"विनाश
काले विपरीत बुद्धि"
भक्त कवि सूरदास जी की उक्त पंक्तियाँ ओलम्पियन कुश्ती पहलवान सुशील कुमार पर पूर्णतः सही और माकूल बैठती है। जिसके अनुसार, गोपियाँ, अपने मन को कृष्ण के विरह मे खोये रहने के कारण उलाहना दे, कहती है,
"उधौ"! मन तो हमारा एक ही है,
दस बीस मन तो हैं नहीं, कि एक को किसी
मे लगा दे और दूसरे को किसी और मे.........
अंतर्राष्ट्रीय कुश्ती पहलवान सुशील कुमार
भी अगर अनेकों मन के मालिक होते तो एक मन से अपनी प्रसिद्धि,
कीर्ति और यश को सम्हालने दूसरे से असामाजिक तत्वों के सरगनाओं और माफियायों से मिलके अपनी ताकत और शौर्य का प्रदर्शन लोगो की पिटाई और हिंसा से पैसा बसूली कर डॉन बनने की कोशिश करते।
लेकिन हा! दुर्भाग्य और दुर्योग मन तो एक ही था जो अनैतिक,
अवैधनिक और पतित कार्यों मे लिप्त था फिर ऐसे मे सदाचार और नैतिक संस्कारों की उम्मीद
कैसे की जा सकती थी।
वो विरले लोग ही होते है जिन्हे देश की तरफ
से ओलम्पिक या एशियाड मे खेलने का शुभ संयोग मिलता है और वे तो और भी सौभाग्यशाली व्यक्तित्व
है जिन्हे इन अंतरराष्ट्रिय खेल समारोह मे सफलता हांसिल होती है। पहलवान सुशील
कुमार उन दुर्लभतम व्यक्तियों मे थे जिन्होंने न केवल कुश्ती खेल मे तमाम राष्ट्रीय
और अंतर राष्ट्रीय पदक जीते अपितु खेल की दुनियाँ की सर्वोच्च प्रीतियोगता ओलम्पिक
मे भी दो पदक जीत कर भारत देश का गौरव बढ़ाया। कॉमन वेल्थ खेलों मे स्वर्ण पदक, कुश्ती मे विश्व चैंपियन एवं एशियाड खेल मे भी
कुश्ती मे भारत का नाम रोशन कर सर्वोपरि सफलता पायी। ये सौभाग्य चंद भाग्यशाली
व्यक्तियों के नसीब मे होता है सुशील कुमार उनमे से एक सर्वोत्तम उदाहरण थे। इन्ही
सफलताओं के आधार पर भारत सरकार ने उन्हे अर्जुन खेल रत्न पुरस्कार एवं पदम्श्री सम्मान से सम्मानित किया था।
ऐसा कम ही देखने को मिलता है जब एक साधारण
परिवार की पृष्ठभूमि मे पले-बड़े व्यक्ति को ईश्वर की दैवीय कृपा एवं विशेष अनुग्रह
अपनी मेहनत, परिश्रम और लगन के बल
पर कुश्ती खेल की दुनियाँ के सर्वोच सम्मान और पुरुस्कारों से नाबाजा गया हो। जीवन
मे अनेक सफलताओं और सम्मानों के साथ मात्र एक
धैर्य और सहनशीलता के गुण के अभाव ने आज उस सफल कुश्ती बाज पहलवान को अपने
साथी पहलवान की हत्या के मामले मे असफलता की निम्नतम सीढ़ी पर ला खड़ा कर दिया।
पहलवानी से मिली अपनी ताकत के अहंकार मे वे ये भूल गये कि देश का कानून हर व्यक्ति
के लिये समान होता है फिर वह चाहे कुश्ती के
खेल की दुनियाँ का सूर्य के सदृश्य चमकने वाला दैदीप्यमान तारा सुशील कुमार हो या एक आम साधारण नागरिक। जिस देश की जनता ने
उनको गौरव और सम्मान देकर, पलक पाउणे
बिछाकर अपने सिर आँखों पर बैठाया था लेकिन दुर्भाग्य सुशील कुमार इस गौरव,
सम्मान और सफलता को बनाये न रख सके। सुशील
कुमार को मिली ये यश, कीर्ति,
गौरव और प्रतिष्ठा को एक साथी पहलवान की
हत्या मे शामिल होने के कारण एक सेकंड मे आसमान से जमीन पर ला पटका। जो पहलवान अपने शारीरिक सौष्ठव और
कौशल के बल पर पेचीदा दाँव लगा विरोधी
पहलवान को चित्त कर धूल चटा देता था आज कुश्ती का कोई भी दाँव पेंच उन्हे अपने ही
साथी पहलवान की हत्या के केस से न बचा
सका। बड़ी मेहनत और यतन से प्राप्त सम्मान,
यश, कीर्ति काम न आयी और चंद मिनटों मे कानूनी दाँव पेंच ने न केवल
उन्हे परास्त कर धूल धूसरित कर दिया अपितु जेल के सींखचों के पीछे ला दिया।
कुश्ती पहलवान सुशील कुमार अपनी संगत-सौवत
के कारण अपनी स्थिति को कायम न रख सके। खेलों मे पायी सफलता ने उन्हे जिस
क्षत्रसाल स्टेडियम का निदेशक बनाया था, शारीरिक ताकत और बल के मद मे चूर उन्होने उस
स्टेडियम को सामान्य जनों के उत्पीढन का अड्डा बना डाला जिसका संचालन और समन्वयन
गुंडों और सरगनाओं के हाथ मे था। एक विश्व प्रिसद्ध खिलाड़ी जुर्म,
अपराध और गुनाह की दुनियाँ का बादशाह बन गया।
जिस धन दौलत को कमाने के लिए सुशील कुमार ने
अपराधियों का साथ लिया वे भूल गये कि जो सोहरत,
प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा उन्होने अपनी मेहनत और खेल कौशल से अर्जित की थी उसे
दुनियाँ की सारी दौलत पा कर भी नहीं प्राप्त किया जा सकता था। दुनिया सहित देश की
हर आम और खास जनता ने ओलिम्पिक सहित अन्य खेल प्रतियोगिता मे मिली सफलता के कारण उन्हे
अपनी सिर आँखों पे बैठाया था। देश के प्रथम नागरिक माननीय राष्ट्रपति महोदय,
प्रधानमंत्री और देश की अन्य राजनैतिक हस्तियों का वरद शुभस्थ उन पर था। अलग अलग क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों ने
उनकी खेलों मे मिली सफलता को सराहा था एवं जो लोग उनके साथ खड़े होने पर अपने को
गौरवान्वित समझते थे तब देश के आम नागरिक
उनके लिए क्या सम्मान रखते होंगे इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। ऐसा पद
प्रतिष्ठा, यश और गौरव विरले लोगो
के मुकद्दर मे ही होता है, सुशील कुमार उन
खुश नसीब लोगो मे थे। पर हा!! दुर्भाग्य मात्र एक अपराध मे शामिल होने के कारण अब
कदाचित ही कोई गणमान्य या साधारण नागरिक उनके साथ खड़े होने या मिलने मे अपने
सौभाग्य को सराहेगा।
सुशील कुमार ने कुश्ती और पहलवानी के
दांव-पेंच के साथ कुछ नैतिक शिक्षाओं और संस्कृति के भी दांव सीखे होते या उनके
गुरु ने कुश्ती मे प्राप्त सफलता को धैर्य,
सहनशीलता और आत्मसंयम से ईश्वरीय उपहार के
रूप मे स्वीकारने की शिक्षा दी होती तो शायद वे अपने पथ से न भटकते।
सफलता को सहजता से स्वीकारने की कला के अभाव के कारण ही हमारे ऋषि महात्माओं ने "विनाश काले विपरीत बुद्धि" के नीति वचन को उद्धृत किया था। विश्व प्रसिद्ध कुश्ती पहलवान सुशील कुमार खेलों की दुनियाँ से प्राप्त सफलता, यश और गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखने मे कामयाब न रख सके और "विनाश काले विपरीत बुद्धि" के नीति वचन के तहत खेलों की दुनियाँ से अर्जित पराक्रम, शूर-वीरता और बहादुरी को चंद मिनटों मे ही गंवा बैठे।
विजय सहगल



1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर प्रस्तुति
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