"लखबीर
की सद्गति"
अभी पिछले दिनों 14 अक्टूबर 2021 को दिल्ली
के सिंघू बार्डर पर अनुसूचित जाति के एक सिक्ख युवक लखबीर सिंह की बड़ी नृशंस रूप
से हत्या कर दी गयी। पिछले नौ-दस महीने से
अपनी मांगो के लिए आंदोलनरत संयुक्त किसान
मोर्चा के मुख्य मंच के नज़दीक हुई इस
जघन्य हत्या से किसान नेता श्री हन्नन मुल्ला
एवं श्री राकेश टिकैत ने इस अमानवीय नृशंस
हत्या से अपने संगठन का पल्ला यह कहते हुए झाड़ लिया कि "मृतक से हमारा कोई
संबंध नहीं"। बात तो सही है एक
अनुसूचित जाति के गरीब अनपढ़ व्यक्ति से वैभव शाली,
बलशाली किसान नेताओं का क्या संबंध?
संबंध तो बराबरी वालों से होता है। कहाँ राष्ट्रीय स्तर के किसान नेता श्री टिकैत
और कहाँ निम्न जाति का सेवादार कमजोर,
कृषक मजदूर लखबिंदर? इसका संबंध तो किसान नेताओं से हो ही नहीं सकता?
जैसा कि एक कहावत भी है "कहाँ राजा
भोज, कहाँ गंगू तेली?"
अरे लक्खी यदि तूँ आज जिंदा होता तो ये ही मंचाशीन
किसान नेता तेरे को आवाज देकर मंच पर पानी मंगाते,
चाय मंगाते, तेरे से तेल मालिश करा
भारत बंद के आवाहन के लिये ऊर्जा एकत्रित करते?
आपस मे चर्चा करते? क्योंकि तू तो सेवादार
जो ठहरा? आज जब तेरी मंच के नीचे जघन्य तरीके से अंग भंग
कर हत्या हो रही थी? चित्कार चित्कार कर जब
तू निर्दयी लोगो से, दया की भीख मांग रहा था?
वेदना और दर्द से हृदय विदारक क्रंदन कर बेरहम हत्यारों से,
रहम की भीख मांग रहा था? जिन दिलों मे
थोड़ी भी दया, करुणा या मानवता थी,
तुम्हारा दर्दनाक विलाप,
चित्कार लोगो के दिलों को चीर कर, दिल मे दर्द पैदा
कर रहा था!! मानवता चीख-चीख कर इस वहशी घटना से शर्मसार हो रही थी,
तब ये किसान नेता बालिश्त भर की दूरी पर नींद मे सोने का स्वांग कर रहे थे और घटना होने के बाद सोने की दुहाई दे घटना से
अनिभिज्ञ और अंजान होने का नाटक कर रहे थे। आज जब तेरी नृशंस हत्या हो गयी तो स्वाभाविक
था इन जमींदार किसान मालिकों से तेरा क्या संबंध?
यदि ये किसान नेता हनन मुल्ला और टिकैत
साहब लखबीर से मालिक-नौकर के से
संबंध सार्वजनिक तौर पर स्वीकारेंगे तो फिर इस बनावटी किसान-किसान,
भाई-भाई के समाजवादी नीति के ढौंग का क्या
होगा? फिर किसान आंदोलन की आढ़ मे शासक और शोषित
की सच्चाई दुनियाँ के सामने आने पर जग हँसाई नहीं होगी?
अरे!! लक्खी,
बेशक तेरी दर्दनाक और रक्त रंजित हत्या पर मानवता दृवित और शर्मशार हो रही थी तब
इन घाघ, कपटी और धूर्त समाज के
चेहरों पर सिकन भी न थी क्योंकि ये मोटी
खाल के लोग अच्छी तरह जानते है कि जिस जाति,
कुल, समाज मे तूने जन्म लिया है उसकी यही नियति
है और यही परिणति है!! अरे, लक्खी!! तेरी दर्दनाक
मौत पर राजनैतिक दलों का कोई नेता घड़ियाली
आँसू भी नहीं बहाएगा क्योंकि तेरी मौत से उन्हे कोई राजनैतिक लाभ जो नहीं होने वाला?
देखना!!, एकाधा दिन की सुर्खियों
के बाद दुनियाँ को दहला देने वाली ये घटना सदा सर्वदा के लिये इतिहास के पन्नों मे
दफन हो जायेगी?
अरे!! लखबीर तेरी दिन दहाड़े लहू-लुहान कर
हुई हत्या पर इस व्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। तुमसे पूर्व तुम्हारे
पूर्वजों पर भी सैकड़ों वर्षों से होते चले आ रहे अनाचार और अत्याचार ने तुम्हारे
कुल को मानव समाज का हिस्सा भी मानने इंकार कर दिया तब कैसे हम तुझे अपना हिस्सा
माने? और जब तूँ
हमारे समाज का हिस्सा ही नहीं,
तो लखबीर!! तेरे से इन मठाधीशों का क्या संबंध?
किसान नेताओं ने सही ही कहा है, रे!! "मृतक
लखबीर का हमसे कोई संबंध नहीं!!" अरे!! यदि तुम कुछ ऐसा करते जैसा पंजाब मे
रेल रोक कर किया गया? यदि तुम दिल्ली
के बार्डर पर सड़क रोकते? यदि तुम 26 जनवरी
को दिल्ली के लाल किले पर चढ़ाई करते?
यदि तुम लखीमपुर मे आंदोलन करते हुए मारे जाते तो तुमसे संबंध होना स्वावभिक था!
तब तुम्हारी मौत पर 40-50 लाख रुपए अनुग्रह राशि और सरकारी नौकरी की मांग भी की
जाती? तुम्हारे बच्चों की परवरिश की चिंता की
जाती? पर अफसोस लखबीर तुमने ऐसा कुछ किया ही नहीं।
तब हे! लखबीरे, "तुमसे हमारा क्या
संबंध"?
बैसे लखबीर तुम्हारी आत्मा नाहक ही अपनी तीन
बच्चियों के लिए चिंतित है? सन् 1947 के बाद,
देश की सारी सरकारें ने तुम्हारे वर्ग और जाति के कल्याण के लिये हजारों योजनाए
बनायी और उन पर अरबों रुपए खर्च भी किये मगर तेरी चिंताएँ दूर न कर सकी?
तुम्हारे दादे-परदादों की चिंताएँ भी दूर न
हो सकी? तो फिर अपनी संतानों की
परवरिश की चिंता से तेरा क्या प्रयोजन रे!?
जैसे तैसे लोगो की चाकरी कर दो वक्त की रोटी से अपना गुजर-वसर कर ही लेंगी?
तूँ भी तो यहाँ सिंघू बार्डर पर ऐसा ही बेगारी करने को मजबूर था रे!!
अरे लखबीर तुम्हें तो अपने भाग्य पर इतराना
चाहिए, तकदीर को सराहना चाहिये क्योंकि तू तो मात्र 34 वर्ष की आयु मे इस
जरा-मरण के चक्र से मुक्त हो गया। तेरे बाप-दादों के ऐसे भाग्य कहाँ थे,
रे? सारी उम्र,
बीमारी-हारी मे भी लोगो का मैला ढोते,
लोगो की चाकरी करते और जी हजूरी करते घिसट-घिसट कर इस लोक से मुक्त हुए?
तूँ कितना सौभाग्य शाली है रे! लखबीर,
देवदूतों द्वारा गठित अदालत ने तेरी मुक्ति के लिये न दलील,
न वकील और न अपील के झंझट से तुझे मुक्त कर सीधे ही फैसला सुना दिया और तेरी
किस्मत तो देख तुझे अपने ही पवित्र कर कमलों से जीवन-मरण के चक्र से मुक्त कर
दिया!! तेरी तो सद्गति हो गयी लखबीरे!!!!
इसीलिए किसान नेताओं ने सच ही कहा रे!!
लखबीर, तुम जैसी महान आत्मा से किसान नेताओं का
कोई संबंध कैसे हो सकता है????
विजय सहगल
1 टिप्पणी:
बहुत सटीक चित्रण किया है आपने
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