शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

गोहद का किला (भाग-1)

 

"गोहद का किला" (भाग-1)

















दिनांक 19 फरवरी 2021 को मेरे सामने दो लक्ष्य थे। पहला गोहद का किला जो ग्वालियर से 46 किमी॰ था जबकि दूसरा अटेर का किला जो लगभग 100 किमी॰ था। दोनों ही किले मध्य प्रदेश भिंड जिले मे स्थित है।  अंततः कम दूरी की बजह से गोहद को वरीयता दे मैंने गोहद फोर्ट देखने का निर्णय लिया। दोपहर लगभग 12 बजे बसंती खुशनुमा मौसम मे मोटरसाइकल पर सवार राष्ट्रीय राजमार्ग 92 के दोनों ओर हरे भरे गेहूं और सरसों के खेतों से गुजरना एक  सुखद और यादगार पल थे। अब तक इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर अनेकों बार निकलने पर मै गोहद चौराहे को ही गोहद कस्बा समझता था पर उस दिन हमे ज्ञात हुआ कि मूल गोहद छोटा सा शहर जो राष्ट्रीय राजमार्ग से 5 किमी॰ दूर है पर हाईवे से कस्बे तक पक्की चार लेन मार्ग से जुड़ा होने पर यात्रा सुगम थी।

कस्बे के अंतिम छोर पर स्थित गोहद के किले की ऊंची ऊंची दीवारों के मध्य एक पक्की सड़क को देख आभास हो रहा था कि सड़क के दोनों ओर जाट  राजाओं द्वारा निर्मित किले की आलीशान इमारते अपने वैभव की कहानी कह रही हों। सड़क के बाएँ तरफ लोहे के गेट के अंदर से हम लोगो गोहद किले मे प्रवेश किया। हम लोगो की हमारी इस यात्रा मे किले के प्रवेश द्वार पर  गोहद शहर के वरिष्ठ पत्रकार श्री भगवती प्रसाद कटारे जी मुलाक़ात सुखद संयोग थी। उन्होने किले के भ्रमण एवं इतिहास से परिचय करा हमारे भ्रमण को सुखद एवं यादगार बना दिया।   16वी 17वी ई॰ के  इस किले का निर्माण जाट राजा महा सिंह और भीम सिंह ने कराया था। किले परिसर के भग्नावशेष अपने वैभव की मौन कहानी कह रहे थे। "खंडहर बता रहे है इमारत बुलंद थी" के सूत्र वाक्य के आधार पर मेरा दृढ़ मत है कि किले का निर्माण जाट राजाओं की वीरता, बहदुरी  एवं राज्य के वैभवशाली गाथा उनके  अपने इतिहास मे समाहित  है। बड़े बड़े दालानों के बीच छोटे बड़े आँगन महल के राजाओं की पद और गरिमा के हिसाब से बनाई गयी थी। वरांडे एवं दालानों पर विभिन आकारों के खंबे जिन पर बहुत बारीक आकर्षक नक्काशी की गई थी। प्रवेश द्वारों पर वर्गाकर पत्थरों पर खूबसूरत ज्योमिति एवं पशु पक्षियों एवं पुष्पों की आकृति जहां तहां उकेरी गयी थी। इन आकृतियों को सफ़ेद समुद्री कौड़ी को पीस कर अन्य तत्वों को मिले पेस्ट से उकेरा/बनाया गया था। जो आज भी मौसम और समय के  धपेड़ों  के विरुद्ध सीना तान के किले की संपन्नता और वैभवता की कहानी कह रही हो।  लेकिन किले के अधिकतर महल खंडहर अवस्था मे थे। पुरातत्व विभाग यध्यपि किले के रख रखाव का प्रयास कर रहा है पर जो नाकाफी है! जौहर महल, सप्तवदी महल का रखरखाव साफ दिखाई दे रहा था पर अन्य महलों के पत्थर के  टूटे सहतीरे, दीवारे, दहलीज़, दरवाजे एवं छतरियाँ के रख रखाव की शीघ्र आवश्यकता है। किले की कुछ बुर्जे समय को चुनौती दे  अपने मूल रूप मे खड़ी थी पर कुछ दो तीन मंजिली इमारते समय से टक्कर ले हताशा और निराशा मे अपनी पराजय स्वीकार कर रुग्ण अवस्था मे खड़े हो अपने अवसान की राह देखती प्रतीत हो रही थी।

काली चरण बाथम जो कि इस पुरातन धरोहर की चौकीदारी कर रहे थे। यूं तो मध्यप्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा समुचित प्रचार प्रसार न होने के कारण पर्यटकों की आमद कम ही है। पर जो स्थानीय पर्यटक भी आते है उनके लापरवाह व्यवहार एवं समुचित स्टाफ के अभाव के कारण एवं  कचड़े का समुचित निष्पादन संभव न होने के कारण नाश्ते, खाने, कोल्ड ड्रिंक्स आदि के पैकेट यहाँ वहाँ दिखाई दे जाएंगे। लगभग डेढ़-दो घंटे श्री कटारे जी के सानिध्य एवं किले का भ्रमण समाप्त कर पुनः प्रवेश द्वार पर पहुँच यात्रा पूरी की। श्री कटारे जी की मातृ भूमि से प्रेम की तारीफ करनी होगी मेरे द्वारा किले के रखरखाव पर जब जब टिप्पड़ी की उन्होने बखूबी बचाव कर जहां तहां रख रखाब और इमारत की चूने मौरंम से की गई मरम्मत को दिखाया। पत्रकार से अधिक एक अच्छे शहरी से मुलाक़ात सुखद थी।

किले के सामने ही स्थित पाँच मंज़िला नया महल, दरबार हाल या रानी महल आज भी अपनी भव्यता, वैभवता एवं शानदार वास्तु निर्माण का अद्भुद नमूना देख  महल के लिये प्रस्थान किया। महल के प्रवेश द्वार पर ही जाट राजा श्री भीम सिंह की एक विशाल घुड़सवार प्रतिमा लगी थी जिसके चेहरे पर एक कपड़ा लपेटा गया था। पत्रकार श्री कटारे जी ने बताया ये मूर्ति दो साल से राजनैतिज्ञों द्वारा उद्घाटन की बाट जोह रही है। ये समय की बलिहारी ही कही जायेगी कि अपने समय मे शूरवीरता, पराक्रम, शौर्य  और साहस की प्रतिमूर्ति रहे राजा भीम सिंह की प्रतिमा आज मुंह छुपा अपनी बेबसी, विवशता, और लाचारी पर आँसू बहा रही होगी जो एक अदद ऐसे नेता के इंतज़ार मे उद्घाटन की आश मे दो साल से खड़ी है जिनकी हैसियत उनके राज दरबार मे एक अदने से "साईस" (घोड़े का सेवादार) से ज्यादा न रही हो।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

श्री राम शरण सहगल

"श्री राम शरण सहगल"


कभी कभी कुछ लोग जीवन के इतने निकट होते है मानों आपके शरीर के ही हिस्से हों पर उनकी अनुभूति आपको कभी नहीं हो पाती। कभी आपको  अपने शरीर के अंगों के होने का अहसास हुआ है
? अपने पैरों, हाथों, आँखों या सबसे महत्वपूर्ण मस्तिष्क के होने का स्मरण भी किया हो? शायद नहीं! जब तक की उनको कोई वेदना या पीढ़ा न हो। ऐसे ही थे श्री राम शरण सहगल, जो थे तो मेरे मौसेरे भाई पर मै उन्हे हमेशा एक संघर्षशील युवा, एक पारंगत मलखमिस्ट, उत्तम जिम्नास्ट और उन सबसे भी उपर मेरे गुरु के रूप मे याद करता हूँ। शांत, सौम्य और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी श्री राम शरण भाई साहब ने  समाज के रिश्तों के  अलग अलग चरित्रों को एक आदर्श पुत्र, जिम्मेदार भाई, समर्पित पति और उत्तरदायी पिता की भूमिका को बखूबी निभाया।

बचपन मे मै तीसरी, चौथी कक्षा मे अपने स्कूल से अलग उनके घर ट्यूशन पढ़ने जाया करता था। वे उन दिनों झाँसी के व्यख्यात "लक्ष्मी व्यायामशाला" रूपी आश्रम मे गुरु-शिष्य परंपरा के परिचायक मलखम के प्रशिक्षु थे। जिम्नास्ट मे भी पारंगत थे। एसपीआई इंटर कॉलेज जिसके वे छात्र थे, कॉलेज  की वार्षिक पत्रिका मे मैंने काँच की बोतलों पर संतुलित मलखम पर उनकी व्यायाम करते फोटो देखी थी। छात्र के रूप मे अध्यन के साथ वे हम जैसे बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे। संयुक्त परिवार मे बड़े बेटे होने की भूमिका उन्होने बड़ी जिम्मेदारी पूर्वक निभाई। उनके संघर्ष की बानगी का मै अवश्य उल्लेख करूंगा कि तीन चार साल ट्यूशन पड़ने के दौरान मैंने उनको 7-8 किराये के मकान बदलते देखा, जहां पर बच्चों को ट्यूशन के साथ वे स्वयं अपने स्नातक आदि की सतत पढ़ाई अपने छोटे भाई बहिनों के साथ करते  रहे। बाद मे झाँसी के ही गिने चुने कॉलेज मे से एक एसपीआई इंटर कॉलेज मे अध्यापक के रूप मे अपने कैरियर की शुरुआत की।

वे जीवनपर्यंत अध्यापन के कार्य को करते हुए झाँसी शहर मे शिक्षा की रोशनी को अपने हजारों छात्रों के माध्यम से समाज को आलोकित करते रहे। जीवन के अंतिम पहर मे लगभग दस वर्ष पूर्व धर्मपत्नी श्रीमती नीरू के आकस्मिक निधन किसी भी व्यक्ति के खुशहाल जीवन मे एकाकीपन होना स्वाभाविक होता है पर उन्होने कभी इसको अपने मिलने वाले मित्रों और शुभ चिंतकों को आभास नहीं होने दिया।

दिनांक 24 फरवरी को उनके निधन का दुःखद समाचार सुन मन व्यथित हो उठा। मै एक शिष्य और छोटे भाई के नाते उन्हे अपनी अश्रुपूरित, विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि उन जैसे नेक, सच्चे  कर्मयोगी व्यक्ति को अपने श्री चरणों मे स्थान दे।

ॐ शांति।

विजय सहगल              


मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

अंधेर नागरी चौपट मामा

 

                 "अंधेर नागरी चौपट मामा"





16 फरवरी को प्रातः अपने संक्षिप्त भोपाल प्रवास पर एक हृदय बिदारक बस दुर्घटना का सुन मन उद्वेलित हो उठा जब समाचार सुना कि बसंत पंचमी के दिन मध्य प्रदेश के नगर "सीधी"  से "सतना" जा रही बस ने ड्राईवर की लापरवाही के कारण जल समाधि ले ली। इस दुःखद दुर्घटना मे अनेकों यात्री असमय काल कवलित हो गये। अगले दिन समाचार पत्रों की सुर्खियों मे  दुर्घटना की भयावहता, विकरालता रोंगटे खड़े करने वाली थी। समाचार पत्रों मे 47 यात्रियों के काल के ग्रास के समाचार ने मन को व्यथित कर दिया। 30 सवारियों की क्षमता वाली इस बस मे 62 से अधिक यात्रियों को ठूंस ठूंस कर बैठाया गया था। 23 महिलाओं एवं 22 पुरुष सहित 2 छोटे मासूम इस दुर्घटना की भेंट चढ़ गये। 2 साल के अथर्व की फोटो दिल दहलाने वाली थी। मृतकों मे अधिकतर वे बेरोजगार युवक, युवतियाँ थे जो बैंक, रेल्वे एवं एएनएम की परीक्षा मे शामिल होने आये थे।  वे अपने ज्ञान और कौशल से परीक्षा मे सफल भी हो जाते किन्तु खेद और अफसोस है कि वे सारे मृतक शासन प्रशासन की भ्रष्टाचार एवं निरंकुशता की परीक्षा को उत्तीर्ण न कर सके और असमय काल के गाल मे समा गये।

 

इससे ज्यादा घोर लापरवाही क्या होगी कि दुर्घटनाग्रस्त बस पिछले पाँच साल से बिना बीमा के चल रही थी। जो बस त्रुटि पूर्ण ब्रेक प्रणाली, घिसे टायरों सहित चलने के लिये अनपयुक्त थी उसे फ़िटनेस प्रमाणन आरटीओ द्वारा प्रदान किया गया था। मुख्य मार्ग पर अवैध उत्खनन और ओवरलोड डंपरों  से क्षतिग्रस्त मार्ग के कारण बस अपने तयशुदा मार्ग को छोड़ नहर किनारे सँकरे मार्ग पर वेलगम दौड़ रही थी।  यात्रियों के बारबार कहने के वावजूद ड्राईवर ने बस की गति को धीमे नहीं किया। लापरवाही और गैरजिम्मेदार ड्राइविंग एवं सँकरे रास्ते के कारण बस पानी से लबालव भरी 20 फुट गहरी नहर मे समा गयी जिसकी कीमत 47 निरीह, निरपराध यात्रियों को मौत के रूप मे चुकानी पड़ी।  

 

आपको जानकार आश्चर्य होगा कि दिल दहला देने वाली इस दुर्घटना पर मध्य प्रदेश के कर्तव्य पारायण, ईमानदार, जनसेवक  आरटीओ अधिकारी श्री संजय श्रीवास्तव ने बगैर एक  क्षण गवाएं इस बस का फिटनेस प्रमाण पत्र, परमिट एवं लापरवाह ड्राईवर का लाइसेंस निरस्त कर दिया। इतनी गंभीर, शोकाकुल दुर्घटना पर ऐसे सेवभावी जन सेवक की बस के  परमिट, फ़िटनेस, और ड्राईवर के लाईसेंस के निरस्तीकरण की त्वरित एवं त्रुटि रहित कार्यवाही की मिशाल दुनियाँ मे शायद ही देखने को मिले!! शासकीय अधिकारियों की राकेट जैसी गति से  कार्यवाही आपको सिर्फ मध्य प्रदेश मे  ही देखने को मिलेगी। मेरा दृढ़ मत है कि माननीय आरटीओ महोदय ने अपनी सेवाभावना एवं कर्तव्य परायणता  का एकांश भी दुर्घटना घटने के पूर्व वाहनों के परमिट, फ़िटनेस, इनश्योरेंस की जांच पढ़ताल मे लगाया होता तो ये  निरीह 47 व्यक्ति अकाल मृत्यु को न प्राप्त होते। मेरा निश्चित कठोर एवं अप्रिय मत ये भी है कि कि इन 47 निरपराध लोगो की मौत दुर्घटना मे नहीं बल्कि शासन/प्रशासन के इन गैर जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा बनाई कुव्यवस्था के इन भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा की गयी "हत्या" है!! कदाचित समय रहते इन्होने अपने कर्तव्यों को ईमानदारी और जनसेवा की भावना से निभाया होता तो ऐसी अनहोनी न होती। ऐसा नहीं है कि आरटीओ महोदय द्वारा त्वरित और शीघ्र कार्यवाही से व्यवस्था के परमिट, फ़िटनेस, लाईसेंस अब चाक चौबन्द हो गयी  हों और अब सड़कों पर वाहन चालकों की निरंकुशता समाप्त हो गई हो? कहीं न कहीं ये निरंकुश वेलगाम वाहन आज और अभी भी चल रहे होंगे!! वो बात दूसरी है कि ये गैर कानूनी परमिट, लाईसेंस तब तक नहीं दिखाई देंगे जब तक की कोई अन्य अगली दुर्घटना न घटे!! क्योंकि शासन प्रशासन के भ्रष्ट अधिकारियों की लचर और ढुलमुल रवैया अभी भी बदस्तूर जारी है। परिवहन और यातायात विभाग के ये विचारशील, कुशल  और होनहार जनसेवक, जनसाधारण के दुपहिया और चौपहिया वाहनों के इन्श्योरेंस, लाईसेंस पर्यावरण प्रमाण पत्र आदि पर तो अपनी सारी ऊर्जा व्यय करेंगे (देखे मेरा ब्लॉग उन्नाव बालाजी, दिनांक 25 दिसम्बर 2020:-  https://sahgalvk.blogspot.com/2020/12/blog-post_24.html) पर इन अनफ़िट, बगैर परमिट, बगैर इन्श्योरेंस के सरपट भाग रहे अनत्थे बैलों की तरह अनियंत्रित ट्रकों, बसों या अन्य व्यापारिक  वाहनों पर लगाम लगाने मे अपने समय का सौवाँ हिस्सा भी लगाएँ तो यातायात व्यवस्था चाक चौबन्द हो जाए और साधारण जन मानस इस असमय मौत का शिकार न बने। 

 

एक अन्य समाचार पत्र  ने भी इस अमंगलकारी दुर्घटना पर राज्य शासन के परिवहन मंत्री श्री गोविंद सिंह राजपूत के अमर्यादित आचरण की ओर मेरा ध्यानाकर्षित किया। माननीय मंत्री महोदय ने दुर्घटना स्थल पर जाना भी गवारा नहीं किया इसके विपरीत वे बसंत पंचमी के भोज मे आमोद-प्रमोद, हास-परिहास और मौज-मस्ती  करते नज़र आये। श्री राजपूत के अनैतिक एवं लोकलाज विरुद्ध आचरण की उम्मीद उस दल के सदस्यों  से अपेक्षित नहीं की जा सकती जो भारतीय सांस्कृति और सनातन परंपरा के वाहक होने और "जनसेवक" की भावना से ओतप्रोत होने  का दम भरता हो। उपर से तुर्रा उनके इस बयान ने "जले पर नमक छिड़कने" का कार्य किया कि उस स्वादिष्ट और स्वरूचि भोज मे "और भी मंत्री थे"।      

मुख्य मंत्री श्री शिवराज सिंह जो मामा के रूप मे जनसामान्य के बीच प्रसिद्ध है और अपने आप को जनसामान्य के दुःख-सुख मे शामिल होने का कोई मौका नहीं चूकते।  उनकी कैबिनेट के  परिवहन मंत्री बस दुर्घटना मे मारे गये 47 व्यक्तियों की मौत  की खबर से  बेखबर हो,  ऐसी  निर्लज्ज, असभ्य आचरण  उनके मंत्रिमंडल के सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाये ऐसी अपेकक्षा जनकल्याण कारी सरकार से कदापि नहीं की जा सकती। इसकी जितनी भी आलोचना, निंदा, भर्त्सना की जाये कम है।

 

एक बात से मै अनिभिज्ञ हूँ कि क्यों मध्यप्रदेश मे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अवैध उत्खनन एवं अवैध यात्री बसों का वहन/परिवहन क्यों नहीं समाप्त हो पाया। फलस्वरूप विन्ध्यांचल मे 6 बड़ी बसों की  जलसमाधि मे 322 लोगो ने अपनी जान गंवाई।   सीधी-सतना की इस बस दुर्घटना मे भी अवैध उत्खनन से क्षतिग्रस्त सड़कों और यातायात के जाम के कारण बस दुर्घटना हुई। कुछ वर्ष पूर्व 2012 मे  मुरैना मे एक आईपीएस अधिकारी श्री नरेंद्र सिंह  की इसी अवैध उत्खनन के कारण दिन दहाड़े ट्रैक्टर चढ़ा कर  हत्या की गई थी। आखिर क्यों मध्य प्रदेश की कोई सरकार इस अवैध रेत उत्खनन एवं अवैध यात्री बस परिवहन   पर नियंत्रण नहीं कर पा रहीं है?  सरकारें कोई भी रही हों पर अवैध उत्खनन एवं परिवहन पर नियंत्रण शासकीय मशीनरी एवं अधिकारियों की ढुलमुल रवैये एवं भ्रष्ट आचरण  के कारण इन पर कभी अंकुश नहीं लगाया जा सका। शायद  माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह जी की सरकार भी इस से अछूती नहीं रही??

 

न जाने वो  दिन कब आएंगे जब इन दुर्घटनाओं पर अंकुश मुमकिन होगा?? आइये तब तक इन अकाल काल कवलित लोगो को अपने श्रद्धा सुमन तो अर्पित कर ही सकते है। मृतकों को हार्दिक श्रद्धांजलि!!  ॐ शांति!!

 

विजय सहगल

 

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

चीनी हलवाई, मुरैना

"चीनी हलवाई"





हलवाई का "चीनी" नाम क्यों पड़ा, मिठाई की "चीनी" के कारण, या "चीन देश" के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संपर्क या संबंध के कारण? मै नहीं जानता। मैंने हमेशा उसकी दुकान के मिष्ठान का पूरा पूरा भाव दिया, पर उसने हमे कभी भाव नहीं दिया! इसलिये मैंने भी कभी जानने की कोशिश नहीं की "कि भाई, चीनी हलवाई तुम्हारा नाम "चीनी" क्यों पड़ा या क्यों रक्खा!! (इन लाइन को बहुत गंभीरता से न लेना यूं ही लिख दी)।

पर एक बात तो पक्की थी कि "चीनी हलवाई" की मिठाई का कोई मुक़ाबला न था। मैंने अपनी नौकरी के साढ़े चार साल पोरसा (जिला मुरैना, मध्य प्रदेश) प्रवास मे बिताये। अपने गृह नगर झाँसी आते/जाते शायद ही कोई  हफ्ता ऐसा बीता हो जब मैंने, मुरैना रेल स्टेशन के सामने स्थित उसकी दुकान के व्यंजनों का उपभोग करने से कभी मै चूंका हूँ। ये मेरे साप्ताहिक दिनचर्या का अंग था। ऐसा कोई हफ्ता नहीं छूटा होगा जब  सोमवार को झाँसी से मुरैना  आने पर  पोरसा के लिए बस मे सवार होने के पूर्व "बेढ़ई और जलेबी" का रसास्वादन मैंने न लिया हो। कभी कभी पिन्नी, पतिसा, इमारती और उड़द की दाल के लड्डू भी हमारे स्वल्पाहार का हिस्सा होते।  पर शनिवार को पोरसा से वापसी पर  चीनी हलवाई के व्यंजनों का स्वाद झाँसी जाने वाली ट्रेन पर निर्भर करता था। यदि ट्रेन सही समय पर है तो मन मार कर ट्रेन मे बैठ जाता और यदि ट्रेन लेट है अर्थात 10 मिनिट का भी समय हो  तो अन्य प्रशंसक उपभोक्ता की तरह मै भी उसकी दुकान का  ग्राहक होने पर संतुष्टि महसूस करता। इसका मुख्य कारण था कि उसकी दुकान स्टेशन परिसर से सड़क पार करते ही थी। जहां सरलता से ट्रेन पर निगाह रखते हुए मिष्ठान वस्तुओं का सुस्वाद  विनमय  हो जाता था।

आज यहाँ  मै चीनी हलवाई की मिठाइयों के स्वाद, गुणवत्ता आदि की  चर्चा/परिचर्चा कर आपका और अपने मुंह के साथ ज्यादती नहीं करूंगा। आप, फिर भी, एक बार मिठाइयों के विवरण के चिंतन, मनन से ज्यादती सहन भी कर ले पर "डाइबिटिस" मुझे खाने से तो क्या, मिठाई से संबन्धित बातों को भी याद करने के विरुद्ध चेतावनी देती  रहती है।

चलिये मूल विषय पर आते है। दरअसल विभागीय प्रोन्नति के लिये मुझे साक्षात्कार मे शामिल होने के लिये एक बार जयपुर जाना था। मेरे कुछ मित्र भी उसी ट्रेन से आ रहे थे जिससे मैने भी आगरा जाना था। जहाँ से सभी को एक साथ आगे बस द्वारा जयपुर जाना था। साथी  मित्रों के नाम तो याद नहीं, पर घटना शायद 1995 की थी।

मुझे झाँसी से चढ़ना था। झाँसी पर मेरी मुलाक़ात मेरे मित्रों से हुई जो उसी ट्रेन से पीछे से आ रहे थे। साक्षात्कार और आगरा से जयपुर जाने के कार्यक्रमों  पर ट्रेन मे चर्चा होती रही इसी बीच मुरैना स्टेशन आ गया। परिचित स्टेशन तो था ही, सालों यहाँ से आवागमन जो अब भी जारी था।  चीनी हलवाई की याद आना स्वाभाविक थी। सौजन्यता वश मुरैना स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर उतर कर एक बार फिर से अपने पुराने दिनों को याद कर ही रहा था कि मैंने देखा कि आगे रेल फाटक की क्रोसिंग पर कुछ भीड़ भाड़ नज़र आ रही है। लोगो की भीड़ रेल्वे लाइन पर जमा थी। मुझे सोचने मे कोई संकोंच न हुआ कि कुछ हादसा या गड़बड़ी रेल लाइन पर हुई है। सालों के आवागमन पर दैनिक या साप्ताहिक दैनिक रेल यात्री अपने आपको रेल विभाग का "तुर्रम खाँ" समझने लगते है कुछ ऐसी ही गलतफहमी उस दिन मुझे भी हो गई। कुछ रेल विभाग की कार्यप्रणाली की ज्यादा समझ और कुछ अपने ऑफिस साथियों पर अपने पूर्व स्टेशन पर रहने के रौब और रुतबे की गलतफहमी ने रेल फाटक पर जमा भीड़ को देख ये निर्णय लेने के लिये बाध्य कर दिया कि भीड़ की गड़बड़ी को दूर होने मे 15-20 मिनिट तो लगेंगे ही।  अतः ट्रेन अभी 15-20 नहीं जाने वाली। विश्वास होता तो मै साहस न करता पर अतिविश्वास ने मुझे दुस्साहस करने को मजबूर कर दिया।  मैंने सोचा कि क्यों ने अपने साथियों को चीनी हलवाई की गरमा-गरम बेढ़ई और जलेबी का नाश्ता करा अपने रुतबे को मजबूत किया जाये। तुरंत निर्णय ले मैंने साथियों से कहा कि मै पाँच मिनिट मे स्टेशन के बाहर स्थित चीनी हलवाई से नाश्ता ले कर आ रहा हूँ, अभी ट्रेन 15 मिनिट नहीं जाने वाली!! इतना कह मै तेजी से स्टेशन के बाहर भागा। चीनी हलवाई से अर्जेंट आग्रह कर ट्रेन के प्लेटफॉर्म खड़े होने का वास्ता दे ऑर्डर दिया। चीनी हलवाई ने भी तुरंत बेढ़ई और जलेबी पैक कर दी और मै उल्टे पैर ही बापस प्लेटफॉर्म की ओर दौड़ा।

जिसका डर था वही हुआ। अतिआत्मविश्वास मे ट्रेन स्टेशन से रवाना हो चुकी थी। जाती हुई ट्रेन दिखाई तो दी, पर वह हमारी पहुँच के बाहर थी। दूर जाती ट्रेन को देख लगा शायद साथियों ने चैन खींची हो? पर ट्रेन चली तो चलती चली गई। अचानक इस स्थिति की कल्पना मैंने नहीं की थी। विश्वास तो था कि मेरी सीट से मेरे साथी मेरा सामान सूटकेस उठा लेंगे, पर ऐसी कोई बात नहीं हुई थी और न ही ऐसी अनहोनी का अंदेशा भी था, कि मेरा  क्या क्या और कौनसा सामान है? चिंता हुई। स्टेशन मास्टर से आग्रह कर आगरा स्टेशन पर सामान को सुरक्षित उतरवाने का संदेश प्रसारित करा दे। अतरिक्त सुरक्षा को दृष्टिगत आशंकाओं के बीच आगरा मे अपने बहिनोई को एसटीडी पीसीओ से दूरभाष पर घटना बता उन्हे भी स्टेशन पहुँचने का आग्रह किया क्योंकि उन दिनों मोबाइल का चलन शुरू नहीं हुआ था। मैने  सीधे मुरैना बस स्टैंड पहुँच  आगरा की बस पकड़ी। सौभाग्य से हरियाणा रोडवेज की नॉन स्टॉप बस से डेढ़ घंटे मे आगरा पहुँच गया। स्टेशन पहुँच सभी साथियों से मुलाक़ात हो गई। खैरियत थी सभी कुछ ठीक ठाक था। बहिनोई जी भी स्टेशन पहुँच चुके थे। मुरैना स्टेशन मास्टर द्वारा प्रेषित संदेश का भी प्रसारण आगरा स्टेशन पर कर दिया गया था।  उस समय तक  बेढ़ई और जलेबी गरम तो नहीं थी पर तनाव और परेशानी ने हमारे दिमाक की गर्माहट से उन्हे भी कुछ गरम जरूर कर दिया था।  

अपनी करनी पर क्रोध और ग्लानि भी हुई कि व्यर्थ मे रेल विभाग के कर्मचारियों, साथियों और बहिनोई साहब को अपनी "बेवकूफी" के कारण परेशान कर दिया। पर कहीं गालिब के उस शेर "बहलाने को दिल  गालिब ख्याल अच्छा है"  के कुतर्क दे  मन को तसल्ली दी कि, "सब कुछ तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार ठीक  हो जाता तो कौन घटना को याद करता और कौन घटना का यहाँ  जिक्र करता? और कौन चीनी हलवाई को स्मरण करता??

 

विजय सहगल    

         

               

                    

     


सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

पत्थर की अभिलाषा

 

"पत्थर की अभिलाषा"




मै रस्ते का ठलुआ पत्थर,
राहगीर की ठोकर खाकर।
दूरी कुछ मै, तय कर पाया।
रूखे जीवन मे, रंग भर पाया॥
एक और ठोकर मै खाकर।
पड़ा रहा "घूरे" पर आकार॥

हाथों कभी किसी पापी के।
देश द्रोही, अपराधी के॥
पहुँच मे आया।
ठगा सा पाया!!
हा! दुर्दैव, दुर्भाग्य हमारा।
अपनों ने अपनों को मारा॥
"जड़" होकर भी हम ये सोंचे।
"चेतन" कैसे करें, भरोंसे?
जिस थाली मे तुम हो खाते।
खाकर उसमे ही, छेद बनाते॥
तुच्छ अतीत पर खेद जताकर।
परिमार्जन की राह दिखा कर॥
उन नन्हें हाथों मे आऊँ।
नभ मे खूब उच्छाला जाऊँ॥
पाली थी कुछ यही तमन्ना।
आसमान मे उछलूँ इतना॥
काश छेद उसमे कर पाऊँ,
लौट ज़मी पर बापस आऊँ।
गिरूँ कहीं उस पुण्य धरा पर।
गिरा शहीद का लहू जहां पर॥
छू कर, धन्य भाग जानूँगा।
जीवन सफल तभी मानूँगा॥

विजय सहगल

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

लता मंगेशकर एवं सचिन तेंदुलकर के ट्वीट

 

"लता मंगेशकर एवं सचिन तेंदुलकर के ट्वीट"




महाराष्ट्र सरकार को हो क्या गया जो अपने उल-जलूल निर्णयों के कारण अपनी भद्द पिटवा  देश मे  जग हँसाई का पात्र बनी हुई है। एक अदनी सी अभिनेत्री के विरुद्ध सरकार की अति सक्रियता के मामले मे अपनी फजीहत से लगता है उसे पूरी तसल्ली नहीं हुई थी? जो उनके गृह मंत्री ने हाल ही मे देश के निर्विवाद गौरव, भारत के अमूल्य रत्न, भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त  सर्व श्री लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर के अपने देश के पक्ष मे किये गये  ट्वीट की जांच कराने की बात कही है। दुर्भाग्य तो तब और हुआ कि महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री ने भी अपने गृह मंत्री अनिल देशमुख  के निर्णय पर मुहर लगा दी। उनका कहना कि इन दोनों भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त माननीयों  सहित देश के अन्य अनेक गणमान्य सितारों ने किन के दबाब मे देश की सर्वभौमिकता के पक्ष मे ट्वीट किया? क्या भारत देश के लोकतान्त्रिक और सर्व भौमिकता के पक्ष मे लिखना, बोलना, ट्वीट करना अपराध है? क्या साधारण जनों के सहित देश के गौरव,  भारत रत्न लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर साहित गणमान्य प्रतिष्ठित  लोगो को अपनी देशभक्ति के दर्शन और प्रदर्शन के लिए महाराष्ट्र सरकार की अनुमति लेनी होगी? मंत्रियों, विधायकों की ज्ञान, बुद्धिमत्ता पर फख्र करना इतराना तो समझा जा सकता है लेकिन इन गौरवशाली व्यक्तियों द्वारा  देश के पक्ष मे ट्वीट करने के  निर्णय लेने की क्षमता पर संदेह  करना क्या इन मंत्रियों की ओछी और तंग मानसिकता का परिचायक नहीं? लता मंगेशकर और सचिन जैसी भारत श्रेष्ठ हस्तियाँ जो अपने अपने क्षेत्रों मे दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ अनुभव और दुनियाँ भर मे अपना एक अलग महत्वपूर्ण स्थान रखते है, तो क्या विधायक और मंत्री उन्हे अच्छे-बुरे का पाठ सिखाएँगे? क्या माननीय गृह मंत्री महाराष्ट्र सरकार इन विशिष्ट महत्वपूर्ण हस्तियों को नादान बच्चा समझते है जिन्हे अच्छे बुरे की पहचान सिखाई जाये? बेशक महाराष्ट्र के विधायकों, गृह मंत्री या मुख्य मंत्री को  भारत के इन गौरवशाली   रत्नों के ट्वीट पर किसी दवाब की शक या शंका  हो पर देश की 130 करोड़ जनता को लेश मात्र भी संशय नहीं कि दुनियाँ की कोई ताकत, कोई शासन सत्ता या कोई धन कुबेर उनके उपर दबाब डाल ट्वीट कराने को मजबूर कर सके।  सिर्फ और सिर्फ छुद्र और विक्षिप्त मानसिकता का ही व्यक्ति ऐसी गिरी हुई सोच रख इन हस्तियों  पर बेहूदा आरोप लगा सकता है। कॉंग्रेस के चाटुकार नेता शायद ये भूल गये कि आसमान की ओर देख कर थूंकने बाले लोगो के मुंह पर ही थूंक बापस गिरता है।

काश गृह मंत्री महोदय अनिल देशमुख अपने श्रीमुख से मुंबई सहित देश के दुश्मन दाऊद इब्रहीम के बारे मे जांच करने के आदेश पर विचार कर अपने बल और पौरुष का प्रदर्शन करते तो महाराष्ट्र सहित देश की जनता उन्हे अपने सिर आँखों पर बैठाती, उनकी वाहवाही, शाबाशी और जय जय कार करती। 

कॉंग्रेस की एक  नेत्री ने 9 फरवरी को टीवी परिचर्चा पर  ये कहते हुए काँग्रेस का बचाव किया कि "लोगो को ये नहीं भूलना चाहिये कि श्री सचिन तेंदुलकर को राज्य सभा मे सांसद के रूप मे मनोनीत करना एवं भारत रत्न पुरस्कार से विभूषण  काँग्रेस के  ही कार्यकाल मे किया गया था"!! तो क्या ये माना जाये कि सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से नवाजना या राज्य सभा मे मनोनीत करने से उन्हे ये अधिकार मिल जाता है कि उनके राष्ट्रभक्ति पूर्ण ट्वीट करने पर उनकी जांच करें? या सचिन तेंदुलकर के  विरूद्ध उनके कार्यकर्ता उनकी आदमक़द कट आउट पर  कालिख पोत उनको अपशब्द कह उनकी निंदा और आलोचना करें? 

केरल काँग्रेस के इस कुत्सित घटना को देख मुझे भक्त प्रहलाद एवं हिरण्य कश्यप की कथा याद हो आई जिससे आप सभी भलीभाँति परिचित होंगे। कैसे आसुरी मानसिकता और अपने विचार  को थोपने के लिये दैत्यराज हिरण्य कश्यप ने भक्तपरायण  अपने ही पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिये होलिका की सहायता ली! कैसे ईश्वर भक्त प्रह्लाद को अग्नि छू भी न सकी और कैसे होलिका स्वयं ही अग्नि मे जल कर भस्म हो गई!! ठीक इसी तरह सारे देश ने एक  विडियो मे  देखा कि सचिन के आदम कद कट आउट पर लीटरों कालिख डालने के प्रयास करने वाले केरल काँग्रेसी  सदस्यों की  एक बूंद कालिख उस कट आउट पर न टिक सकी अपितु इन कार्यकर्ताओं की झक सफ़ेद  लुंगियाँ जरूर कालिख से काली हो गई। ये घटना  इन विक्षिप्त  नेताओं को ये सख्त संदेश  है कि देश की 130 करोड़ ईश्वर रूपी जनता की क्रोधाग्नि इन छद्म नेताओं के  शासन सत्ता के मद मे चूर इनके अहंकार रूपी ताकत  को ठीक होलिका की तरह अग्नि मे भस्म कर देगी। सरकार की निर्दयी, कुत्सित एवं तानाशाही सोच वाली अग्निपरीक्षा से देश की करोड़ो जनता की आँखों के तारे, दुनियाँ  के गौरव, सम्मानीय लता मंगेशकर एवं सचिन तेंदुलकर  खरे सोने की भांति  चमकदार सूर्य के सदृश्य और निखरेंगे एवं उज्ज्वलित होंगे।    

जिस व्यक्ति को देश और दुनियाँ के करोड़ो क्रिकेट प्रेमी क्रिकेट की दुनियाँ का बेताज बादशाह मान भगवान की श्रेणी मे रख पूजते है, खेद और अफसोस है कि केरला और महाराष्ट्र के कुछ चाटुकार कोंग्रेसी कार्यकर्ताओं ने अपने आकाओं की तलुओं के रसास्वादन करने वालों की  सूची मे जगह पाने के लिए सचिन के आदम कद चित्र के उपर कालिख पोतने विरूपित करने और नारे लगाने का कायरता पूर्ण दुस्साहस किया है। उनकी इस क्रूर और कायरता पूर्ण कृत को सारा देश न केवल उनकी निंदा और आलोचना कर रहा है बल्कि उन की छद्म और दिवालिया मानसिकता पर बहुत बड़े सवाल भी कर रहा है?            

अपनी लेखनी से उन दो दुष्टाओं और एक अवोध बालिका का नाम लिखना भी हम लेखनी का अपमान समझते है जिन्होने किसान आंदोलन के बहाने हमारे देश की सर्वभौमिकता को चुनौती दी एवं  हमारे अंदुरुनी मामले मे दखल देने का कुत्सित प्रयास किया। हम इनका नाम लिख कर इन तीनों का महिमा मंडन भी नहीं  करना चाहते क्योंकि इन लोगो को हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत, गौरवशाली परंपरा और प्राचीन भारतीय  संस्कार को जानने समझने के लिये कदाचित सात जन्म भी कम पढ़ें!!

विजय सहगल