"बारसूर
के गणेश-दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)"
कल दिनांक 21 जनवरी 2022 को "सकट
गणेश" का पर्व अर्थात "संकट नाशक गणेश चौथ" थी। बचपन मे हमे "सकट
गणेश" की पूजा का हमेशा इंतज़ार रहता था। गणेश भगवान की पूजा का तो विधान था
ही पर मेरी माँ इस दिन बिशेष तरह के तिली के लड्डू बनाती थी जो मुझे बहुत प्रिय
थे। दो तरह के लड्डू का प्रावधान वो पूजा करने के लिए करती थी। एक तो आटे के लड्डू
होते और दूसरे काली तिली के लड्डू होते जिनमे अदरक को कूट कर मिलाया जाता। लड्डू बनाने मे माँ बड़ी मेहनत करती थी। आटे के
लड्डू मे किसी विशेष विधि न थी पर काली तिली के लड्डू मे श्रम करना पड़ता था। तिली को
भून कर लोहे के खल्लड़ मे अदरक मिला का काफी देर कूटा जाता था जिससे अदरक का रस तिली
मे अच्छी तरह मिल जाता साथ ही गुड़ को भी उसी खल्लड़ मे कूट कर फिर लड्डू बनाये
जाते। अदरक और गुड़ का जो स्वाद, निराली गंध और रस लड्डूओं मे आती वह अतुलनीय होती।
मै पहले आटे का लड्डू खाता फिर बाद मे तिली का
लड्डू ताकि स्वादिष्ट तिली का स्वाद देर तक मुंह मे बना रहे। एक खास बात और होती
स्वादिष्ट मीठा खाने के बाद मै काफी देर तक
पानी नहीं पीता ताकि देर तक मीठे के स्वाद का आनंद ले सकूँ। बचपन मे कुछ शैतानियाँ
भी इस दौरान होती, मै कुछ लड्डू छुपा कर
रख देता। यदि घर मे भाई बहिनों के बीच लड्डू के बँटवारे को ले कर हो हल्ला होता तो
चुप चाप तिली के लड्डू लौटा देता और यदि मामला शांत रहता तो फिर चोरी के लड्डू
खाने का कुछ मजा ही और होता!! पर आज कभी ये सोचता हूँ तो बचपन की शैतानियों पर
थोड़ी ग्लानि तो होती ही है।
इस अवसर पर भगवान गणेश का स्मरण स्वाभाविक
है। आज छत्तीसगढ़ स्थित "सकट
गणेश" पर दंतेवाड़ा जिले के बारसूर के गणेश मंदिर की याद स्वतः ही हो आयी।
पर इसके पूर्व बस्तर के बारे मे कुछ चर्चा
करना चाहूँगा। यूं तो बस्तर के दंतेवाड़ा एवं जगदलपुर प्रकृतिक एवं संस्कृति
धरोहरों से भरपूर धार्मिक एवं प्रकृतिक स्थलों से परिपूर्ण है लेकिन नक्सलवादियों
और माऊवादियों से ग्रस्त क्षेत्र होने से पर्यटकों का आवागमन नगण्य है। मै अपने रायपुर
के साढ़े चार साल के प्रवास के कारण नक्सलवादियों की हिंसा और डर के कारण कभी बस्तर
के इन क्षेत्रों मे न जा सका। पर अपने जगदलपुर
प्रवास के दौरान मै अपने साथी ऋतुराज शर्मा के साथ मई 2015 के एक रविवार को
दंतेवाड़ा स्थित दंतेश्वरी मंदिर के दर्शनार्थ रवाना हुआ था। इस यात्रा के दौरान
जगदलपुर से दंतेवाड़ा के मार्ग मे घने जंगलों से आच्छादित मार्ग पर कार ड्राइविंग
के अपने यादगार अविस्मरणीय यात्रा को अब तक नहीं भूला। जगदलपुर से दंतेवाड़ा के बीच
बने शानदार पक्की डामर दो मार्ग वाली सड़क
देखते ही बनती है। बस्तर के पूरे क्षेत्र अधोसंरचना मे जो विकास देखा अकल्पनीय था।
लेकिन नक्सलवादियों के खौफ और भय के कारण
ही जनसाधारण लोग बस्तर की यात्रा पर जाने से डरते है। मेरा दावा है कि जगदलपुर का
चित्रकूट एवं तीरथ गढ़ जलप्रपात एवं कुटुंबसर की धरती की नीचे स्थित गुफाएँ देखेंगे तो आप रोमांच और आश्चर्य से इन स्थलों को
देखते रह जाएंगे। प्रकृति द्वारा निर्मित ईश्वर की इन अद्भुत रचनाओं ने बस्तर क्षेत्र
को अपने स्नेह, आशीर्वाद और उपहार से समृद्ध किया है।
मेरे साढ़े चार साल के छत्तीसगढ़ प्रवास से
मिले अपने अनुभव के आधार पर मै कह सकता हूँ कि जंगल मे अपना अनैतिक,
अनर्थकारी और अन्यायी शासन चलाने वाले ये नक्सलवादी,
गाँव मे संगठित गिरोह की तरह अपराधिक शासन चलाते है जिन पर अंकुश लगाना अत्यंत आवश्यक है
पर साधारण नागरिकों, पर्यटकों पर हमलों या
हिंसा की घटनाएँ कम या नगण्य ही देखने को मिली। इस सब के बावजूद मै अपने बैंक
सहयोगी ऋतुराज शर्मा के परिवार ने छत्तीसगढ़ सहित देश के लोगो के बीच सबसे सम्मानित
एवं प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर के दर्शन का
कार्यक्रम बनाया बस भ्रमण का थोड़ा उत्साह और जज़्बा दिखाने की जरूरत है। ये स्थान
देवी सती की 52 शक्तिपीठों मे से एक है। ऐसी मान्यता है कि देवी सती का
"दांत" इस स्थान पर गिरने के कारण इसका
नाम दंतेवाड़ा पड़ा।
11-12वीं शती के बने इन मंदिरों की अपनी
अलग ही विशेषता है। भगवान गणेश को समर्पित
इस मंदिर मे बैठी स्थिति मे एकदंत गणेश जी को दो प्रितिमायेँ है। बड़ी मूर्ति 7 फुट
एवं छोटी मूर्ति साढ़े 5 फुट ऊंची है जो अलग अलग एक पत्थर पर तराशी गईं है। दोनों
देवाधिदेव गणेश के स्वरूप की वक्रतुंड बायें
ओर मुड़ी है जो सुख, शांति और
समृद्धि का प्रतीक है। दोनों गणेश विग्रह चतुर्भुजा धारी है जिनके एक हाथ मोदक एवं
दूसरे हाथ मे अस्त्र धारण किये है,
पैरों मे पाजेब को भी स्पष्ट देखा जा सकता है। गणेश का वाहन मूसक भी प्रितमा के
नीचे विध्यमान है एवं जनेऊ धरण किये बारसूर नामक स्थान मे स्थित इस ऐतिहासिक गणेश
मंदिर के अद्भुद दर्शन अतुलनीय थे। इस स्थान के पास ही बत्तीस पाषाण स्तंभो पर
निर्मित बत्तीसा शिव मंदिर, मामा भांजा
मंदिर भी स्थित है।
हमारी नक्सलवादी प्रभावित बारसूर के गणेश
दर्शन के कुछ दिन बाद एक दिन समाचार पत्रों मे बारसूर मे नक्सलवादियों द्वारा एक बस को जलाये जाने
का समाचार पढ़ा गनीमत ये थी कि बस मे आग लगाने
के पूर्व सभी यात्रियों को बस से उतार दिया गया था।
इस तरह साफ सुथरे शांत एवं पुरातत्व की
धरोहर समृद्ध वारसूर गाँव मे भगवान गणेश
के दर्शन अविस्मरणीय थे। "प्रणम्य शिरसा देवं,
गौरी पुत्रम विनायकम"!! संकट नाशक
भगवान गणेश की जय!!
विजय सहगल
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