"दान
का कंबल (सत्य घटना पर आधारित कहानी)"
भाग्वती नोएडा की
सैक्टर पचास की आम्रपाली ईडेन पार्क की इस सोसाइटी के आठ घरों मे वर्तन,
झाड़ू पोंछे का काम करती है। इससे मिली मजदूरी से वह अपने चार बच्चों का गुजर वसर
बमुश्किल कर पाती है। कमजोर वर्ग से आयी ये
अनपढ़ महिला प्रातः लगभग सात बजे अपने घर
से निकल दोपहर 1-2 बजे घड़ी दो घड़ी
सुस्ताने के बाद दूसरी शिफ्ट के काम,
जूठे वर्तन आदि की सफाई के लिये पुनः तीन बजे से शुरू हो शाम को लगभग छः बजे
समाप्त कर अपने घर पहुँचती है। अनुसूचित
जाति की इस महिला की कमोबेश ये ही दिनचर्या पूरे साल चलती है। मेहंगाई के इस दौर
मे परिवार की परवरिश मे उसके पति और एक बड़ी बेटी भी हिस्सा बंटाते है,
तब कहीं तीन अन्य बच्चों की पढ़ाई, घर खर्च और मकान
किराये के बाद मुश्किल से 2-3 हजार की बचत को अपने बूढ़े सास-ससुर को खर्चे के लिये
गाँव मे भी भेजती है।
आम्रपाली सोसाइटी के इन आठ घरों मे जहां
भाग्वती काम करती है के रहवासियों को शायद
ही कभी उसके काम काज से शिकायत रही हो या उसकी ईमानदारी पर शक किया हो। सोसाइटी के
रहवासी भी यदा कदा खाने पीने की वस्तुओं और वस्त्रादि दे उसकी आवश्यकताओं की
पूर्ति मे सहयोग करते है। दिसम्बर की इस भीषण सर्दी के प्रकोप मे फ्लैट क्रमांक
604 की उस संभ्रांत महिला ने भाग्वती को एक कंबल दिया। कंबल यध्यपी बहुत पुराना था,
जगह जगह से छन कर उसके छिद्र कंबल के उम्रदराज होने की कहानी व्याँ कर रहे थे पर
फिर भी भाग्वती खुश थी कि इस जान लेवा ठंड से उसको कुछ राहत तो मिल ही जाएगी।
परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकता जैसे तैसे पुरानी लोई,
कंबल और रज़ाई से पूरी हो गयी थी पर उसके
हिस्से की रज़ाई मे पिल्ले (रुई के छोटे-छोटे ढेर बन जाना) पड़ जाने के कारण रुई के
जहां तहां गुठले बन गए थे और रज़ाई मे रुई समान रूप से न फैली होने के कारण ठंडी हवा आती थी। बैसे भी भाग्वती
ने सोचा था दिसम्बर के बीस दिन तो गुजर ही गए है और दस दिन की बात है गाँव की
दुकान से एक नया कंबल ले बेटे को दे देगी जिसे वह बेहद प्यार करती थी क्योंकि वह
"बौरा" (बोल न सकने वाला) था और
उसके हिस्से की रज़ाई से वह अपना काम चला लेगी। रोज अपनी उधेड़-बुन मे जब वह घर जाने
के पहले गाँव की उस कपड़े की दुकान से जैसे ही
निकलती हर बार वह उस कंबल को देखती
जो दुकान के कोने मे रक्खा हुआ था और उसे
पसंद था और जिसे उसने खरीदने का मन बनाया हुआ था।
604 वाली मेडम ने जब उसे वह पुराना कंबल
दिया तो उसने सोचा चलो अब 8-10 दिन वह इस
पुराने कंबल से काम चला लेगी फिर दस दिन बाद तो नये कंबल को लेना ही है?
भाग्वती ने मेडम से पुराने कंबल की पर्ची बनाने का निवेदन किया ताकि निकासी द्वार
पर तैनात गार्ड को पर्ची दिखा वह कंबल घर ले जा सके?
पर 604 वाली मेडम ने भाग्वती को बगैर
पर्ची दिये ही कहा, "कंबल पुराना है
और यदि गार्ड पूंछे तो इंटरकॉम पर मेरी बात करा देना। बगैर किसी पूर्वाग्रह के जब
गेट पर खड़े गार्ड ने भाग्वती से कंबल
की पर्ची मांगी तो उसने मेडम की बात बताई
और गार्ड साहब से फोन पर मेडम से बात करने की प्रार्थना की। लेकिन गार्ड ने
सोसाइटी मे हो रही चोरी के मद्देनज़र बड़ी अशिष्टता पूर्वक पर्ची लाने की बाध्यता
बतायी। भाग्वती निम्न वर्ग से आने वाली
निर्धन महिला जरूर थी पर गार्ड द्वारा चोरी की बात कह और फोन पर 604 नंबर वाली
मेडम से बात करने से इंकार पर उसका
स्वाभिमान जाग उठा और उसने कंबल वही
कूड़ेदान मे फेंक वह अपने घर चली गयी।
अगले दिन जब भाग्वती रोज की भाँति सोसाइटी मे
काम करने पहुंची तो गेट पर तैनात गार्ड ने उसे प्रवेश देने से इंकार कर दिया।
भाग्वती ये सुन स्तब्ध रह गयी। उसने जब गार्ड से प्रवेश निषेध का कारण पूंछा?
तो उसने बताया कि कल कंबल के मुद्दे पर उसने गार्ड स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया
और गार्ड को चप्पल मारी!! भाग्वती ये सुन हतप्रभ थी!! स्वतः स्फूर्त मुंहवाद से
उसने इंकार नहीं किया पर अभद्रता या दुर्व्यवहार या चप्पल मरने जैसी कोई बात कहीं
दूर-दूर तक न थी। पर पुरुष प्रधान समाज ने उस अनपढ़,
निर्धन और निम्न वर्ग से आने वाली महिला
की कोई बात सुनने से इंकार कर दिया?
यह देख भाग्वती की मनोदशा कुछ क्षणों के लिये बिगड़ी और ऐसा लगा कि उसके पैरों के
नीचे की जमीन खिसक गयी हो? उसकी आँखों के
सामने अंधेरा छा गया? एक झटके मे उसकी
मेहनत मजदूरी पर पानी फिर गया! उसको अपने सपने बिखरते नज़र आने लगे?
क्यों उसने अपने स्वाभिमान के विरुद्ध पुरुष प्रधान समाज के पौरुषत्व को ललकारा था?
यूं भी एक नीच कुल की निर्धन महिला का मर्द से तर्क वितर्क का क्या अधिकार?
उसे सफाई का कोई भी मौका दिये बिना गार्ड्स और सोसाइटी के पदाधिकारियों ने उसके सोसाइटी
मे प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी।
भाग्वती को फ्लैट नंबर 604 की अपनी मालकिन
पर पूरा भरोसा था कि वह वास्तविक स्थिति को सोसाइटी के गार्ड को बता मामले मे
हस्तक्षेप करेंगी? उसे मन के किसी कोने मे
उम्मीद थी कि मेडम यदि एक पर्ची लिख देती तो ये क्लेश और संताप देखना या भुगतना
न पड़ता?
पर छोटे मुंह बड़ी बात, वह अनपढ़ महिला
कैसे पर्ची लिखने की जिद मेडम से कहती?
भाग्वती ने सारे घटनाक्रम को बता, मेडम से अपनी
निर्धनता को दृष्टिगत सहायता की गुहार
लगायी? अब वह क्रोधावेश मे अपने किए पर अफसोस
जाहिर कर गलती मानने को भी तैयार थी। लेकिन जब मेडम ने बताया कि मै घर के काम करने
मे लाचार और विवश हूँ, मै लड़ाई झगड़े के
किसी झंझट मे पड़ना नहीं चाहती और इसीलिए
ही सोसाइटी के गार्ड्स से तुम्हारे झगड़े के बाद मैंने नई नौकरानी रख ली!! मेडम के
जबाव सुन कर भाग्वती हैरान थी पिछले तीन साल से
जिस मेडम की सेवा करने मे उसने अपना जी जान एक कर दिया था उसने तीन वर्ष के
रिश्ते को एक झटके मे तोड़ दिया। उसके काम के लिये न आने या देर से आने पर जो मेडम
फोन कर-कर नाक मे दम कर लेती थी, आज संकट की इस
घड़ी मे कितनी सफाई और सहजता से उसने नाता तोड़ दिया।
पिछले दिन के मुंहवाद की याद कर उसे अपने उपर क्रोध आ रहा था,
मन ही मन आत्मग्लानि हो रही थी। रह रह कर उसे अपने आप पर क्षोभ हो रहा था कि क्यों
उसने पुराने कंबल का लालच किया?
कल तक अपने परिवार के पालन पोषण मे एक अहम योगदान करने वाली भाग्वती को आज 604 वाली
मेडम के कारण सड़क पर ला खड़ा किया?
उसके आँसू भी उन कठोर, पत्थर दिल सुरक्षा
गार्ड्स के हृदयों को न पिघला सके क्योंकि उसने मर्द सत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती
जो दी थी जिसकी कीमत एक निरीह निर्धन और कमजोर महिला को अपने रोजी रोटी खो कर
गँवाना पड़ी। वह पल पल उस घड़ी को कोश रही थी जब पर्ची के बिना उस फटे कंबल की लालच मे
आ कर सालों से अपनी जमी जमाई रोजी को ताश के पत्तों की तरह हवा मे विखरते देखा!! वह
निरीह महिला आँखों मे सूखे आँसूओं को अपना खोटा नसीब मान अपने हालातों से सम्झौता करने
को मजबूर थी क्योंकि वह जानती थी कि ये इस समाज का उसूल है कि "जवर मारे और रोने भी ना दें?
विजय सहगल
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