मंगलवार, 30 मार्च 2021

अंबाजी मंदिर (गुजरात)

                 "अंबाजी मंदिर (गुजरात)"








दिनांक 27 फरवरी 2021 को जब मेरी परिवार सहित उदयपुर की  यात्रा शुरू हुई तो सबसे पहले हम पांचों सदस्यों ने उदयपुर भ्रमण की शुरुआत सोलहवी शताब्दी के जगदीश मंदिर के दर्शन से की। भव्य और ऊंचे शिखर पर ध्वज लगे  उक्त भव्य मंदिर की  सड़क को तलहटी माने तो सड़क से 125 फुट ऊंचा था। सीधी सपाट सीढ़िया थी तो कम  पर नाश्ते से मिली सारी ऊर्जा मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते समाप्त हो गई। मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते समय एक वृद्ध सज्जन को भी मैंने मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते समय देखा पर बहुत ज्यादा नोटिस नहीं किया। मंदिर के मुख्य मंडप मे बैठ उन वृद्ध सज्जन ने प्रचलित आरती "ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे....... का पूरा वाचन करते समय भी मैंने देखा। दर्शन के पश्चात जब वे और मै सीढ़ियों से उतरे तो सौजन्यता वश मैंने उनका अभिवादन कर उनके इस उम्र मे इतनी सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए उनके  हौसले और हिम्मत की प्रसंशा की। बातचीत मे उन्होने बताया कि उनकी उम्र 84 वर्ष है और उनका ये नित्य क्रम है। हर रोज वे इसी समय मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ प्रभु के दर्शन के लिए मंदिर मे ढोक लगाने आते है। नाम पूछने पर उन्होने विनम्रता से उपर हाथ उठा विनीत भाव से भगवान का उदाहरण दिया अर्थात अपना नाम भगवान बताया। आरंभिक परिचय पश्चात उन्होने अपनी कुलदेवी माँ अंबाजी का स्मरण कर मुझे और मेरे परिवार के लिये आशीर्वचन कहे, जो स्नेह और ऊर्जा से  भरे थे।

उस समय तो श्री भगवान जी जैसे सज्जन का स्मरण न हुआ पर माउंट आबू जाते समय कुछ यात्रियों ने आबू रोड से 20-22 किमी॰ दूर गुजरात के बनासकांठा जिले के अंबाजी ताल्लुका स्थित  माँ अंबाजी के दर्शन हेतु मार्ग दर्शन किया। अंबाजी मंदिर गुजरात का नाम तो सुन रक्खा था पर उस समय तक हमे स्मरण न था कि सहयात्री अरावली पर्वत श्रंखला के बीच गुजरात राज्य स्थित विश्व प्रसिद्ध अंबाजी की चर्चा कर रहे है वह आबु रोड से मात्र 20-22 किमी॰ है!! मुझे भान भी  न था कि गुजरात राज्य की सीमाएं अबूरोड से इतनी नजदीक है। 51 शक्तिपीठों मे से एक अंबाजी मंदिर जाने का जैसे ही सुनिश्चित हुआ हमने अपने यात्रा कार्यक्रम मे एकदिन की बढ़ोतरी कर माउंट आबू से बापसी मे कार्यक्रम निश्चित कर लिया। तभी हमे उदयपुर के जगदीश मंदिर मे हुई भेंट के उन बुजुर्ग श्री  भगवान का स्मरण  हो आया जिनका माँ अंबाजी का आशीर्वाद  अंबाजी मंदिर के दर्शन का माध्यम बना।

दिनांक 4 मार्च 2021 को प्रातः 6.15 बजे बस से बापसी मे माउंट आबू से चलते समय बड़ी उहाँ-पोह की स्थिति थी कि कैसे आबू रोड से अंबाजी पहुंचेंगे। लेकिन जैसे ही अबूरोड मे उतरे गुजरात राज्य परिवहन की बस अंबाजी जाने को तैयार खड़ी थी जैसे हम दोनों का ही इंतज़ार कर रही हो। अबूरोड से बमुश्किल 8-10 किमी॰ सड़क के दोनों ओर सूचना दर्शाते बोर्ड से हिन्दी गायब हो चुकी थी। समझते देर न लगी कि हम गुजरात राज्य मे प्रवेश कर चुके है। तुक्के लगा कुछ शब्द समझ तो आ जाते पर क्षेत्रीय भाषाओं के राज्यों मे पर्यटकों को एक समस्या समान होती है कि सिवाय स्थानीय भाषा के अङ्ग्रेज़ी या हिन्दी भाषाओं के सांकेतिक या सूचनाओ का अभाव हो जाता है। क्षेत्रीय राज्यों के पर्यटक मंत्रालय या सरकारे इस समस्या को क्यों नहीं जान या समझ पाते?? उनको चाहिए कि क्षेत्रीय भाषा के अतिरिक्त, कम से कम अँग्रेजी या हिन्दी मे भी सूचनाओं/संकेतिकों का उल्लेख अवश्य करें विषेशतौर पर बसों मे प्रस्थान और गंतव्य स्थान की जानकारी के मामले मे।    

अंबाजी मंदिर मे स्नान ध्यान के बाद दर्शन हेतु प्रस्थान किया जो होटल के नजदीक ही था। दर्शन हेतु मंदिर तक पहुँचने हेतु बनाए गये रास्ते और बैरिकेड को देखते हुए अनुमान लगाना मुश्किल न था कि विशेष एवं प्रमुख त्योहारों पर कितने श्रद्धालुओं का आना लगा रहता होगा। मंदिर मंडप एवं विशाल मंदिर परिसर मे फोटोग्राफी निषेध होने के कारण मंदिर प्रांगण की फोटो उपलब्ध नहीं है।  यध्यपि उस दिन बिलकुल भीड़ दर्शनार्थियों की न थी। लाइन के लिये रेलिंग से बनाये रास्ते से बगैर किसी बाधा के सीधे मुख्य मंदिर मंडप मे प्रवेश कर गया। संगमरमर की बारीक कसीदकारी से सजी देव, यक्ष, गणों की सुंदर प्रतिमाओं एवं मंडप मे लटके विशाल झूमर ने मंदिर की सुंदरता को शोभयमान कर रहे थे। फूलों से श्रंगार की हुई सिंह पर सवार माँ अंबे की जाग्रत प्रतिमा के दर्शन श्री यंत्र के रूप बड़े ही नयनभिराम थे। दर्शन के लगी लंबी लाइनों के बावजूद रास्ते के दोनों ओर बने स्थान पर श्रद्धालू देवी माँ के दर्शन पश्चात कुछ समय बैठ ध्यान मे मग्न थे। यध्यपि कोरोना एवं सुरक्षा की दृष्टि से देवी को अर्पित फल, फूल, नारियल को मंदिर के मुख्य दरवार मे ले जाना वर्जित था पर मंदिर प्रबंधन ने देवी माँ के प्रसाद के वितरण की व्यवस्था नाममात्र के शुल्क ले की जा रही थी। स्वादिष्ट प्रसाद ग्रहण कर मंदिर मंडप के बाहर खुले मे बैठ कुछ समय मंदिर को निहारते बैठे रहे। पास मे ही ठंडे पानी के व्यवस्था जगह जगह की गई थी। विशाल खुले आँगन के एक ओर हवन वेदीयां मे श्रेष्ठ पारंगत पुरोहितों द्वारा  विवाह, मुंडन, जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ हेतु संस्कार संपादित कराये जा रहे थे। कुछ देर इन संसकारों को संपादित होना देख हम दोनों पति पत्नी राजमार्ग के मुख्य द्वार की ओर बढे।

दोपहर कुछ आराम के पश्चात एक बार पुनः शाम की आरती मे शामिल होने हेतु हम लोग पुनः प्रवेश हेतु मंदिर पहुंचे। मुख्य राज मार्ग से लगे प्रवेश द्वार पर जूते आदि रख प्रवेश किया। मंदिर के शिखर सहित विशाल सम्पूर्ण मंदिर प्रांगण के दर्शन राजमार्ग से लगे प्रवेश द्वार से किया जा सकता था। एक बात मानने होगी 150 मीटर चौड़े एवं लगभग एक किमी से कुछ कम आयतकार मंदिर के विशाल आँगन, मंडप और सम्पूर्ण प्रांगण का ये रूप नव निर्वाण लगता प्रतीत होता है जो शायद पूर्व मे ऐसा न रहा हो। पूरे मंदिर का वास्तु निर्माण इस तरह किया गया है कि रात्रि मे आरती के समय मंदिर के अंदर जल रही दीपक की ज्योति को  मुख्य राजमार्ग से भी  देखा जा सकता है जिसे मैंने बापसी पर स्वयं महसूस किया। चूंकि मंदिर के अंदर मुख्य मंडप मे मोबाइल, कैमरा से फोटोग्राफी प्रतिबंधित है इसलिए दर्शन पश्चात मंदिर की  कुछ फोटो राजमार्ग से ली है। सूर्यास्त की सुनहरी किरणों से 103 फुट ऊंचे मंदिर के शिखर पर चढ़ी सोने की परत की स्वर्णिम आभा देखते ही बनती। साफ सुथरे लंबे-चौडे प्रांगण के दोनों ओर फूल, धार्मिक समग्रियों की दुकाने आदि बनी थी बीच का खुला आँगन मंदिर की भव्यता और दिव्यता को चार चाँद लगा रहा था। 358 सुंदर स्वर्ण कलश मंदिर के अन्य छोटे शिखरों पर लगाये गये थे। चैत्र नव रात्रि शारदीय नवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु अंबाजी मंदिर मे दर्शन हेतु आते है।      

एकाध किमी की परधि के अंबाजी शहर बहुत  छोटा सा कस्बा है, पर साल मे लाखों श्रद्धालुओं के आने के कारण विश्व प्रसिद्ध है। अंबाजी मंदिर के पश्चात मंदिर से लगभग 3 किमी॰ दूर गब्बर पहाड़ी पर अंबाजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर मे ऐसी मान्यता है माँ अंबाजी के चरण कमलों की पूजा होती है। इस मंदिर मे माँ के चरण कमलों के दर्शन के साथ अखंड ज्योति के दर्शन के लिये भी दर्शनार्थी आते है। कष्टसाध्य लगभग 900 सीढ़ियों को  चढ़ने के अतरिक्त पारश्रमिक देकर बगैर किसी श्रम के भी आप उड़न खटोले (रोप वे) से शिखर पर पहुँच उक्त प्राचीन मंदिर के दर्शन कर सकते है। शिखर के शीर्ष पर दर्शन कर यहाँ भी मंदिर के प्रांगण मे लगे घंटे से ध्वनि कर अपनी उपस्थिती की प्रविष्टि की।

मंदिर की तलहटी मे भी माउंट आबु की तरह अरावली पर्वत श्रंखला की तरह प्राकृतिक शैल आकृतियाँ एक बार पुनः देखने को मिली। इस तरह बगैर किसी पूर्वनिर्धारित योजना के माँ अंबाजी के दिव्य दर्शन हमारी तीर्थ यात्रा के पुण्य कृतों मे शामिल हो गये। शाम को एक होटल मे भोजन करते समय एक आश्चर्य जनक घटना देखने को मिली। जिस होटल मे हम भोजन कर रहे थे नजदीक ही एक सज्जन भी वहाँ भोजन कर रहे थे। ये वही सज्जन थे जिनके कुछ दूर स्थित होटल मे हमने सुबह नाश्ता किया था। मुझे लगा हर व्यक्ति को अच्छे भोजन की तलाश मे हमारी तरह दूर दराज भटकना पड़ता है!!!

जय माँ अम्बे।      

विजय सहगल

                 

                 

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

ओवैसी का अंक गणित

 

"ओवैसी का अंक गणित"



श्री असद ओवैसी जी कानून मे वैरिस्टर, योग्य और बुद्धिमान राजनैतिज्ञ के साथ साथ देश की संसद के वरिष्ठ माननीय सांसद भी है। कानूनों की बारीक समझ और जानकारी मे उनका कोई मुक़ाबला नहीं। एक जागरूक नागरिक होने के नाते मै उनका आदर और सम्मान भी रखता हूँ पर उनकी नीतियों और विचारधारा से असहमति के चलते अलग विचार रखता हूँ। कुछ दिन पूर्व मध्यप्रदेश की श्री शिवराज सिंह सरकार के परिवहन मंत्री की निष्ठुरता के बारे मे लिखा था। "अंधेर नागरी चौपट मामा"(https://sahgalvk.blogspot.com/2021/02/blog-post_23.html)।  आज श्री ओवैसी की हठधर्मिता एवं कठोरता का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ।  बचपन मे मुल्ला नसरुद्दीन के चुटीले और शिक्षाप्रद  व्यंग और  किस्से हम  बच्चों मे  खूब लोकप्रिय थे।  अब जमाना बदल गया आजकल ओवैसी जी का एक नए मुल्ला के रूप मे प्रादुर्भाव हुआ है जिन्होने  "मुल्ला नसरुद्दीन" का स्थान ले लिया पर वे चुटीले और शिक्षाप्रद किस्से तो क्या गढ़ेंगे  इसके विपरीत ये "चोटिल और घ्राणास्पद" किस्से गढ़ने के लिये मशहूर है।

किसी भी तरह की धार्मिक कट्टरता, सामाजिक बुराई या निंदनीय प्रथा के चलन की  स्वीकृति किसी भी सभ्य समाज मे स्वीकार नहीं की जा सकती। पिछले दिनों अहमदाबाद की आयशा नाम की बच्ची ने अपने माता-पिता को संबोधित, दहेज के कारण अपने अत्महत्या पूर्व विडियो ने सभी को दुःख, दर्द और वेदना से झकझोर दिया। आँसू बहाते, उसके प्रौढ़ माता पिता की लाख मिन्नते, अनुनय, विनय, उनका  हाथ जोड़ गिड़गिड़ाना भी आयशा को अत्महत्या से न रोक सका!! उस युवा बच्ची के शब्दों की मर्मस्पर्शी चित्कार ने लोगो की मनोव्यथा को शोक संतृप्त कर दिया।  जरा कल्पना कीजिये, एम॰ए॰ पास आयशा के बूढ़े माता पिता पर क्या गुजरी होगी जो दहेज की भेंट चढ़ी अपनी बेटी को अपने सामने ही अत्महत्या से ने रोक सके!! ऐसा नहीं कि दहेज रूपी दानव मुस्लिम बहिन बेटियों को ही काल का ग्रास बना रहा हो हिन्दूओं मे भी समान रूप से  दहेज रूपी वेदी पर बेटियों की बलि बड़ी निर्दयता से चढ़ाई जा रही है।

माननीय ओवैसी जैसे कठोर हृदय  इंसान के दिल मे भी हिन्दू मुस्लिम के विपरीत सभी धर्मावलम्बियों से अमानवीय दहेज प्रथा के विरुद्ध आवाज बुलंद करने की अपील सुनने को मिली। उन्होने कहा, "चाहे आप कोई भी मजहव के हों, ये दहेज़ की लानत को खतम करों"। "अगर तुम मर्द हो न, तो बीबी पर जुल्म करना मर्दानगी नहीं है!!, बीबी को मारना मर्दानगी नहीं है, बीबी से पैसों का मुतालबा करना मर्दानगी नहीं है, तुम मर्द कहने के लायक भी नहीं होगे अगर तुम ऐसी हरकत करोगे!! ....................(पूरा भाषण के लिए लिंक https://www.youtube.com/watch?v=k3bYy4HVz4w) उस वीडियो मे ओवैसी जी ने युवाओं को ललकारते हुए उनकी मर्दानगी पर लानत की। सुन कर अच्छा लगा कि यदि ओवैसी हिन्दू मुसलमान की राजनीति न करें तो शायद हिंदुओं के भी निर्विवाद नेता हो जाएँ? दहेज के लिये आयशा की अत्महत्या के वीडियो ने ओवैसी की आत्मा को झकझोर दिया? पर आयशा तो हताशा और निराशा की  दहेज रूपी इस लड़ाई  मे पराजित हो जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो बहुत से अनुत्तरित सवाल छोड़ गई? पर समाज मे आज भी  ऐसी हजारों महिलाएं है जिन्होने आत्माहुति तो नहीं दी पर "तीन तलाक" या "हलाला" जैसी कुप्रथा के दंश के बीच जीते जी हर रोज तिल तिल कर मरने को मजबूर है!! उनके दुःख, दर्द और तकलीफ का क्या!!? क्या माननीय ओवैसी जी दर्द झेल रही ऐसी महिलाओं की लड़ाई को लड़ने का झण्डा ले इस लड़ाई की अगुवाई करेंगे??

उनके चाल-चलन, और विचार धारा से तो ऐसा नहीं लगता, इन्ही ओवैसी महाशय ने तीन तलाक के विरुद्ध कैसे दहाड़ मार-मार कर संसद मे आसमान सिर पर उठा लिया था एवं  तीन तलाक के बिल का जबर्दस्त विरोध किया था!! हिन्दू-मुसलमान को तराजू पर रख, हमेशा राजनीति करने वाले ओवैसी जी जिनकी कथनी और करनी के इसी  अंतर के कारण कदाचित ही उनके वक्तव्य आम जनों को प्रभावित करेंगे ??           

पिछले दिनों बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के प्रतिक्रिया स्वरूप श्री ओवैसी का "हिन्दू-मुस्लिम"  तराजू एक बार फिर बापस निकल आया। सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक पहलू पर तुलना के बाद ओवैसी जी अब "अंक गणित" मे भी हिन्दू-मुस्लिम को ले आये। अनुपात, समानुपात और प्रतिशत के ज्ञान का विस्तार उन्होने मुस्लिमों के विरुद्ध मुठभेड़ मे 37% का आंकड़ा पेश कर दिया। उनका कहना है कि योगी सरकार द्वारा कुल मुठभेड़ों मे 37 प्रतिशत मुठभेड़े अल्पसंख्यकों  के विरुद्ध हुई है। वे ये भूल गये कि अपराधी, अपराधी होता है उसका कोई धर्म-समाज और मजहब से कोई लेना देना नहीं होता। जैसा कि उनसे अपेक्षित था, उन्होने, अपराधियों और असामाजिक तत्वों के वर्गीकरण के  बीच  भी अपनी  विघटनकारी सोच को उजागर कर दिया। ठीक ही है इस अर्थप्रधान समय मे हर सौदागर अपने वाणिज्य-व्यापार, विपणन के विस्तार के लिए येन-केन-प्रकारेण, नीति या अनीति पूर्वक प्रयास करेगा फिर वह भले ही कफन का सौदाई ही क्यों न हो।

वे भूल गये कि पुलिस या सुरक्षा बल तब ही मुठभेड़ को  अंतिम अस्त्र के रूप मे इस्तेमाल करती है जब उनकी अपनी जान पर बन आती है और आततायी, गुंडा या बदमाश उनकी ही जान के लिये खतरा बन जाता है। मुठभेड़ मे धर्म का कोई मतलब नहीं रहता  फिर मुठभेड़ भले ही "विकास" (वही "विकास दुबे, कानपुर वाला" ) की हो या अभी हाल ही मे  कासगंज मे  सिपाही की हत्या करने वाले शराब माफिया "मोती" की मुठभेड़!!

बकील और वैरिस्टर के रूप मे सुविख्यात ओवैसी जी गणित मे भी इतने प्रवीण और पारंगत होंगे इसका गुमान न था। कितनी तेजी से गणना कर 37% का आंकड़ा निकालने वाले  कानूनविद गणितज्ञ ओवैसी जी, ईराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान मे होने वाली आंतंकवादी घटनाओं मे शामिल शत प्रतिशत इस्लामी आतंकवादियों की संलिप्तता के बारे मे क्या कहेंगे?? दुर्भाग्य ये कि इन देशों मे इस्लाम के नाम पर इस्लाम के ही अनुयायियों पर  हिंसा, अत्याचार, दमन करने वाले कट्टरपंथी, आतंकी, आततायी, इस्लाम को मानने वाले तो कदापि नहीं हो सकते? अन्यथा अपने ही धर्म के मानने वालों पर इतनी दहशतगर्दी तो कदापि न करते? अतः इतना तो तय है कि "आतंकवादियों", "दहशतगर्दों", "अतिवादियों" का कोई धर्म नहीं होता। वहाँ तो उत्तर प्रदेश या योगी जी की सरकार नहीं है?? माननीय ओवैसी जी जितनी ऊर्जा मुठभेड़ मे हिन्दू मुसलमान का अनुपात या समानुपात निकालने मे व्यय कर रहे है कदाचित इस ऊष्मा का  एकांश भी इन जैसे लोग यदि इन भटके हुए, कट्टरपंथी सोच, और रूढ़िवादी विचारधारा से पोषित इन युवाओं को हिंसा के इस रास्ते को त्यागने के लिये शिक्षित-प्रशिक्षित करते तो उन माँओं के जिगर के टुकड़ों को असमय, बेमौत और निर्दयी तरह से  नहीं मरना पड़ता और न ही "आरिज"  जैसे अपराधियों को फांसी की सजा सुन रात की नींद उड़ने के दौर से गुजरना पड़ता।  हम सभी को इस कहावत की  कड़वी लेकिन धुर्व सत्य की सच्चाई को याद रखना होगा कि  "बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय"?? या जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे??   

अपने बीबी बच्चों को सात पर्दों के पीछे छुपा कर रखने वाले, अपने बेटे बेटियों को विदेशों मे आधुनिक सुख सुविधाओं वाली शिक्षा व्यवस्था मे  शिक्षित कराने वाले कश्मीर के अलगाववादी या इसी तरह के चरमपंथी, अशिक्षित गरीब, पिछड़े युवाओं को 72 हूरों का सब्जबाग दिखा कर हिंसा और कट्टरवाद की आग मे झौंकते है और आंतंकवादी गतिविधियों मे इनकी अमानवीय मौत पर प्रतिशत और अनुपात के नियमों का प्रतिपादन करते है!! क्यों नहीं अपने स्वजनों को या 72 हूरों की शिक्षा नीति  के सब्जबाग मे खुद अपने आपको शामिल नहीं करते?? कब तक निरीह, भोले-भाले सीधे-सरल लोगों  की लाशों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकेंगे या राजनैतिक गोटियाँ फेंकेंगे??

माननीय ओवैसी सहित समाज के हर प्रबुध वर्ग के बुद्धिजीवियों से आवाहन है कि  कृपया आइये और देश के  भटके, दिशा भृमित, राह भटके  नौजवान युवाओं को चाहे वे किसी भी धर्म और मजहब के हों नफरत और घृणा से परे शांति और सौहार्द का संदेश दे एक नई राह दिखायेँ  तो शायद  आपको गणित की कठिन प्रतिशत और अनुपात के सवालों के हल करने मे अपनी ऊर्जा व्यर्थ मे जाया न करनी पड़े।

विजय सहगल   

मंगलवार, 23 मार्च 2021

माउंट आबु पार्ट-3 (देलवाड़ा मंदिर)

 

" माउंट आबु पार्ट-3 (देलवाड़ा मंदिर)"

 








11वी -12वी शताब्दी मे अरावली पर्वत श्रंखला के बीच स्थ्ति  देलवाड़ा जैन मंदिर यध्यपि कल भी देख चुका था। पर संगमरमर से निर्मित मंदिर की भव्यता, सुंदरता एवं वास्तु निर्माण के आकर्षण ने मुझे पुनः एक बार दर्शन हेतु मजबूर कर दिया। जैन धर्मब्लंबियों के तीर्थ का मुख्य देलवाड़ा मंदिर जो भगवान आदिनाथ को समर्पित है का संगमरमर से निर्मित वास्तु, स्तम्भ पर यक्ष-यक्षिणीयों की सुंदर श्रंगारित प्रतिमाएँ, मंडप की मुख्य छत्त के नीचे बारीक पुष्प और बेलबूटे से निर्मित आकृतियाँ देखते ही बनती है। मुख्य मंदिर के चारों ओर बरामदे मे अन्य जैन तीर्थांकारों की संगमरमर की प्रतिमाएँ भी दर्शनीय है। काफी देर साफ सुथरे मंदिर प्रांगण के मुख्य मंडप मे बैठने के बावजूद उठने का मन नहीं कर रहा था। मेरा मानना है खजुराहो के मंदिर और देलवाड़ा के मंदिरों का वास्तु सौन्दर्य के सामने ताजमहल की सुंदरता भी फीकी है। जो आध्यात्मिक सुकून, शांति और सुख इन मंदिरों मे  बैठ कर अनुभव की  जा सकती है  कदाचित ही श्रमिकों पर अत्याचार, निर्ममता और हिंसा से निर्मित कराये गये एक शहँशाह के मकबरे मे महसूस होता हो।

बापसी मे वन विभाग द्वारा संचालित  ट्रेवेर्स टैंक के भ्रमण हेतु उनके द्वारा निर्मित एवं  नियंत्रित पार्क बनाया गया है। इस पार्क मे रीछ, जंगली सूअर, बघेरा एवं पार्क के आखिरी सिरे पर स्थित झील मे विभिन्न मछलियों के अतरिक्त  मगरमच्छ, घड़ियाल आदि जलचर भी है। पक्षियों मे जंगली मुर्गे, मोर, उल्लू, मैना, तोता आदि बहुतायत मे कलरव करते मिलेंगे। नितांत सुनसान वनाच्छादित पेड़ो के बीच लोग पैदल ट्रेक करते है पर दोपहिया या चार पहिया वाहनों को आवश्यक फीस के भुगतान पर प्रवेश की अनुमति दी जाती है। दोपहिया वाहन की आवश्यक फी के भुगतान कर लगभग 4-5 किमी लंबे ट्रेक पर अंदर प्रवेश किया। पार्क के आखिरी मे झील मे विभिन्न रंगो और आकारों की मछलियों को देखना रोमांचकारी अनुभव था। मेरे पहुँचने पर कोई अन्य पर्यटक वहाँ नहीं था लेकिन कुछ समय बाद तीन चार अन्य वाहन आने से डर मे कुछ सुकून मिला। कुल मिला के जंगल के बीच यात्रा ठीक ठाक ही रही।

यात्रा के अंतिम पढ़ाव मे सूर्यास्त स्थल देखने के इरादे से प्रस्थान किया जो मेरे होटल के ही नजदीक ही था। अन्य पर्यटन स्थल की तरह माउंट आबू के सभी पर्यटकों  की दिशा सन सेट पॉइंट की तरफ ही थी। वन विभाग द्वारा आवश्यक फीस लेने के बाद लगभग 1 किमी॰ की चढ़ाई थी। एक विशेष छोटी बच्चा गाड़ी की सहायता से लोगो को उपर चढ़ाने की व्यवस्था की गई थी। सीढ़ियों चढ़ कर बड़ी से पहाड़ी से सूर्यास्त देखने की व्यवस्था थी। मेले जैसा माहौल था खाने पीने खेल खिलौने की वस्तुओं के  विक्रय हो रहा था। जैसे ही सूर्य अस्ताञ्चल की ओर बढ़ा मोबाइल और कैमरों के माध्यम से लोगो ने सूर्यास्त के फोटो निकालना शुरू कर दी। दूर पहाड़ियों के पीछे सूरज का डूबना देखना अलौकिक अनुभव था। सूर्य देव एक नई ऊर्जा और शक्ति प्राप्त करने के लिये अस्त हो रहे थे ताकि कल नए ओज और चमक के साथ पुनः उदय हो सके। मैंने भी सूर्यास्त की  कुछ फोटो अपने कैमरे मे कैद  की।            

माउंट आबू की इस शानदार अविस्मरणीय यात्रा ने मन की  प्रसन्नता और उत्साह को आनंद से भर दिया। शानदार मौसम साफ सुथरे वातावरण और धूल रहित पर्यावरण ने मन को मोह लिया। ग्रामीण परिवेश मे लोगो का अभावों और सुविधा रहित रहन सहन के बावजूद उनके सामाजिक और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण स्वभाव ने महानगरों की चकाचौंध को भी फीका कर दिया। माउंट आबू की यात्रा मेरे अंतर्मन की एक शानदार और यादगार यात्रा थी। माउंट आबू परिक्षेत्र और वहाँ के निवासियों को नमन, बारंबार नमन।

विजय सहगल    

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

माउंट आबु पार्ट-2

" माउंट आबु पार्ट-2"

सूचना - माउंट आबु की विभिन्न पाषाण रॉक्स एवं प्रकृतिक चट्टानों की फोटोस को निम्न  लिंक को क्लिक कर देखा जा सकता है : https://sahgalvk.blogspot.com/2021/03/blog-post_17.html 











3 मार्च 2021 को गुरु शिखर तक का पूरा रास्ता साफ सुथरा था। तलहटी से शिखर के बीच सीढ़ियों का रास्ता यहाँ भी तय करना था। नीचे स्कूटर को छोड़ जब शिखर की ओर प्रस्थान किया तो सारे रास्ते साफ सफाई देख मन प्रसन्न था पर सारे रास्ते एक कमी दिखाई पड़ी  कि सीढ़ियों के एक ओर लोगो ने अपनी दुकान सजा कर रास्ता घेरा हुआ था और रास्ते के दूसरी ओर लोहे की रेलिंग से सुरक्षा की दृष्टि से रास्ता घेरा था। शिखर पर चढ़ाई चढ़ने वाले धर्मावलंबियों को विश्राम और सुस्ताने की कोई तिल मात्र जगह नहीं छोड़ी गई थी। रास्ते के एक ओर पूरे रास्ते दुकानों, चाय की गुमटियों, और अन्य दूकानदारों का मक्कड़ जाल फैला हुआ था। हम जैसे थके वरिष्ठ जन मजबूरी मे या चल रहे थे या जहाँ तहाँ सीढ़ियों पर बैठ यात्रियों की राह मे अवरोध उत्पन्न कर रहे थे। स्थानीय दूकानदारों से "ग्राम पंचायत ओरिया" की सरपंच का मोबाइल नंबर ले उनसे संपर्क किया। सरपंच जी से तो नहीं उनके पति श्री प्रेम जी से मोबाइल पर चर्चा हुई। "ग्राम पंचायत ओरिया" (जिला सिरोही) के क्षेत्रन्तेर्गत आने वाले "गुरु शिखर" की सफाई  व्यवस्था की तारीफ हमने प्रेमजी से की और बैठने की जगह के आभाव से उनको अवगत करा संदेश पहुंचाने का अनुरोध किया। सौभाग्य से सरपंच पति श्री प्रेमजी भी सेवानिवृत बैंक कर्मी थे, अच्छी बातचीत हुई। बापसी मे गाँव मे सरपंच जी से मिलने के प्रेमजी भाई के अनुरोध को नहीं ठुकरा सका। बापसी मे  सरपंच श्रीमती शारदा देवी एवं उनके स्टाफ से मुलाक़ात सुखद थी। मैंने जहां एक ओर उनकी पंचायत द्वारा साफ सफाई की प्रशंसा की वही दूसरी ओर शिखर पर जाने वाले रास्ते पर यात्रियों के बैठने के स्थान के अभाव से भी सरपंच जी को अवगत कराया। चाय पानी से सरपंच श्रीमती शारदा जी का अथित्य ग्रहण करना एवं उनके कार्यालय के स्टाफ एवं उनसे भेंट करना हम पति-पत्नी के लिये एक अविस्मरणीय पल था।

गुरु शिखर पर श्री दत्तात्रेय भगवान का मंदिर दर्शनीय था। चटक सिंदूरी रंग मे रंगे मंदिर की दीवारे किसी देवलोक के से देवालय सा प्रतीत कराती है। प्रकृतिक गुफाओं को बगैर तोड़े मंदिर निर्माण आधुनिक और पुरातन निर्माण का अनूठा संगम प्रस्तुत करता नज़र आया। मुख्य  मंदिर एक बड़ी चट्टान की गुफा मे बनाया गया था। शिखर के सर्वोच्च विंदु पर भगवान दत्तात्रेय के चरण कमलों के निशान को पूजा जाता है जो एक छोटी सी गुफा मे स्थित है। कुछ कदम नीचे पीतल का एक बड़ा सा घंटा और उससे निकली ध्वनि शिखर के प्रहरी की तरह अपनी उपस्थिती दर्ज़ करती प्रतीत होती रही। ऐसी मान्यता है कि तीन बार ध्वनि करने से मांगी हुई ईक्षा पूरी होती है। भगवान दत्तात्रेय के चरण कमलों मे नतमस्तक हो तीन वार घंट ध्वनि कर विश्व कल्याण की कामना की एवं माउंट आबू के सर्वोच्च शिखर की परिक्रमा कर चारों तरफ के सुंदर नज़रों को अपने मोबाइल और आँखों मे कैद किया। सुंदर मनोहारी दृश्य था।    

शिखर से वापसी यात्रा मे भी पत्थरों की देवाकृतियों को देखने की ललक से स्कूटी को जगह जगह रोकना जारी था। इन संरचनाओ का लोभसंभारण यात्रा के पूरे होते होते भी मै नहीं रोक सका। एक कछुआ की सी आकृति ने तो मन ही मोह लिया पर बदजात मानव अपनी  घ्राणास्पद छाप यहाँ भी छोड़ने से वाज़ नहीं आया। जहाँ तहाँ बीयर की बोतलों के टूटे काँच के टुकड़े और अन्य गंदगी उन की पशुता की कहानी कह रहे थे।

मै प्रायः भ्रमण के दौरान कोशिश करता हूँ कि घूमने के साथ साथ स्थानीय लोगो से उनकी भाषा और संस्कृति से अपने आपको जोड़ूँ। उनके रीति-रिवाज त्योहार आदि मे शामिल हो ज्यादा से ज्यादा जानूँ! दोपहिया वाहन इस तरह की यात्रा को पूरा करने मे सुगम और सरल होते है इसीलिए मेरी कोशिश होती है कि गहन संपर्क और सरल यात्रा मे दोपहिया वाहनों से यात्रा करूँ। मेरी अब तक जितनी यात्रा मोटरसाइकल या स्कूटर से हुई बड़ी यादगार रहीं। बापसी मे एक जगह मैंने महिलाओं के कई समूह एक दिशा मे जाते देखे जो शायद गाँव के किसी सामाजिक कार्यक्रम से अलग अलग समूहों मे बापस हो रही थी। महिलाओं के इन समूहों मे एक विशेष समानता मैंने देखी कि वे अपने राजस्थानी पहनावों के साथ एक हल्के बैगनी रंग का वस्त्र ओढ़े हुए थी। एक ही रंग के इस पहनावे की जिज्ञासा ने मुझे इस बारे मे और जानने को विवश कर दिया। मै और मेरी पत्नी ने  "नमस्ते" और "राम राम" कहते हुए एक समूह मे चल रही 4-5  महिलाओं का अभिवादन कर एक ही रंग की ओढनी के बारे मे पूंछा। उन्होने बताया की उनके समाज मे किसी वृद्ध-बुजुर्ग के देहावसान के बाद आज उस परिवार मे अपनी शोक-संवेदना के कार्यक्रम मे शामिल हो गाँव के उसी घर से बापस आ रही थी। उन्होने बताया कि कुछ रिश्तेदार तो दूर दराज के गाँव से पहाड़ी रस्तों से होकर 8-10 किमी॰ पैदल यात्रा कर बापस हो रहे है। उनकी इस समाजिकता के बारे मे जान मेरा सिर उनके प्रति सम्मान से झुक गया!! उन महिलाओं का आत्मीयता पूर्ण निश्छल भाव से अपने घर चाय-पानी के आमंत्रण ने मन को अविभूत कर दिया। शहरीकरण की इस आधुनिकता और  भागम-भाग भरी ज़िंदगी की परिस्थितियों मे आज इस समाजिकता का नितांत अभाव देख मन उदास हो उठता है!! नगरों की चका-चौंध भरे एकाकी जीवन के कितने  अभयस्थ हो गये है कि सामाजिक जीवन मे हम एक दूसरों के सुख-दुःख मे शामिल होने से भी वंचित रह जाते है। क्या वास्तव मे हमने ऐसे ही जीवन की आशा पाली थी? क्या ऐसे ही जीवन की कल्पना की थी?? सोच कर मन उदास हो जाता है।

विजय सहगल 

बुधवार, 17 मार्च 2021

माउंट आबू की रॉक्स

 माउंट आबू की रॉक्स (ROCKS OF MOUNT ABU)

3 मार्च 2021 को अरावली पर्वत श्रंखला के बीच स्थित राजस्थान के अर्बुदांचल अर्थात आबू पर्वत के यात्रा धार्मिक पर्यटन के साथ प्रकृति से निकट का साक्षात्कार था। प्राकृतिक रूप से माउंट आबु मे अरावली पर्वत के चारों ओर पाषाण शिलाएँ विभिन्न आकृतियों मे बिखरी पड़ी है जिनमे से कुछ ईश्वरीय रचनाओं की फोटोस को इस ब्लॉग मे रखने की कोशिश की है। 

विजय सहगल