गुरुवार, 6 जनवरी 2022

राजू (कहानी)

 

"राजू"(कहानी)



राजू मेरी ताई का बेटा था घर मे सबसे छोटा, दुबली पतली काया लेकिन इरादों मे मजबूती और ईश्वर मे असीम श्रद्धा उसे विरासत मे मिली थी। ताई द्वारा पोषित धर्म के संस्कारों ने उसके मानस  पटल पर राम चरित मानस की गहरी छाप छोड़ी थी। पाँचवी छटी कक्षा मे आते आते उसे रामचरित मानस मे प्रवीणता प्राप्त हो गयी थी। रामचरित मानस के सुंदर कांड की समस्त चौपाइयाँ उसे कंठस्थ याद थी। मै अपने किशोर वय मे उसे बहुत ज्यादा महत्व नहीं देता था पर इसके उलट उसके दिल मे मेरे लिये बड़ा प्रेम और सम्मान का भाव था। वह मुझे  "गुरु जी" कह के संबोधित करता था।

अभावों मे रहने और कठिनाइयों मे जीवन यापन करने के बावजूद वह वाद-विवाद और अंताक्षरी प्रतियोगिताओं मे अव्वल आने लगा और स्कूल के साथ अपना भी नाम रोशन कर रहा था। पर अपनी शिक्षा और विध्यालय की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु राजू को कठिन परिश्रम करना पड़ता था। परिवार मे उन दिनों अखबार की रद्दी से लिफाफे बनाने का काम किया जाता था। राजू भी लिफाफे बनाने मे मशीन की तेजी से हाथ चला कर बिभिन्न क्षमताओं और आकार के छोटे बड़े लिफाफे बनाने मे सिद्धहस्त था। वह तूफान की तेजी से अपना हाथ चला कर लिफाफा बनाता था। लिफाफे  विभिन्न आकार प्रकार के होते पर पर तीन चरणों मे लिफाफे बनाने की  पृक्रिया समान होती। अखबार के दोनों किनारों को आटे की लेई से चिपका कर "पुंगे" बनाए जाते। दूसरे चरण मे क्षमता के अनुसार  नीचे के सिरे को विशेष तिकोने आकार मे मोड़ा जाता जिसे "सिंघाड़ा" कहा जाता था तत्पश्चात तीसरे और अंतिम पढ़ाव मे उनको चिपकाने की पृक्रिया के पश्चात लिफाफा तैयार होता। पचास पचास की संख्या मे गिनती कर उनको धागे से सिल कर बंडल बनाए जाते जिन्हे बाज़ार मे बिक्री के लिये भेजा जाता।

आज राजू सुबह पाँच बजे ही उठ गया था। अंताक्षरी प्रतियोगिता का शुल्क जमा करने की आज आखिरी तारीख थी।  दिन के अँधियारे झुरमुटे मे ही उसने "पुंगे" बनाना शुरू कर दिये थे। उसके हाथों की तेजी देखते ही बनती थी। देखते ही देखते बेलनाकर के पुंगे पूरी मँझपौरिया  मे यहाँ वहाँ बिखरे पड़े थे। क्षणिक विश्राम के पश्चात पुंगों की एक तह लगा कर सिंघाड़े के आकार मे मोड़ना शुरू कर दिया। उसका लक्ष्य लिफाफे के दस बंडल को बाज़ार मे बेच कर उनसे मिले पैसों से प्रतियोगिता की फीस जमा करना था। सूरज ने रश्मियों के सात घोड़ों पर सवार हो एक अच्छी ख़ासी  यात्रा तय कर ली थी। उसने अपने तेज प्रकाश से आसमान को सुनहरी किरणों से प्रकाशित कर दिया था। तभी ताई की आँख खुली। राजू को अभी भी सिंघाड़े चिपका कर लिफाफों को अंतिम रूप देना था। ताई ने राजू को उसे सुबह सुबह न जगाने पर नाराजी भरा  उल्हाना दिया और झटपट नहा धोकर बिना एक मिनिट गवाए चूल्हे मे लकड़ियाँ डाल रोटी बनाने की तैयारी शुरू  कर दी। घर मे  चाय पीने या नाश्ता खाने का चलन उसकी दिनचर्या मे न था। ताई ने जल्दी से चूल्हे पर  सब्जी चढ़ा आटा गूथने के क्रम को संपादित किया ताकि सब्जी के बनते ही चूल्हे पर रोटियाँ सेंकने के क्रम को शुरू किया जा सके।

अब तक राजू ने भी लिफाफों की आखिरी पृक्रिया को पूर्ण कर 50-50 लिफाफों के दस बंडल बाँध लिये थे और स्नान आदि एवं धार्मिक स्रोत्र एवं श्लोकों का वाचन कर भोजन करने के लिए रसोई मे बैठ गया। दिन के दस बज चुके थे अभी मुख्य काम उन लिफाफों का  व्यापार विनमय कर मुद्रा अर्जित करनी थी ताकि प्रतियोगिता का शुल्क 12 बजे  के पूर्व जमा किया जा सके। कपड़े पहन कर उसने लिफाफों के बंडलों को जल्दी-जल्दी झोले मे रक्खा। उसके लिफाफों के ग्राहक निश्चित थे, उम्मीद थी के दस बंडल बेचने मे उसे बहुत वक्त न लगेगा। पर न जाने आज क्या बात थी कि जिस दुकानदार से लिफाफों का बंडल खरीदने की बात करता तो जबाब मिलता अभी जरूरत नहीं या अभी पहले ही लिफाफे रक्खे है। उसे लगा कही ऐसा न हो कि शुल्क  जमा करने से वंचित रह जायें? वह और तेजी से लिफाफों को बेचने के प्रयास करने आगे बढ़ता चला गया। 2-3 बंडल बिके भी पर उनसे काम चलने वाला नहीं था। उसने अपने प्रयास तेज कर दिये। कुछ घनिष्ठ दूकानदारों से आग्रह कर कुछ रुपए उधार भी मांगे पर बात बनी नहीं। इन प्रयासों के चलते वह काफी दूर निकाल गया था। अब तक साढ़े ग्यारह बज चुके थे। उसे कुछ घबड़ाहट और बेचैनी भी हो रही थी। उसने कुछ और दूकानदारों से अनुनय विनय कर बंडल खरीदने का निवेदन किया। कुछ धूर्त दूकानदारों ने मजबूरी का फायदा उठा बंडल को औने पौने भाव मे खरीदने की बात कही। राजू की मजबूरी थी उसे तो बस कुछ पैसों की जुगाड़ जो करनी थी ताकि शुल्क जमा हो जायें! अब उसने शेष चार बंडल लागत से भी कम कीमत पर बेच पैसे जेब मे डाले और स्कूल की तरफ दौड़ा। कार्यालय का बाबू हिसाब समेट कर जाना ही बाला था कि राजू ने देर से आने के लिये माफी मांगते हुए बाबू को नमस्कार किया। ये तो अच्छा था बाबू राजू के हालातों से परिचित था बोला इतनी देर कहाँ कर दी राजू। राजू ने अपनी आप बीती सुनाते हुए जेब से सारे पैसे निकाल कर बाबू के समक्ष रख दिये। उसे उम्मेद थी कि पूरे पैसे होंगे पर जिसका डर था वही हुआ अंत मे आठ आने कम पड़ गये। राजू का चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी। आँखों के कोनो मे आँसू की बूंद मानों टपकने को तैयार थी और वह कातर दृष्टि से बाबू की ओर  देख रहा था!! मौन करुणा संदेश  को बाबू ने भांस लिया और  ढांढस बंधाते हुए पचास पैसे अपनी जेब से निकाल, शुल्क जमा कर लिया। राजू ने बाबूजी के पैर छू आभार व्यक्त किया।

आज इस अंतर विध्यालीन  रामचरित मानस पर आधारित "अंताक्षरी प्रतियोगिता" का आयोजन स्कूल मे होना था। स्कूल का सभागार  बच्चों से खचा खच भरा था। जिस दल मे राजू था उसकी धुरी राजू के चारों ओर ही घूम रही थी। जब एक दल मानस की चौपाई शुरू करता तो राजू झट से आखिरी शब्द से नई चौपाई शुरू कर गेंद अपने प्रतिद्वंदी के पाले मे डाल देता। जब दूसरा  दल चौपाई का जबाब देता तो वह पहले से ही उस दल द्वारा कही चौपाई के  आखिरी शब्द को पहले से ही पकड़ लेता और अपने दल के सदस्यों से चर्चा कर खुद ही नई चौपाई भी बता देता। अंताक्षरी का खेल लगभग एक तरफा ही चला। लगभग 8-10 अंकों से राजू की टीम विजयी हुई थी। उसकी टीम की सफलता का सारा श्रेय राजू को ही गया था। जीत की खुशी मे उसके साथियों ने खुशी से उछल कर उसे कंधों पर उठा लिया था। आयोजकों द्वारा उसे फूलों का हार पहना उसे मेडल, प्रमाण पत्र और शाल उड़ा कर सम्मानित किया।  

घर आने पर उस दिन राजू दौड़ता हुआ मेरे पास आया और पुरुस्कार के रूप मे मिले मेडल और प्रमाण पत्र के साथ एक शाल मेरे हाथों मे थमा दिये।   मैंने पूंछा, अरे ये क्या है राजू? मै आगे कुछ बोल पाता उससे पहले ही उसने मेरे पैर छूकर खुशी से उछलते हुए कहा, "गुरुजी आपके चेले ने रामचरित मानस की चौपाइयों की अंताक्षरी प्रतियोगिता मे प्रथम स्थान प्राप्त किया है। आज स्वतः ही मुझे अपने स्कूल के वार्षिक आयोजनों  की याद हो आयी। मै जब अन्य छात्रों को विभिन्न गतिविधियों मे पुरुस्कार प्राप्त होते देखता तो मन के किसी  कोने मे कहीं कसक उठती की काश एक पुरुस्कार मुझे भी मिलता या परितोषिक के रूप मे एक अदद प्रमाण पत्र ही प्राप्त हो जाये पर ऐसा संभव नहीं था क्योंकि मै बचपन मे  पढ़ाई लिखाई मे औसत दर्जे का छात्र था।  खेलकूद, अन्य सांस्कृतिक या सामाजिक  गतिविधियों  मे भी मेरी भागीदारी शून्य ही थी।

मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मन ही मन सोचा कि चलो भले ही मुझे कभी कोई मेडल या कप नहीं मिला। लेकिन, सहसा आज राजू ने मेडल जीतने का श्रेय मुझे देकर मेरे अंतर्मन मे दबी मेरी सुषुप्त इच्छाओं को जाग्रत कर मानो यथार्थ से मेरी ललसाओं का साक्षात्कार करा दिया हो।

आज मै पुनः राजू की प्रतिभा, ज्ञान और कौशल का कायल हो गया था।

विजय सहगल

3 टिप्‍पणियां:

Deepti Datta ने कहा…

अति सुंदर प्रस्तुति..

गोपाल pathak ने कहा…

अति सुंदर व मार्मिक

Unknown ने कहा…

अति सुन्दर