"बीरभूम
मे कायरता पूर्ण कृत्य"
पिछले दिनों 21 मार्च 2022 को पश्चिमी बंगाल
के बीरभूम जिले के बोगतुई गाँव मे असामाजिक एवं अराजक तत्वों ने गाँव के अनेक घरों
मे तोड़फोड़, मारपीट और लूटपाट कर
घरों मे आग लगा दी। इस आगजनी की घटना मे आठ जिंदा लोगो की जीते जी अग्नि समाधि मे
जल कर मौत हो गयी। घटना विभत्स एवं हृदय विदारक थी। इस दुःखद घटना मे देश भर के
लोगो को झकझोर दिया सिवाय पश्चिमी बंगाल की मुख्य मंत्री सुश्री ममता बैनर्जी के। घटना
ने मुझे भी विचलित तो किया पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि मैंने अपने 19 मार्च
2022 के अपने ब्लॉग "जनादेश" (https://sahgalvk.blogspot.com/2022/03/blog-post_19.html)
एवं 23 अगस्त 2021 के ब्लॉग "सौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली" (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/08/blog-post_23.html)
मे पश्चिमी बंगाल मे सुश्री ममता बैनर्जी के निरंकुश और आलोकतान्त्रिक शासन के बारे मे विस्तार पूर्वक लिखा था। बीरभूम
के नरसंहार की यह घटना पिछली घटनाओं की
पुनरावृत्ति मात्र है जो पश्चिमी बंगाल मे 2021 के चुनावी समर मे उनकी सत्ता बापसी के बाद
राज्य मे घटी थी। उन घटनाओं मे भी उनके अनुचरों और समर्थकों ने हिंसा का जो घिनौना
तांडव "खेला होवे" किया था जिसमे हत्या,
लूटपाट, आगजनी,
बलात्कार की घटनाओं मे तृणमूल काँग्रेस के संगठित गुंडा तत्वों ने अपने राजनैतिक
विरोधियों को सबक सीखने और कुचलने के लिए किया था।
पश्चिमी बंगाल मे 2021 के चुनाव बाद हिंसा,
हत्या, बलात्कार पिछली घटनाओं मे भी फौरी तौर पर सर्वोच्च
न्यायालय ने सीबीआई से जांच के आदेश दिये थे इस बार भी कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्वतः
संज्ञान लेते हुए 21 मार्च 2022 की बीरभूम की इस हिंसक हत्या कांड मे केंद्रीय अन्वेषण
ब्यूरो से जांच के आदेश दिये। न्यायालयों की अपनी एक अलग प्रणाली है इस पृक्रिया
मे समय एक स्वभविक एवं अनिवार्य घटक है जो
कभी कभी जनसमान्य के बीच न्याय के संदेश को हल्का और प्रभाव शून्य कर असामाजिक
तत्वों और उपद्रवियों को सकारात्मक संदेश देने मे विफल हो जाते है। पश्चिमी बंगाल
मे शासन और सत्ता का राज्याश्रय प्राप्त ऐसे अपराधी इसी कृत का फायदा उठा निरंकुश
भस्मासुर बन जाते है और परिणाम स्वरूप हिंसा,
हत्या, बलात्कार एवं आगजनी की घटनाओं को अंजाम
देते है। बड़ा खेद और अफसोस है कि बंगाल मे सुश्री ममता बैनर्जी का ऐसे तत्वों पर कहीं कोई
नियंत्रण नहीं है।
आज कल देश के सभी राजनैतिक दलों मे चाहे वे
सत्ता पक्ष के हों या विरोधी पक्ष मे एक समान चलन चल पड़ा है कि किसी भी नृशंस घटना
घटित होते ही विरोधियों के राज्य मे घटित पूर्व घटनाओं का उल्लेख कर अपना बचाव
करने की कोशिश करते है जो नितांत अमानवीय और निंदनीय है जैसा कि बीरभूम की इस घटना
मे भी हुआ? बीरभूम की घटना पर सुश्री ममता बैनर्जी ने विरोधियों के आरोपों के प्रत्यारोप
मे उन्नाव, हाथरस और लखीमपुर की
घटनाओं का उल्लेख कर बीरभूम की घटना को हल्का करने की कोशिश की जो सर्वथा अमानवीय
और निंदनीय है। सुश्री ममता बैनर्जी अपने राजनैतिक विरोधियों के प्रति जबाब देय है
या अपने राज्य एवं देश की आम जनता के
प्रति? ऐसा कह उन्होने न केवल बीरभूम घटना के पीढ़ितों के जख्मों पर
नमक छिड़कने का कार्य किया है अपितु घटना मे त्वरित एवं कठोर कार्यवाही से बचने का
कुत्सित प्रयास किया है जिसकी तीव्र भर्त्स्ना की जाने चाहिये। घटना मे लीपा पोती और लापरवाही इसी बात से
इंगित होती है कि ममता जी के घटनास्थल पर भ्रमण के दौरान आम लोगो की भीड़ के बीच राज्य के पुलिस महा निदेशक को
चमत्कारिक एवं सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने वाले आदेश के तहत मुख्य आरोपी को गिरफ्तार
करने के आदेश दिये। आश्चर्य और कौतूहल का विषय ये था कि बीरभूम घटना को अंजाम देने
वाले जिस मुख्य आरोपी अनारुल हुसैन को पुलिस तीन दिन से गिरफ्तार नहीं कर सकी थी
उसे मात्र तीन घंटे के अंदर गिरफ्तार कर
लिया गया !! लोगो का कहना है कि पुलिस
स्थानीय असामाजिक तत्वों को राजनैतिक पराश्रय के चलते गिरफ्तार करने से डरती है।
क्या ऐसी ही कल्पना भारतीय संविधान के निर्माताओं ने संविधान की प्रस्तावना:-
"हम भारत के लोग.....................," लिखते
समय की थी?
पश्चिमी बंगाल राज्य एक ऐसा राज्य है जिसकी
सीमाएं बंगला देश से लगती है। देश की सीमाओं की सुरक्षा की दृष्टि से इस राज्य को
लगातार विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है अतः इस राज्य की अतरिक्त
ज़िम्मेदारी हो जाती है कि कानून व्यवस्था मे कोई
भी कोताही देश की सुरक्षा के लिए
गंभीर चुनौती का सामना कर सकना पड़ सकता है। पर खेद है येन केन प्रकारेण सत्ता
प्राप्त करने की चाह मे राजनैतिक पार्टियां एवं सत्ताधारी दल देश के समक्ष एक
गंभीर चुनौती पेश कर रहे है। अतः न्याय
पालिका के साथ केंद्र सरकार को भी देश की सीमाओं पर इस सुरक्षा की चुनौती को
दृष्टिगत कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। अब
तो गाँव और कस्बों की ये प्रतिद्वंद्ता और हिंसा पश्चिमी बंगाल की विधान सभा तक
पहुँच गयी!! दिनांक 28 मार्च को विधान सभा मे माननीय विधायकों के बीच जो हिंसा,
मारपीट और झूमाझटकी हुई वह लोकतन्त्र के नाम पर कलंक और शर्मनाक है। कैसे एक
सत्ताधारी दल का विधायक एक आदिवासी विधायक के सिर के बाल खींच पटकता है और बाद मे
उस आदिवासी विधायक का कालर पकड़ कर घसीटते हुए ले जाता है। एक गरीब और पिछड़े वर्ग
के विधायक के साथ सत्तारूढ़ दल का ये रवैया है तो अनुमान ही लगाया जा सकता है कि
सामान्य आदिवासी और दबे-पिछड़े वर्ग के लोगो के साथ इनका व्यवहार कैसा रहता होगा ये
विचारणीय प्रश्न है?
आज 29 मार्च को टीएमसी के एक विधायक का श्री
नरेन चक्रवर्ती द्वारा बीजेपी को वोट देने पर देख लेने की धमकी का वीडियो खूब
वाइरल हो रहा है। क्या संदेश दे रहे है ये माननीय विधायक प्रदेश और देश की जनता को?
इनकी और इनके दल की नीति और नियत पर विचार अवश्य होना चाहिये।
बड़ी खुशी और प्रसन्नता होती है जब किसी
राज्य का मुखिया या अन्य नेतृत्वकारी व्यक्ति राष्ट्रीय राजनीति मे अपना स्थान
बनाता है। इन्ही पद चिन्हों पर बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी भी चल कर
राष्ट्रीय राजनीति मे आने को आतुर है और सार्थक प्रयास भी कर रही है जो स्वागत
योग्य कदम है। केंद्रीय राजनीति मे आना राजनैतिक युद्ध का परीक्षण स्थल है जहां
आपके विचारों, नीतियों और कार्यक्रमों
के साथ आपके आचार विचार, व्यक्तित्व-व्यवहार
एवं आपके क्रोध पर विजय की परीक्षा धैर्य के धरातल होती है। देश की जनता उक्त सारे
पैमानों की कसौटी पर कसने के बाद ही अपके जय-पराजय पर निर्णय करेगी। लेकिन क्या सुश्री
ममता बैनर्जी के प्रदेश मे कानून व्यवस्था,
उनके राजनैतिक अनुयाइयों के असामाजिक एवं हिंसात्मक कृत उनके इस लक्ष्य मे अबरोध
पैदा नहीं करेंगे? क्या सुश्री ममता
बैनर्जी को इस पर चिंतन मनन की आवश्यकता नहीं है?
सुश्री ममता बैनर्जी, राज्य मे
हुए 2021 के चुनाव के दौरान और सत्ता
प्राप्ति के बाद उनके पार्टी कार्यकर्ताओं द्वरा अपने राजनैतिक विरोधियों के विरोध की गयी चुनावी हिंसा के आचरण से भली
भांति परिचित है। सुश्री बैनर्जी को हाल
ही मे उत्तर प्रदेश के चुनावों मे माननीय अखिलेश को दिये गये अपने आशीर्वाद के
फलस्वरूप उत्तर प्रदेश की आम जनता द्वारा दिये गये जनादेश को भी अपने केंद्रीय राजनीति मे आने के
मिशन के पूर्व याद रखना होगा?
विजय सहगल




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