भारत जोड़ो?
देश जिन्होने बांटा, सोचो!, वो थे कौन?
चीन ने हड़पी धरा हमारी तब थे मौन?
जिन वीरों ने "वैरी" को घर घुस मारा।
पीठ दिखा कर भाग रहे "अरि" को ललकारा॥
मुहब्बत की दूँका, खुल गयी
नफरत के बाज़ार मे !
सौदागर ज्यों बेंचे कंघी,
"गँजो" के त्योहार मे !!
निकल पड़े, "पैदल" अब "भारत जोड़ो"।
है नियत मेँ खोट तुम्हारी, अब ये नाटक छोड़ो ॥
देश की खातिर, देह नहीं तुम, जिव्हा हिलाते ।
सीमा के हर सैनिक का तुम मान बढ़ाते ॥
देश तुम्हें "सिर आँख बिठाता"!
राह, "पलक पाँवड़े बिछाता"!!
पर, हा!! शोक!
दुःखद, संयोग!!
जिन वीरों ने देश की खातिर, जान गवाई !
उनको तुमने "पिटा" बताया, "लाज" न आयी !!
उपेक्षित कर, जो वक्त को छेड़ेगा।
काल चक्र भी, "राह" उन्हे पीछे छोड़ेगा॥
विजय सहगल


2 टिप्पणियां:
True
बहुत सुंदर
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