंदर की वास्तु निर्माण शैली और निर्माण मे प्रयुक्त
सामाग्री भी अलग अलग है, क्योंकि ऐसी बेसर वास्तु शैली साधारणतः मंदिरों मे देखने को नहीं मिलती। एक विशाल समतल आयताकार
चबूतरे पर मंदिर अर्धगोलाकार रूप मे बौद्ध स्तूप जैसी शैली मे मंदिर बना है। प्रायः
मंदिर का मंडप मंदिर के ऊपरी भाग का वह हिस्सा होता हैं जो अर्ध गोलाकार गुंबद या
पिरामिड की स्टाइल मे ऊंचा होता हैं और आम तौर पर पत्थरों के स्तंभों पर अभिलंबित
होता है, पर इस जगन्नाथ मंदिर की
विशेषता जो मैंने देखी पूरा मंदिर ही अर्ध गोलाकार रूप मे बना हैं और उक्त गुंबज
बिना किसी स्तंभों या दीवारों के आधार के सीधा ही धरातल पर बना है जो गुवाहाटी मे माँ
कामाख्या मंदिर जैसा दिखलाई देता है। मंदिर
के प्रवेश द्वार की वास्तु शैली कुछ कुछ ओरछा मे बने महलों के प्रवेश द्वार से
मिलती जुलती है जिसे बुन्देली शैली कहा जाता है। (फोटो संलग्न) प्रवेश द्वार या
गोपुरम, तत्पश्चात मंडप कक्ष
प्रदक्षिणा पथ आदि इस मंदिर मे दिखलाई नहीं देते,
सीधे ही अर्ध वल्याकार गुंबज मे ही प्रवेश द्वार के माध्यम से मंदिर मे प्रवेश का
प्रावधान है। मंदिर के शिखर पर ध्वज पताका के साथ ही जगन्नाथ मंदिर का प्रतीक
चिन्ह धातु से बना अष्ठ फ़लक की गोल आकृति
लगी है जैसा की पुरी के मंदिर मे दृष्टिगोचर होता है। मंदिर की बाहरी दीवारे चूने
गारे से बनी प्रतीत होती हैं पर मंदिर का आंतरिक कक्ष पत्थरों से बने पिरामिड की
तरह है जो बहुधा उत्तर भारतीय मंदिरों मे दिखलाई पड़ता है। मंदिर का रख रखाब उत्तम
था। पूरा परिसर साफ सुथरा दिखलाई दिया जिसे देख कर मन प्रफुल्लित हो उठा। मंदिर
परिसर मे प्राचीन कुआं और तालाब भी है।
मंदिर की आंतरिक रचना मे एक छोटा सामान्य
आकार का गर्भगृह है जो एक छोटे से दालान से होकर गुजरता हैं। इस दालान मे मुख्य दरवाजे के अतिरिक्त दायें एवं
बाएँ दो प्रवेश द्वार और हैं पर जो स्थायी रूप से बंद है। मंदिर का आंतरिक निर्माण चारों तरफ बने कलात्मक पाषाण स्तंभों से बना हैं। मंदिर के गर्भगृह
मे एक ढाई-तीन फुट ऊंचे चबूतरे पर काले पत्थरों से बनी भगवान जगन्नाथ की 5-6 फुट ऊंची प्रतिमा आसमानी रंग
की पोशाक मे सुंदर दिखलाई पड़ रही थी। उनके नीचे उसी आसमानी रंग के वस्त्रों से
सुसज्जित उनके अग्रज बलदाऊ की छोटी
प्रतिमा है। इस प्रतिमा के चारों ओर समान काले पत्थरों से ही बनी भगवान के
दशावतार की प्रतिमाएँ चारों ओर बनी हैं। मंदिर मे बने सामान्य चबूतरे के उत्तरी
दिशा मे भगवान शिव की झलारी बनी है और मंदिर के ऊपरी भाग मे भगवान ब्रह्मा जी की
प्रतिमा है और स्वयं भगवान विष्णु,
जगन्नाथ जी के रूप मे मंदिर के मुख्य देवता के रूप मे विराजमान हैं।
पुजारी जी श्री दिनेश शुक्ल जी ने पुराणों
की कथा को उद्धृत करते हुए बताया कि इस मंदिर की स्थापना का काल ओड़ीशा के जगनाथ
मंदिर से भी पूर्व का हैं और ये क्षेत्र बड़ा पवित्र और पूज्यनीय हैं क्योंकि जब
भगवान शिव देव लोक से साधारण मानवी के रूप मे पृथ्वी लोक पर अवतरित हुए तो उन्होने
अपनी दिव्य, दैवीय और आलौकिक
शक्तियों को भगवान विष्णु को सुपुर्द किया ताकि संसार का पालन पोषण सुचारु रूप से
चल सके। यही कारण है कि भगवान विष्णु जो कि जगत के स्वामी हैं और जिन्हे जगत के पालन हारे के रूप मे जगन्नाथ कहा जाता
हैं। यही वो पवित्र स्थान है जहां भगवान शिव और विष्णु के बीच दिव्य शक्तियों का आदान प्रदान हुआ था।
किंवदंतियाँ, कहावते और कहानियाँ कुछ भी हों पर इस मंदिर की
भव्यता, दिव्यता,
तेज और गौरव अद्व्तिय है। मंदिर का वास्तु निर्माण और रख रखाव उत्तम होने के साथ
ही साथ शांत वातावरण मन को लुभा लेता है। मंदिर के बाहर किसान शिव नाथ,
जिस तरह धान की उड़ावनी कर धान को अलग अलग कर
रहे थे वे एक सुंदर, शांत और सुरम्य ग्रामीण
परिवेश उत्पन्न कर रहे थे जो नारायण को नर
के रूप मे देखने का सुखद संयोग जैसा प्रतीत हो रहा था।
जय जगन्नाथ!!
विजय सहगल








1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर ढंग से आपने मंदिर के इतिहास,उसकी मान्यताओं और स्थापत्य शैली का विश्लेषण किया अद्वितीय है । इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं ।
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