मध्य प्रदेश विधान सभा
चुनाव-2023,
"चुनाव फंसा हैं"!!
17 नवंबर 2023 के
विधान सभा चुनाव मे, मध्य प्रदेश राज्य के
मतदाता विधान सभा के लिए मतदान कर 16वीं विधान सभा चुनने के लिए मतदान करेंगे। वर्तमान मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान
जिन्हे प्यार से राज्य की जनता "मामा" कह संबोधित करती हैं,
ने अलग अलग काल खंडों लगभग 16 वर्ष 8 माह मध्य प्रदेश राज्य का मुख्य मंत्री के रूप मे नेतृत्व कर मध्य प्रदेश राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्य
मंत्री के रूप मे कार्य करने का रिकॉर्ड बनाया। श्री शिवराज सिंह 16 वर्ष के लंबे
समय तक राज्य के मुख्यमंत्री के बावजूद वो प्रभाव और छाप प्रदेश की जनता के बीच नहीं
छोड़ सके जो असर उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ ने अपने अल्प काल मे
उत्तर प्रदेश मे कायम किया। गुजरात राज्य से श्री नरेंद्र मोदी के केंद्र मे
प्रधानमंत्री के रूप मे आगमन के बाद बने
राजनैतिक वातावरण और बदले समीकरण के बीच थोड़े
ही समय मे आर्थिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ईमानदारी
राजनेता और एक विकासशील सोच के रहनुमा की
जो छवि नरेंद्र मोदी बनाने मे कामयाब रहे,
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी को अपवाद मान लें तो श्री शिवराज सिंह या अन्य भाजपा शासित राज्यों
के मुख्यमंत्री बैसी इमेज बनाने मे नाकामयाब रहे।
मध्य प्रदेश
राज्य का ये दुर्भाग्य रहा कि सरकार और शासन मे चाहे काँग्रेस रही हो या भाजपा,
इन दोनों की बुनियाद, मूल नीति और
नियत मे लाल फ़ीताशाही, नौकरशाही और
सरकार मे भ्रष्टाचार का रूप/स्वरूप कमोवेश
एक ही रहा। कॉंग्रेस के श्री दिग्विजय का कार्यकाल कौन भूल सकता हैं जब बिजली की
कटौती के दैनिक कार्यक्रम तय होता था। 2-3 घंटे
की कटौती मे घर के अंदर मौसम की मार पड़ती थी और घर के बाहर मच्छरों के दंश चैन से
नहीं बैठने देता था। मध्य प्रदेश मे सरकार या शासन किसी भी राजनैतिक दल का रहा हो
पर सरकारी कार्यालयों मे प्रशासनिक अधिकारी,
कर्मचारियों का शासन पहले भी चलता रहा था और आज भी चल रहा हैं। आम जनता को अपने
दिन प्रतिदिन के कार्यों के लिए इन दीर्घसूत्री और भ्रष्ट अधिकारियों के रहमो करम
पर निर्भर रहना पड़ता हैं फिर चाहे नगर निगम हो,
बिजली बिभाग हो या फिर सड़क या पानी वितरण विभाग हो। भाजपा मे तो पिछले एक दशक से
मध्य प्रदेश मे श्री मोदी का कमाया हुआ ही खा रहे हैं। इनका अपना कोई बाजूद या
पहचान नहीं जिसके बदौलत जनता इन्हे अपना समर्थन या सहयोग करें। आम जनता से जुड़े
विभागों के बाबू और अधिकारी वर्षों से एक
ही स्थान पर पदस्थ होने के कारण कार्य सांस्कृति का पूरी तरह ह्रास हो गया हैं।
कहना अनुचित न होगा कि मध्य प्रदेश विधान सभा का चुनाव फंसा हुआ हैं। ऊंट किस करवट
बैठेगा कहना मुश्किल हैं।
पिछले छह वर्षों से जैसे इंदौर ने देश के टॉप 100 शहरों के स्मार्ट सिटी मे पहला स्थान पाने मे सफल रहा हैं। निश्चित ही इंदौर नगर की जनता, जन प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी बधाई के पात्र हैं, जिनके समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और सेवा भवना के कारण इंदौर नगर ने स्वच्छता इतना अहम स्थान प्राप्त किया। क्या कारण हैं कि मध्य प्रदेश राज्य के वही नागरिक, अधिकारी और कर्मचारी बैसी कार्य सांस्कृति विकसित नहीं कर सके जैसी कि इंदौर शहर के लोगो ने की। इसका मुख्य कारण इन शहर के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों का वर्षों से एक ही शहर मे पदस्थ रहते हुए ज़िम्मेदारी और सेवा भावना का पूर्णतः अभाव एवं भ्रष्टाचार!! ये कार्य सांस्कृति कोई एक दिन मे नहीं पनपी। शासन और सरकार किसी भी दल की रही हो पर नौकरशाहों की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और कार्य पद्धति अपने निश्चित ढर्रे पर ही चलती रही। इन दीर्घ सूत्री अधिकारियों की कार्य प्रणाली की एक बानगी देखिये कि पिछले एक माह से 24 घंटे लगातार स्ट्रीट लाइट के जलने की शिकायत प्रदेश के मुखिया से लेकर ग्वालियर के हर स्तर के आला अधिकारियों को करने के बावजूद विजली का अपव्यय अभी भी जारी हैं।
श्री शिवराज सिंह
के कार्यकाल के दौरान 2013 मे "व्यापम" जैसा घोटाला किसी भी सभ्य सरकार
पर एक बहुत बड़ा कलंक था। इस घोटाले के अंतर्गत सरकारी नौकरियों,
मेडिकल तथा इंजीन्यरिंग परीक्षाओं मे भर्ती की गड़बड़ी के कारण उनके मंत्री मण्डल के
एक मंत्री की गिरफ्तारी इस महा घोटाले का सबूत थी। इसके बावजूद भी मुख्य विपक्षी
दल कॉंग्रेस द्वारा इस मुद्दे को ज़ोर शोर से न उठाने के कारण लोग कॉंग्रेस के
नेताओं की भी इसमे संलिप्तता के दबे मुंह बात करते हैं अन्यथा इतने बड़े घोटाले पर
श्री शिवराज सरकार का पद पर बने रहना तमाम शंकाओं की ओर इशारा न करता?
इस चुनाव मे
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा अपने
चुने हुए सांसदों, पार्टी संगठनों के
धुरंधर पदाधिकारियों और केंद्रीय मंत्रियों तक को विधान सभा चुनाव मे नामांकन करा
चुनाव के लिए खड़ा करना भी इस बात को दर्शाता हैं कि चुनाव के बाद भाजपा मे कहीं
कुछ आश्चर्य चकित होने वाला होगा जिसकी कल्पना सामान्य घटनाक्रम से परे कुछ
असाधारण और अनोखा होने वाला होगा। बीजेपी
ने मध्य प्रदेश के जिन दिग्गज केंद्रीय मंत्रियों को विधान सभा चुना 2023 का
उम्मेदवार बनाया गया उनमे श्री नरेंद्र
सिंह तोमर, श्री प्रहलाद पटेल और
श्री फगन सिंह कुलस्ते हैं जबकि चार वर्तमान सांसद सर्व श्री राकेश सिंह,
जबलपुर से, सीधी से रीति पाठक,
सतना से श्री गणेश सिंह एवं होशंगाबाद के सांसद श्री उदय प्रताप सिंह को विधान सभा
के चुनाव मे उम्मीदवार बनाया हैं जबकि पार्टी के धुरंधर महासचिव श्री कैलाश
विजयवर्गी को उनके पुत्र की जगह इंदौर से उम्मीदवार बनाया गया हैं। इन महारथियों
को एक साथ विधान सभा के चुनाव मे उतारना किसी तूफान के पूर्व की शांति की ओर इशारा
करता हैं। या तो ये प्रभावशाली श्रीमान पुरुष चुनाव मे विजय वरण कर राज्य सरकार
का हिस्सा होंगे या अपना बाजूद खोकर राजनैतिक पृष्ठ के हांसिये पर खड़े नज़र आयेंगे।
दोनों ही स्थितियों मे केन्द्रीय राजनीति
मे संसद सदस्यों के रूप मे नये चेहरों को चुनाव मे मौका दिया जाना निश्चित हैं। इस पूरे घटनाक्रम को "दबाब की
राजनीति" कहना अतिशयोक्ति न होगी और शायद कूटनीति की भाषा के नकारात्मक भाव
मे इसे ही "एक तीर से दो निशाने लगाना" या "एक पत्थर से दो शिकार
करना" कहना "समसामयिक" होगा।
केंद्रीय सरकार
द्वारा निर्मित राष्ट्रीय राजमार्गों को यदि छोड़ दिया जय तो राज्य सरकार के मार्ग
और शहरों, कॉलोनियों की आंतरिक सड़कों
की हालात बहुत ही खराब हैं। तब मध्य प्रदेश के विधान सभा चुनाव 2023 के बारे मे
भविष्यवाणी करना एक "टेढ़ी खीर ही होगा"!! यह कहना अतिशयोक्ति न होगी की मध्य प्रदेश के
चुनाव मे पेंच फंसा है।
बेशक मध्य प्रदेश
कॉंग्रेस के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार श्री कमाल नाथ भी राम नाम की
चादर ओढ़े नाव पर सवार होकर चुनाव रूपी बैतरणी पार करने के प्रयास मे हैं पर चुनाव
के पूर्व टिकिट बंटबारे की रणनीति मे असंतोष के चलते श्री दिग्विजय सिंह और श्री
कमल नाथ के बीच "कपड़े फाड़ने" की
नौबत आ गयी। जिस कारण कॉंग्रेस के इन क्षत्रपों के बीच मतभेद खुल कर सामने आए।
मध्य प्रदेश के बहुसंख्यक हिन्दू मतदाताओं को आज भी इंडिया गठबंधन के सदस्य श्री
प्रियंक खडगे जो कॉंग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मलिकार्जुन खडगे के पुत्र हैं
एवं डीएमके के उदयनिधि मारन के सनातन धर्म के विरुद्ध वक्तव्य को भी लोग भूले नहीं है,
जो कॉंग्रेस की राह को इतना आसान नहीं करने वाले।
लोगो का मानना हैं
कि मध्य प्रदेश राज्य की जनता विधान सभा चुनाव मे अपनी नयी सरकार को चुनेगी तो मतदाओं की ये मजबूरी रहेगी
कि उन्हे "साँप नाथ" या "नाग नाथ" दोनों मे से किसी एक का चुनाव करना पड़ेगा क्योंकि
अंततः ये दोनों चोर चोर मौसेरे भाई जो
ठहरे। काँग्रेस और बीजेपी के बीच मुक़ाबला कठिन हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा कहना कठिन
हैं। चुनाव का सही निर्णय तो 3 दिसंबर के दिन ही देखने को मिलेगा,
तब तक दोनों पक्ष के महारथी अपनी अपनी "डींग हांकेंगे" और "कयास"
लगाएंगे" !!
विजय सहगल


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