"कुंठों बाई की बरोसी" (बाल कहानी)
कुंठों बाई गढ़मऊ गाँव की रहने वाली थी। सर्दियों
मे वह शाम होते ही बरोसी (सिगड़ी की तरह आग जला कर हाथ सेंकने का मिट्टी से बना पात्र जो बुंदेलखंड मे
"बरोसी" के नाम से प्रचलित है) मे आग जला अपने हाथ सेंका करती। फूस-माघ की
कड़क सर्दी मे जब मावठ की वर्षात होती तो घर के बाहर बने छप्पर के तले कुंठों बाई
अपने नाती पोते के साथ ठंड से बचने के लिए दिन का अधिकतर समय बरोसी मे आग जला अपने
हाथ सेंकती। छप्पर मे मुहल्ले के सारे बच्चे जो कुंठों बाई को प्यार से दादी कहते और
पड़ौसी की महिलाएं भी जो कुछ उन्हे अम्माँ कहती और कुछ बच्चों के सुर से सुर मिला दादी कह कर ही
संबोधित करती और छप्पर के नीचे उनके साथ बैठ किस्से कहानी और घर बाहर
की बाते करती। इस साल की सर्दी तो हाड़
काँपा देने वाली थी। बरोसी से दूर होते ही दांत किट-किटाने लगते। अतः गुंठों बाई के दिन की
शुरुआत बरोसी मे छोटी छोटी लकड़ी से आग जलाने से शुरू होती और देर रात राख मे दबे
अंगारों को निकाल कर वुझाने पर ही समाप्त होती। इस दौरान उनके प्रातः की चाय,
नाश्ता दोपहर और रात का खाना भी बरोसी के
चारों ओर बैठ कर ही होता। इस बहाने घर के लोग,
बच्चे और पड़ौसी कुंठों बाई के साथ गपियाते हुए दुनियाँ जहान की बाते करते और कहानियाँ सुनते।
घर मे एक चपलून चूहा भी दिन भर दादी के आस पास
चक्कर लगता, और जैसे ही कहीं कोई
काम से उठता तो मौका पाकर बरोसी के पास पड़े रोटी-सब्जी के दुकड़ों को चट कर जाता।
बच्चे भी चपलून चूहे को देख खुश होते। कभी गुड़ की ढेली या अन्य मिठाई के टुकड़े को खाकर चपलून की आत्मा तृप्त हो जाती तो वह
पीछे के दो पैरों पर खड़े हो अपनी पूंछ
हिला कर नाचता जिसे देख बच्चे खुश होकर ताली बजाते।
चपलून चूहे के दिन अच्छे कट रहे थे कि एक
दिन जखौरा गाँव की बब्बन बिल्ली ने आकर कुंठों बाई के घर को अपना आश्रय बनाया
क्योंकि उसकी नियत चपलून चूहे पर थी। बब्बन बिल्ली ने अपना डेरा कुंठों बाई के घर
के पास ही बनाया और चपलून चूहे की तलाश मे मौके की ताक मे रहने लगी। बब्बन बिल्ली गाँव के दूसरे घरों
मे भी घुस कर घरों का दूध और खाने पर भी अपना हाथ साफ कर देती।
एक रात चपलून चूहे का आमना सामना बब्बन
बिल्ली से हो गया। चपलून चूहा रात मे खाने की तलाश मे बरोसी के आस पास मंडरा रहा
था वहीं मौके की ताक मे बैठी बब्बन बिल्ली,
चपलून चूहे को चट करने की फिराक मे थी। अब क्या था चपलून चूहे ने बब्बन को देखते
ही बरोसी से दूर छलांग लगाई, बिल्ली भी उच्छल
कर चूहे के ऊपर झपटी। पर बब्बन बिल्ली जब तक चालाक चपलून के ऊपर झपटती चपलून तुरंत
ही अपने बिल मे घुस गया। इस आपा-धापि और दौड़-भाग मे बब्बन बिल्ली ने दादी की बरोसी
के ऊपर छलांग लगाई तो इस उछल कूंद मे दादी
की बरोसी पर गिरने के कारण बरोसी कई
टुकड़ों मे टूट गई।
जब सुबह गाँव के लोगो ने टूटी बरोसी देखी तो समझते देर न लगी की ये बब्बन बिल्ली की करतूत
है। जब से बब्बन बिल्ली उनके गाँव मे आयी तब से उसके उत्पात ने
गाँव के लोगो को परेशान कर उनका जीना हराम कर दिया। अब सभी गाँव वालों ने बब्बन
बिल्ली को सबक सिखाने की सोची। बब्बन बिल्ली की बजह से चपलून की जान भी हमेशा आफत
मे रहती। चपलून चूहे ने अपनी योजना गाँव
वालों को बताई। योजना के मुताबिक एक रात चपलून ने बब्बन बिल्ली के सामने पूंछ
उठाके डांस करते हुए उसे ललकारा। बब्बन को चपलून के इस दुस्साहस पर बहुत गुस्सा
आया और चपलून से बोली तेरी ये हिम्मत?
ठहर! तुझे अभी मजा चखाती हूँ!! इतना कह कर
बिल्ली चूहे के पीछे झपटी। चपलून भी कभी दायें मुड़ता तो बब्बन भी उसके पीछे दायें
मुड़ जाती। वह बाएँ मुड़ता तो बिल्ली भी
बाएँ मुड़ जाती। चूहा कहीं ये गया कहीं वो गया,
बिल्ली भी उसके पीछे भागती। आज तो बब्बन
ने तय कर लिया था कि वह चपलून को चट कर के
ही मानेगी। इस चूहा बिल्ली की भाग दौड़ मे चपलून ने योजना के मुताबिक दादी कुंठों
बाई के घर मे बने एक कमरे की ओर दौड़ लगा
उसमे घुस गयी। बिल्ली तो आज उसे मारने के
लिए दृढ़ निश्चय के साथ आग बबूला हो चूहे के
पीछे भाग रही थी और चपलून के जाल मे फंस गयी!!
जैसे ही बब्बन बिल्ली कमरे के अंदर पहुंची
कमरे मे जमा गाँव के लोगो ने कमरे का दरबाजा बंद कर बब्बन बिल्ली की जम कर लाठी और डंडों से पिटाई लगाई। अब तो बब्बन बिल्ली दहाड़
मार मार कर रोने और चिल्लाने लगी!! आज तो गाँव के लोगो के घरों का खाना खाने,
दूध पीने और दादी कुंठों बाई की बरोसी को तोड़ने का अच्छी तरह से बदला लिया। जैसे
ही कमरे का दरबाजा खुला बब्बन बिल्ली दुम दबाकर ऐसी भागी कि उस दिन के बाद से
बब्बन बिल्ली गढ़मऊ गाँव मे फिर दुबारा कभी दिखाई नहीं दी।
विजय सहगल
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