"हमास फिलिस्तीन नहीं और न ही फिलिस्तीनी
हमास हैं"
1988 से लेकर 2004
तक श्री यासिर अराफात जो फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के अध्यक्ष रहे थे एवं जो स्वतंत्र
फिलिस्तीन राष्ट्र (फिलिस्तीन राष्ट्र के दोनों
हिस्से अर्थात वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी) के निर्विवाद नेता थे, तब से लेकर आज तक भारत
हमेशा से स्वतंत्र फिलिस्तीन का समर्थक रहा हैं। जहां फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक पर फिलिस्तीन
मुक्ति संगठन के राष्ट्रपति श्री महमूद अब्बास का शासन हैं वहीं गाजा पट्टी पर फिलिस्तीन
के इस्लामिक चरमपंथी, "हमास"
ने बंदूकों के बल पर अपना शासन स्थापित किया हैं। 7 अक्टूबर 2023 का दिन दुनियाँ
के इतिहास मे इंसान की हैवानियत और
अमानवीयता की पराकाष्ठा थी, जब हमास के
उग्रवादियों द्वारा इज़राइल के निहत्थे
नागरिकों, महिलाओं और युवाओं के
साथ-साथ वहाँ के निरीह और अबोध बालकों तक
पर अंधाधुंध फायर कर सदा के लिए मौत की
नींद सुला दिया गया। इन उग्रवादियों ने इज़राइल के ऊपर समुद्र,
आकाश और जमीन से हमले किए जो अप्रत्याशित और अनपेक्षित थे। ये दिन हमास के
चरमपंथियों द्वारा जान बूझ कर चुना गया क्योंकि
इस दिन यूहूदी समुदाय का एक विशेष पर्व "शबात" था,
जिसमे इज़राइल के नागरिक साप्ताहिक विश्राम के दिन परिवार और मित्रों के साथ अपने
आराध्य की प्रार्थना और पूजा कर रहे थे। पिछले अनेक दशकों मे ऐसा भीषण और विभत्स
हमला कभी नहीं हुआ था। इस आतंकी हमले मे लगभग 1400 से ज्यादा निर्दोष नागरिकों,
महिलाओं और अबोध नागरिकों की निर्मम और नृशंस हत्या कर दी गयी और अनेक नागरिकों को
बंदी बना कर हमास के आतंकी अपहरण कर अपने साथ ले गए। अब इन लगभग 250 बंधकों को हमास
के आतंकी अपनी अनैतिक और कुत्सित मांगों
के लिए "चारे" की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
हमास के इन बहशी,
क्रूर और बेरहम आतताइयों ने सड़क चलते लोगो पर अंधाधुंध फायर कर मौत की नींद सुला
दिया। महिलाओं को मार कर उन के निर्वस्त्र शवों के साथ पशुवत व्यवहार कर मानवता को शर्मसार किया। 6-8
महीने के अबोध, दूध पीते बच्चों
जिन्होने दुनियाँ अभी देखी भी न थी,
उन पर अनगिनित गोलियां दाग कर और कहीं कहीं इन अबोध बच्चों को जिंदा ही जला कर
अपनी हैवानियत और राक्षसी मानसिकता का परिचय दिया। सारी दुनियाँ ने इन फोटो और वीडियो को देखा जो
बड़े ही वीभत्स, घिनौने और मार्मिक थे।
मन को विचलित करने वाले ऐसे फोटो और वीडियो सभ्य मानव समाज पर कलंक थे। सारी
दुनियाँ मे इस अमानवीय त्रासदी, बर्बरतापूर्ण और
वहशी हमले पर प्रतिक्रिया होनी ही थी। सारी दुनियाँ के अनेक देशों सहित भारत ने इस
कायरना धार्मिक उन्माद, आतंकवाद और उग्रवादी हमले की तीव्र निंदा और भर्त्स्ना की।
इज़राइल ने तो हमास के इस पूर्वनियोजित,
अनपेक्षित हमले पर तीखी प्रतिक्रिया के
फलस्वरूप गाज़ा पट्टी से हमास का समूल नष्ट करने की सौगंध और प्रतिबद्धता के फलस्वरूप
तीव्र और तीखे हवाई और जमीनी हमले किये,
जिसमे अनेकों हमासी आतंकी मारे गए। हमास द्वारा अकारण ही 7 अक्टूबर 2023 को
इज़राइल पर किये गए अमानवीय हमले की कीमत
गाज़ा पट्टी के निर्दोष फिलिस्तीन नागरिकों
को भी अपनी जान-माल देकर चुकानी पड़ रही
हैं क्योंकि हमास के आतंकवादियों ने अपने ठिकाने गाज़ा के अस्पतालों,
स्कूलों और धार्मिक स्थलों के नीचे सुरंगों मे बना रक्खे हैं। हमास के आतंकवादी
इरजाइल की फौज पर हमले कर इन आश्रय स्थलों का दुरुपयोग,
अपनी जान बचाने के लिए कर रहे हैं भले ही इस कुकर्म की कीमत बेकसूर,
फिलिस्तीनी नागरिकों की जान लेकर चुकानी पड़ रही हो!!
दशकों से आतंक और
आतंकवाद से पीढ़ित भारत ने बड़े स्पष्ट रूप से हमास के अतिवादियों द्वारा 7 अक्टूबर
2023 के इज़राइल पर हमले की निंदा की,
पर खेद और अफसोस का विषय हैं कि काँग्रेस सहित देश के अधिकांश विरोधी दलों ने भारत
सरकार की हमास के हमले पर भारत द्वारा
इस्राइल के साथ खड़े होने पर सरकार की आलोचना और निंदा की। अभी हाल ही मे काँग्रेस
की पूर्व अध्यक्ष एवं प्रभावशाली नेता श्रीमती सोनिया गांधी ने 30 अक्टूबर 2023 को
लिखे अपने लेख मे इज़राइल-हमास युद्ध पर संयुक्त राष्ट्र के हालिया प्रस्ताव पर
भारत के वोटिंग मे हिस्सा न लेने के रुख
पर विरोध और नाराजगी प्रकट की। हालांकि संयुक्त राष्ट्र
ने हमास के बारे मे कोई प्रस्ताव नहीं रखा पर जॉर्डन ने गाजा संकट पर इज़राइल और हमास
के बीच तत्काल संघर्ष विराम की बात कही। संयुक्त राष्ट्र मे भारत द्वारा जॉर्डन के इस संघर्ष विराम के प्रस्ताव
पर मतदान से अनुपस्थित रह उचित ही किया क्योंकि भारत का तर्क था कि यूएन के प्रस्ताव मे हमास के हमले का जिक्र नहीं
था और न ही इज़राइल पर हमास के हमले की निंदा की गयी थी। हमास द्वारा इज़राइल के निहत्थे नागरिकों पर छल, बल और अन्याय-पूर्वक हमला किये जाने और क्षेत्र मे अशांति फैलाने
से न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
तब श्रीमती सोनिया गांधी का ये तर्क कि न्याय
के बिना शांति नहीं हो सकती उचित प्रतीत नहीं होता। अब जबकि इज़राइल ने गाज़ा पट्टी से
चुन-चुन कर हमास के उग्रवादियों की हत्या करना शुरू कर दिया और हमास के चरमपंथी, फिलिस्तीन जनता के बीच
छुप कर अपनी जान बचाने के लिए सुरंग रूपी बिलों मे दुबक रहे हैं। यूं भी एक स्वाभिमानी
राष्ट्र, जिसके 1400 से ज्यादा
नागरिकों की एक तरफा बर्बर और नृशंसा पूर्वक सुनयोजित ढंग से हत्या कर दी गयी हो, दुश्मन को, समूल नष्ट किए बिना, कैसे शांति प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता हैं? हमे ये याद रखना होगा कि फिलिस्तीन हमास नहीं है और न ही हमास फिलिस्तीनी
हैं!!, क्योंकि 2007 से गाजा पट्टी
पर फिलिस्तीन के इस्लामिक चरमपंथी संगठन "हमास" के काबिज होते ही गाजा पट्टी
क्षेत्र मे इज़राइल और हमास के बीच हिंसक झड़पों
का दौर शुरू हो गया क्योंकि हमास शांति पूर्वक वार्ताओं के विपरीत छल और बल पूर्वक
क्षेत्र के भूगोल को अपने पक्ष मे करना चाहता हैं।
देश के विपक्षी दलों और वामपंथी सोच के राजनैतिक
दलों और कुछ मुल्ला-मौलवियों ने एक स्वर मे हमास के पक्ष लेते हुए इज़राइल द्वारा गाजा
पट्टी पर प्रतिक्रिया स्वरूप किये गये हमले की निंदा कर इज़राइल की लानत-मलानत की हैं!!
इन गणमान्य पुरुषों ने 7 अक्तूबर 2023 को हमास के चरमपंथियों द्वारा इज़राइल के नागरिकों,
महिलाओं और अबोध बच्चों पर अमानवीय,
अकारण और असमय हमले के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा। महज़ धर्म के आधार पर हमास से "रिश्ते"
जोड़ना कहाँ का न्याय हैं? फिलिस्तीन के गाजा
पट्टी और वेस्ट बैंक के क्षेत्रों से लगी सीमाओं या नजदीक स्थित इस्लामिक देश इजिप्त,
जॉर्डन, लेबनान और सीरिया जैसे देश
संकट की इस घड़ी मे गाजा के शरणार्थियों को शरण देना तो दूर उनको भेजी गयी खाध्य वस्तुओं,
दवा, पेय जल और ईधन जैसी आवश्यक सामाग्री को भी उन
तक पहुंचाने मे बाधाएँ और अबरोध उत्पन्न कर
रहे हैं, तब इन "रिश्तों"
का क्या औचित्य? भुखमरी की कगार पर खड़ा पाकिस्तान
जहां एक ओर हमास से अपने धार्मिक रिश्तों की डींगे हांक कर हमास के पक्ष मे खड़ा हैं,
वही अपने पड़ौसी अफगानिस्तान के 40 साल से भी
ज्यादा वर्षों से रह रहे 20 लाख शरणार्थियों को अपने देश मे रखने को किसी भी कीमत पर
तैयार नहीं हैं और येन केन प्रकारेण इन लाखों अफगानी शरणार्थियों को बापस उनके देश
भेजना चाहता हैं। इन इस्लामिक देशों के ये दोहरे मापदंड इनकी मानसिकता और सोच को दर्शाते
हैं।
आज आवश्यकता इस बात की हैं कि जहां एक ओर इज़राइल
के नागरिकों पर "हमास" के वहशी और बर्बर हमलों की निंदा होनी चाहिए वहीं हमास
के दरिंदों को गाजा के आम नागरिकों से अलग-थलग कर वहाँ के बच्चों,
बुजुर्गों और महिलाओं को मानवीयता के आधार पर,
फौरी राहत के तौर पर भारत सहित विश्व के अनेक देशों द्वारा भेजी गयी राहत सामाग्री
जैसे भोजन, दवाओं,
टेंटों, पेय जल और अन्य आवश्यक सामाग्री
उपलब्ध कराई जानी चाहिये ताकि उनके यातना पूर्ण और कष्टप्रद जीवन मे कुछ राहत मिल सके।
विजय सहगल



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