रविवार, 1 जनवरी 2023

कामाख्या देवी मंदिर-गुवाहटी

"कामाख्या देवी मंदिर-गुवाहटी"








31 अक्टूबर 2022 को मुझे लखनऊ के अपने पुराने मित्र मंडली के साथ   देश की 51 शक्ति पीठों मे एक, असम के गुवाहाटी शहर मे स्थित पवित्र कामाख्या देवी के मंदिर  का दर्शन लाभ का सौभाग्य मिला। मंदिर प्रवेश द्वार के लगभग आधा किमी पूर्व से ही सड़क के दोनों ओर देवी कामाख्या को अर्पण करने हेतु लाल चुनरी और लाल  पताकाओं से सुसज्जित,  देवी को भेंट करने हेतु प्रसाद, पत्रम, पुष्पम, फलम एवं अन्य पूजन सामाग्री की दुकाने  इस बात की संकेत थी कि हम मंदिर के  निकट ही है। श्री अर्नब गोस्वामी हमारे इस समूह के पथ प्रदर्शक के रूप मे हम सब का मार्गदर्शन करा रहे थे। ऐसी किवदंती है कि वास्तु और भवन निर्माण कला के इस अतिसुन्दर और अद्व्तिय कृति, मंदिर का निर्माण कामदेव द्वारा विश्वकर्मा की सहायता से करवाया गया था इसलिये इस क्षेत्र को कामरूप भी कहा जाता है।  कामाख्या मंदिर के रास्ते मे भी कुछ प्राचीन मंदिर अपनी वास्तु का बोध कराते हम श्रद्धालुओं को स्वागातुर थे। एक दुकान पर अपनी पादुकाए एवं अन्य अनावश्यक वोझ को एक दुकान मे उतार, अपनी काया को जल के अभिसिंचन से पवित्र कर आवश्यक पूजन सामाग्री ले कर हम लोगो ने मंदिर द्वार की ओर प्रस्थान किया जो दूर से ही नज़र आ रहा था। मंदिर के प्रवेश द्वार से लगी  एक दुकान पर लटके पिट्ठू बैगों को क्रय करने की इकच्छा से मैंने वहाँ खड़े व्यक्ति से बात की तो मै जानकार हैरान था कि ये पिट्ठों बैग बिक्री हेतु नहीं है अपितु मंदिर मे आये दर्शनार्थियों के है जिन्हे किराये से रखने की सुविधा के अंतर्गत क्लॉक रूम मे जगह जगह लटका कर रक्खा गया था।        

ऐसी मान्यता है कि जब देवी सती ने अपनी योगशक्ति से अपनी देह त्यागी तो भगवान शिव, देवी सती की देह लेकर घूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देह के 51 टुकड़े कर दिये। यहाँ इस निलांचाल पर्वत के स्थान पर देवी के देह का गर्भाशय गिरा जिसने एक देवी का रूप धारण कर लिया जिसे देवी कामाख्या के रूप मे प्रतिष्ठित किया गया। आज इस मंदिर को सृष्टि की उत्पत्ति के प्रतीक के रूप मे देवार्चन, पूजार्चन करने हेतु देश विदेश के श्रद्धालु, दिसपुर स्थित इस विश्व प्रसिद्ध कामाख्या  मंदिर के दर्शनार्थ  पहुँचते है। नीलाचल वास्तु शैली मे निर्मित इन  मंदिरों को  पश्चिमी बंगाल, असम सहित देश के पूर्वोत्तर राज्यों मे देखा जा सकता है। पूर्व से पश्चिम दिशा मे चूने और  पत्थर से निर्मित लंबे अर्ध वलयाकार ढालू छत्तों से बने मंडप एवं अर्ध बेलनाकर गुंबद के शीर्ष पर निर्मित स्वर्ण कलश से सुशोभित मुख्य गर्भ गृह निर्मित है जो 8वी सदी मे निर्मित इस कामाख्या मंदिर के सौन्दर्य को नयनभिराम बनाता है। मंदिर के भवन मे निर्मित सीमांत वास्तु पर गेरुआ रंग और  पृष्ठभूमि मे सफ़ेद रंग से रंगे मंदिर प्रांगड़ मे धर्म और अध्यात्म के की आभा और तेज़ को हर जगह महसूस किया जा सकता है। जिस प्रकार उत्तर भारत मे कुम्भ महापर्व का महत्व है उसी  प्रकार कामाख्या मंदिर मे अंबुबाची महायोग पर मंदिर मे एक विशाल धार्मिक अनुष्ठान के चलते बड़ी संख्या मे श्रद्धालु यहाँ पहुँचते है जो प्रायः जून माह मे होता है। इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की दिव्य आलौकिक शक्तियों का अर्जन तंत्र-मंत्र में पारंगत साधक अपनी-अपनी मंत्र-शक्तियों को पुरश्चरण अनुष्ठान कर स्थिर रखते हैं।  

शाम के समय मंदिर के बंद होने के पूर्व समूह के हम सभी सदस्य मंदिर के प्रवेश द्वार से होकर दर्शनार्थियों के लिए निर्धारित लाइन मे अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे। मंदिर के एक गलियारे से होते हुए हम सीधे देवी कामाख्या मंदिर के  मुख्य गर्भ गृह मे पहुंचे।  6-7 फुट परधि  के 12 गोल विशाल पत्थरों से निर्मित बारहदरी जिसकी ऊपरी छत्त अर्ध बेलानकार मे काफी ऊंचाई तक बनी थी। लगभग 18-20 फुट लंबे, चौड़े वर्गाकार गर्भ गृह के मध्य माँ कामाख्या देवी सिंहासन पर विराजमान थी। चारों तरफ लाल चन्दन और गुलाल बिखरा हुआ था जो कि श्रद्धालुओं द्वारा माँ देवी कामाख्या को अर्पित किया जा रहा था। मंदिर की सेवा मे लगे पुरोहित भी देवी माँ पर चढ़ाये गए रोली चन्दन से हर भक्त का मस्तकाभिषेक कर रहे थे। दो खंभों के सहतीरों पर गण, यक्ष और किन्नरो की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी थी। पूरा मंडप अति प्राचीन पत्थर के स्तंभों पर टिका हुआ था। चारों दीवारों के मध्य बने रोशनदानों से मध्यम सूर्य किरणे मंदिर मे अपना प्रकाश बिखेर रही थी।  साथ लाये फल, फूल और पुष्पों को माता के चरणों मे अर्पित कर जैसे ही हम आगे एक दूसरे प्रांगण की ओर बढ़े, जहां पर दीपकों की मध्यम प्रकाश रशमियों के बीच सीढ़ियो से नीचे मंदिर का एक और मुख्य गर्भ गृह था। जिसके दरवाजों पर नक्काशीदार स्वर्ण पत्र लगाए गए थे जो दीपक के प्रकाश से अपनी स्वर्णिम आभा को चारों ओर बिखेर रहे थे। नीचे बने कुंड के पवित्र जल से आचमन कर पुनः उसी रास्ते हम मंदिर प्रांगण के परिक्रमा पथ पर बाहर आ गए।

एक बार पुनः मंदिर प्रांगण को बाहर से देखने की जिज्ञासा के चलते मैंने मंदिर के प्रवेश मार्ग को पार किया। बाएँ हाथ पर एक बड़ा कक्ष दिखलायी दिया जिसे हाल ही मे पानी से सफाई किया प्रतीत होता था। ये बलि घर था, जहां पर आज भी बकरे, मेमने या पशुओं  की बलि की प्रथा जारी है।  आगे पथ के दायें ओर कर मुख्य बड़े अर्धबलयाकार मंडप मे जाने का रास्ता था जो इस कामाख्या मंदिर की पहचान है। वे दर्शनार्थी जो लंबी लाइन और भीड़ के कारण समय  आभाव के चलते लाइन मे नहीं लग सकते उनके लिए गेरुई और सफ़ेद रंग के इस हाल मे से देवी माँ के दर्शन की व्यवस्था की गयी है। जहां से किसी भी समय बारहदरी मे सिंहासन पर बिराजमान माँ कामाख्या देवी के दर्शन किये जा सकते है।  प्रांगण मे घूम रहे बकरे और मेमने के बारे मे जानने की उत्सुकता पर मंदिर के सेवादारों ने बतलाया जो श्रद्धालु देवी माँ को अपनी मनोकामना के पूर्ण होने पर पशु को समर्पित तो करते है पर बलि नहीं चढ़ाते, तब ऐसे बकरे या पशुओं को यूं ही मंदिर प्रांगण मे छोड़ दिया जाता है जिनका पालन पोषण  मंदिर प्रबंधन समिति और आए हुए भक्तों द्वारा घास, चारा आदि खिला कर किया जाता है। 

कामाख्या देवी के मंदिर के दर्शन की अभिलाषा पूर्ण होने पर मै धन्यभागी हो  कृत्य कृत्य हूँ। अपने सभी सुधि पाठक गणों को नववर्ष 2023 की उज्ज्वल कामना करते हुए बधाई प्रेषित करता हूँ। माँ कामाख्या देवी आप सभी का कल्याण करें। इन्ही कामनाओं के साथ।

विजय सहगल  

 


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