"नादिया
रेप कांड"
किसी महिला या बालिका के विरुद्ध अपराधिक जांच
की मांग की पृक्रिया को पटरी से उतारने का
सबसे आसान और घिनौना तरीका उस महिला/बालिका के चरित्र पर अंगुली उठा उसका चरित्र हनन करना होता
है। 4 अप्रैल 2022 को बंगाल के नादिया जिले के हंसखाली ग्राम मे 14 वर्षीय एक नाबालिग पीढ़ित किशोरी की रेप के बाद हत्या की जांच की मांग के जबाब मे माननीय
मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी ने कुछ ऐसा ही कुत्सित और अधम प्रयास मृतक पीढ़िता पर चारित्रिक
दोषारोपण कर हत्या और बलात्कार की जांच को भटकाने का निर्लज्ज काम किया है। अमानवीयता
और निष्ठुरता की पराकाष्ठा देखिये पीढ़िता के परिवार के घावों पर मलहम की बजाय मिर्च
लगते हुए उनका कहना था कि, "आपको कैसे
पता चलेगा कि उसके साथ रेप हुआ था?
या वह गर्भवती थी? या उसका प्रेम प्रसंग था?
या वह बीमार थी? एक पीढ़ित
परिवार जिसकी 14 वर्षीय किशोर बेटी की सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों द्वारा रेप के बाद
हत्या कर दी जाये और मृतिका के दोषियों को सजा देने की बात तो दूर उल्टा मृतक नाबालिग
के चरित्र हनन के कुत्सित प्रयास कि वह गर्भवती थी!! उसका प्रेम प्रसंग था!! जैसे दोषारोपण
करना एक पदासीन महिला मुख्यमंत्री को ये शोभा नहीं देता?
ऐसी अधम सोच और नकारात्मक मानसिकता की महिला से नैतिकता की उम्मीद करना तो व्यर्थ है
लेकिन विधिसम्मत मांग तो की ही जा सकती है कि वह अपने संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन
मे उन बलात्कारियों, हत्यारों और अपराधियों के
विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें फिर भले ही उनका प्रेम प्रसंग ही क्यों न हो?
क्या प्रेम प्रसंग करने वाले किशोर को ये अधिकार मिल जाता है कि वह नाबालिग किशोरी
के साथ बलात्कार करे? या उसकी हिंसात्मक
तरीकों से हत्या कर दे? कदापि नहीं!! माननीय
महोदया कानून भी एक नाबालिग किशोरी से रिश्ते को अपराध की श्रेणी मे रखता है चाहे वह
मामला यूपी का हो या बंगाल या देश के किसी भी हिस्से का।
किसी राज्य की कानून व्यवस्था को संचालित करने
वाली एजन्सियों पर अविश्वास प्रकट कर जब कोई न्यायालय अपराध की जांच केंद्रीय जांच
ब्यरों को सौपे तो इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है?
न्यायालय की ऐसी टिप्पड़ियाँ समूचे शासन तंत्र पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। पश्चिमी
बंगाल मे पिछले कुछ समय से ऐसी ही स्थितियाँ निर्मित हो रही है। एक के बाद एक कई आपराधिक
मामलों मे कलकत्ता हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच केंद्रीय एजन्सि को सौंपी है।
बंगाल के हंसखाली रेप मामले मे भी ऐसा निर्णय कलकत्ता हाई कोर्ट ने हाल ही मे दिया
है। किसी राज्य की मुख्य मंत्री अपने अनुयायियों और अनुगामियों के प्रति इतना आसक्त
और मोहग्रस्त कैसे हो सकती है कि उनकी अनैतिक
और अन्यायी कारगुजारियाँ उसे दिखाई ही न दे?
अन्यथा राज्य के आम नागरिकों के विरुद्ध रेप
और हत्या जैसे घिनौने कृत कोई मुख्यमंत्री कैसे सहन कर सकता है?
यदि ममता बैनर्जी परिवार और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के प्रति अनुराग का एकांश भी राज्य के नागरिकों के साथ निष्पक्षता
से करें तो राजधर्म के पालन करने वाली वे सर्वोत्तम लोक शासक हो सकती थी?
पर दुर्भाग्य से ऐसा हो न सका अन्यथा माननीय न्यायालयों को लगातार राज्य मे घट रहे
आपराधिक मामलों की जांच के लिये राज्य शासन की एजेंसियों से परे केंद्रीय जांच ब्यरो को क्यों निर्देशित करना पड़ता।
सुश्री ममता बैनर्जी को जो पिछले कुछ समय से
केंद्रीय राजनीति मे आने को लालायित है,
निश्चित ही उन्हे आत्मचिंतन और आत्ममंथन करना होगा कि इस सोच और मानसिकता के साथ देश के सर्वसाधारण जन उनका नेतृत्व स्वीकार करेंगे?
विजय सहगल


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