"पहला शिकार"
"पहला शिकार"
अस्सी
के दशक मे भारतीय मध्यम वर्गीय संयुक्त
परिवारों मे बच्चों का जीवन बड़ा कठिन हुआ करता था। अधिकतर परिवार जहां एक कमाने
बाला हो और पूरा परिवार खानपान से पढ़ाई लिखाई तक का उपभोग कर आश्रित हो बड़ा संघर्ष पूर्ण जीवन जीता था। विज्ञान के अन्य अनेकों छात्रों की तरह हमने
डॉक्टर या इंजीनियर के सपने अपनी आँखों मे नहीं संजोय थे। उन दिनों सिर्फ और सिर्फ एक ही सपना आँखों मे
कौंधता था कि किसी भी तरह एक अदद ठीक ठाक
नौकरी मिले ताकि परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं मे कुछ हाथ बंटा सके। उन दिनों उच्च वर्ग के विध्यार्थी जब विज्ञान के विषयों
के साथ हाई स्कूल और इंटर मीडियेट कक्षाओं
मे कोचिंग लेते थे ताकि पीएमटी या पीईटी
की परीक्षा मे अव्वल आकार डॉक्टर या इंजीनियर बन अपनी मंजिल को हांसिल कर सके, पर इन
क्लासों मे हमारी मंजिल टायपिंग और शॉर्ट हैंड सीख कर एक अदद नौकरी हांसिल करना
था। इन अतिरिक्त अर्हताओं के कारण स्नातक परीक्षा के साथ नौकरी मिलना सामान्य
अभ्यर्थियों के मुक़ाबले कुछ आसान हो जाता है अतः जल्दी ही हमे लखनऊ स्थित बैंक मे नौकरी मिल गई और ऐसा लगा मानों ज़िंदगी की बहुत
बड़ी मंजिल हांसिल हो गई हो।
जहां
एक ओर स्नातक तक की पढ़ाई मे जेब मे 2-4 रूपये से ज्यादा नहीं देखे थे नौकरी की पाँच
सौ रूपये की पहली तनखा ने मानो हमे आसमान पर बैठा दिया, लगा मानो
हमसे ज्यादा दौलतमंद इस दुनियाँ मे कोई भी नहीं। हाल तक जो नौजवान वेशक कॉलेज से निकल कर किसी संस्थान मे नौकरी मे आ गया हो पर कॉलेज की
खुमारी इतनी जल्दी कहाँ उतरने बाली थी। शुरुआती दिनों मे कार्यालय के माहौल मे
ढलने का प्रयास हो रहा था। दिन ठीक ठाक गुजर रहे थे। कॉलेज के माहौल को भुला कार्यालीन
माहौल मे संतुलन बनने लगा था। एकाधा साल यूं ही निकल गया समय व्यतीत होता रहा।
कार्यालय
मे हमारा कार्य था अधिकारियों द्वारा हाथ से लिखे पत्रों को ऑफिस के लेटर हैड पर
टाइप करना। एक दिन हमारे अधिकारी महोदय ने एक पत्र लिख कर टाइप करने के लिया दिया।
जैसा कि होता है हमने उक्त पत्र को टाइप कर संबन्धित अधिकारी को दे दिया। पर कुछ
देर बाद पुनः हाथ से लिखा वही पत्र उक्त अधिकारी ने हमे टाइप के लिए दिया तो हमे
लगा शायद दुबारा लिख कर भूलवश उन्होने हमे फिर से दे दिया! जब हमने उन अधिकारी
महोदय को कहा सर आपने ये पत्र दुबारा दे दिया है मै पहले ही उक्त पत्र को टाइप कर
दे चुका हूँ। तब उन्होने कहा नहीं मै ये पत्र तुम्हें पहली बार लिख कर दे रहा हूँ।
मेरा
ऐसा कोई इरादा नहीं था कि उनके आदेश कि अवहेलना कर रहा हूँ। ऑफिस मे ऐसा कई बार
होता है एक पत्र मे दुबारा संशोधन होता है तो कभी कभी कई कई संशोधन के बाद टाइप किया
पत्र मूर्त रूप लेता है, पर ऐसे मामले मे पहले टाइप किये पत्र मे ही संशोधन कर पुनः पत्र टाइप के
लिये आते हैं। उक्त पत्र जो दुबारा आया था उसके साथ पहले टाइप पत्र नहीं था। आजकल की तरह कम्प्युटर तो थे नहीं कि पत्र के
सेव कर रखा जा सके। कुछ जवानी का जोश था कॉलेज से हाल ही मे निकले थे, मैंने अधिकारी महोदय को कहा सर वेशक दिन भर मे पचासों पत्र टाइप करें
पर विषय या मैटर देख कर याद तो रहता ही है
कि हम ये पत्र पहले ही टाइप कर चुके हैं, दुबारा टाइप करने
मे आपत्ति नहीं है पर मै ये पत्र पहले टाइप कर चुका हूँ।
उन
अधिकारी महोदय ने इसे अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न बना कर पुनः कहा नहीं मै ये
पत्र तुम्हें पहली बार ही टायपिंग के लिये
दे रहा हूँ। उनके चेहरे पर क्रोध के लक्षण एवं अधिकारी होने के श्रेष्ठता
के भाव स्पष्ट थे। अधिकारी महोदय के व्यवहार मे एक अधीनस्थ कर्मचारी द्वारा अधिकारी
से बहस मुसाहिबा करने की धृष्टता स्पष्ट परिलक्क्षित हो रही थी। मैंने भी इसे
स्वाभिमान का प्रश्न मान कर ऑफिस के बाहर फाड़े गये कागज़ के कचरे के ढेर मे छानबीन
की तो उक्त पहले टाइप किया पत्र टुकड़ो मे कटा-फटा मिल गया। वास्तव मे उस पत्र मे
कुछ संशोधन किया गया था जिसे हमे पुनः टाइप
करने के लिये दिया गया था। जब मैंने उन अधिकारी महोदय को उक्त पत्र दिखाया तो ऑफिस
मे सभी स्टाफ सदस्यों के सामने उन्हे अपनी तौहीन महसूस हुई। कुछ दिन बाद इस दुस्साहस के कारण उन अधिकारी
महोदय ने हमारा ट्रान्सफर अन्य स्थानीय शाखा मे करा दिया। चूंकि एक सत्य से परे
आरोप मे मेरा ट्रान्सफर हुआ तो बहुत बुरा लगा। वास्तव मे हमे इस ट्रान्सफर से
ओफिसियेटिंग भत्ते के रूप मे मिलने बाले कुछ अतरिक्त आर्थिक लाभ से भी वंचित होना
पड़ रहा था। मैने भी इस कृत का विरोध अपने
तरीके से किया।
एक
स्थानीय यूनियन लीडर को भी इस स्थंतरण को बापस लेने के प्रयास के तहत निवेदन किया पर
उन्होने अपनी असमर्थता जताते हुए अपने तर्क दिये कि स्थानीय ट्रान्सफर बैंक का
विवेकाधिकार है जिसका हम विरोध नहीं कर सकते। बाद मे पता चला इसके लिये उनकी
मौखिक सहमति पहले ही ली जा चुकी थी। ऑफिस
मे हमारे साथी जो हमारी बात से सहमत तो थे पर इस अन्याय के विरुद्ध हमारे साथ खड़े
नहीं थे??
बैंक
के दो साल के कार्यकाल मे हमने महसूस किया
कि हमारे बैंक मे कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी और बैंक प्रबंधन एक सिक्के के दो
पहलू है, जिनके बीच एक बहुत बारीक झीना पर्दा है। इनमे किसी एक से निकटता स्वतः ही
दूसरे की निकटता का धोतक है इसके विपरीत एक पक्ष से आपकी वैमनस्यता स्वतः ही दूसरे
पक्ष से आपका वैरभाव प्रकट करेगा। दुर्भाग्य से हम बैंक के अपने पूरे सेवाकाल मे सिक्के के इन दोनों पहलुओं
के कभी इतने करीब न आ सके कि किसी एक पक्ष की भी प्रशंसा सूची मे अपना नाम दर्ज़ करा संगठन या प्रबंधन के कृपा पात्र बन सकूँ।
मेरी
ज़िंदगी का ये पहला लेकिन "बड़ा सबक" था, पर ये सबक हमे गहरी सीख दे
गया कि ये कॉलेज लाइफ नहीं है जहां सारे छात्र
अन्याय के विरुद्ध संगठित हो संघर्ष करें? ज़िंदगी मे आने बाले हर संघर्ष को आपको सिर्फ और
सिर्फ अकेले ही लड़ना होगा। ये आदमी के
जीवन संघर्ष की कड़वी सच्चाई थी जिससे मै रु-ब-रु
हुआ। लोग आपके साथ रहेंगे, बहुत अभिन्न रूप से आपसे जुड़े
रहेंगे पर संघर्ष मे आपके साथ खड़े नहीं होंगे। इस तरह के संघर्ष मे आपको अपने
अस्तित्व की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। इस तरह शतरंज की बिसात पर जीवन के संघर्ष की
पहली लड़ाई मे, सच के बाबजूद मुझे एक कमजोर मोहरे के रूप मे एक झूठे, धूर्त और मक्कार वज़ीर ने अपना पहला शिकार बना डाला।
विजय सहगल



4 टिप्पणियां:
आपकी बात शत प्रशिसत सही है ।
ऐसा ही होता था
सच कहा है अपनी लड़़ाई तो स्वयं ही लड़नी होती है। हाँ कभी कभी कुछ भले लोग सहयोग के लिए आगे आते हैं।
सहगल साहब,
बेहतरीन ढंग से आपने एक सदाबहार बात कह दी! यहां पर अजीबोगरीब मानसिकता है लोगों का। मैं सीनियर हूं, वह मेरे से जूनियर है! मैं कोई गलती कर नहीं सकता, सारे गलती उसका है! साले, अभी भी नाक दबाव तो छठी का दूध निकल आएगा और हम से मुंह चलाता है!
ऐसे ना जाने कितने बातें!
यह वाक्या आपके साथ हुआ था। पर यह सिर्फ आप ही के साथ नहीं हुआ था यह सब के साथ हुआ था! कारण हम ऐसे समाज में काम करते हैं, जहां पर हमारे सीनियर लोग हमेशा यही सोचा करते हैं/थें की तनखा वह अपनी जेब से देते हैं! यह एक घटिया मानसिकता है पर क्या करें! सब ऐसे ही सोचते हैं! और यही कारण है कि अगर आपने अपने सीनियर को कुछ सप्रेम भी कह दिए तो उनकी चारों तरफ से आग निकलता था। और इस आग में जलने के बाद वह बाद में बदला लेते थे। इसलिए जरूरत था यूनियन के जितने भी लीडरान हैं,सबको अपने साथ मिलाने का! बस काम फतेह!!
बहुत साल पहले की बात है, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरे साथ तो वैसे कई बार हुआ है, क्योंकि मैं हमेशा मुंह पर कहने वाला इंसान रहा। उस समय मेरी नौकरी मात्र एवं मात्र ढाई साल का ही हुआ था। एक बहुत ही सिनियर व्यक्ति मुझे कोई गलत आदेश दिए थे। मैं करने के लिए मना किया और बोला था, "दफ्तर के नियम के अनुसार आपका इस आदेश का पालन करना संभव नहीं है। मुझे क्षमा करना!"
उनको तत्काल बहुत गुस्सा आया और उन्होंने मुझे एक डायलॉग बोले थे, मुझे आज भी याद है, "बच्चू, ज्यादा मुंह नहीं चलाओ। करना तो तुम्हें पड़ेगा ही। तुम्हारी नौकरी ही कितना दिन का है? उससे ज्यादा तो मैं कैजुअल लीव बिता चुका हूं!" मैंने जो जवाब दिया था, मुझे आज भी याद है, "सर, मेरे ऊपर आपका गुस्सा करना शोभनीय नहीं है, ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद दें,क्योंकि आप मेरे से बहुत साल पहले जन्म लिए तो आज मेरे से बहुत बहुत साल सीनियर हैं! यह कोई नई बात नहीं है। आप अगर मेरे से इतने साल सीनियर हैं, इसके मतलब यह नहीं है कि आप मेरे लिए बहुत बहुत अच्छा काम कर चुके हैं! और मैं अगर आपसे जूनियर हूं इसका मतलब यह नहीं है, कि मैंने आपके लिए बहुत बहुत हानिकारक काम कर चुका हूं! सर यह घमंड ना पालें। इंसान सब बराबर है।"
फिर तो हमारी पेशी हुई। हमने भी बहुत कुछ झेला और अंत में हम उनकी ट्रैप से बाहर आ गए।
कुल मिलाकर बात यह है कि, ऐसा होता है कारण हम लोग बहुत घमंडी हैं। आप सत्य बात को कितना सुंदर भाषा में लिखे हैं, यह बताता है, लेखनी में आप की पकड़ कितनी जोरदार है!
आप ऐसे ही लिखते रहें और हम आपके सुंदर सुंदर लेख को पढ़कर आनंद लें। आपको अनेकानेक साधुवाद! 🙏🏻
शंकर भट्टाचार्य, ग्वालियर।
दिनांक - १९ जून २०२१
Sahi kaha sir ji
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