शनिवार, 24 जनवरी 2026

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, वेरुल, संभाजी नगर, महाराष्ट्र

 

"घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, वेरुल, संभाजी नगर, महाराष्ट्र"







बचपन मे भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंग का स्तोत्र संस्कृत मे  पढ़ा था जो पवित्र ज्योतिर्लिंग को कंठस्थ करने का सरल और सुंदर माध्यम था।

॥ द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् ॥ 

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम् ॥१॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् ।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥२॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥३॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥४॥

सनातन धर्म और हमारी भारतीय सांस्कृति मे ऐसी मान्यता हैं कि भारत के विभिन्न स्थानों मे स्थापित ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना एक पवित्र कार्य है। 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों का भारत के भिन्न भिन्न  क्षेत्रों मे स्थित होने के कारण  वहाँ की सांस्कृति, सभ्यता भाषा और रहन सहन से भी परिचय होता है। इस प्रकार मै इस तीर्थ यात्रा मे पूरे 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के पुण्य का भागी हूँ। स्तोत्र के क्रमानुसार शुरुआत न सही लेकिन समाप्ती महाराष्ट्र के संभाजी नगर मे स्थित इस घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग से हुई।

13 जुलाई 2025 को पूना से प्रातः 8 बजे  चलकर, राजणगाँव महागणपति के दर्शन लाभ लेते हुए,  260 किमी॰ दूर संभाजी नगर के  वेरुल गाँव मे स्थित  घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। होटल मे कुछ क्षण  विश्राम पश्चात लगभग 3 बजे घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। मंदिर से 1-1.5 किमी॰  पहले एलोरा गुफाओं का दिखलाई देने पर हार्दिक प्रसन्नता हुई, क्योंकि एलोरा गुफाओं का  इतनी नजदीक होने का अहसास हमे ने था। इसलिए सर्वप्रथम भगवान घृष्णेश्वर महादेव के दर्शन का सद्कार्य करने तत्पश्चात अगले दिन सुबह एलोरा गुफाओं को देखने के निश्चय के साथ घृष्णेश्वर महादेव मंदिर की ओर बढ़े। पूछते पांछते मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे क्योंकि रास्ते को फल-फूल, प्रसाद और अन्य वस्तुओं के दूकानदारों ने सारा रास्ता अवरोधों से घेर रक्खा था। जूते चप्पल आदि की समुचित व्यवस्था नहीं थी पुष्प-पत्र वाले दुकानदार के पास ही उन्हे रख कर आगे बढ़े। अव्यवस्था मंदिर के प्रवेश द्वार तक थी। प्रवेश द्वार पर त्वरित दर्शन और साधारण दर्शन हेतु अलग अलग प्रवेश द्वार थे। पूंछने पर उपस्थित कर्मचारियों ने सुझाव दिया कि दर्शनार्थियों की भीड़ ज्यादा नहीं है साधारण निशुल्क  दर्शन आधा घंटे मे हो जाएंगे। समयाभाव न था, कुछ स्थानीय सांस्कृति सभ्यता को नजदीक से महसूस करने के वशीभूत साधारण निशुल्क दर्शन की लाइन मे लग गए। अंदर घुसते ही मंदिर आयताकार प्रांगण की परधि के किनारे किनारे,  लंबी लंबी लोहे की रैलिंग मे लोगो की भीड़ देख कर लगा कि शायद मेरा निशुल्क दर्शन का निर्णय गलत था। ज़िग-ज़ैग लाइनों मे आगे-पीछे फिर आगे घूमना, इंतज़ार करना, थोड़ा कष्ट प्रद लग रहा था, लेकिन श्रद्धालुओं का तेज गति से आगे बढ्ने के कारण उत्साह बना रहा। तेज गति से लाइन बढ्ने के कारण लगभग आधा घंटे मे ही हम मंदिर के मंडपम के नजदीक थे। अंदर व्यवस्था अनुशासित थी। साफ सफाई की समुचित व्यवस्था थी कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि मंदिर प्रांगण के अंदर और मंदिर के बाहर व्यवस्था और अनुशासन मे जमीन आसमान का फर्क था। प्रवेश द्वार के पहले जैसा कि मंदिर प्रबंधन का नियम है कि पुरुषों के लिए ऊपर के वस्त्र उतारकर सिर्फ अधो वस्त्र धोती, पाजामा या पेंट मे ही प्रवेश की अनुमति है। महिलाओं को भारतीय परिधान मे प्रवेश की अनुमति है। इन नियमो का पालन करते हुए हम मंदिर के बहु आयामी मंडपम से होते हुए गर्भ गृह मे पहुंचे। सभी श्रद्धालुओं ने क्रमानुसार घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग महादेव के दर्शन और स्पर्श कर अपने को धन्य मानते हुए दर्शन किए। पत्र पुष्प अर्पित कर हम भोले नाथ को दंडवत कर मंदिर के गर्भ गृह से बाहर निकले। दर्शन पश्चात मंदिर भवन के भाहर बने आँगन मे जाने के प्रयास किया ताकि मंदिर की पूर्ण अर्ध परिकरीमा कर कुछ यादगार फोटो ले सके। कुछ व्यवसायिक फोटोग्राफर भी वहाँ लोगो की फोटो मंदिर भवन के साथ ले रहे थे। बड़े जद्दो-जहद के बाद कुछ मिनिट के लिए मंदिर प्रांगण मे जाने की अनुमति मिली। यदि वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर के आँगन की तरह यहाँ घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग के आँगन प्रांगण मे सुरक्षा व्यवस्था के पैमानों का अनुपालन करते हुए प्रांगण मे दर्शन और कुछ ध्यान आदि की अनुमति हो तो और भी अच्छा होगा। मंदिर का स्थापत्य भीमाशंकर मंदिर की तर्ज़ पर ही था। गर्भ गृह के पूर्व छोटा मंडपम। एक ऊंचे चबूतरे पर दक्षिण भारतीय सनातन हिन्दू मंदिरों और मराठा शैली का अनूठा मिश्रण है। 18वीं सदी मे रानी अहिल्या बाई होल्कर ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। मंदिर का निर्माण लाल ज्वालामुखीय पत्थरों से किया गया है। 5 स्तरीय शिखर जिसके शीर्ष पर स्वर्ण कलाश स्थापित है,   24 नक्काशीदार स्तंभों वाले सभा मंडपम की नक्काशी देखते ही बनती है।   

मंदिर परिसर के बाहर निकलने का एक बहुत ही छोटा दरबाजा था जो ठीक मंदिर के प्रवेश द्वार के  सामने था। मुझे ऐसा लगता है व्यवस्था की दृष्टि से इस छोटे कम ऊंचाई वाले दरवाजे को निकासी द्वार कहा जा रहा है वह वास्तव मे प्रवेश द्वार ही है क्योंकि प्रायः मंदिर के प्रवेश द्वार इसलिये छोटे और कम ऊंचाई के रक्खे जाते है ताकि मंदिर मे प्रवेश करते हुए चाहे राजा हो या रंक भगवान के दरबार मे झुक कर ही प्रवेश करें। मंदिर के बाहर आते ही अतिक्रमण अव्यवस्था से पुनः आमना-सामना हुआ। कदम कदम पर दुकानों के अतिक्रमण भिखारियों की भीड़ दिखलाई दी।

बापसी मे मंदिर के नजदीक ही छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी राजे भोसले की भव्य और सुंदर कमल के फूल की आकृति लिए हुए गुंबज छोटी किन्तु आकर्षक समाधि बनी हुई है। इस एतिहासिक समाधि को और भी आकर्षक और भव्य रूप शासन को दिया जाना चाहिए जो छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा की शान और स्वाभिमान के अनुरूप नहीं किया गया। समाधि के चारों ओर और आसपास अतिक्रमण और गंदगी नज़र आ रही थी जो सर्वथा अनुचित थी। शासन को इस ओर त्वरित कार्यवाही करना चाहिए।

वेरुल गाँव के नजदीक एक सुखद संयोग भी देखने को मिला जहां धर्मांध, निर्दयी, निष्ठुर क्रूर और कठोर औरंगजेब की कब्र है। मैंने उसकी कब्र पर जाना तो उचित नहीं समझा परंतु उस दिशा मे उस शैतानी आत्मा को धिक्कारते हुए उसे कोसा कि, हे! क्रूर तानाशाह जिस सनातन धर्म पर जज़िया लगा कर तूने हिंदुओं का  नरसंहार किया, हे दुष्ट!!, उपद्रवी!!  औरंगजेब, देख!! सनातन आज और भी मुखर होकर पहले से ज्यादा पुष्पित और पल्लवित होकर फल फूल रहा है और विश्व कल्याण के लिए वसुधैव कुटुंबकम का संदेश फैलाने की ओर अग्रसर है।     

विजय सहगल                  

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