शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

ऊंची हैसियत वाले- श्री जबर सिंह

 

"ऊंची हैसियत वाले- श्री जबर सिंह"





भोपाल मे मेरे  बड़े भाई समान एक मित्र है श्री ए॰ के॰ शर्मा जी,  जब कभी इन से दूरभाष पर बात होती है तो जरा लंबी और देर तक! पिछले दिनों बातचीत मे न जाने कहाँ से  "हैसियत" और "औकात" शब्द पर चर्चा हो आयी। दोनों ही शब्दों का शाब्दिक अर्थ तो  स्थिति और  सामर्थ्य रूप से  तो समान है, सिवाय सकारात्मक और नकारात्मक भावों के!! निश्चित ही ऊंची मान, प्रतिष्ठा, पद और सम्मानारूढ़ व्यक्ति को समाज मे ऊंची हैसियत वाले माननीय  श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेणी मे रक्खा  जा सकता  है और रक्खे भी जाते है, पर यदि उनके आचरण उनके सामर्थ्य से भिन्न,  विपरीत या प्रतिकूल हों तो उसके लिये नकारात्मक भाव से युक्त "औकात" शब्द का प्रयोग कर हेय दृष्टि से किया जाना श्रेयष्कर है। इन शब्दों का सटीक उदाहरण गायत्री परिवार के कलेंडर की 15वी तारीख के सद्वाक्य मे देखा जा सकता है। जिसके अनुसार  "उन्हे मत सराहो, जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई और संपत्ति कमाई!!"

मै अपने बैंक के कुछ उच्चतम पदासीन  "श्रीमान" पुरुषों और महिलाओं  को जनता हूँ जिन्होने अपने पद पर आरूढ़  रहते  हुए बैंक द्वारा   प्रदत्त शक्तियों का दुरुपयोग कर बैंक के हितों के विपरीत अपने निजि स्वार्थ को प्राथमिकता दे, अनैतिक और भ्रष्ट आचरण के माध्यम से संपत्तियाँ अर्जित की है और आज समाज मे एक ऊंची  हैसियत रखते है, पर उनकी ये तथाकथित हैसियत झूठी, काल्पनिक और आभासी है!! सही मानों मे उनकी ये छद्म मान, प्रतिष्ठा रूपी "औकात" एक अधम सड़क छाप "चोर" व्यक्ति  की तरह ही है जो समाज मे "बगुला भक्ति" का "मुखौटा" ओढ़ झूठे आडंबर करते है।

इसके विपरीत अनेक ऐसे श्रेष्ठ व्यक्ति भी बैंक मे पदाशीन है जो छोटे प्राथमिक पदों पर आसीन,  अल्प शिक्षित, सीमित साधनों और साधारण मान प्रतिष्ठा के बावजूद अपने श्रेष्ठ आचरण से न केवल बैंक अपितु मानव समाज  के सामने अपनी  उत्कृष्टतम,  उत्तम और श्रेष्ठतम आचरण से श्रीमान पुरुषों के गृह मे जन्म लेने वाले है और  समाज मे ऊंची "हैसियत" अर्जित करते है, जो  कदाचित ही ईश्वर की कृपा से समाज के आत्मोद्धार के लिये कर्म करने वाले व्यक्ति को प्राप्त होती है। 

ऐसे ही एक उच्च कुलीन श्री जबर सिंह का उल्लेख हमारे मित्र श्री शर्मा जी ने किया जो  सेना से सेवानिवृत्त ओबीसी बैंक मे गार्ड के पद पर नियुक्त हुए थे और  कालांतर मे प्रोन्नति पा कर रिकॉर्ड कीपर (दफ्तरी) के पद पर कार्यरत थे। सेना मे रहकर स्व्भाविक रूप से अनुशासित जबर सिंह अपने बैंकिंग कार्य मे सिद्धहस्त हो अपने कार्य को पूरी निष्ठा और समर्पण से संपादित करते थे। राजस्थान राज्य की एक शाखा मे कार्यरत श्री जबर सिंह,  दिनांक 10 फरवरी 2012 हर रोज़ की तरह अपने कार्य मे रत रहते हुए बैंक के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ो और कागजों को जब बैंक के स्ट्रॉंग रूम (वह अति मजबूत, सुरक्षित कक्ष जहां नगदी, लॉकर एवं अन्य महत्वपूर्ण कागज जैसे ड्राफ्ट, चैक बुक, एफ़डीआर आदि रक्खे जाते है) मे रख रहे थे, तभी  एक कागज के बैग जिसमे 2 हीरों के हार, छह सोने की अंगूठियाँ एवं एक जोड़ी कानों के आभूषण थे शाखा प्रबन्धक के सामने लाकर रख दिये। उन्होने बताया शायद कोई ग्राहक लॉकर के संचालन के दौरान उन्हे स्ट्रॉंग रूम मे भूलवश छोड़ गया। उन दिनों उक्त आभूषणों की कीमत लगभग 14-15 लाख थी निश्चित ही आज के समय उन आभूषणों के दाम 30 लाख रुपए से कम कदापि न होंगे। बैंक ने अपने स्तर पर उक्त गहनों को उसके सही ग्राहक तक पहुंचाने के सार्थक प्रयास किये लेकिन दुर्भाग्यवश प्रयास निष्फल रहने के कारण उनको नियम पूर्वक बैंक की सुरक्षित अभिरक्षा मे रक्ख दिया गया।  

इस घटना को जब प्रबन्धक श्री शर्मा जी ने अपने उच्च अधिकारियों को अपनी इस अनुशंसा के साथ भेजा कि श्री जबर सिंह द्वारा अपने कर्तव्य के निष्पादन एवं निर्वहन के दौरान अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और समर्पण के लिये उनको प्रशंसा पत्र, नगद पुरुष्कार एवं बैंक की गृह पत्रिका "आधार" मे घटना का संक्षिप्त विवरण एवं उनकी फोटो प्रकाशित कर उनका उत्साहवर्धन किया जाये!! पर हा!! दुःख और अफसोस!!, प्रबंधन ने उनमे से एक भी सद्कार्य करने की ज़हमत नहीं उठाई!!

मै नहीं जानता कि जबर सिंह कौन है? इनकी क्या शिक्षा, दीक्षा है?? इनकी क्या कद काठी है??? इनका क्या रूप रंग है???? मै उनसे कभी नहीं मिला, पर मै निश्चित दावे के साथ कह सकता हूँ कि मै, इनके संस्कार, इनकी सोच, इनकी सांस्कृति और इनके कुल की शिक्षाओं और मर्यादाओं, माँ-बाप द्वारा दिये गए संस्कारों को स्पष्ट रूप से पढ़ सकता हूँ!! जिनको मैंने इनकी   कर्तव्यनिष्ठा, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता मे देखा और महसूस किया। प्रबन्धक महोदय द्वारा उनकी सराहना के प्रत्युत्तर मे  श्री जबर सिंह के "ये"  शब्दों थे, "साहब!!, जी ये तो मेरी ड्यूटि थी!"। सौभाग्य देखिये कि एक "छोटे" से पद पर कार्य करने वाले जबर सिंह के मन मे एक क्षण  भी ये विचार नहीं आया कि स्ट्रॉंग रूम मे मिलने वाले 14 लाख रुपए के गहने बाजार मे एक "बड़ी" नहीं "बहुत बड़ी" कीमत रखते है। श्री जबर सिंह के मन मे एक पल के लिये भी ये बदनीयती नहीं आयी कि इन बेशकीमती आभूषणों को अपने पास रक्ख ले? क्योंकि किसी ने उन्हे आभूषणों के बैग के साथ देखा नहीं था? पर इस छोटी हैसियत वाले जबर सिंह के  पारवारिक संस्कार, कुल की मर्यादाएं  और समाज और धर्म की सीख एवं सेना मे सिखायी  गयी  देशभक्ति और अनुशासन  ने उन्हे  ये बड़ी शिक्षा दी थी  कि "ईश्वर सर्वज्ञ"!! है, "वो"! "सर्वव्यापी"!! है, "वो सर्वशक्तिमान"!! है।

उपर उल्लेखित जिन अधिकारियों ने अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग कर अपने  भ्रष्ट आचरण से अनैतिक धन अर्जित किया और बैंक सहित देश और समाज से द्रोह किया!!,  काश! श्री जबर सिंह जैसी  शिक्षा, संस्कार और पारवारिक संस्कार हमारे उन उच्च पदस्थ तथाकथित ऊंची हैसियत? वाले अधिकारियों को भी मिली होती कि ईश्वर सर्वज्ञ!! है, सर्वव्यापी!! है, सर्वशक्तिमान!! है, वो सब कुछ देख रहा है!!    

विजय सहगल        

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर शब्दों में आपने जबर सिंह जी की ईमानदारी और सच्चाई को बताया जिससे उनके प्रति श्रद्धा से सर झुक जाता है । वाक़ई अपने बैंक में उच्च पदस्थ अधिकारी थे जिन्होंने भ्रष्टाचार कर बैंक को चूना लगाने से परहेज़ नहीं किया। ऐसे ही एक प्रादेशिक प्रबंधक थे जिनका डायलॉग होता था मुँह खाता है आँख शर्माती है।बैंक में भ्रष्टाचार कर निलंबित हो गये।

बेनामी ने कहा…

99 बेईमानों मे एक का ईमान। सम्मान कैसे दिया जाये ? क्ष्री जबरसिंह जी के उत्कर्ष कार्यो की अनदेखी दुखद है।पर बेईमानों की आत्मा, जीवन मे जरूर धिक्कारती होगी और मृत्यु पर्यन्त वे इस बोझ को लेकर ही संतप्त होंगे।

बेनामी ने कहा…

श्री जबर सिंह की एक सच्ची कर्तव्य निष्ठा हमें बहुत कुछ सिखाती है।उन्हें मेरा प्रणाम🙏और आपकी लिखावट दिल को जीत लेती है।आपको बारम्बार प्रणाम बाबूजी।हम एक साथ "मुनस्यारी साधना सत्र "में भाग भी लिए थे