"माननीयों का
आचरण"
पिछले
दिनों संसद के दोनों सदनों के विभिन्न राजनैतिक दलों के अनेकों माननीय संसद
सदस्यों को सदन के मौजूद सत्र से निलंबित करने का समाचार हम सभी ने देखा और पढ़ा।
बड़ा दुःख और अफसोस होता है कि जिन माननियों संसद सदस्यों को चुन कर देश की जनता
देश के नागरिकों के कल्याण और हित के लिये नीतियाँ और कार्यक्रम बनाने की
ज़िम्मेदारी सौंपती है वे अपने कर्तव्यों की अवेहलना कर संसद मे हँगामा खड़ा कर देश
और देश के नागरिकों के साथ छल प्रवंचना करते है। संसद की कार्यवाही मे विघ्न और बाधा उत्पन्न करने वाले ऐसे सांसदों
का व्यवहार न केवल उस संसदीय क्षेत्र के
नागरिकों का अपमान है जिन्होने इन मननियों को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि बना कर
देश के सर्वोच्च लोकतान्त्रिक सदन के पवित्र मंदिर मे मर्यादित आचरण करने के वचन के
साथ अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि बना कर भेजा था। तख्तियाँ लेकर सदन के मंडप मे
जबर्दस्ती घुसना कौन सा मर्यादित आचरण है? वे क्यों अपने मर्जी और इक्छा
हंगामे के रूप मे बल पूर्वक क्यों लागू करवाना चाहते है? क्यों
नहीं सभापति द्वारा संचालित सदन के नियमानुसार सदस्य आचरण नहीं करते?
संसद
के इस मानसून सत्र 2022 मे विपक्ष बढ़ती महंगाई और खाद्य सामाग्री
पर जीएसटी की बढ़ोतरी को लेकर सदन मे बहस की मांग पर अड़ा है! जिसके चलते लगातार सदन
मे हँगामा खड़ा किया जा रहा है। राजनैतिक दलों की दोमुंही नीति देखिये कि जिस
जीएसटी परिषद मे जिन खाद्य
सामग्रियों पर सर्वसम्मति से जीएसटी की दर
बढ़ाई गयी थी, उस मे हँगामा कर रहे मननियों के दलों की राज्य
सरकार के वित्त मंत्री भी उपस्थित थे। क्यों नहीं उनके राज्य की सरकारों के वित्त
मंत्रियों ने खाद्य सामाग्री पर जीएसटी की दरों मे वृद्धि का विरोध किया? क्यों नहीं कॉंग्रेस पार्टी ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान के, टीएमसी ने पश्चिमी बंगाल के, आप पार्टी ने दिल्ली
और पंजाब के, डीएमके पार्टी ने तमिलनाडु के वित्त मंत्रियों
से आवश्यक वस्तुओं पर जीएसटी बढ़ाने/लागू करने की सहमति पर सवाल किये?
सरकार
की नीतियों और कार्यक्रमों पर मतांतर होना स्वाभाविक है! विपक्षी दलों का सरकार
की नीतियों और विचारों पर असहमति रखना
उनका अधिकार है!! आवश्यकता पड़ने पर उनका विरोध करना उनका संवैधानिक अधिकार है!! पर
विरोध संविधान मे उल्लेखित नियमो के तहत ही होना चाहिये। पर ऐसा प्रतीत होता है कि
अधिकतर विपक्ष विशेषकर देश की सर्वाधिक
पुरानी पार्टी, काँग्रेस सरकार विरोध और देश विरोध के बीच अंतर को भूल सरकार के विरोध
करके राष्ट्र विरोध पर उतारू हो जाती है!! तभी आये दिन संवैधानिक संस्थानों और उस
पर आसीन व्यक्तियों का अपमान करती रहती है।
इसी तारतम्य मे 27 जुलाई 2022 को काँग्रेस के संसदीय दल के प्रमुख माननीय
श्री अधीर रंजन चौधरी ने जानबूझ कर देश की सम्मानीय प्रथम आदिवासी महिला "राष्ट्रपति"
श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपत्नी! कह अपमानित किया। ये देश की राष्ट्रपति
का ही नहीं देश और देश की 139 करोड़ नागरिकों का अपमान है। अफसोस और दुःख इस बात का
है कि अधीर रंजन जी को उनकी त्रुटि की ओर इंगित कराने के बावजूद भी उन्होने इसे चूक तो
माना पर अपने अक्षम्य वक्तव्य के लिये माफी नहीं मांगी। क्या अधीर रंजन जैसे
माननीय पुरुष द्वारा भारत की राष्ट्रपति
महोदया पर इस गंभीर अमर्यादित टिप्पड़ी के लिए कॉंग्रेस दल की प्रमुख, जो स्वयं भी एक महिला है, द्वारा हस्तक्षेप कर रंजन
जी को माफी के लिये निर्देशित नहीं किया जाना चाहिये?
इसी
तरह 27 जुलाई 2019 को समाजवादी के सांसद श्री आज़म खाँ ने भी पीठासीन अध्यक्ष
श्रीमती रामा देवी पर अभद्र टिप्पड़ी की थी। दुःख तो तब और होता है कि हमारे माननीय संसद अपने कुत्सित
वक्तव्यों पर माफी मांगना तो दूर अपने भौड़े कुतर्कों को न्यायोचित ठहराने का
प्रयास करते है!! विदित हो कि श्री आज़म खाँ पूर्व मे भी रामपुर से संसद सदस्य की
प्रत्याशी रहीं जयप्रदा जी पर भी अमर्यादित,
विवादित, कलुषित
टिप्पड़ी के लिये कुख्यात रहें है। आश्चर्य इस बात का है कि श्री आज़म खाँ की
श्रीमती रामा देवी पर की गयी अभद्र टिप्पड़ी पर
विभिन्न दलों की महिला सांसदों के साथ श्री अधीर रंजन जी ने भी निंदा की थी
और श्री आज़म खाँ से माफी मांगने की मांग की थी पर आज महामहिम राष्ट्रपति जी पर
अपमानजनक टिप्पड़ी पर माफी मांगने के प्रश्न पर वे क्यों मौन है?
मेरा
इस माननीय सदस्यों से प्रश्न है कि क्या संसद के दोनों सदनों के सभापति द्वारा
विभिन्न सांसद सदस्यों के मर्यादित आचरण के कारण निलंबन जो किसी भी दृष्टि से
आपराधिक न सही लेकिन नैतिक सजा से कम नहीं है? जिस संसदीय क्षेत्र का
प्रतिनिधित्व इन मननियों द्वारा किया जा रहा है क्या उस क्षेत्र के नागरिकों के
विश्वास पर आघात नहीं है? आइये दलगत भावनाओं से परें समस्त
देशवासी लोकतान्त्रिक संस्थानों, संगठनों और उन पर आसीन
व्यक्तियों का सम्मान करते हुए देश की नयी पीढ़ी को एक शुभ,
मर्यादित और शास्त्रानुकूल संदेश दें।
विजय
सहगल



2 टिप्पणियां:
सहगल जी, आपने बिलकुल सही बात कही है। मै आपसे पूर्णरूपेण सहमत हूं।
अपनी स्वभावगत असभ्यता से यह इतने विवश हैं कि यह भी भूल जाते हैं कि इनके बच्चे इनसे क्या सीखेंगे।
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