"गरीबी
हटाओं आंदोलन की असफलता की अर्धशती "
वास्तव मे कभी कभी हमे अपनी उपलब्धियों के
साथ साथ कभी अपनी असफलताओं पर भी विचार मंथन कर अपना मूल्यांकन करना चाहिये।
कदाचित यह आत्म निरीक्षण हमे हमारी भावी योजनाओं के क्रियान्वयन मे सहयोग कर सके।
ऐसी ही देश की गरीबी हटाओं योजना पर विभिन्न सरकारों ने बड़ी बड़ी योजनाएँ बनाई पर
दुर्भाग्य से स्वतन्त्रता के 76 वर्ष पश्चात भी देश की गरीबी उन्मूलन के वांछित
परिणाम नहीं दिखाई दिये।
1971 मे इन्दिरा गांधी ने गरीबी हटाओ देश
बचाओ का नारा दिया और इस तरह गरीबी हटाओ के नाम पर उन्हे दो तिहाई बहुमत से सत्ता हांसिल हुई पर गरीबी हटाने के सिवा सब कुछ हुआ,
यथा प्रचार प्रसार, बड़े-बड़े बजट पर गरीबी
जश के तश बनी रही और ये योजना बुरी
तरह फ्लॉप होकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी।
5वीं पंचवर्षीय योजना मे (1974 से 1978 तक)
जब इन्दिरा गांधी के विरोधियों ने इन्दिरा हटाओ का नारा दिया तो जवाब मे उन्होने
गरीबी हटाओ का नारा दिया एक बार फिर वे प्रधानमंत्री के रूप मे सत्तासीन हुईं पर गरीबी हताओं के नाम से "ढाक के वही तीन पात"
रहे।
स्व॰ राजीव गांधी ने भी इन्दिरा गांधी के पद
चिन्हों पर चलते हुए गरीबी हटाओ का नारा दिया था। छटी पंचवर्षीय योजना (1980 से
1985 तक) का मुख्य उद्देश्य गरीबी को समाप्त करना था। योजना तो समाप्त हो गयी पर
गरीबी ज्यों की त्यों बनी रही। वहीं श्री राजीव गांधी ने सातवीं पंच वर्षीय योजना
(1985 से 1990) के अंतर्गत एक बार फिर गरीबी विरोधी कार्यक्रम के माध्यम से प्रयास
किए।
माननीय श्री मनमोहन सिंह ने 1975 मे इन्दिरा
गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम को 21वीं शताब्दी के अनुरूप पुनर्गठित कर गरीबी उन्मूलन
को प्रतिस्थापित कर प्रासंगिक बनाने की कोशिश की। आंदोलन से प्रभावित होकर 12वी पाँच वर्षीय योजना
2012 मे शुरू हुई और इस दौरान गरीबी मे 10%
कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए। पर हर बार की तरह होना जाना कुछ नहीं था
सो नहीं हुआ और बीमारी जैसे की तैसे बनी रही।
2014 मे मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल मे
समग्र रूप से गरीबी उन्मूलन की विभिन्न योजनाएँ शुरू हुई और उनके परिणाम भी देश ने
देखें।
भारत की स्वतन्त्रता के 76 साल बाद आज देश
के पास गरीबी उन्मूलन के विभिन्न सरकारों
की योजनाओं और उनके कार्यनिष्पादन के तुलनात्मक आंकड़े हैं जिनके आधार पर हम यह जानने
का प्रयास करेंगे कि किन सरकारों ने वास्तव मे बुनियादी तौर पर देश से गरीबी मिटाओ
के लिए काम किया और किन सरकारों ने इस पर लीपा पोती कर गरीबी हटाओं का नारा दे देश
के निर्धनों के जज़्बात से खिलबाड़ कर उनके साथ धोखा किया।
गरीबों की बुनियादी आवश्यकताओं मे पुरातन
काल से ही "रोटी",
"कपड़ा" और "मकान" की मूलभूत आवश्यकताओं की अवधारणा रही है।
कालांतर मे समाज के विपन्न वर्ग के एक निर्धन व्यक्ति की इन तीन आवश्यकताओं मे
रोटी के साथ पानी, कपड़े के साथ स्वास्थ्य
और शिक्षा तथा मकान के साथ शौचालय,
बिजली और गैस की आवश्यकताओं को भी जोड़ा गया जिसकी अपेक्षा एक निर्धन व्यक्ति अपनी प्रगतशील
समाज और सरकार से रखता हैं।
हमारे प्रबुद्ध पाठकों को याद होगा कि सबसे
पहले, कैसे 1971 के लोकसभा के आम चुनाव मे
तत्कालीन प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी ने "गरीबी हटाओ" का नारा बुलंद
किया था। तब से लेकर 2014 और 2019 के आम चुनावों तक देश की गरीबी तो नहीं हटी पर
गरीब और गरीब होता चला गया। 1966 से 1977 तक उन दिनों श्रीमती गांधी ने गरीबी
उन्मूलन के कार्यक्रमों मे "20
सूत्री कार्यक्रम" का ढिंढोरा बड़ी ज़ोर-शोर से पीटा था। सरकार और उनके मातहत
अफसरों इसे किस हद तक लागू करवा सके नहीं मालूम,
लेकिन हम जैसे विध्यार्थियों को उन दिनों 10वीं
और 12वीं के पाठ्यक्रम की परीक्षाओं मे "सरकार के 20 सूत्री कार्यक्रम"
का रट्टा लगा कर याद करना एक टेढ़ी खीर
जरूर साबित हुआ करता था। वास्तव मे उन
दिनों सरकार और उनके ठकुरसुहाती अफसरों का गरीबी हटाने मे न तो कोई दिलचस्पी थी और
न कोई दृष्टिकोण!! न तो कोई नीति थी और न ही कोई नियति!!,
न कोई कार्यक्रम थे और न ही योजनाएँ। देश के दवे कुचले वर्ग की निर्धनता को कैसे दूर किया जाय?
इस पर किसी का ध्यान ही नहीं था। चाँदी की
चम्मच मुँह मे लेकर पैदा हुए नेतृत्व से
भला कैसे उम्मीद की जा सकती थी कि वे देश
की गरीबी दूर कर सकते? राजपरिवार मे
जन्मे ऐसे राजकुमारों से गरीबी हटाओं की आप क्या उम्मीद कर सकते हैं जिनके पूर्वजों के कपड़े पेरिस मे
धुलने जाते थे!! अरे गरीबी हटाओं के नारों को तो वह व्यक्ति ही महसूस कर सकता था
जिसने गरीबी देखी हो या जिसने गरीबी मे जीवन यापन किया हो?
एक धानीमानी धन कुबेर क्या जाने गरीबी क्या हैं?
पचास-साठ के दशकों मे गरीबों की मूलभूत या बुनियादी अवश्यकतायेँ तो रोटी,
कपड़ा, मकान तक सीमित थीं जिनको आज हमारी उम्र के
अनेक युवाओं ने साठ-सत्तर के दशक मे देखा और भुक्ता हैं। राशन,
मिट्टी के तेल और कपड़ो के लिए हम जैसे लोगो की उस पीढ़ी ने अपना पूरा बचपन लंबी
लंबी लाइन मे लग कर आहूत कर दिया था। यहीं तक होता,
तब भी ठीक था पर कदम-कदम पर भ्रष्टाचार और काला बाजारी से जीवन दुर्लभ और कठिन हो गया
था जिसके दंश अब तक हरे हैं।
2014 मे मोदी सरकार के आने के बाद आज 21वी
सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप इनमे जल,
बिजली, गैस,
स्वास्थय के साथ एक महत्वपूर्ण कारक शौचालय को भी शामिल किया गया। उन दिनों पूरब से
पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक गाँव शहरों
मे लोग सड़क और रेल पटरियों के किनारे खुले मे शौच जाने को मजबूर थे। उन दिनों के मंजर
हम आप भूले नहीं होंगे। खुले मे शौच के कारण महिलाओं की दशा तो सबसे ज्यादा दयनीय
थी। खुले मे शौच महिलाओं के साथ होने वाली लिंग आधारित हिंसा और अस्वस्थ वातावरण सबसे
बड़ा कारक था। जिन शौचालयों का नाम लेने पर लोग शर्माते थे,
ग्राम पचायतों ने उसे "इज्जत घर" देकर सम्मानित किया जो पूर्णतः महिलाओं
की लज्जा, सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा था,
जिस पर स्वतन्त्रता के बाद मोदी सरकार के
अलावा किसी भी राजनैतिक दल की नज़र नहीं पड़ी थी
क्योंकि राज प्रासादों मे रह रहे बिगड़े श्रेष्ठी वर्ग" महिलाओं की लाज
शरम और आत्मसम्मान से जुड़ी इन मूलभूत आवश्यकताओं
से लेश मात्र भी परिचित नहीं थे।
गरीबी दूर तो तब होगी जब गरीबों के लिए चलने
वाली योजनाओ का पैसा सीधे गरीबों को मिले। हमे याद है तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री
राजीव गांधी ने एक बार स्वीकारा था कि सरकार द्वारा गरीबों को भेजा एक रुपया उन तक
पहुँचते पहुँचते मात्र 15 पैसे ही रह जाता हैं अर्थात गरीबों के हित और विकास के
लिए सरकार द्वारा भेजे गए 100 पैसों मे से
85 पैसे न जाने कितने हाथ के पंजों से
होते हुए रास्ते मे गायब हो जाते थे। ऐसी कोई पारदर्शी व्यवस्था के बारे मे
तत्कालीन सरकारों ने कभी सोचा ही नहीं कि निर्धनों के लिए भेजे पैसे को कैसे उनके
हाथों तक सुरक्षित और सकुशल उन तक पहुंचाये जाएँ।
स्वतन्त्रता के 65 वर्ष बाद भी "गरीबी हटाओं"
आंदोलन या योजनाओं की असफलता पर आज विचार मंथन की महति आवश्यकता हैं। न केवल कॉंग्रेस
अपितु देश के सभी राजनैतिक दलों को जाति,
लिंग भेद और प्रांत से परे देश के निर्धन वर्ग
के कल्याण के लिए विचार-विनिमय की अति आवश्यकता हैं।
विजय सहगल

2 टिप्पणियां:
👏👏👏👏👏👏
एक दम सही है।
गरीब तो गरीब ही रहा।
प्रश्न तो यह बनता है कि
नेता कैसे अमीर से और अमीर हो गये। आज अधिकांश नेता, जो कल तक गरीब अत्यंत गरीब थे। आज सब अरब पति हो गये।
कैसे।
कौन पूछेगा।
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