शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

किमर्थं "आदिपुरुष"-चलचित्रस्य विरोधं

"किमर्थं "आदिपुरुष"-चलचित्रस्य विरोधं?"






पिछले दिनों कोई 46 वर्षीय मनोज मुंतशिर द्वारा "आदिपुरुष" नाम से रामचरित मानस पर आधारित भगवान राम की कथा के  फिल्मांकन का 90 सेकंड का एक  छोटा-वृत्तचित्र (teaser) के प्रदर्शिन पर बड़ा  वाद विवाद सुना और देखा गया। 2 अक्टूबर 2022 को प्रदर्शित   इस विवादास्पद वृत्त-चित्र पर इंडिया टीवी के  श्री रजत शर्मा के साथ चर्चा सुनी तब इस फिल्म "आदिपुरुष", फिल्म के पटकथा लेखक, गीतकार मनोज मुंतशिर और निर्देशक ओम राऊत के बारे मे जाना और सुना। फिल्म के पटकथा लेखक और निर्देशक के अनुसार, "इस वृत्त चित्र  मे भगवान राम, श्री हनुमान, सीता माता एवं रावण के स्वरूप को आज के दौर के हिसाब से मोल्ड किया है!!"। अभी तो फिल्म बनी भी नहीं है? उपर से लेखक महोदय का तुर्रा कि "दर्शकों को इस नए जमाने की फिल्म से   पुराने जमाने की कहानी की  तुलना नहीं करना चाहिए!!  सदा शांत और सौम्य रहने वाले भगवान राम के स्वरूप को क्रोधाग्नि मे आवेशित दाढ़ी-मूंछ युक्त पुरुष के रूप मे एवं माता सीता को वनवासी स्वरूप मे आभूषणों से युक्त दिखाना कोई सनातनी व्यक्ति कैसे स्वीकार कर सकता है? रामभक्त  श्री हनुमान एवं राम लक्ष्मण के  शरीर पर चमढ़े का अंगवस्त्र/कवच  पहने, दाढ़ी मूंछ वाले और हनुमान को  बिना पूंछ वाले वानर राज को दिखाना कहाँ तक उचित है?  पटकथा लेखक उन अंग वस्त्रों को  कपड़े का बता कर कहना नहीं भूलते कि हनुमान जी को चमड़े का अंग वस्त्र कैसे पहना सकते है?  मेरा आग्रह है कि आप  हजारों साल से चली आ रही हनुमान जी की  छवि मे को भी कैसे आधुनिक जमाने के रूप मे परिवर्तित कर सकते है? लंकाधिपति असुर के महाप्रतापी शिवभक्त रावण के सिर पर बगैर राजमुकुट और मस्तक पर त्रिपुंड चन्दन के तिलक के साथ चमगादण रूपी वाहन पर आरूढ़ कर  अलाउद्दीन खिलजी नुमा दाढ़ी के रूप मे प्रदर्शन निश्चित ही हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाने और मान्यताओं के विरुद्ध षड्यंत्र है!! उनका ये कहना कि खिलजी त्रिपुंड चन्दन का तिलक लगता था?, वह रुद्राक्ष की माला पहनता था? मेरा कहना  है कि जब लेखक  ने रावण के त्रिपुंड मे, रुद्राक्ष मे कोई परिवर्तन नहीं किया तो उसके चेहरे मे खिलजी नुमा दाढ़ी बना, उसके रूप को विरूपित क्यों किया? रावण, हनुमान, श्री राम  को उसके सनातन रूप मे ही रहने देने मे लेखक को क्या हर्ज़ था। वे क्यों आज की जेनेरेशन की पसंद को ध्यान मे रक्ख फिल्म मे रामायण के पात्रों के साथ छेड़-छाड़ करना चाहते है।  

मनोज मुंतशिर जी की  मानना है कि इस मात्र 90 सेकंड के इस अति सूक्ष्म वृत्त को लोग  3 घंटे की फिल्म की कल्पना कैसे कर सकते है? उनके इस 90 सेकंड के फिल्म टीज़र मे दिखलाए विरूपित ईश्वर स्वरूपों पर समाज के कुछ बौद्धजीवियों का मत है कि इस अल्प वृत्त के आधार पर फिल्म रोकने जैसे कठिन निर्णय लेना उचित नहीं? उन्हे पूरी फिल्म का इंतज़ार करना चाहिये? मिस्टर मनोज मुंतशिर!,! आपको ये नहीं भूलना चाहिये कि हांडी मे बन रहे चावल के एक दाने को ही परख कर पूरी हांडी के चावल की स्थिति का अंदाज़ लगाना हमारी अति प्राचीन परंपरा है!! क्या हमारे आरध्यों, जो  इस फिल्म के मुख्य कथानक और पात्र है, जिनके स्वरूपों मे बदलाव कर  इस नब्बे सेकंड के टीज़र मे दिखाया गया है, कैसे पारंपरिक रूप मे प्रदर्शित करेंगे? स्पष्ट करना चाहिये? आदिकवि बाल्मीकी द्वारा रचित रामायण और गोस्वामी तुलसी द्वारा अनुवादित रामचरित मानस के आधार पर रामलीला मंचन द्वारा  हजारों साल से जो छवि हमारे पूज्य भगवान की गढ़ी गयी उसमे मिस्टर मनोज मुंतशिर और ओम राऊत क्यों बदलाव करना चाहते है? वे क्यों हमारी भावनाओं और श्रद्धा से खिलवाड़ करना चाहते है?? और उस पर ये कुतुर्क देना कि वे भी ब्राह्मण है? और राम उनके भी आराध्य है!!?  आजकल लेखक महोदय ने अपने नाम के साथ मनोज मुंतशिर "शुक्ला"  लिखना भी शुरू कर दिया है!!  मनोज मुंतशिर या ओम राऊत को भगवान श्री राम के भक्त होने  और ब्राह्मण होने से क्या उन्हे हिन्दू धर्म के  आरध्यों के स्वरूपों  एवं कथानकों  मे परिवर्तित करने की स्वच्छंद अनुज्ञप्ति मिल गयी? क्या वे रामायण का लेखन या हमारे आरध्यों के स्वरूपों की छवि मे परिवर्तन आज के आधुनिक युग के  रूप मे करेंगे? उन्हे  अपनी कुत्सित मान्यता और घटिया सोच के मुताविक कुछ भी दिखाने और प्रदर्शित करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? 

देश सहित दुनियाँ मे समय समय पर नेपाल, कम्बोडिया, इंडोनेसिया, तिब्बत, बर्मा, थाईलैंड सहित   अनेकों मनीषयों, चिंतकों और विचारकों ने भगवान राम पर रामायण की रचना कर पांडुलिपियाँ लिखी हैं  पर किसी मे भी उनके मूल स्वरूप मे कोई परिवर्तन नहीं किया है।  

जब बे आज की पीढ़ी की आवश्यकता के अनुरूप रामायण के पात्रों मे परिवर्तन करेंगे तो क्या वे कल के दिन हमारे विभिन्न संस्कारों के विधि विधान और पूजा पद्धतिमे अपनी मनमर्जी से परिवर्तन के कुत्सित कृत्य  को  न्यायोचित ठहराने का प्रयास नहीं करेंगे? क्या वे कल के दिन शास्त्रनुकूल निर्धारित हवन और अन्य पूजा पद्धति जैसे पवित्रीकरणम, देवाहनाम, आचमनम, चन्दन धारणम, शिखा वंदनम, रक्षाश्रोतम आदि मे उच्चरित श्लोकों के उद्धघोष मे परिवर्तन कर छिन्न-भिन्न या नष्ट-भ्रष्ट नहीं करेंगे। उनको ये छूट कदापि नहीं दी जानी चाहिये।    

अगर उन्हे अपनी पटकथा लेखन, निर्देशन और गीत लेखन पर इतना ही अभिमान और अहंकार  है तो क्यों नहीं हॉलीवुड या बॉलीवुड की फिल्मी तर्ज़ पर कोई नई कालजयी रचना या कोई पटकथा लिख अपनी ज्ञान प्रतिभा का परिचय किसी  नवीन विषय पर फिल्मांकन, साहित्य लेखांकन कर देते है? ताकि उन्हे दुनियाँ के श्रेष्ठतम "ऑस्कर पुरुस्कार" जीतने की प्रबल दावेदारी पेश करने सुयोग प्रपट हों!! या कम से कम  भारत के "फिल्मफेयर" परितोषिक प्राप्त करने मे नाम तो आ ही सकता है?  या फिर सिर्फ सनातन धर्म के  ऋषियों  और मनीषियों द्वारा रचित  साहित्यक की चोरी और उसमे स्वच्छंद  परिवर्तन कर, छद्म ख्याति अर्जित करना ही इन लेखक द्वय का उद्देश्य है? आज की पीढ़ी की आवश्यकता के अनुरूप, आदिपुरुष मे भगवान राम सहित हनुमान, माता सीता या रावण के 90 सेकंड के टीज़र से परे अन्य किसी धर्म या संप्रदाय के आरध्यों के  बारे मे श्रीमान मनोज मुंतशिर 90 तो क्या मात्र  09 सेकंड के वृत्त चित्र बनाने का भी  साहस कर सकते है?????

मेरा आरोप  है कि भारतीय लोकतन्त्र मे मिले अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आढ़ मे इस तरह की फिल्मों  का फिल्मांकन सिर्फ और सिर्फ अनुचित और अपवित्र सोच के साथ  धनार्जन करना है!! यदि कोई श्रेष्ठ साहित्यकार या कथाकार होता तो कदापि इस तरह के निर्लज्ज, धूर्त और कुटिल कार्य न करता।  मेरा स्पष्ट मत है  हमारे ऋषियों और गुरुओं की पांडुलिपयों मे परिवर्तन कर यदि कोई लेखक या  निर्देशक द्वारा इस तरह के पापार्जन से धनार्जन और भिखारी द्वारा "भिक्षावृत्ती" से एकत्रित धनार्जन   मे कोई अंतर नहीं!! ये दोनों तथाकथित श्रेष्ठी वर्ग "भिक्षा के अन्न को खाने" के प्रयोजन को  श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 2  के श्लोक संख्या 5 मे अर्जुन द्वारा उल्लेखित "अभिप्राय" से भलीभाँति परिचित होंगे जिसके अनुसार-:

"गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।"
"हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥" ॥2.5 

अर्थात हे  महानुभाव, गुरुजनों को न मारकर इस (मैं) इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी कल्याणकारक  समझता हूँ।   क्योंकि गुरुजनोंको मारकर भी इस लोक में  रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को तो भोगूँगा!  (कहने का तात्पर्य है कि भिक्षा के अन्न को  खाना गुरु की हत्या के पाप से भी घृणित और निकृष्ट कार्य है!!) 


विजय सहगल      

 

 


2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Boycott such movies. Only lesson Hindus should give to bolywood.

बेनामी ने कहा…

बेबाक टिप्पणी। व्यवस्थित विश्लेषण, प्रवाहमान लेखन।