"चित्तौड़गढ़"
मेरा
मानना है कि इतिहास के पन्नों मे "स्वर्णिम अक्षरों" मे नामांकन के लिये
किसी राजवंश का राजा होना, बल एवं वैभवशाली या साहित्य, ज्ञान या अन्य कलाओं
मे प्रवीण और निपुण होने की पात्रता होना
ही आवश्यक नहीं एक साधारण सेवक भी अपनी स्वामी भक्ति और सेवा समर्पण से भी अपना
नाम स्वर्ण अक्षरों मे दर्ज़ करा सकता है। इतिहास मे इसका जीता जागता उदाहरण "पन्ना
धाय माँ" है।
स्वामी
के इकलौते कुल चिराग को बचाने के लिये, पन्ना धाय द्वारा अपने पुत्र का बलिदान एक सेवक द्वारा स्वामी भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। पन्ना धाय
की इस कहानी को हमने बचपन मे अपनी पाठ्य पुस्तक "हमारे पूर्वज" मे पढ़ा था। मेवाड़ राजवंश के कुल को दासी
पुत्र बनवारी के कोप से बचाने हेतु, अपने पुत्र
चन्दन को राजकुमारों के वस्त्र पहना, पलंग पर सुलाना और
मेवाड़ राजकुमार उदय सिंह को बांस की टोकरी मे जूठे दोना पत्तलों के बीच छुपा कर
महल के बाहर भेजने की अमिट कहानी आज भी मेरे मन मस्तिष्क मे स्पष्ट अंकित है। जब 6
मार्च 2021 को चित्तोडगढ़ के किले पर भ्रमण
का कार्यक्रम बना तो सहसा ही "पन्ना धाय" की उक्त कहानी का स्मरण हो
आया।
कल
मेरे ऑटो सारथी रवि तिवारी जी से कार्यक्रम तय था। किसी कारणवश उनको आने मे एक घंटे का विलंब हुआ लेकिन उनके मृद व्यवहार
से मैंने दूसरा ऑटो उपलब्ध होते हुए भी रवि के साथ ही जाना तय किया। इस विलंबित
काल का उपयोग मैंने कलेक्ट्रेट के सामने स्थित विनायक रेस्टोरेन्ट मे स्वल्पाहार
ग्रहण करने मे किया। उत्तम एवं शुद्ध राजस्थानी नाश्ते की व्यवस्था तो थी यध्यपि
हर जगह की तरह कम पराश्रमिक के चलते अच्छे सेवा भावी स्टाफ न होने के कारण नाश्ते
परोसने की सेवायें साधारण ही थी।
जिलाधिकारी कार्यालय एवं शहर के हृदय स्थल होने के कारण तिराहे पर रौनक थी।
कार्यालय प्रवेश द्वार के दोनों ओर मेवाड़ की राजवधू मीराबाई की विदाई के जीवंत
चित्रण हाथी, घोड़ो और कहारों द्वारा डोली ले जाने का जीवंत चित्रण श्याम रंग की पाषाण
मूर्तियों के माध्यम से किया गया था जो
सुंदर दिखाई दे रहा था। इसी बीच हमारे सारथी श्री रवि तिवारी जी अपना वाहन ले कर आ
गये। इनकी सेवायें आप चित्तौड़गढ़ प्रवास के
दौरान ले सकते है (मोबाइल न॰ 9166865014) आनंद आयेगा।
शहर के एक ओर पहाड़ी पर बना चित्तौड़गढ़ किला अन्य दुर्गों की तरह ही बड़ी
विशाल चहर दीवारी से घिरा था जिसके अंदर ही छोटा सा शहर वसा हुआ था। सात बड़े दरवाजों जिन्हे क्रमश: पाडन पोल, भैरव, हनुमान, गणेश, जड़ेला, लक्ष्मण और राम पोल का नाम दिया गया है।
चहर दीवारी की अंदर रह रहे वासियों के पूर्वजों को रहने की राजाज्ञा ताम्र
पत्र के माध्यम से प्रदान की गयी जो आज भी वैधानिक रूप से मान्य है। इन पोल अर्थात
दरबाजों से होते हुए चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर
अल्प आवास एवं भ्रमण की राजाज्ञा पुरातत्व
विभाग द्वारा टिकिट के माध्यम से हमे दी गयी। दुर्ग मे प्रवेश करते ही उस महल के
दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ जहां पन्ना धाय द्वारा मेवाड़ राजवंश के राजकुमार उदय
सिंह को बचाने के लिये अपने पुत्र चन्दन का बलिदान किया था। उस पवित्र धरा पर खड़े
हो उस काल खंड को महसूस करना रोमांचकारी अनुभव था। यध्यपि कहीं कहीं महलों की छत्त
और दीवारें ढह गयी थी फिर भी उन महलों की मजबूत नीव पर उन दिनों के वैभव को महसूस
किया जा सकता था। किस तरह राज महलों मे चल रहे षडयंत्रों के कारण एक दासी पुत्र
बनवीर ने मेवाड़ के कुल को समाप्त करने का कुत्सित प्रयास किया था लेकिन
"पन्ना धाय माँ" द्वार अपने पुत्र के बलिदान के कारण उक्त अधम षड्यंत्र
विफल हो गया।
एक
अन्य स्थल "विजय स्तम्भ" के दर्शन का उत्सुकता भी मुझे बचपन से थी।
जिसको देखना मेरे लिये बड़े कौतूहल और उत्साह का विषय था। 122 फुट ऊंची नौ मंज़िला
वर्गाकार इमारत भारतीय स्थापत्य कला की
बारीक एवं सुंदर कारीगरी का अनमोल नमूना है। 1440 मे मेवाड़ के राजा राणा कुंभा
द्वारा मोहम्मद खिलजी पर विजय पाने की स्मृति मे बनवाए गए इस स्तम्भ को विजय
स्तम्भ का नाम दिया गया। सुरक्षा और अन्य कारणों से स्तम्भ मे प्रवेश तो निषेध था पर स्तम्भ के बाहर, जहां तक
दृष्टि जा सकती थी हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी है। किले के
प्रांगढ़ मे कहीं से भी इस अद्भुद, आकर्षक विजय स्तम्भ के
सौंदर्य को देखा जा सकता है।
चित्तौड़गढ़
दुर्ग मे ही एक अन्य ऐतिहासिक मीरा बाई का मंदिर विजय स्तम्भ के नजदीक ही है। मीरा
बाई के पति मेवाड़ राजवंश के राजा भोज राज के निधन के बाद राजसी वैभव से विरक्ति धारण कर कृष्ण की भक्ति मे अपना शेष
जीवन समर्पित कर दिया। मीरा बाई के कृष्ण भक्ति के अनेक धार्मिक भजन और गीतों से देश का जन मानस
अच्छी तरह परिचित है। उनकी कृष्ण भक्ति का गवाह ऐतिहासिक मीरा बाई मंदिर के दर्शन
अपने आप मे दुर्लभ थे। दुर्ग परिसर मे स्थित समाधीश्वर मंदिर, एवं
कुक्ड़ेश्वर मंदिर और कुंड भी आँखों को शीतलता प्रदान करने वाला था। बड़ी बड़ी
मछलियों को आटे की गोलियां खिला उनके प्रकृतिक रूप को देखना,
उनका अठखेलियाँ करना मन मे एक अलग ही सुख और संतोष को देने वाला था। सातबीस देवरी
जैन मंदिर, जौहर कुंड, पद्मिनी महल, जैन कीर्ति स्तम्भ, महावीर जैन मंदिर, नील कंठ मंदिर का स्थापित्य, कला पुरातत्व के नायाब
नमूने है। शायद इन्ही विशाल मंदिरों, महिलों और इमारतों के
कारण ही इस दुर्ग को भारत का सबसे बड़ा
दुर्ग होने का गौरव प्राप्त है।
किले
के उत्तरी छोर पर स्थित मद्मनी महल सुसज्जित मेहराव युक्त प्रवेश द्वारों से घिरे महल
ही रानी पद्मावती का महल है। इस महल की खिड़कियों से चारों तरफ तालाब से घिरे एक तीन
मंजिला इमारत को देखा जा सकता है जिसे जल महल कहते है। यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है
ये रानी पद्मावती वही रानी है जिनके उपर "रानी पद्मावती" नामक विवादास्पद
चल चित्र पिछले दिनों जारी किया गया था। एक अन्य मांडू स्थित "जल महल" का
उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग 17 दिसम्बर 2019 को किया था।( https://sahgalvk.blogspot.com/2019/12/2-28-2019-6.html ) वह भी अति सुंदर दर्शनीय
स्थलों मे से एक था।
इस
तरह लगभग चार घंटे चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भ्रमण के बाद बापस अपने आश्रय स्थल की ओर
रवाना हुए। चित्तौड़गढ़ दुर्ग की ऐतिहासिक और अविस्मरणीय यात्रा को अपनी यादों मे
सँजोये रात की ट्रेन पकड़ने हेतु हम रेल्वे स्टेशन स्थित भोजनालय मे पहुंचे ही थे कि ज्ञात हुआ कि रेल्वे कैंटीन का
आज ही उद्घाटन हुआ है। ठेकेदार श्री गुप्ता जी को अनौपचारिक बधाई देने पर पता चला
कि वह ग्वालियर के डबरा कस्बे के रहने वाले है। मेरा बैंक की सेवा का लगभग चार
वर्ष डबरा प्रवास रहा था। उनके परिवार के लोगों से हमारा परिचय था। इस परिचय और मुलाक़ात के बाद भोजनालय मे एक अलग ही
महत्वपूर्ण आथित्य सत्कार गुप्ता बंधुओं द्वारा मुझे दिया गया जिसने इस यादगार
यात्रा मे चार चाँद लगा दिये।
विजय
सहगल




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें