शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

कुफ़री -शिमला (हि॰ प्र॰)

 

"कुफ़री -शिमला (हि॰ प्र॰)"

          











आज 1 जून 2022 को मै इसलिये खुश नहीं था कि आज बैंक अकाउंट मे पेंशन जमा हो गयी। मै खुश इसलिये था कि चैल से प्रस्थान कर, मेरा परिवार सहित  कुफ़री जाना हो रहा था। 1972 मे कक्षा 8वी की भूगोल विषय की पुस्तक मे मैंने उस समय कुफ़री और उसके वर्फ़ीले मौसम के बारे मे पढ़ा था। कभी कभी भूगोल विषय की  परीक्षा मे कुफ़री के बारे मे संक्षिप्त सवाल आ जाता था। मैने बचपन मे  कुफ़री और उसके मौसम को "कुल्फी" के नाम से याद किया था ताकि स्थान और मौसम को भूगोल की उत्तर पुस्तिका मे लिखने मे आसानी हो। आज उन्ही  यादों को सँजोये प्रातः लगभग 8 बजे चैल, कुफ़री और शिमला के स्वर्णिम त्रिभुज पर स्थित कुफ़री की ओर प्रस्थान किया जो एक दूसरे से लगभग 18-20 किमी॰ की दूरी पर स्थित हैं।  चैल से बिदा लेते वक्त यहाँ की शांत और सुंदर घाटियों के बीच एक बार फिर से आने के भाव के साथ कुफ़री के लिए प्रस्थान करना सुखद अनुभव किया। इस 18-20 किमी॰ के शांत और हरे भरे वृक्षों की घाटियों से होकर सड़कों पर चलना सुगम था क्योंकि  सुबह के समय ज्यादा ट्रेफिक नहीं था।

चैल की तरफ से कुफ़री पहुँचने वाला शायद मै पहला बंदा था। घोड़े और कार पार्किंग के ठेकेदार  के साथ महासू पीक पर रोमांचक खेलों के टिकिट विक्रेता व्यापारी भी  विनिमय के लिए कार आता देख पधार चुके थे, पर हम लोगो ने प्रातः से कुछ आहार न लेने के कारण पहले आलू के गरमागरम पराँठे का स्वल्पाहार लेने का निश्चय किया। इस दौड़ भाग की दुनियाँ से उपजी बीपी और शुगर की कड़वी दवाओं के सेवन के साथ आलू के पराँठे स्वादिष्ट थे। पार्किंग की व्यवस्था ठीक ठाक थी पर, कुफ़री से ग्राम मखड़ोल मे स्थित  महासू पीक जाने आने के लिए बापसी की शर्त पर घोड़ा खरीदने के मोलभाव मे वक्त लग गया। सौदा पक्का हो जाने के बाद भी घोड़े के लिए घोड़ों की घुडशाल मे पहुँचने के लिए लगभग आधा किमी॰ की पैदल यात्रा करनी पड़ी। घोड़ा मंडी मे सैकड़ों घोड़ों को देख अंदाज़ा लग गया था कि आज महासू पीक की यात्रा मे पर्यटकों का भारी दबाब देखने को मिल सकता है। ऐसा ही  हुआ, हमलोग कुछ जल्दी कुफ़री पहुँच गए थे इसलिये महासू पीक पर जाने वालों की ज्यादा भीड़ नहीं थी, पर चारों तरफ घोड़ों की लीद की बदबू के बीच जैसे तैसे घोड़े पर सवारी कर हमने अपने परिवार के साथ यात्रा आरंभ की। घोड़ो की संख्या लगभग सात-आठ सौ से किसी भी तरह कम न होगी।  पीक पर  रोमांचक खेलों के 700/- रुपए के टिकिट विक्रेताओं को उम्र के तकाजे के  वास्ता के  कारण उन्हे निराश करने के पूर्व  सविनय माफी मांग ली। लगभग आधे घंटे की घुड़सवारी के पश्चात मखड़ौल स्थित महासू पीक पहुँच गये।

दस रुपए प्रति पर्यटक शुल्क अदा कर हम लोगो ने पीक की ओर प्रस्थान किया ही  था कि सामने ही लेह मे पाये जाने वाले याक के दर्शन हो गये। अभी पिछले वर्ष ही सितम्बर 2022 मे अपनी लेह यात्रा के दौरान याक से साक्षात्कार हो चुका था, पर यहाँ काले याक के साथ एक सफ़ेद याक के दुर्लभ दर्शन लाभ ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। मै अचंभित इसलिये था कि सफ़ेद याक के दर्शन हमे पूरे लेह लद्दाख मे देखने नहीं मिले थे। मै  लेह लद्धाख की मधुर स्मृतियों को याद कर रोमांचित था और उस सफ़ेद याक को देख मन ही मन सोच रहा था कहीं ये गोरेपन की क्रीम "फेयर एंड लवली" का तो कमाल नहीं है!!?

यहाँ से कुछ आगे ही बढ़ा था कि महासू घाटी की तलहटी मे नीले और पीले रंग की बरसाती के टेंट दूर दूर तक फैले  नज़र आ रहे थे। घाटी मे जहां हरी घास के बुग्याल (मैदान) होने चाहिए थे उसकी जगह चाय, नाश्ते और अन्य वस्तुओं की दुकानों के पंडाल लगे थे। सँकरे रास्ते के अलावा शायद ही कोई जगह पर्यटकों के खड़े होने या आराम करने को दिखाई दी हो!! कड़ी धूप मे शायद ही कोई पेड़ घाटी मे दिखाई दिया हो!! बड़ी निराशा हुई देख कर। महासू पीक मे मानव निर्मित अतिक्रमण ने 50-51 वर्षों से, दिल मे वसी  कुफ़री और महासू पीक की छवि को ध्वस्त कर चकना-चूर कर दिया था। रास्ते की इन दुकानों, खोमचों से बचते बचाते कुछ दूर घाटी के दूसरे छोर पर पहाड़ी पर बने सिल्वर रंग की जालियों से घिरे मंदिर की ओर प्रस्थान किया। पहुँचने पर मालूम  हुआ कि उक्त मंदिर  "महासू देवता नाग मंदिर" है जिसका कायाकल्प 2019 मे कराया गया था और जो साल मे मात्र एक बार सावन मास की नाग पंचमी के दिन ही खुलता है। धूप से बचने की कहीं कोई राहत न देख इसी मंदिर के पीछे कुछ वृक्षों की छाँव तले राहत भी मिली और दूर दूर तक पहाड़ों और उसकी घाटियों मे लाखों  हरे भरे पेड़ देख मन प्रसन्न भी हो गया। 15-20 मिनिट ठंडी हवाओं के बीच हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित पहाड़ों को एक टक निहारता रहा।

बेशक एक पर्यटक स्थल के नाते हम लोगो ने कुफ़री और महासू पीक का भ्रमण तो किया पर कुफ़री मे घोड़ों की लीद की बदबू और महासू पीक मे अनियंत्रित चाय नाश्ते के ढ़ावों के अतिक्रमण ने हताश और निराश किया। हम हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग से इन दोनों स्थलों पर आग्रह पूर्वक हस्तक्षेप की मांग करते है हुए इन स्थलों को सुंदर और आकर्षक ढंग से विकसित करने की अपेक्षा करते है। मुझे कहने मे कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हिमाचल प्रदेश की इस यात्रा मे सबसे खराब और अप्रिय अनुभव कुफ़री-महासू पीक का ही रहा।  अगले  भ्रमण स्थल हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से करने के संदेश के साथ नमस्कार।

विजय सहगल               

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

I liked Shimla when we went in December 1976.
Very beautiful place.